जैसलमेर से ताल्लुक़ रखने वाले अल्ताफ़ खान (बदला हुआ नाम) प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी कर रहे हैं. इसके लिए वे अपने ननिहाल यानी जयपुर के खो-नागोरियन इलाक़े में रहते हैं. स्थानीय लोग इस जगह को मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र के तौर पर ज़्यादा पहचानते हैं. खो-नागोरियन, जयपुर के ही एक अन्य मुस्लिम बहुतायत वाले इलाक़े ‘रामगंज’ से क़रीब पांच किलोमीटर दूर स्थित है. रामगंज इस समय राजस्थान में कोरोना वायरस का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है. रिपोर्ट लिखे जाने तक प्रदेश के कुल 341 कोरोना मरीज़ों में से 98 रामगंज से ही आते हैं. इस समय वहां कर्फ़्यू लगा हुआ है और मीडिया को भी वहां जाने की अनुमति नहीं है. फिलहाल ड्रोन कैमरों की मदद से इस पूरे इलाक़े की निगरानी की जा रही है.

इन हालातों के बीच किसी का भी फ़िक्रमंद होना लाज़मी है. सो अल्ताफ़ भी हैं. लेकिन उनकी चिंता हम जैसों से कुछ ज़्यादा है. जब पहली बार फोन पर हमारी उनसे बात होती है तो हमें इसके बारे में पता चलता है. वे कोरोना से भी ज़्यादा अगर किसी से डरा हुआ महसूस कर रहे हैं तो तब्लीगी जमात के कुछ लोगों से. वे कहते हैं कि दिल्ली में इतना बड़ा घटनाक्रम होने के बाद भी कई तब्लीगी न तो अपने आप को घरों, मदरसों और मस्जिदों में क़ैद कर रहे हैं और न ही दूसरे मुसलमानों के घर आने-जाने से रुक रहे हैं. वे ऐसा बर्ताव कर रहे हैं जैसे कि कुछ हुआ ही न हो.

लेकिन अल्ताफ की चिंता का विषय सिर्फ इतना भी नहीं है. उन्होंने तब्लीगी जमात और उससे जुड़े लोगों के बारे में और भी बहुत कुछ हमें बताया जिसकी पुष्टि हमने कई और लोगों से भी करने की कोशिश की. जब हमें इनमें से भी कुछ लोगों ने कमोबेश वैसी ही बातें बताईं तो हमने अल्ताफ की बातों को ज्यों का त्यों आपके सामने रखने का फैसला किया. अल्ताफ के अलावा उनकी बातों का समर्थन करने वाले कुछ और लोगों की भी बातें इस समाचार रिपोर्ट में शामिल हैं.

तब्लीगी जमात पिछले महीने के अंत में तब चर्चा में आया जब दिल्ली के निजामुद्दीन में हुए इसके एक आयोजन के बाद इससे जुड़े और उनके संपर्क में आने वाले लोग बड़ी संख्या में कोरोना संक्रमित पाए गए. मार्च के दूसरे हफ्ते में हुए इस विवादित आयोजन में करीब ढाई हजार लोग शामिल हुए थे. इनमें भारत के अलग-अलग राज्यों समेत चीन, इंडोनेशिया, मलेशिया, सऊदी अरब, यूक्रेन, अफगानिस्तान, बांग्लादेश जैसे देशों के लोग भी शामिल थे. यह वह समय था जब भारत ने कोरोना वायरस से बचने के लिए एहतिहाती कदम उठाने शुरू कर दिये थे. इसके तहत हर तरह के सामाजिक आयोजनों और सार्वजनिक मेल-जोल पर पाबंदी लगा दी गई थी. लेकिन इसके बावजूद न सिर्फ यह आयोजन हुआ बल्कि इसके खत्म होने के बाद, करीब दो सौ विदेशी नागरिकों समेत डेढ़ हजार से ज्यादा लोग 24 मार्च तक निजामुद्दीन मरकज में ही रुके रहे.

