भारत मे कोरोना वायरस के कारण आम इंसान तकलीफ़ में हैं. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक अब तक इसकी चपेट में करीब चार हजार लोग आ चुके हैं जिनमें से डेढ़ सौ लोगों की मौत हो चुकी है. लेकिन इस तकलीफ़ के सबसे बड़े शिकारों में लाखों बेजुबान भी शामिल हैं. कोरोना वायरस की वजह से पैदा हुई परिस्थितियों का सबसे बुरा असर राजस्थान ओर गुजरात के लाखों पशुओं और पशुपालक जातियों पर भी देखने को मिल रहा है. लेकिन फिलहाल ये सब चर्चा से बाहर हैं.

राजस्थान के मारवाड़ तथा गुजरात के कच्छ क्षेत्रों में ऊंटों ओर भेड़-बकरियों का पालन बड़े स्तर पर किया जाता है. अकेले मारवाड़ में दो लाख ऊंट, 90 लाख से ज्यादा भेड़-बकरियां तथा 60 हज़ार से ज्यादा गधे हैं. ऐसे ही गुजरात के कच्छ क्षेत्र के तैरने वाले ऊंट काफी मशहूर हैं.

ऊंट, गधे ओर भेड़-बकरियों के बिना रेगिस्तान में जीवन की कल्पना करना सम्भव नहीं हैं. दुनिया मे पाए जाने वाले सभी गर्म रेगिस्तानों में थार का मरुस्थल ही सबसे अधिक मानव बसावट वाला है. इसे इतना सजीव बनाने में इसकी पशुपालक जातियों और यहां के पशुओं का ही योगदान रहा है. इन पशुओं ने अपने आप को रेगिस्तान के अनुरूप ढाल लिया है और ये यहां के समाज की तरह-तरह की जरूरतें पूरी करते हैं.

यहां पशुपालन के व्यवसाय में रायका-रैबारी, बागरी ओर बावरिया समाज जुड़े हुए हैं. ये समाज सदियों से यह काम करते हुए आ रहे हैं. भारत में ऊंट पालने का काम सभी जातियां करती हैं किन्तु इनकी ब्रीडिंग रायका- रैबारी लोग ही करवाते हैं. ये ब्रीडिंग राजस्थान के मारवाड़ के साथ-साथ गुजरात के कच्छ में भी होती है. लेकिन कभी राजे-रजवाड़ों की शान रहे, राजस्थान के राज्य पशु ऊंट को रायका- रैबारी लोग रेगिस्तान के मिट्टी के धोरों में खुला छोड़ने पर विवश है. उनके पास इन्हें खिलाने के लिए कुछ नहीं है. यहां के भेड़-बकरी पालक भी हताश हैं. जब उनके पास खाने को कुछ नही हैं तो वे रेवड़ को क्या खिलाएं?

प्रतिकूल परिस्थितियों में अनुकूलन कैसे करते हैं?

मार्च महीने की शुरुआत में बाड़मेर में लगने वाले चैत्री मेले के बाद राजस्थान के ज्यादातर पशुपालक अपने-अपने पशुओं के काफिलों को लेकर चरागाह ओर पानी की तलाश में निकल पड़ते हैं. ठीक ऐसा ही गुजरात के कच्छ में भी होता है.

इस दौरान रेगिस्तान का क्षेत्र पूरी तरह से सूख जाता है. वहां जानवरों के लिए चारा और पानी तो दूर की बात है इंसानों के रहने की परिस्थितियां ही बेहद विकट होती हैं. ऐसी स्थिति में पशुपालकों के कुछ काफिले हरियाणा, पंजाब की ओर तो कुछ मध्य-प्रदेश की ओर निकलते हैं. अगस्त के अंत में जब रेगिस्तान में थोड़ी बारिश होती है, तब ये लोग अपने टोलों को लेकर वापस लौटते हैं.

पशुओं के क्षेत्रीय स्थानांतरण की यह परंपरा सदियों से चली आ रही है. किन्तु इस वर्ष चैत्री मेले को ही सरकार ने बीच मे बंद कर दिया. इससे पशुपालकों को अपने पशुओं को या तो वापस लेकर आना पड़ा या वहीं मेले में ही खुला छोड़ देना पड़ा. जब अपने खाने को नहीं है तो ऊंटों को खिलाने की व्यवस्था कैसे करें!

