लॉकडाउन शुरू हुए तीन हफ्ते बीत चुके हैं. सामान्य दिनों में दिनभर आवारागर्दी की आदत रही है. जब लाॅकडाउन की घोषणा हुई तब लगा कि यार, दिन भर अकेले में समय कैसे कटेगा? क्या करूंगा दिन भर बैठे-बैठे? कद्दू में तीर तो मैं और दिन भी नहीं मारता. यहां-वहां जाकर मुफ्त की चाय पीता हूं और लोगों को बोर करता हूं. उस पर तुर्रा ये कि अधिकांश लोगों के विचारों से सहमत नहीं होता हूं. चीजों को देखने का अपना जरा अलग नजरिया है. वो अलग बात है कि यार-दोस्त भले लोग लोग हैं, मुझे बरदाश्त कर लेते हैं. कोई अनदेखा नहीं करता.

इस विश्वव्यापी वायरस से फिलहाल मुझे यह फायदा हुआ कि फिर से किताबों की संगत में हूं. इससे बेहतर कोई संगत हो भी नहीं सकती. दिन का अधिकांश हिस्सा पढ़ने में बीत रहा है. कई किताबें अधपढ़ी, अनपढ़ी रह गयी थीं. न पढ़ने के पीछे कोई बहाना नहीं, बस, पढ़ने की आदत छूट-सी गयी थी. आजकल दो दिन में औसतन एक किताब का स्कोर चल रहा है. किताबों का कोटा अब खात्मे की ओर है. लगता है कोई नया शगल पालना पड़ेगा. फिल्में देखने में भी अच्छा समय बीतता है. पर वह कोटा तो पहले ही खत्म हो चुका है.

लेकिन हर कोई इतना खुशनसीब नहीं कि दिन भर घर बैठा रहे और दाने-पानी का भी इंतजाम हो जाये. लॉकडाउन के बाद टीवी और सोशल मीडिया पर कई दिल दहला देने वाली तस्वीरें-खबरें सामने आ रही हैं. साधनहीन प्रवासी श्रमिक सैकड़ों-हजारों की तादात में कई दिनों-हफ्तों के सफर के लिये अपने घरों को पैदल चलने को मजबूर हैं. गोद में बच्चा और सर पर गठरी, दाना न पानी. बेयारो-मददगार चिलचिलाती धूप में चले जाते हैं.

व्यवस्था इन्हें बेरहमी से पीट रही है, सड़क पर मुर्गा बना कर अपमानित कर रही है. बहुत सारे लोग इन अपमानजनक तस्वीरों और वीडियोज को शेयर करके मजे ले रहे हैं. कोई इसे पुलिस द्वारा बांटा जा रहा प्रसाद कह रहा है तो किसी को इसमें साम्प्रदायिक सद्भाव नजर आ रहा है कि टोपी और तिलक वाले में कोई भेद नहीं हो रहा है. एक ही लाठी से सब बिना किसी भेदभाव के पिट रहे हैं. यह बड़ा ही भद्दा मजाक है, बल्कि क्रूरता है. आखिर कोई इतना क्रूर कैसे हो सकता है!

लेकिन सारी ही तस्वीरें ऐसी भी नहीं हैं. कई तस्वीरें सकारात्मक भी हैं. इन मुसीबतज़दा लोगों को कहीं-कहीं खाना-पानी और सहानुभूति भी मिल रही है. ऐसी तस्वीरें कुछ दिलासा देती हैं कि नहीं, अभी सभी कुछ नहीं सड़ गया है. काफी कुछ बचा है. यह दिलासा कुछ ऐसी ही है कि जैसे मनुष्य का लीवर सौ फीसदी खराब न हुआ हो.

