मुरलीधर आज वहां नहीं था. दुपहर की उस घड़ी में क्लब उजाड़ दिखाई देती थी. दुपहर के समय सिर्फ़ बिलियर्ड खेलने कुछ लोग आते थे. लायब्रेरी के रीडिंग रूम में कुछ रिटायर्ड अफ़सर दिखाई दे जाते, अखबारों और पत्रिकाओं पर झुके हए. पीछे बार थी, जिसके दरवाज़े लॉन की तरफ़ खुलते थे. धूप में चमकती हुई पहाड़ियां हर खिड़की से दिखाई दे जाती थीं.

वहीं एक कोने की मेज़ पर डॉक्टर सिंह बैठे थे. हर दुपहर, एक ही टेबल पर. ‘दूसरों को क्लीनिक में देखता हूं, अपने को यहां!’ वह कहा करते थे.

मुझे देखकर हाथ हिलाया, खाली कुर्सी को पीछे धकेल दिया, कहा कुछ नहीं, मुंह में दबी सैंडविच चबाते रहे. मैं बैठ गया.

‘पोस्ट ऑफ़िस हो आए ?’

‘जी.’

‘कुछ खाओगे?’

मैंने सिर हिलाया. उन्होंने मेरे लिए बियर मंगाई. उनका गिलास मेज़ पर रखा था. बियर और सैंडविच, यही उनका दुपहर का लंच था.

बार खाली थी. दुपहर की धूप खाली कुर्सियों, मेज़ों पर गिर रही थी.

उन्होंने सिर उठाया, ‘तुम कहते थे, मुझसे कुछ काम था’

आप बहुत दिन से आए नहीं. एक बार उन्हें देख लेते.’ देख लूंगा...’ इस बार मुझ ध्यान से देखा, ‘कोई फ़िक्र की बात?’

‘आप जानते हैं, वह अपनी बात किसी से कहते नहीं.’

वह चुपचाप खाते रहे-बियर का घूट लिया.

‘तुम्हें जो लिखाते हैं, वह अपने बारे में नहीं है ?’

क्या वह हंस रहे हैं ? उन्हें देखकर पता नहीं चलता. उनका स्वर एक रहता है-पीने के बाद भी कोई अन्तर नहीं आता. मझे उनसे हमेशा ईर्ष्या होती है.

‘उन्हें कोई तकलीफ़ है ?’ उन्होंने मेरी ओर देखा.

‘तकलीफ़? नहीं, तकलीफ़ नहीं. हो सकता है, वह आपसे कुछ कहना चाहें, जो और किसी से नहीं कह सकते हों. आप उन्हें बरसों से जानते हैं.’

‘डॉक्टरी पेशा ही ऐसा है. वहां जानने का मतलब कुछ नहीं. दो और दो चार, बस इतना ही. जब कभी पांच हो जाता है, तो हम उसे चमत्कार कहते हैं. तुम चमत्कारों में विश्वास करते हो ?’

उनके साथ ऐसा होता था. बात पटरी से उतरकर कहीं की कहीं चली जाती थी. मैं एक जगह रुका रहता था, वह हर जगह दिखाई देते थे.

‘आप करते हैं?’

‘क्यों नहीं... तुम्हें याद है, जब तुम पहली बार मुझसे मिलने आए थे ?’ ‘मैं नहीं, मिसेज़ मेहरा लाई थीं.’ मैंने कहा.

‘हां, वही तो!’ वह हंसने लगे, ‘वह असाधारण औरत थीं. अपने साथ अजीब जीव-जन्तुओं को लेकर मेरे पास आती थीं. लेकिन तुम सबसे निराले थे!’

‘आपने मुझे मुश्किल से दस मिनट देखा होगा.’

‘मेरे लिए वे काफ़ी थे. जानते हो, पुराने जमाने के वैद्यराज सिर्फ़ चेहरे का रंग देखकर देह का रोग पहचान लेते थे!’

‘मुझे नहीं मालूम था, आप आयुर्वेद में विश्वास रखते हैं.’

‘चेहरों को तो पहचानता हूं’

‘मुझमें आपने क्या देखा ?’

‘मैंने सोचा था, तुम महीना खत्म होते ही इस बियावान से भाग निकलोगे.’

‘आपका अनुमान ग़लत निकला-देखिए, मैं यहीं हूं’

‘यही तो चमत्कार है.’

उन्होंने सिगरेट सुलगाई, कुसी के सिरहाने सिर टिकाकर और खिड़की के बाहर पेड़ों पर छाया उतरने लगी थी.

‘जानते हो, मेहरा साहब ने मुझे क्यों बुलाया है?’ उन्होंने आंखें मूंदे-मूंदे ही पूछा.

‘किसलिए?’

‘वह जानना चाहते हैं, कितना समय और बचा है.’

‘कैसा समय?’

‘जीने का.’ उनकी मुंदी आंखें खुल गईं, ‘कितने दिन, महीने, साल?’