जैसलमेर के सम में रहने वाले ऊंट पालक साजन भी चैत्री मेले में गये थे. उन्हें उम्मीद थी कि इस बार उनके ऊंट बिक जायेंगे तो वे राशन की दुकान का पैसा चुका सकेंगे और बचे हुए पैसे से अपने छोटे भाई-बहन को पढ़ा सकेंगे. लेकिन सबकी उमीदों पर पानी फिर गया.

साजन बताते हैं कि ‘जब सरकार ने अचानक ही बीमारी (कोरोना वायरस) की वजह से मेले को बीच में बंद करवा दिया तो हमारी अंतिम उम्मीद भी समाप्त हो गई. इन ऊंटों को वापस कैसे लेकर आते? सोचा घर पर भी ये ऊंट भूख से मरेंगे तो इससे अच्छा है कि उनको 500-1000 रुपये में किसी को बेच दें. लेकिन वहां 500 रुपये में भी कोई ऊंट लेने वाला नहीं था तो वहीं छोड़कर आ गया.’

एक ऊंट एक दिन में 20 किलो चारा खाता है. 10 किलो सुबह और 10 किलो शाम को. सूखे चारे की कीमत पहले 10 रु प्रति किलो थी अब और बढ़ गई है. इस हिसाब से एक दिन का ख़र्चा हुआ कम से कम 200-250 रुपये. एक महीने का एक ऊंट का खर्च होगा करीब सात-आठ हजार रुपये. सामान्यतः हर व्यक्ति के पास 8- 10 ऊंट हैं. वे इनको खिलाने के लिए इतना पैसा कहां से लेकर आएं?

ऊंट रेगिस्तान का जहाज है तो बकरी को गरीब की गाय कहा जाता है. बकरी को थोड़ा सा चराकर कभी भी ओर कितनी बार भी दूध निकाला जा सकता है. उसका दूध कई मायनों में गाय और भैंस के दूध से भी ज्यादा उपयोगी होता है. मरुभूमि में गरीब व्यक्ति के पोषण का आधार बकरी ही है जो उसके जीवन और अस्तित्व से जुड़ी है.

अकेले मारवाड़ में 95 लाख से ज्यादा भेड़ बकरी हैं. बदले हालात में इतनी बकरियों को चारा उपलब्ध करवावाना किसी भी सरकार के लिए सम्भव है? और यह चार माह अर्थात अगस्त माह तक उपलब्ध करवाना है. इससे भी बड़ी बात है मवेशियों के लिए पानी का प्रबंधन करना. जहां इंसानों के लिए पानी नहीं है वहां इतने बड़े स्तर पर पांच महीने तक पानी कहां से आयेगा?

जैसलमेर के हरियां बागरी की उम्र करीब 65-70 वर्ष है. उसके पास 150 भेड़ें, 23 बकरी ओर नौ गधे हैं. हरियां बताते हैं, ‘हम आज 10 किलो आटा उधार लेकर आये हैं. जब हमारे पास खाने को कुछ नहीं तो इस रेवड़ को क्या खिलायेंगे?’

हरियां आगे बताते हैं कि वे अपने काफिले को लेकर जोधपुर की सीमा तक चले गये थे किंतु वहां से पुलिस ने उन्हें वापस भेज दिया. ‘अब हम यहां इन भेड़-बकरियों को क्या खिलायें? यहां इतना पानी भी नही है और ये स्थिति लगातार और ज्यादा खराब होती जाएगी. जैसे-जैसे गर्मी बढ़ेगी रेगिस्तान में सब सूखता चला जाएगा’ हरियां कहते हैं, ‘सरकार ने हमें आज तक क्या दिया था जो जंगल थे उनमें पशु चराने पर रोक लगा दी. जो चारागाह थे उन पर लोगों ने कब्जा कर लिया. ओर अब ये नई आफ़त.’

राजस्थान सरकार के पशुपालन विभाग के निदेशक श्री वीरेंद्र सिंह बताते हैं, ‘हमने कोरोना के चलते सभी का पशुपालकों का स्थानांतरण रोक दिया है. किंतु मवेशियों के चारे पानी का किसी तरहं का कोई उपाय नहीं किया है.’ जब उनसे यह पूछा जाता है कि जो लोग अपने घरों से निकल लिए थे उनका क्या तो वे बताते हैं कि जो जहां हैं उसे वहीं रोक दिया गया है. जब तक सरकार का आदेश नहीं आएगा हम कुछ नहीं कर सकते.’

