सरपंच-पति या प्रधान-पति एक ऐसा शब्द है जो सरकारी शब्दावली का हिस्सा न होते हुए भी खासा लोकप्रिय है. जैसा कि शब्द से ही साफ है कि सरपंच-पति वे लोग होते हैं जो महिला सरपंचों के पति होते हैं. ज्यादातर मामलों में ये सिर्फ पति नहीं बल्कि उससे ज्यादा होते हैं. लेकिन कुछ मामलों में ये उससे भी कुछ ज्यादा या सबकुछ भी हो सकते हैं. ऐसा तब होता है जब सरपंच-पति पूर्व-सरपंच भी होते हैं. दरअसल पंचायतों की सीटें बीच-बीच में महिलाओं के लिए रिजर्व होती है. उस दौरान सरपंच महोदय अपनी जगह अपनी पत्नी को चुनाव लड़ा देते हैं और सत्ता उनकी ही बनी रहती है. यह लोकतंत्र की पहली इकाई कही जाने वाली ग्राम पंचायतों की सहज स्वीकार्य सच्चाई बन चुकी है. एमेजॉन प्राइम पर प्रसारित ‘पंचायत’ की सबसे बड़ी खासियत यही है कि यह निष्पक्ष और स्पष्ट तरीके से प्रधान-पति नाम की सत्ता की पड़ताल करती है.

कहानी पर थोड़ी और बात करें तो मेट्रो-सिटी का एक युवक, अभिषेक त्रिपाठी बलिया के एक गांव में पंचायत-सचिव बनकर पहुंचता है. पहले आईआईएम से एमबीए और फिर कॉर्पोरेट सेक्टर में लाखों की नौकरी का सपना देखने वाला अभिषेक अपनी इस नौकरी से नफरत करता है. उसका दोस्त उसे गांव जाने के लिए यह कहकर राजी करता है कि आगे उसे इस काम का प्रोफेशनली फायदा मिलेगा और नहीं भी मिला तो वह वहां जाकर ‘स्वदेश का मोहन भार्गव’ (स्वदेश फिल्म में शाहरुख खान द्वारा निभाया गया किरदार) तो बन ही सकता है.

पहला एपिसोड देखते हुए आप भी उम्मीद करते हैं कि कब आने वाले दृश्यों में अभिषेक के भीतर का मोहन भार्गव जागेगा और गांव की सूरत बदलने की शुरूआत होगी. लेकिन नहीं, और यह खुशी की बात है कि ऐसा बिल्कुल नहीं होता है. ‘पंचायत’ अपनी इस खासियत को अंत तक बनाए रखती है यानी कहीं भी प्रेडिक्टिव होने की बजाय वास्तविकता के करीब रहकर धीमे-धीमे अपनी कहानी कहती है.

बेहद पॉपुलर ऑनलाइन कंटेट क्रिएटर, द वायरल फीवर यानी टीवीएफ द्वारा बनाई गई यह वेबसीरीज खुद में कई ऐसी बातें शामिल करती है जिसके लिए टीवीएफ जाना जाता है: माहौल का ईमानदारी से रचा जाना, भाषा को उसकी पूरी बारीकियों के साथ अपनाना और मेलोड्रामा से जितना हो सके दूर रहना इनमें शामिल हैं. सीरीज के लेखक चंदन कुमार ने प्रधान-पति की खोखली ठसक, गांव की टुच्ची लेकिन भोली राजनीति और पंचायत सचिव की अंदरूनी उधेड़बुन को इसकी मुख्य सामग्री बनाया है. इसके आसपास उन्होंने गांवों में अक्सर होने वाली कई घटनाओं और उनके किरदारों को इस वेब सीरीज में इस तरह से फिट किया गया है कि आपको ग्राम पंचायत फुलेरा में होने का खरा-पूरा एहसास होता है.

इसके अलावा, मनरेगा जैसी योजनाओं का जिक्र, फूहड़ नारे लिखवाने की सरकारी महकमों की सनक और मौके-बेमौके दी जाने वाली ताजी लौकी की रिश्वत जैसी चीजें इसे और विश्वसनीय बनाती हैं. लगभग आधे-आधे घंटे की आठ कड़ियों वाली इस सीरीज में ऐसा कुछ भी नहीं है जो आपको अगली कड़ी देखने को बेसब्र करता हो. लेकिन फिर भी यह इतनी मनोरंजक है कि अगली फुर्सत पाते ही आप इसे आगे देखना शुरू कर देते हैं. इसलिए कि ‘परमानेंट रूममेट्स’ जैसी बेहतरीन सीरीज रचने वाले दीपक कुमार मिश्रा का निर्देशन आपको भले ही शहर की नज़र से गांव को दिखाता है लेकिन फालतू की रूमानियत का चश्मा चढ़ाए बगैर.