इस खबर के चर्चा में आने के साथ ही तबलीगी जमात और उसके बहाने मुसलमान समुदाय लगातार मीडिया और सोशल मीडिया के निशाने पर बना हुआ है. तबलीगी जमात का यह मामला जहां एक तरफ धार्मिक कट्टरता, जाहिलपन और आपराधिक लापरवाही का एक बहुत बड़ा उदाहरण है तो वहीं यह प्रतिष्ठित समाचार संस्थाओं और उसके नुमाइंदों के बेहद गैर जिम्मेदाराना बर्ताव को भी उतनी ही स्पष्टता से हमारे सामने रखता है. उनके इस बर्ताव का जबर्दस्त फायदा वे लोग उठाते हैं जिनके हित पूरे मुस्लिम समुदाय को कुछ विशेष रंगों में दिखाने से जुड़े हुए हैं.

इस रिपोर्ट को लिखते समय हमारी सबसे बड़ी चिंता यही थी कि इसमें जो लिखा है उसका दुरुपयोग करने की कोशिश ऐसे लोग कर सकते हैं जो तब्लीगी जमात के बहाने पूरे देश के मुसलमानों को कटघरे में खड़ा करने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ रहे हैं. लेकिन यह रिपोर्ट ही उन लोगों को यह जवाब भी देती है कि भारत का मुसलिम समुदाय तब्लीगी जमात ही नहीं है और वह अपने भले-बुरे के बारे में उतना ही सजग और सतर्क है जितना कोई और धार्मिक समुदाय. इसमें न जाने कितने अल्ताफ़ भी हैं जो इस समय ही नहीं बल्कि अरसे से कट्टरवादी संगठनों से उचित दूरी बनाकर रखे हुए हैं और आगे भी ऐसा ही करना चाहते हैं. हम अगर सभी को एक ही चश्मे से देखेंगे तो न केवल ऐसे लोग कमजोर होंगे बल्कि यह देश भी कमजोर हो जाएगा.

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पीछे से शाम की अजान की आवाज़ आ रही है और अल्ताफ़ हम से बात करने के लिए सबकी नज़रों से बचकर घर के ऊपरी कमरे में आ गए हैं. शुरुआती दुआ-सलाम के बाद वे कहते हैं - यहीं पास में एक मस्जिद और मदरसा है. लॉकडाउन के बाद मदरसे के बच्चों को तो घर भेज दिया गया है. लेकिन तीन-चार मौलाना उसी में रुके हुए हैं. हमारे मामा ने कभी उनसे घर के बच्चों को दीन के सबक सिखाने के लिए कहा था. लिहाज़ा वे लोग हम लोगों को सिखाने के लिए इस समय रोज़ हमारे घर आ रहे हैं.

दीन के सबक से मतलब?

पिछले कुछ दशकों से भारत में एक अलग तरह के इस्लाम का प्रचार जोरों पर है. इसमें सऊदी अरब के प्रतीकों और मान्यताओं का असर ज्यादा है (जबकि केरल को छोड़कर मूल रूप से भारतीय इस्लाम की जड़ें अरब की बजाय मध्य एशिया और ईरान यानी फारसी संस्कृति से जुड़ी मानी जाती हैं). मैं बचपन से कुरान को हिंदी (देवनागरी) में पढ़ता आया हूं. लेकिन इन मौलानाओं का दावा है कि अरबी ही हमारी मादरी ज़बान है और कुरान को उसी में पढ़ा जाना चाहिए. इस तरह ये हमें कुरान के साथ-साथ अरबी भाषा भी सिखाते हैं. एक नई भाषा सीखने में हमें कोई परेशानी नहीं है. अगर वो अपने मज़हब से जुड़ी हो तो दिलचस्पी बढ़ ही जाती है. लेकिन परेशानी इस बात की है कि जब सब कुछ लॉकडाउन है तो ये लोग मदरसों में ही क्यों नहीं टिकते?

और आपको डर है कि इन मौलानाओं की वजह से आपका परिवार भी कोरोना संक्रमित हो सकता है!

