कोरोना वायरस के संकट के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीन मार्च को तीसरी बार देशवासियों को संबोधित किया. इस दौरान उन्होंने देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान लोगों द्वारा बरते गए अनुशासन और सेवाभाव की तारीफ की और कहा, ‘आपने जिस प्रकार 22 मार्च रविवार के दिन कोरोना के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले हर किसी का धन्यवाद किया वो भी आज सभी देशों के लिए एक मिसाल बन गया है. आज कई देश इसको दोहरा रहे हैं.’

इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर से लोगों से कुछ विशेष करने की अपील की. उन्होंने कहा कि इस रविवार यानी पांच अप्रैल की रात को नौ बजे सब लोग घर की सभी लाइटें बंद करके, दरवाजे पर या बालकनी में खड़े रहकर नौ मिनट के लिए ही मोमबत्ती, दिया, टॉर्च या मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाएं. उनका कहना था, ‘चारों तरफ जब हर व्यक्ति एक-एक दीया जलाएगा, तब प्रकाश की उस महाशक्ति का अहसास होगा, जिसमें एक ही मकसद से हम सब लड़ रहे हैं.’ प्रधानमंत्री ने कहा कि कोरोना के संकट के अंधकार को चुनौती देता यह 130 करोड़ देशवासियों की महाशक्ति का जागरण होगा.

यहां एक ध्यान देने वाली बात यह है कि सुबह नौ बजे दिये गये अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह भी कहा कि ‘कोरोना वैश्विक महामारी के खिलाफ देशव्यापी लॉकडाउन को आज नौ दिन हो रहे हैं.’ हालांकि तीन मार्च को यह लॉकडाउन 11वें दिन में प्रवेश कर चुका था. शायद प्रधानमंत्री का संदेश एक दिन पहले पहले रिकॉर्ड किया गया था और इस बात का ध्यान नहीं रखा गया था कि यह प्रसारित अगले दिन होगा. वजह जो भी हो इससे उनके भाषण में नौ का अंक चार बार जुड़ चुका था - सुबह नौ बजे, प्रधानमंत्री ने नौ दिन के लॉकडाउन के लिए लोगों को धन्यवाद देते हुए पांच तारीख को नौ ही बजे नौ मिनट के लिए दिये-मोमबत्ती-मोबाइल जलाने का आवाहन किया.

प्रधानमंत्री के इस भाषण पर विपक्ष और बुद्धिजीवी वर्ग का कहना है कि ऐसे मुश्किल समय में वे कोई ठोस कदम उठाने की बजाय केवल दिखावटी कवायदें और जुमलेबाजी कर रहे हैं. अपने साढ़े 11 मिनट के भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महामारी से लड़ने की कोई रणनीति नहीं साझा की और न ही यह बताया आने वाले समय में देश को किन चुनौतियों के लिए तैयार रहना चाहिए. इस दौरान पूरे समय वे दिया जलाओ कार्यक्रम के बारे में ही बात करते दिखाई दिए. इससे भी उनके विरोधियों की बात को बल मिलते दिखा. लेकिन उनके समर्थक इससे जरा भी सहमत नहीं.

