कोरोना वायरस के प्रकोप के चलते भारत में 21 दिन का लॉकडाउन चल रहा है. दुनिया के तमाम देश भी लॉकडाउन की राह पर चल पड़े हैं. इन देशों की सरकारों ने यह कदम वायरस को फैलने से रोकने के लिए उठाया है. लेकिन इसके बाद भी कोरोना वायरस के मामले तेजी से बढ़ते जा रहे हैं. इसके संक्रमण से हुई मौतों का आंकड़ा 76 हजार छूने को है जबकि इसकी चपेट में आए लोगों की संख्या 13 लाख पार गई है.

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या केवल लॉकडाउन लगाने से ही कोरोना वायरस को काबू किया जा सकता है और क्या इस महामारी को फैलने से रोकने के लिए सरकारों को और ज्यादा उपाय नहीं करने चाहिए?

कोरोना वायरस की उत्पत्ति चीन से हुई, इसलिए जाहिर है कि चीन की सरकार को इसकी गंभीरता समझने और इससे निपटने की तैयारी करने के लिए उतना समय नहीं मिला होगा जितना अन्य देशों के पास था. इसके बावजूद चीन ने दो महीने में इस महामारी पर लगभग काबू पा लिया है. चीन में फरवरी के दौरान एक दिन में कोरोना वायरस के पांच-पांच हजार मामले सामने आते थे, लेकिन अब बीते एक हफ्ते से यह आंकड़ा 40 से भी नीचे बना हुआ है. आज तो वहां कोरोना वायरस से एक भी मौत दर्ज नहीं की गई.

बहुत से लोग मानते हैं कि ऐसे में केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को लॉकडाउन के अलावा कोरोना से निपटने के लिए वे तरीके अपनाने की जरूरत है, जो चीन ने अपनाये हैं.

तकनीक का बेहतरीन इस्तेमाल

चीन में कोरोना वायरस के प्रकोप के दौरान सबसे सराहनीय काम वहां की तकनीक से जुडी कंपनियों ने किया. चीन के दिग्गज अलीबाबा ग्रुप की कंपनी ‘अली पे’ ने एक ऐसा मोबाइल एप तैयार किया जिसने सरकार की कोरोना वायरस से लड़ाई आसान कर दी. इस एप के जरिये लोग घर बैठे कोरोना वायरस को लेकर अपनी स्थिति का पता लगा सकते हैं. इस एप के बनते ही सरकार ने नागरिकों को इस पर रजिस्ट्रेशन कराने का निर्देश दिया. एप पर रजिस्ट्रेशन के लिए लोगों को अपना नाम, राष्ट्र्रीय आईडी नंबर (आधार नंबर जैसा) और मोबाइल नंबर देना होता है.

इसके बाद एप पर यूजर से कई सवाल पूछे जाते हैं. ये सवाल उसके स्वास्थ्य और बीते दो हफ्तों के दौरान की गयी यात्रा से संबंधित होते हैं. यूजर से यह सवाल भी पूछा जाता है कि क्या वह पिछले दिनों किसी कोरोना पीड़ित से मिला है या फिर किसी कोरोना संक्रमित इलाके में गया है. इन तमाम सवालों के जवाब के आधार पर एप तीन तरह के (लाल, पीला और हरा) क्यूआर कोड जेनरेट करता है. यह जानकारी सरकारी एजेंसी के पास भी पहुंच जाती है.

हरे रंग का क्यूआर कोड जेनरेट होने का मतलब कि यूजर की हालत ठीक है और वह शहर में कहीं भी आने-जाने के लिए आजाद है. हालांकि, ऐसे लोगों को सार्वजनिक स्थलों, सुपर मार्केट, स्कूल, टोल प्लाजा और पुलिस चेकिंग पॉइंट जैसी जगहों पर हरा क्यूआर कोड दिखाने के बाद ही आने-जाने की अनुमति मिलती है.

अगर किसी यूजर का पीले रंग का क्यूआर कोड जनरेट होता है तो इसका मतलब है कि उसे एक हफ्ते के लिए खुद को घर में सबसे अलग-थलग यानी आइसोलेट करना है. इसी तरह लाल क्यूआर कोड वाले यूजर को 14 दिनों के लिए खुद को आईसोलेट करने की सलाह दी जाती है. लाल और पीले क्यूआर कोड पाए लोगों को आइसोलेशन के दौरान रोज एप में जाकर अपनी स्थिति बारे में जानकारी देनी पड़ती है. इस दौरान एप उसके लक्षणों के आधार पर उसे गाइड करता है. अगर सब कुछ सही रहता है तो आइसोलेशन का समय पूरा होने के बाद पीले और लाल क्यूआर कोड वाले यूजर्स को भी हरा क्यूआर कोड दे दिया जाता है.