मिट्टी का प्रबंधन और अरावली से संबंध

पशुपालकों की परेशानी वर्तमान समस्या का सिर्फ एक पहलू है. पशुओं के काफिले जब राजस्थान और गुजरात से देश के दूसरे हिस्सों में जाते हैं तो इससे उन्हें भी फायदा होता है. इस स्थानांतरण से वहां के किसानों को खेतों के लिए जैविक खाद मिल जाती है. इससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है ओर पानी भी जहरीला नही होता. बदले में पशुओं को फसल निकालने के बाद खेतों में अनावश्यक बचे फूल-पत्ते, फलियां और भूसा मिल जाता है. ये चीजें काफी पौष्टिक होती हैं और पशु भी इन्हें बड़े चाव से खाते हैं. अब यह जुगलबंदी तो टूट ही रही है साथ ही मिट्टी का प्राकृतिक तरीके से होने वाला प्रबंधन भी बिगड़ रहा है.

गुजरात से लेकर दिल्ली तक भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रंखला ‘अरावली’ स्थित हैं. करीब 700 किलोमीटर लंबी इस पर्वत श्रंखला के एक ओर थार मरुस्थल है. अरावली इस रेगिस्तान के फैलाव को रोकती है, मानसून की स्थिति को निर्धारित करती है और जल विभाजक की भूमिका भी निभाती है.

इसकी अपनी खास पारिस्थितिकी है जिसे ऐसा बनाने में घुमन्तू चारवाहों की भी विशेष भूमिका है. ये लोग वहां की जैव विविधता को बनाये रखने में मदद करते हैं. इनकी वजह से वहां मौजूद पेड़-पौधों ओर झाड़ियों की हर वर्ष कटाई-छंटाई होती रहती है. अरावली को इन जानवरों से खाद मिलती हैं. वहां से प्राप्त होने वाली असंख्य जड़ी-बूटियों को ये चरवाहे अन्य राज्यों तक ले जाते हैं. यदि चरवाहे नहीं चलेंगे पशु नहीं चरेंगे तो यह चक्र रुक जाएगा.

हमें यह भी देखना है कि अरावली में आग लगने की घटनाएं क्यों नहीं होती ? अरावली केवल राजस्थान से दिल्ली के बीच ही कटा-फटा है किंतु इससे पहले गुजरात से लेकर राजस्थान के अलवर तक तो यह निरंतर फैला हुआ है. क्योंकि इसमें मौजूद सूखी घास और झाड़ियां यही पशुपालक हर वर्ष हटाते हैं.

अरावली और थार का संबंध कोई एक-दो साल से नहीं बना है. यह तो अनगिनत सदियों में निर्मित हुआ है. ‘जंगल’ को इंसान नही उगाते, उन्हें उगने में सैंकड़ों वर्ष लगते हैं. और इसके साथ ही इनमें संतुलन का एक तंत्र भी विकसित होता है. अरावली के मामले में भेड़-बकरियां, ऊंट, गधे और बंदर इस तंत्र का अहम हिस्सा हैं. क्या सरकार इस सम्बंध को भी देखेगी?

यदि मवेशी नहीं रहे तो रेगिस्तान में रहना असंभव हो जायेगा. यदि रेगिस्तान को दिल मानें तो मवेशी उसकी धड़कन हैं. जैसे दिल के बिना धड़कन का कोई अस्तित्व नहीं ठीक ऐसे ही धड़कन के बिना दिल के भी कोई मायने नहीं हैं.

अब क्या?

सवाल यह है कि क्या इस कोरोना महामारी को हिंदुस्तान में लाने का कारण ये लोग रहे हैं? क्या इस महामारी को पूरे देश मे फैलाने में इनका कोई योगदान है या हो सकता है? क्या इस महामारी में इन पशुओं की कोई भूमिका है? पशुपालक किसी शहर में जाना तो बहुत दूर की बात है किसी गांव तक में प्रवेश नहीं करते. वे गांवों की बाहरी सीमाओं से होकर निकलते हैं. किसी भी गांव की सीमा में एक दिन से ज्यादा नहीं ठहरते. ऐसे में क्या सरकार के इन्हें पूरी तरह से रोकने के कदम उचित ठहराये जा सकते हैं? यदि कोरोना वायरस की रोकथाम की बात है तो पशुपालकों को यह हिदायत दी जा सकती है कि वे शहर में न जायें. उनके रूटों को चिन्हित किया जा सकता है.

अगर इस मामले में जल्द ही कुछ नहीं किया गया तो यह न सिर्फ पशुपालकों और पशुओं बल्कि रेगिस्तान की संपूर्ण इकोलॉजी को भी अपनी चपेट में ले सकता है. जीवन के उन तरीकों को भी जिन्हें सदियों में समझा और सीखा गया होगा.