इन समर्थकों में प्रधानमंत्री की पार्टी के लोग उनकी ही बात को आगे बढ़ाते हुए यह कह रहे हैं कि इससे कोरोना संकट में एक-दूसरे से अलग रह रहे भारतीयों में सामुदायिकता की भावना का संचार होगा और नकारात्मकता का हृास होगा. लेकिन नरेंद्र मोदी के आम समर्थक हमेशा की तरह इसे अलग ही धरातल पर लेकर जाते नजर आये. उन्होंने प्रधानमंत्री के आवाहन में नौ जोड़ने की कुछ और संभावनाएं निकालीं और फिर इस अंक में मोमबत्ती के प्रकाश का मिश्रण करके इसे एक पारलौकिक घटना में तब्दील कर दिया. वैसे ही जैसा उन्होंने 22 मार्च को ‘कोरोना वारियर्स’ को धन्यवाद देने के लिए थाली-घंटी बजाने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील के साथ किया था. उसे भी ध्वनि तरंगों के माध्यम से कोरोना का इलाज करने का प्रधानमंत्री का मास्टरस्ट्रोक बता दिया गया था. इससे कोरोना के हमारे देश में फैलने की गति में कोई फर्क नहीं पड़ा लेकिन उससे मोदी जी के समर्थकों को भी कोई फर्क नहीं पड़ा.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शायद विश्व में ऐसे विरले नेता होंगे जो कुछ भी करें-कहें उनके समर्थक न केवल उस पर कोई सवाल नहीं उठाते हैं बल्कि वैसा करने के सकारात्मक तर्क अपने आप ही ढूंढ़ लेते हैं. दूसरों के लिए ही नहीं, अपने लिए भी. ऐसे में अगर प्रधानमंत्री कुछ ऐसा करें जो रहस्यमय लगे, जैसे कि पांच बजे पांच मिनट तक घंटी बजानी है या नौ बजे नौ मिनट तक दिया जलाना है, तो सोने पर सुहागा. इसके बाद उनके समर्थकों का दिमाग कल्पनाओं की हर हद को लांघ कर उन्हें मसीहा साबित करने की होड़ में लग जाता है. ऐसा क्यों होता है यह एक अलग और लंबा विषय है. लेकिन फिलहाल उनकी नई अपील पर आईं कुछ प्रतिक्रियाओं से यह जानते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थकों में उन्हें अपना और देश-दुनिया का मसीहा साबित करने का किस तरह का जुनून है:

1) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थक शुक्रवार से ही व्हाट्सएप और सोशल मीडिया पर एक संदेश खूब शेयर कर रहे हैं. इसमें नासा की रिसर्च और आईआईटी के किसी अनाम प्रोफेसर के हवाले से कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री ने मोमबत्तियां जलाने का नया मास्ट्रस्ट्रोक इसलिए खेला है क्योंकि एक साथ पैदा हुई ढेर सारी प्रकाश ऊर्जा से वातावरण का तापमान नौ डिग्री सेंटिग्रेड तक बढ़ जाएगा और इस वजह से कोरोना वायरस खत्म हो जाएगा.

2) नौ के आंकड़े को लेकर भी कई लोगों ने अपनी कल्पनाओं के घोड़े खूब दौड़ाए. मोदी जी के गणित को समझाते हुए उनके समर्थकों का कहना है कि प्रधानमंत्री ने जनता से मोमबत्ती जलवाने के लिए 5 अप्रैल को इसलिए चुना क्योंकि 5वीं तारीख और 4थे महीने के आंकड़े को जोड़ दें तो 5+4=9 हो जाता है. इनके अनुसार प्रधानमंत्री मोदी ने यह बात तीन अप्रैल यानी 03-04-20 को कही है और इन अंको का योग भी नौ होता है. कुछ लोगों ने प्रधानमंत्री के भाषण की लंबाई देखे बिना यह दावा भी किया कि उन्होंने सिर्फ नौ मिनट बोला है. बाकी नौ बजे घर की लाइट बुझाने और नौ मिनट के लिए मोमबत्ती जलाने की बात तो है ही. इन सब आंकड़ों का जिक्र करते हुए मोदी जी के समर्थकों का कहना है कि ‘9 का अंक अविभाज्य है इसलिए अब भारत को यह अघोषित तीसरा विश्वयुद्ध जीतने से कोई रोक नहीं सकता. पहले ध्वनि विज्ञान अब प्रकाश विज्ञान. सबकुछ वैज्ञानिक और शास्त्रों के अनुसार. धन्य है ऐसा प्रधानमंत्री.’