अलीबाबा द्वारा बनाये गये इस एप को पहली बार 11 फरवरी को चीन के झेजियांग प्रांत की राजधानी हांगझोऊ में लांच किया गया. पहले दिन 65 लाख लोगों ने इसके जरिये अपने लिए क्यूआर कोड जनरेट किये. अगले चार दिनों में इस एप को चीन के 100 बड़े शहरों में लांच किया गया और करोड़ों लोगों ने इस पर अपना रजिस्ट्रेशन करवाया.

चीन का लॉकडाउन

चीन में लॉकडाउन लागू करने का तरीका भारत से बिलकुल जुदा था. वहां पूरे देश में लॉकडाउन लगाने की बजाय, केवल उन्हीं इलाकों में लगाया गया था, जो कोरोना वायरस से बुरी तरह प्रभावित थे. लॉकडाउन के दौरान इन इलाकों में मौजूद प्रत्येक कॉलोनी के बाहर एक सरकारी स्वास्थ्यकर्मी तैनात किया गया जो कॉलोनी में किसी के प्रवेश करने से पहले उसकी स्वास्थ्य की जांच करता था. कॉलोनी के मुख्य गेट पर ही अंदर जाने से पहले लोगों के जूतों पर ब्लीच का घोल डाला जाता था जिससे जूतों से संक्रमण को दूर किया जा सके.

भारत में लॉकडाउन के दौरान लोगों को जरूरी वस्तुएं खरीदने के लिए बाजार जाने की इजाजत है. लेकिन चीन में ऐसा नहीं था, वहां लॉकडाउन के दौरान लोगों के घर पर ही खाने-पीने का सामान पहुंचाया जाता था. यहां तक कि सरकार ने एक ऐसा तरीका निकाला जिससे स्थानीय प्रशासन को यह पता चल जाता था कि किसी के घर का दरवाजा दिन में कितनी बार खुला. इसके लिए दरवाजों पर एक चुंबकीय पट्टी यानी मैगनेटिक स्ट्रिप लगाई गयी थी, जो घर के मालिक के स्मार्टफोन में इंस्टॉल एक एप से कनेक्ट रहती थी. इस एप के जरिये दरवाजे पर निगाह रखी जाती थी. अगर किसी का दरवाजा दिन में ज्यादा बार खुलता था तो उसे एप के जरिये पुलिस को इसका कारण बताना पड़ता था. हालांकि भारत जैसे किसी लोकतंत्र में ऐसा करना शायद संभव नहीं है लेकिन बाकी चीजों के मामले में तो चीन की तरफ देखा ही जा सकता है.

मुफ्त जांच और इलाज

बीते हफ्ते विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) ने भारत सहित उन तमाम देशों को चेताया था जहां कोरोना वायरस के टेस्ट करने की गति काफी धीमी है. संगठन का कहना था कि केवल लॉकडाउन से फायदा नहीं होगा, ज्यादा से ज्यादा लोगों की जांच के बिना इस महामारी पर काबू करना संभव नहीं है. डब्लूएचओ के मुताबिक ज्यादा लोगों की जांच करने से कोरोना वायरस का पीड़ित जल्द पकड़ में आएगा और इससे वायरस को फैलने से रोका जा सकेगा.

चीन ने फरवरी में ज्यादा से ज्यादा लोगों की जांच कराने के मकसद से एक बड़ा फैसला लिया, उसने कोरोना वायरस की जांच मुफ्त में करने की घोषणा की. साथ ही यह भी कहा कि कोरोना पीड़ितों से इलाज का पैसा नहीं लिया जाएगा. एक रिपोर्ट के मुताबिक चीन में कोरोना टेस्ट की कीमत लगभग 370 युआन (4,000 रुपए) है. जबकि कोरोना पीड़ित व्यक्ति के इलाज का खर्च करीब 5,600 युआन (करीब 60 हजार रुपए) से लेकर 23,000 युआन (करीब ढाई लाख रुपए) तक आता है. चीन की सरकार ने केवल कोरोना वायरस की जांच, लोगों के इलाज और मेडिकल उपकरणों के लिए ही 110 अरब युआन यानी करीब एक लाख 18 हजार करोड़ रुपए का बजट तत्काल प्रभाव से जारी किया था.