हां. ये डर इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि जयपुर तब्लीगी जमात का बड़ा गढ़ है. यहां के अधिकतर मौलानाओं से लेकर कई मस्ज़िदों के इमाम भी तब्लीगी हैं ... रामगंज के अधिकतर मरीज़ों में वे लोग शामिल हैं जो विदेश से लौटे एक कोरोना इन्फेक्टेड युवक के संपर्क में आ गए थे. लेकिन वहां के नए मरीज़ो में कुछ तब्लीगी जमात वाले भी हैं. इस बात की क्या गारंटी है कि इसी जमात से जुड़े जो मौलाना हमें अरबी सिखाने आते हैं वे बीते कुछ दिनों के दौरान जयपुर या मरकज के संक्रमित तब्लीगियों के संपर्क में नहीं आए होंगे!

लेकिन बात इतनी भर नहीं है. तब्लीगी सबके सामने तो इस्लाम से जुड़ी बहुत ही नेक सीखें देते हैं, लेकिन कई बार निजी बातचीत में उनका कुछ अलग ही चेहरा दिखता है. पहलू या रकबर खान के साथ जो हुआ था उसे भला कौन भूल सकता है? कोई पत्थरदिल ही होगा जो उस वहशीपन से सिहरा नहीं होगा! कुछ को छोड़कर सभी धर्मों के मानने वालों ने उन क़ातिलों को जी भरकर कोसा था. लेकिन ये मौलाना उन घटनाओं को जिस तरह से याद दिलाते हैं, उससे किसी का भी ख़ून खौल उठेगा. कई दफ़ा ये चर्चा बढ़ते-बढ़ते यहां तक पहुंच जाती है कि यदि भारत के सभी मुसलमान एक न हुए तो वह दिन दूर नहीं जब हमारी बहन-बेटियों की आबरु पर सरेआम हाथ डाले जाएंगे ...

तो बात सिर्फ कोरोना की नहीं है?

नहीं, और ये सिर्फ़ इन एक मौलाना की बात भी नहीं है. मैं ऐसे न जाने कितने तब्लीगी जमात वालों को जानता हूं जो अक्सर ऐसी ही बातों को दोहराते रहते हैं. भारत में मौजूद दूसरे इस्लामी संगठनों की तुलना में तब्लीगी जमात बेहद कट्टर है. इनके संपर्क में आने की वजह से नई उम्र के लोगों पर पड़ रहे असर को साफ महसूस किया जा सकता है. ये लोग कहते हैं कि इस दुनियावी पढ़ाई-लिखाई से कुछ हासिल नहीं होगा. नौकरी की तैयारी छोड़कर दीन के रास्ते पर चलो.

जयपुर में हर साल होने वाले इज्तिमा (मज़हबी सम्मेलन) में साल भर का ब्लूप्रिंट तैयार किया जाता है कि जमात के लोग कहां-कहां जाकर दीन की शिक्षा देंगे. ये जितने शहरों में सक्रिय हैं, वैसी ही पहुंच ढाणियों (राजस्थान के छोटे गांव) तक भी रखते हैं. दसियों लोगों का गुट बनाकर ये शहर, कस्बों से लेकर गांव, देहातों तक दीनी तालीम देने जाते हैं. जो कोई इनकी बातों में ज़्यादा दिलचस्पी दिखाता है, उसे अपने साथ ले लेते हैं. अब कोई बंदा साल में कई-कई दिन या महीने इनके साथ भटकता फिरेगा वो क्या नौकरी-धंधा कर पाएगा, सिवाय पंचर जोड़ने और कबाड़ खरीदने-बेचने के? इनके साथ रहते-रहते युवाओं को भी मुफ़्त की रोटी-बोटी तोड़ने की आदत पड़ जाती है और वे नकारा हो जाते हैं.

हमारी इन तक़रीरों पर तब्लीगी रटी-रटाई दलीलें देते हैं - ये दुनिया भ्रम है. हमारी दुनिया ऊपर है. दीन के रास्ते पर चलने से उस दुनिया में शारीरिक रिश्ते बनाने के लिए बेहद ख़ूबसूरत हूरें मिलेंगी, जो कल्पना से परे होंगी.