3) वैज्ञानिक रिपोर्टों और वैज्ञानिकों का हवाला देने के साथ-साथ लोगों ने विज्ञान पर आधारित अपने तर्क भी चुने. पिछले महीने पीएम मोदी ने जनता कर्फ्यू वाले दिन थाली और ताली बजाने के लिए कहा था, लोगों ने इसे भी दिए जलाने के कार्यक्रम से जोड़कर देखा. व्हाट्सएप पर भेजे जा रहे एक संदेश में कहा गया है कि ‘22 मार्च को जनता कर्फ्यू और पांच अप्रैल के बीच 14 दिन का अंतराल आता है. 22 मार्च की शाम जो ध्वनि तरंग उत्पन्न हुई थी उससे 882 हर्ट्ज फ्रीक्वेंसी की क्षमता वाले वायरस तो मर गए लेकिन करीब 5% नहीं मर पाए’ यह संदेश बताता है कि ‘ऐसे पांच प्रतिशत कोरोना वायरस को निष्क्रिय करने के लिए ध्वनि व प्रकाश तरंग के बीच ओवरलैप होना चाहिए एवं समयावधि 14 दिन की होनी चाहिए.’ अंत में यह संदेश कहता है कि ‘मोदीजी कोई निर्णय भावुकता में नहीं लेते हैं, उनके हरेक निर्णय के पीछे विज्ञान छुपा होता है.’

3) यह देखना दिलचस्प है कि नरेंद्र मोदी के समर्थक भौतिकी के साथ-साथ रसायन विज्ञान का ज्ञान भी रखते हैं और यह जानना तो और भी मजेदार है कि पीएम मोदी की बातें रसायन शास्त्र के सिद्धांतों पर भी फिट बैठती हैं. उनके संदेश के पीछे रासायनिक कारण खोजने वाले एक मैसेज में कहा गया है कि ‘दोस्तो, आदरणीय प्रधानमंत्री जी ने पांच अप्रैल, नौ बजे, नौ मिनट मोमबत्ती जलाने को कहा है. विरोधियों को तो खैर इसके पीछे का साइंस हजम नहीं होगा, लेकिन आप समझिए. कैंडल्टन यूनिवर्सिटी के रिसर्चर कैंडलीन केलडर ने खोज की है कि पिघलते हुए मोम से एक खास रसायन इवांकापेप्टाइट निकलता है. ये घातक विषाणुओं को अपनी चपेट में ले लेता है. कल्पना कीजए अगर करोड़ों मोमबत्ती एकसाथ जलेंगी तो कोरोना के कीटाणु की लाश भी नहीं बचेगी. मोदी जी बेशक कभी स्कूल नहीं गए लेकिन उनका दिमाग प्रयोगशाला है.’

अगर इस संदेश को ध्यान से पढ़ें तो इसमें इस्तेमाल किया गया अनुप्रास अलंकार आपको मुस्कुराने की वजह दे देता है. संदेश के वाक्य पर गौर कीजिए, ‘कैंडल्टन यूनिवर्सिटी’ के ‘कैंडलीन केलडर’ ने मोम यानी कैंडल पर रिसर्च कर बताया है कि ‘इवांकापेप्टाइट’ रसायन निकलता है.

यहां पर बताते चलते हैं कि दुनियाभर में कैंडल्टन यूनिवर्सिटी नाम का कोई विश्वविद्यालय नहीं है और न ही कैंडलीन कोई शब्द या नाम होता है, कम से कम गूगल पर तो इस नाम का कोई सर्च रिजल्ट नहीं आता है. अब अगर इवांकापेप्टाइट रसायन की बात करें तो इवांका अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बेटी का नाम है और पेप्टाइट शब्द का अर्थ दुनिया के सबसे बड़े ऑनलाइन शब्दोकोशों पर भी नहीं मिलता है. इस संदेश में इतनी सारी मजाकिया गलतियां देखकर इस बात की संभावना ज्यादा लगती है कि यह संदेश कटाक्ष करने के उद्देश्य से लिखा गया होगा. लेकिन कुछ लोगों ने इसे सही मानकर व्हाट्सएप पर शेयर करना शुरू कर दिया.