अभिनय की बात करें तो फिल्म में अभिषेक त्रिपाठी का मुख्य किरदार निभा रहे जितेंद्र कुमार पिछले दिनों ‘शुभ मंगल ज्यादा सावधान’ में अपने अभिनय के लिए खूब तारीफें बटोर चुके हैं. लेकिन डिजिटल प्लेटफॉर्म पर जीतू के नाम से मशहूर इस अभिनेता का जलवा अलग ही है. टीवीएफ की लगभग हर लोकप्रिय सीरीज का हिस्सा रहे जीतू की उनमें कुछ खासियतें खासी लोकप्रिय हैं, जैसे बहुत गुस्सा आने पर बैट से पीटना. इस सीरीज में ज्यादातर वक्त उनके खिसियाहट वाले एक्सप्रेशन देखकर आप कई बार यह सोचने लगते हैं कि कब वे उठकर सामने वाले की धुलाई करेंगे. लेकिन उनके इस लोकप्रिय अंदाज का इस्तेमाल पंचायत में बहुत सोच-समझकर किया गया है. इसमें जीतू के अभिनय की सबसे अच्छी बात यह है कि ज्यादातर वक्त अति-गंभीर या नाखुश दिखने के बावजूद वे एक भी फ्रेम में ऐसे नहीं होते कि अझेल हो जाएं. और हां, यहां पर अपने संवादों और एक्सप्रेशन्स के साथ उन्होंने ढेर सारा मीम कंटेंट भी दिया है जो आने वाले वक्त में इंटरनेट पर तैरता नज़र आ सकता है.

प्रधान-पति की भूमिका में रघुवीर यादव पहले दृश्य से ही आपका दिल जीत लेते हैं. गांव वालों से चतुर लेकिन शहर वालों से भोले इस किरदार को यादव एक खास तरह का टेक्सचर देते हैं जो इसे न भूलने वाला बना देता है. सहमने और भ्रमित होने वाले कुछ दृश्यों में उनका अभिनय बहुत कमाल है, लेकिन उनका जिक्र यहां पर करना स्पॉइलर देना हो जाएगा. उनकी पत्नी और ग्राम प्रधान की भूमिका यहां पर नीना गुप्ता ने निभाई है. हालांकि रघुवीर यादव और नीना गुप्ता के कुछ साझे दृश्य बेहद कमाल के हैं और इसका क्रेडिट संवाद लेखक को भी जाता है. लेकिन अकेले नीना के किरदार को भली तरह से पहचानने के लिए आपको अगले सीजन तक इंतजार करना पड़ेगा. फिर भी उनकी बढ़िया कॉमिक टाइमिंग और देहाती औरतों की देहबोली को खूबसूरती से अपनाने के लिए उनकी ढेर सारी तारीफ की जा सकती है.

इसके अलावा, दो और मुख्य किरदारों में चंदन रॉय और फैजल मलिक भी फिल्म का ह्यूमर कोशंट बनाए रखने में अपनी ज़रूरी भूमिका निभाते हैं. अधिक वजन के और कम दिमाग के उप-सरपंच के किरदार में फैजल मलिक जहां आपको इरीटेट कर हंसाते हैं वहीं हर पल नायक से डांट खाने वाले चंदन रॉय का दांत भींचकर मुस्कुराना आपको उससे सहानुभूति रखने की वजह दे देता है. कुल मिलाकर, यह कहा जा सकता है कि जैसे लोकतंत्र की ताकत लोगों में होती है, वैसे ही ‘पंचायत’ की सबसे बड़ी ताकत इसके इन पांच मुख्य किरदारों में हैं.

अगर कोई और वक्त होता तो हम कहते कि इस ‘पंचायत’ को फुर्सत निकालकर देखिए! लेकिन लॉकडाउन की वजह से अभी फुर्सत ही फुर्सत है तो जाइए, घूमकर आइए – ग्राम-फुलेरा, विकासखंड-फकौली, जिला-बलिया, उत्तरप्रदेश.

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