तब्लीगियों की सबसे बुरी बात ये भी है कि ये हम आम भारतीय मुसलमानों को उन कामों को करने से रोकते-टोकते हैं जिन्हें हम पीढ़ियों से करते आ रहे हैं. जैसे ये दरगाह जाना हराम बताते हैं. अब राजस्थान जैसे राज्य में जहां पीर-फ़कीरों का इतना बड़ा इतिहास रहा है, जहां के ज़र्रे-ज़र्रे में सूफ़ी तहज़ीब बसी है. वहां का मुसलमान इस बात को कैसे मान लेगा? हम अजमेर की ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती दरगाह और पाकिस्तान की पीर पागारा जैसी जियारतगाहों में जाने से कैसे रुक सकते हैं? ये लोग हमारे शादी करने के तौर-तरीकों से लेकर पितरों के लिए खाना बख्शने, उससे पहले दुरूद फातिहा (खास दुआ) पढ़ने और मरहूमों की कब्र पर फूल चढ़ाने जैसे सदियों पुराने रिवाज़ों पर भी आपत्ति जताते हैं. इस वजह से इन्हें राजस्थान के बड़े हिस्से में काफी विरोध का भी सामना करना पड़ता है और ये कोई दबी-छिपी बात नहीं है.

तो आप इन्हें घर आने से मना क्यों नहीं कर देते?

तब्लीगी जमात ने हमारे घर को ही नहीं बल्कि इसके लिए नरम रुख रखने वाले कई मुसलमानों को अपने दकियानूसी चंगुल में फंसा लिया है. इनका बेहूदा तर्क है कि कोरोना इस्लाम की हिफ़ाजत के लिए आया है और दुनिया भर में उन लोगों पर अल्लाह का अज़ाब (पाप के बदले मिलने वाला दुख) बनकर टूट रहा है जो मुसलमानों पर ज़ुल्म कर रहे हैं. ये बीमारी मुसलमानों को हो ही नहीं सकती ... लॉकडाउन के बाद शुरुआती दिनों में इन्होंने जुम्मे की नमाज़ के लिए हम लोगों को मस्जिद में बुलाया था. जब हमने कहा कि काबा शरीफ (मदीना) तक में जियरात और उमरा (हज के समय को छोड़कर की गई मक्का-मदीना की यात्रा) पर पाबंदी लगा दी गई है, तो हमारा मस्जिद में आना क्यों ज़रूरी है. इस पर इमाम और मौलाना ने मज़ाक उड़ाते हुए कहा कि मक्का-मदीना में साफ-सफाई चलने की वजह से पाबंदी लगी है, न कि कोरोना से डरकर.

... ग़लतियां ऐसे लोग करते हैं और शर्मिंदगी हमें झेलनी पड़ती है. लेकिन कुछ हज़ार तब्लीगियों की वजह से देश के करोड़ों मुसलमानों की गलत छवि गढ़ना भी तो जायज़ नहीं. फिरकापरस्त लोग ऐसा जान-बूझकर कर रहे हैं. देखा जाए तो नफ़रती और तब्लीगी; ये दोनों ही जमातें हम आम मुसलमानों के लिए एक सी ही ख़तरनाक हैं.

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सत्याग्रह ने अल्ताफ से बात करने के बाद उन्होंने जो बताया उसके बारे में मुस्लिम समुदाय से जुड़े और भी कई लोगों से बात की. इनमें से ज्यादातर लोग राजस्थान से ही ताल्लुक़ रखते हैं लेकिन सब नहीं.

‘जब हम पूछते हैं कि कोरोना से मुसलमान भी तो मरें हैं, तो तब्लीगियों का जवाब होता है कि उन लोगों का ईमान कमज़ोर था, इसलिए उनका ये हश्र हुआ. यानी इन लोगों के हिसाब से जो कोई मुसलमान कोरोना या किसी और वजह से बेमौत मारा जाए उसका ईमान कमज़ोर और जो बच जाए उसका ईमान मजबूत!’ मुस्लिम समुदाय से आने वाले जयपुर के ही एक पढ़े-लिखे युवा हमें बताते हैं, ‘ऐसे ही कुछ जवाब ईराक और सीरिया के मुसलमानों के हाल पूछने पर भी मिलते हैं. ज्यादा सवाल करने पर ये उलाहना मिलता है कि बच्चों को इसीलिए ज्यादा पढ़ाई नहीं करानी चाहिए, दीन पर सवाल उठाते हैं. घर के बड़े और आस-पड़ोस के लोग इनका लिहाज करते हैं और उल्टे हमें ही डांट-डपट कर चुप करा देते हैं ... पहले मैं नमाज भी पढ़ता था. नात शरीफ (भजन) भी सुनता था. लेकिन अब तब्लीगियों की वजह से मेरे और मेरे दीन के बीच दूरियां होती जा रही हैं ...’