यह अंदाजा लगाने की एक वजह यह भी है कि बीते शुक्रवार को चर्चित कवि और सिनेमा लेखक पुनीत शर्मा के साथ ऐसा ही एक वाकया देखने को मिला. पुनीत शर्मा ने ट्विटर पर दिया जलाने को लेकर एक कटाक्षपूर्ण टिप्पणी की थी - ‘जब 133 करोड़ देशवासी, एक साथ मोमबत्ती, दिया, टॉर्च जलाएंगे। तो इन अथाह प्रकाशपुंजों के द्वारा असंख्य फोटॉन या प्रकाशाणु उत्पन्न होंगे. ये प्रकाशाणु, वायुमंडल में उपस्थित सभी विषाणुओं को नष्ट कर देंगे.’ कुछ समय बाद पुनीत को उनकी यही टिप्पणी व्हाट्सएप पर इस संदेश के साथ मिली कि कैसे दिया जलाने भर से कोरोना वायरस नष्ट हो सकता है. इसके अलावा कुछ दिन पहले ऐसा ही बीबीसी के कार्टूनिस्ट कीर्तीश भट्ट के साथ भी हो चुका है जब लॉकडाउन पर की गई उनकी एक मजाकिया टिप्पणी को वरिष्ठ पत्रकार रजत शर्मा ने मोदी जी की तारीफ करते हुए ट्वीट कर दिया था.

4) मोदी समर्थक तमाम अन्य शास्त्रों के साथ-साथ आयुर्वेद और ज्योतिष शास्त्र का सहारा लेते हुए भी दिखाई दिए. ज्योतिषविदों के मुताबिक प्रधानमंत्री मोदी ने नौ के अंक पर इसलिए जोर दिया है क्योंकि नौ मंगल ग्रह का अंक है और इस पर इतना जोर देने से देश की कुंडली में मंगल मजबूत होगा. मंगल के मजबूत होने से देशवासियों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ेगी और वे कोरोना संक्रमित होने से बच जाएंगे. कुछ इसी तरह की बातें इस यूट्यूब वीडियो में कही गई हैं.

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5) दर्शन भारतीय परंपरा का अभिन्न हिस्सा रहा है और ऐसा कैसे हो सकता था कि प्रधानमंत्री का वक्तव्य दर्शन शास्त्र की परिभाषाओं पर फिट न बैठता. पद्मश्री से सम्मानित और इंडियन मेडिकल एसोसिशन के पूर्व प्रमुख डॉ केके अग्रवाल एक वीडियो में दर्शन शास्त्र का हवाला देकर कलेक्टिव कॉन्शसनेस की बात करते हैं. डॉ अग्रवाल के मुताबिक अगर सब एक साथ यह सोचेंगे कि वे कोरोना के संक्रमण से बचें रहें तो ऐसा ही होगा. दर्शन के पैमानों पर उनका कहना कितना सही है, यह बहस का विषय हो सकता है, लेकिन उनके जैसे सम्मानित और भरोसेमंद चिकित्सक का ऐसा कहना, प्रधानमंत्री के समर्थकों को इस तरह की और बातें कहने की ताकत दे देता है. यहां पर चौंकाने वाली बात यह है कि मोदी सरकार के एक आधिकारिक ट्विटर अकाउंट से उनका यह वीडियो रिट्वीट भी किया गया था. हालांकि बाद में इसे डिलीट कर दिया गया.

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बुद्धिजीवियों द्वारा की जाने वाली इन टिप्पणियों को समझने के लिए इस दौर की राजनीति पर गौर किया जा सकता है. राजनीति के जानकारों की मानें तो बड़ी हस्तियां सरकार की गुडबुक्स में शामिल होने के लिए उसके बारे में अच्छी बातें बोलती हैं. और मोदी सरकार का समर्थन करने वाली इस तरह की हस्तियों को इस मामले में कुछ ज्यादा ही उम्मीद रहती है.