लॉकडाउन के उपरांत प्रवासी मज़दूर भारी संख्या में अपने गांवों की ओर निकल पड़े. हज़ारों की भीड़ बस अड्डों पर जमा हो गई. कितने तो पैदल ही सड़कों पर निकल पड़े. फिर क्या था, हाय तौबा मच गई. मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया. कुछ को वापस धकेल दिया गया कि अपने घरों में ही रहो. कुछ को अस्थायी क्वारंटाइन शिविरों में रख दिया गया. डर था कि उन हज़ारों लोगों में कितने ही कोरोना संक्रमित हो सकते हैं. चूंकि भागते हुए वे लोग तथाकथित ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ का पालन नहीं कर सकते थे, इसलिए वे पहले आपस में बीमारी फैलाते. फिर अपने गांव पहुंच कर अन्य लोगों को बीमार करते. चूंकि वहां यों भी इलाज की कोई संतोषजनक व्यवस्था नहीं होती, इसलिए महामारी और तेज़ी से फैलती हुई हम तक भी पहुंच सकती थी.

कोरोना के इस आतंक के बीच हमें इस बात की चिंता कम थी कि लॉकडाउन के चलते देश में लाखों-करोड़ों लोगों के समक्ष भुखमरी का संकट उत्पन्न हो गया है. ये वे दिहाड़ी मज़दूर हैं जिन्हें रात की रोटी उस दिन की मेहनत के बाद ही मिल पाती है. उनके पास कोई बचत नहीं होती. एक दिन काम नहीं किया तो उस रात भूखे सोओ. जब लोगों का सड़क पर निकलना ही रोक दिया गया तो किसी भी प्रकार का काम मिल पाने का प्रश्न ही नहीं उठता. जाहिर है कि तब पेट में रोटी भी नहीं जा सकती. लेकिन हमारी संपूर्ण व्यवस्था की चिंता यह नहीं थी कि चंद दिनों में ये ग़रीब भूखे मर सकते हैं. हमारी मूल चिंता थी कि ये कहीं महामारी को और न फैला दें.

देश में कोरोना वे संपन्न लोग लाये जो हवाई जहाज़ से विदेश यात्राएं कर के लौटे थे. गरीबों के भूखे मरने की नौबत आई उनकी वजह से. और जब उन्होंने खुद को बचाने की कोशिश की तो हम उन्हें ऐसा करने से रोकने की कोशिश में लग गए. इस पूरे प्रकरण ने हमारी हृदयहीनता को नग्न करके रख दिया है.

मैक्स फ़िशर और एम्मा ब्यूबोला ने न्यू यॉर्क टाइम्स में अपने लेख में दिखाया है कि महामारियां पहले से विद्यमान सामाजिक विषमताओं के दुष्परिणामों को और बढ़ा देती हैं. ग़रीब और बीमारी का अच्छे वक़्त में भी चोली-दामन का साथ होता है क्योंकि वह ऐसे भी कुपोषण, अस्वास्थ्यकर वातावरण और निम्न कोटि की चिकित्सा सुविधाओं का शिकार रहता है. महामारी रही-सही कसर भी पूरी कर देती है.

प्रोसीडिंग्स ऑफ़ रॉयल सोसाइटी में मैथ्यू बॉन्ड्स और तीन अन्य वैज्ञानिकों के एक शोधपत्र में ग़रीबी और बीमारी की तुलना एक ऐसे दुष्चक्र से की गई है जिसके दोनों अंग एक दूसरे को बढ़ावा देते हैं. उन्होंने इसे ‘डिसीज़ ड्रिवेन पॉवर्टी ट्रैप’ का नाम दिया है - ग़रीबी से बीमारी और बीमारी से ग़रीबी का फंदा, जिससे व्यक्ति निकल नहीं सकता. ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में प्रकाशित जियान्ग्ज़्हुओ चेन और आठ अन्य वैज्ञानिकों के शोधपत्र में दिल्ली को, उसकी विकट आर्थिक विषमताओं के चलते मॉडल के रूप में लिया गया. उन्होंने पाया कि झुग्गी झोपड़ी कॉलोनियां इन्फ़्लुएन्ज़ा फैलाने के लिए पूरे शहर के लिए त्वरक या एक्सिलेरेंट का काम करती हैं.