यह कोई नई बात नहीं हुई. इसका अस्तित्व पहले भी था. लेकिन इस समय इसे साफ महसूसा-देखा जा सकता है कि हम दो हिस्सों में बंटे हुए हैं. एक तबका वह जो हफ्तों की रसद भरकर आराम से घरों में सुरक्षित बैठा है. दूसरा तबका वह है जो बिना दाना-पानी के कंधे पर सामान लादे अकेला या परिवार के साथ पैदल सफर करने को मजबूर है और पिट भी रहा है. इनके श्रम से पूंजी का निर्माण होता है, सेठों के गल्ले भरते हैं. उन सेठों के पास इतनी संवेदना नहीं बची कि हालात सामान्य होने तक इनके रहने-खाने की व्यवस्था कर सकें. रही बात व्यवस्था की, तो उससे सवाल करना सदा से ही गुनाह रहा है. मौजूदा समय तो और भी कठिन है. इन बेसहारा मुसाफिरों में जो बच पायेंगे वे अपने ही जतन-जुगाड़ और भाग्य के भरोसे अपनी मंजिल पर पहुंचेंगे. व्यवस्था से एक हद के बाद उम्मीद करना नासमझी है और आसमान से कोई फरिश्ता आज तक तो उतरा नहीं.

अपने घर में नमक-रोटी तो जुट ही जायेगी की आस में जो लोग सफर में निकल पड़े हैं, वो सभी गिरते-पड़ते जल्दी ही अपने घर पहुचेंगे, मनुष्य होने के नाते इस समय यही हम सबकी कामना होनी चाहिये. यकीनन दुश्वारियां बहुत होंगी लेकिन बीच-बीच में छोटी-छोटी राहतें भी मिलेंगी. थोड़ा कठिन समय देखते ही कुछ लोग घोषणा कर देते हैं कि आदमी वहशी हो गया है और इंसानियत मर गयी है. यह ठीक नहीं है. जब तक धरती पर मनुष्य विचरता रहेगा, मानवता भी रहेगी. भारतीय श्रमिक वर्ग के पास असीम जिजीविषा के अलावा कभी कोई चीज रही नहीं. फौलाद पिघला देने वाला यही जज्बा सदा ही उसका संबल रहा है. इस बार भी यही उसे अपनी मंजिल तक पहुंचायेगा. पर दिल थाम कर बैठिये, हम आने वाले दिनों में अनगिनत कलेजा चीर देने वाली त्रासद कहानियों के श्रोता होने वाले हैं.

दिल-दिमाग को हिला देने वाली तस्वीरों को देख कर श्मशान वैराग्य की तर्ज पर लगता है कि कुछ लोग नये-नये नास्तिक हुए हैं. वो पूछ रहे हैं कि ईश्वर कहां है या उन्हें इल्हाम हो रहा है कि ईश्वर है ही नहीं. पता नहीं ईश्वर है कि नहीं पर इतना तो तय है कि वह दयालु तो हरगिज नहीं. या फिर यह सिस्टम उसके हाथ में नहीं.

समय चाहे जितना भी क्रूर हो उसकी सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि वह चलायमान है. व्यतीत होने के अलावा उसके पास कोई चारा नहीं है. यही बड़ी राहत है फिलहाल हमारे लिये. ऐसी मुसीबतें पहले भी इस धरती पर आयी हैं अलग-अलग रूपों में. बाढ़, अकाल, युद्ध और दावानल जैसे रूपों में आती रही हैं. हम मनुष्य इनसे टकराये, इन्हें खदेड़ा और ठिकाने लगा दिया. इस बार भी यकीनन हम ही विजयी होंगे. बस थोड़ा सावधानी, सतर्कता और चौकन्नेपन की जरूरत है.

कुछ पल के लिये सूरज के आगे बादल आ जाने को सूर्यास्त मान बैठना ठीक नहीं. मनुष्य कुल मिला कर जीने और परस्पर प्यार करने के लिये ही जन्मा है. कोई भी उससे उसका यह हक छीन नहीं सकता.


यह लेख मूलत: नैनीताल समाचार पर प्रकाशित हुआ है.