मुझे हल्का-सा झटका लगा.

‘उनकी उम्र में शायद सबको ऐसा होता है.’

‘उम्र की बात नहीं...क्या चौबीस घंटे हमें अपनी उम्र याद रहती है? जो चीज़ याद रहनी चाहिए, उसे हम भूल जाते हैं.’

‘कौन-सी चीज़ ?’

‘जैसे यह...’ उन्होंने हल्के-से मेरी छाती को थपथपाया, ‘दिल, देह, बीमारी, शोक...सब! तुम्हें क्या यह अजीब नहीं लगता कि जो चीज़ हमेशा हमारे साथ रहती है, उसी के बारे में हम डॉक्टरों से पूछने जाते हैं या ज्योतिषियों से.’

‘आप पर उनका भरोसा जो है.’ मैंने कहा.

‘भरोसा होता तो मेरी बात नहीं सुनते? कितनी बार उनसे कहा, अपनी बेटी के पास जाकर क्यों नहीं रहते? आख़िर डॉक्टरी तो वह भी करती है.’

‘फिर?’

‘फिर क्या-कहते हैं, मैं उस पर बोझ नहीं बनना चाहता.’ उन्होंने सिगरेट को ऐश-ट्रे में मसल दिया, जैसे बहुत गस्से में हों, ‘सच बात तो यह है, वह यहां से जाना नहीं चाहते!’

‘क्यों, मिसेज़ मेहरा नहीं हैं ?’

मैंने उन्हें देखा. वह नशे में तो नहीं बहक रहे!

‘नहीं, मैं सिमिट्री की बात नहीं कर रहा, जहां वह दबी हैं. मैं घर की बात कर रहा हूं, जहां कभी वह रहती थी. उस घर को छोडना आसान है?’

वह खिड़की से बाहर देख रहे थे, सूरज पर कोई बादल अटका था, एक थकी-सी छांह शहर पर चली आई थी.

‘मैं चलता हूं’ उन्होंने वेटर को बुलाकर बिल पर दस्तख़त किए, फिर मेरी ओर देखा.

‘तुम्हें मेरी बात अजीब लगी?’ उन्होंने कहा, ‘लेकिन ऐसा होता है. आदमी की काया उसे छोड़कर चली जाती है, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह अपने घर को छोड़ देता है, जहां उसके प्राण बसे हैं. मेहरा साहब क्या उन्हें पीछे अकेला छोड़कर जा सकते हैं?’

उन्होंने अपने गिलास से बियर का अन्तिम चूट लिया और उठ खड़े हुए.

‘मुझे तो जल्दी है. आप बैठिए, और उनसे कहिएगा, घबराएं नहीं. मैं एक-दो दिन में आऊंगा.’

कुछ देर बाद मैं क्लब से बाहर चला आया. पीछे की तरफ़ एक कच्चा रास्ता था, जो फॉरेस्ट रेस्ट हाउस की तरफ़ जाता था. कुछ दूर चलकर एक छोटी-सी उठान आती थी, चारों तरफ़ चीड़ के ऊंचे पेड़ और बीच में धूप में नहाती झिलमिलाती घास. किसी ने उसका नाम ‘पाइन ग्रोव’ ठीक ही रखा था. गर्मियों में यहां टूरिस्ट पिकनिक के लिए आते थे, लेकिन इन दिनों वह जगह उजाड़ पड़ी रहती थी. चीड़ की सुइयों पर पांव बार-बार फिसल जाते थे. मेरी घर लौटने की कोई इच्छा नहीं थी, इसलिए कुछ देर के लिए मैं वहीं बैठ गया. बियर का हल्का-सा नशा रहा होगा या पाइन की पत्तियों की सूखी, नशीली गन्ध कि बैठते ही लेटने को मन हुआ और लेटते ही नींद के हल्के झोंके ने एक चादर की तरह मुझे ढंक लिया. कुछ देर तक पलकों पर धूप की रंग-बिरंगी बंदकियां नाचती रहीं, फिर वे धीरे-धीरे हवा की आहटों में बदल गई, जो ऊपर फरफराती फुनगियों से नीचे आ रही थी. एक सूनी-सी सरसराहट जो सिर्फ बीच जंगल में सुनाई देती है, एक पहाड़ के छोर से दूसरे पहाड़ की ओर भागती हुई. अचानक घंटियों की आवाज़ सुनकर मेरी आंख खुल गई. सूरज कहीं कोने में चला गया था. एक पहाड़ी लड़की सिर पर सूखी टहनियों और घास का गट्ठर लेकर जा रही थी. उसके आगे एक छोटा-सा लड़का डंडी घुमाता हुआ उन भेड़-बकरियों को हांक रहा था, जो घंटियां बजाते हुए इधर-उधर दौड़ने लगती थीं. मैं उठ खड़ा हुआ और पगडंडी की राह से नीचे उतरने लगा.