संपन्न भारत और विपन्न भारत का बड़ा ही अजीब रिश्ता है. संपन्न भारत को विपन्न भारत की ज़रूरत पड़ती तो है मगर नौकर के रूप में. चाहे वे घर के नौकर हों, ऑफिस के, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के, फैक्ट्रियों के, दुकानों के, या किसी और जगह के. संपन्न भारत का उनसे रिश्ता पूर्णतया व्यावसायिक होता है. काम करो, पैसे लो, और उसके बाद दिखाई न पड़ो. दरअसल संपन्न वर्ग ग़रीब और ग़रीबी को इतनी हिकारत की नज़र से देखता है कि वह उससे ‘अत्यावश्यक न्यूनतम’ से ज़्यादा कोई सम्बन्ध नहीं रखना चाहता. कितने ही लोग ऐसे हैं जो ये भी नहीं जानते कि उनके घर की नौकरानी के अपने घर में कितने सदस्य हैं. उसकी घर की हालत या अन्य समस्याओं को जानने की तो बात ही छोड़िये. हमारे घर या बिज़नेस से जाने के बाद उसकी क्या ज़िंदगी है, हम जानना भी नहीं चाहते. सच यह है कि हममें से अनेक लोगों ने निकट से देखा भी नहीं है कि झुग्गी झोपड़ियों में लोग किस क़दर भयानक गन्दगी और असुविधाओं के बीच रहते हैं. बहुतेरों ने उस दुर्दशा के विषय में बस उतना ही देखा और जाना है जो ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ जैसी फ़िल्मों में दिखाया गया था और जो सचाई से दूर है.

संपन्न भारत को ग़रीब और ग़रीबी से ऐसी विरक्ति है कि बस चले तो उनकी शक्ल भी न देखें. अमेरिका के प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रम्प की बिटिया हैं इवांका ट्रम्प. ये 2017 में किसी ग्लोबल आन्त्रप्रेन्योरशिप समिट में भाग लेने के लिए हैदराबाद आईं थीं. प्रशासन ने शहर की जो साफ़-सफाई, रंग-रोगन, डेंटिंग-पेंटिंग आदि करनी था वो तो की ही, साथ ही शहर के सारे ग़रीब भिखारियों को उठा कर चंचलगुडा जेल के रिहैब शेल्टर और कुछ अन्य शेल्टरों में रख दिया. 2000 में जब बिल क्लिंटन पधारे थे तब भी ऐसा ही किया गया था. इस बार अहमदाबाद में तो ट्रम्प के लिए दीवार ही खड़ी कर दी गई ताकि झोपड़ियां दिखाई ही न पड़ें, हालांकि उसकी सफाई दी गई थी कि वो तो दो महीने पहले का निर्णय था. हर्ष मंदर अपनी पुस्तक ‘लुकिंग अवे: इनइक्वैलिटी, प्रेजुडिस एंड इनडिफ़रेंस इन न्यू इंडिया’ में लिखते हैं कि हमने ग़रीबों को अपनी अंतरात्मा और चेतना दोनों से निर्वासित कर दिया है.

संपन्न भारत की विशेषता है कि वह विपन्न भारत को सिर्फ निर्णय सुना देता है. उसका पालन कैसे होगा इससे उसे कोई मतलब नहीं. अभी झुग्गी झोपड़ियों में, धारावी जैसी झुग्गियों के बारे में तमाम लोग यह कहते मिलेंगे कि ये जाहिल न तो हाथ धोते हैं, न ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ का पालन करते हैं, और भुगतना हमें पड़ रहा है. हुज़ूर, ग़रीब करे भी क्या? जहां दस फुट बाई दस फुट के कमरे में आठ लोग रहते हों, जहां दो सौ गज दूर स्थित पानी के इकलौते नल से भर कर पीने के लिए दो बाल्टी पानी लाना पड़ता हो, जहां स्त्रियों को भी खुले में नहाना पड़ता हो, वहां क्या ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ होगी और बन्दे कितनी बार हाथ धोयेंगे? आप जानते ही हैं कि देश के कितने इलाकों में लोग मीलों दूर से पानी भर कर लाते हैं.

