नेहरू का समाजवाद की तरफ झुकाव और देश में आजादी के तुरंत बाद मिश्रित अर्थव्यवस्था का लागू होना ऐसी घटनाएं थी जो स्वाभाविक रूप से भारत की साम्यवादी रुझान वाले देश की छवि बनाती थीं. फिर भी शीतयुद्ध की शुरूआत में जब पूरी दुनिया पूंजीवादी (अमेरिका के नेतृत्व में) और साम्यवादी (सोवियत संघ के नेतृत्व में) खेमों में बंट रही थी, भारत किसी पक्ष में खड़ा हुआ दिखाई नहीं दिया.

इन्हीं दिनों 1955 में सोवियत संघ (रूस) के राष्ट्रपति खुश्चेव भारत यात्रा पर आए और देश में रूस के सहयोग से कई परियोजनाएं शुरू हुईं. दोनों देशों की इस नजदीकी के बाद भी इंडोनेशिया के बांडुंग में जब गुटनिरपेक्ष देशों का पहला सम्मेलन हुआ तो भारत न सिर्फ गुटनिरपेक्ष आंदोलन के नेता के तौर पर उभरा बल्कि उसे तमाम देशों का समर्थन भी हासिल हुआ. तब दक्षिण एशिया में भारत के लिए स्थितियां लगातार बिगड़ रहीं थीं. 1954-55 में पाकिस्तान, बगदाद संधि और सीटो (साउथ ईस्ट अटलांटिक ट्रीटी) में शामिल होकर अमेरिकी खेमे का सदस्य बन चुका था. इधर चीन के साथ भारत की तल्खी बढ़ती जा रही थी.

उस समय अमेरिका से पाकिस्तान को मिल रही भारी सैन्य सहायता रूस के लिए भी चिंता का विषय थी. इन परिस्थितियों में 1965 में उसे भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान दोनों देशों के बीच मध्यस्थता करके दक्षिण एशिया में अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश भी की. तब रूस दोनों देशों के बीच तटस्थ रवैया अपना रहा था. लेकिन जब 1971 में फिर से भारत-पाकिस्तान युद्ध के हालात बने तब भारत के विदेश मंत्री स्वर्ण सिंह ने रूस जाकर वहां की सरकार के सामने भारत का पक्ष इतनी मजबूती से रखा कि रूस स्पष्ट रूप से भारत के समर्थन में आ गया. यही वह निर्णायक घटना थी जिसने भारत-रूस मैत्री संधि की बुनियाद रखी.

इसके बाद अगस्त, 1971 में दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक मैत्री संधी हुई. देश के सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए यह काफी महत्वपूर्ण कदम था लेकिन इसने अचानक ही भारत को गुटनिरपेक्ष देशों की अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी के निशाने पर रख दिया. इन देशों का कहना था कि भारत भी अब सैन्य शक्ति की शरण में चला गया है. भारत की प्रतिष्ठा को इस कदम से गहरा झटका लगा लेकिन बाद के सालों में शीत युद्ध का माहौल खत्म होने के साथ-साथ गुटनिरपेक्ष आंदोलन भी मंद पड़ गया. हालांकि भारत-रूस मैत्री संधि भारत के विकास में काफी मददगार साबित हुई.