विजय गोपीचंद्रन और उनके दो अन्य साथी तमिलनाडु के एक ग्रामीण इलाके में अपना क्लीनिक चलाते हैं. उन्होंने अपने एक ब्लॉग में लिखा है कि इसी माह उनके पास एक 50 वर्षीय महिला लाई गई जिसके लक्षण कोरोना से मिलते-जुलते थे. हालांकि वह किसी कोरोना पीड़ित से संपर्क में नहीं आई थी. उन्होंने फेफड़े का संक्रमण मान कर उसका इलाज शुरू किया और एहतियातन उसे आईसोलेशन की सलाह भी दी. इस पर उस महिला की बेटी ने कहा कि वे तीन स्त्रियां और एक पुरुष एक ही झोपड़ी में रहते हैं. दूरी बनाना संभव नहीं है. औरतों का घर के बाहर सोना सुरक्षित नहीं है. यों भी घर के बाहर सांप-बिच्छू का खतरा रहता है. तीसरे, चाहे कुछ हो जाए, उस स्त्री को अपने हिस्से का काम करना ही है, याने बकरियां चराने जाना ही होगा क्योंकि बाक़ी सभी लोग अपने हिस्से के काम को छोड़ नहीं सकते. छोड़ा तो खाना नहीं मिल पायेगा. विजय गोपीचंद्रन का कहना है कि ग़रीबी के जीवन के इस कटु यथार्थ का पहली बार बोध होते ही उन्हें ऐसा लगा जैसे किसी ने उनके मुंह पर तमाचा मार दिया हो.

भगवान न करे लेकिन अगर ऐसा होता कि ऐसी कोई बीमारी होती जो छूत की न होती और जिससे प्रधानतया ग़रीब ही मर रहे होते तो संपन्न भारत के कानों पर जूं तक न रेंगती. बेशक, दिखावे के लिए राजनीतिक हलकों में और अन्य जगहों पर समुचित शोर मचाया जाता, कुछ लोग चन्दा वगैरह भी दे देते, लेकिन दिल में कोई न घबराता. कोई ऐसा आतंक न फैलता जैसा अभी फैल रहा है. अन्दर से बहुत लोग यही सोचते कि कोई बात नहीं, ग़रीब मर रहे हैं तो मरने दो, ग़रीबों की कोई कमी नहीं है, हमें काम करने वाले और मिलते रहेंगे.

वाशिंगटन यूनिवर्सिटी की पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट डॉ. निकोल एरेट का कहना है कि ग़रीब और ग़रीबी की इस परंपरागत उपेक्षा का दंड अंततोगत्वा पूरे समाज को भुगतना पड़ेगा. उनका कहना है कि ऐसा एक भी व्यक्ति जिसे उचित चिकित्सा सुविधा नहीं मिलती, अंततः पूरे समाज पर भारी पड़ेगा. इसलिए समाज का कर्त्तव्य है कि कोई भी उपेक्षित न रहने पाए. कोरोना महामारी दैवीय न्याय है, हम ऐसा तो नहीं कह सकते. लेकिन यह एक ‘ग्रेट लेवेलर’ ज़रूर है. इसके माध्यम से हम कम से कम इस बात से तो सचेत हुए कि समाज के बहुत बड़े वर्ग को उपेक्षित और वंचित रखने के कितने गंभीर परिणाम हो सकते हैं.


डॉ निर्मल चन्द्र अस्थाना रिटायर्ड पुलिस महानिदेशक हैं.