जब हमने यह सवाल एक अन्य व्यक्ति से पूछा कि क्या तब्लीगी जमात से जुड़े लोग देश के दूसरे हिस्सों में भी ऐसा ही कर रहे हैं, तो उनका कहना था कि ‘इस बारे में कोई पुख़्ता जानकारी तो नहीं है. लेकिन अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब जयपुर में इतनी पाबंदियों के बावज़ूद ये लोग अपनी हरक़तों से बाज नहीं आ रहे तो कहीं और कैसे रुकेंगे. दिल्ली में जो हुआ उसे चूक माना जा सकता है. वहां सरकार और पुलिस की भूमिका भी सवालों में है. लेकिन ये लोग यहां जो कर रहे हैं वो सरासर ज़ुर्म है. तब्लीगियों पर कड़ाई से नज़र रखने की ज़रूरत है. हालांकि बीते एक-दो दिनों में दूसरे तब्लीगियों के कोरोना का शिकार होने की वजह से अब इनके हौसले थोड़े पस्त नज़र आते हैं. लेकिन इनकी अक़्ल कब तक ठिकाने रहेगी, कहना मुश्किल है!’

गुजरात के अहमदाबाद से ताल्लुक रखने वाले एक मुस्लिम सामाजिक कार्यकर्ता इस चर्चा में कुछ और भी बातें जोड़ते हैं. वे जो बताते हैं वह अल्ताफ की इस बात की पुष्टि करता है कि अप्रिय सवालों से निपटने के लिए तब्लीगी जमात से जुड़े लोग किस तरह के तर्कों का इस्तेमाल कर सकते हैं. ‘तब्लीगी जमात से जुड़े लोग मुसलमानों को आज में और धरती पर जीना नहीं सिखाते. वे लोग या तो बीते कल की बातें करेंगे या आने वाले कल की, या तो धरती के नीचे की (दफ़न होने की) चर्चा करेंगे या आसमान से ऊपर (जन्नत) के ख़्वाब दिखाएंगे. उन्हें असली दुनिया से कोई मतलब नहीं होता है. देखा जाए तो ये लोग मुसलमानों की ताकत को कमज़ोर करने का ही काम करते हैं’ वे कहते हैं.

‘गुजरात दंगों के बाद जो विधानसभा चुनाव हुए उसमें मुसलमानों के पास अपनी नाराज़गी जताने का एक बड़ा मौका था. लेकिन ठीक उसी समय तब्लीगी जमात ने उत्तरप्रदेश में एक इज्तिमा (मजहबी सम्मेलन) का आयोजन करा दिया जिसमें गुजरात के लाखों मुसलमान पहुंचे थे. असल में इन मुसलमानों को यकीन दिला दिया गया था कि वोट देने के बजाय उस सम्मेलन में भाग लेना कहीं ज़्यादा ज़रूरी है. ये संगठन हर साल करोड़ों मुसलमानों को इज्तिमा के नाम पर इकठ्ठा करता है. जरा सोचिए कि यदि तब्लीगी जमात हम मुसलमानों के हक़ के लिए इतनी भीड़ इकठ्ठा कर दे तो किस सरकार की हिम्मत होगी जो हमारी आवाज़ नहीं सुनेगी. लेकिन इस जमात को जिंदा मुसलमानों के मसलों से तो कोई सरोकार है ही नहीं. ये तो हमारी मौत के बाद के इंतजाम सुधारने में भरोसा रखते हैं’ वे सामाजिक कार्यकर्ता आगे जोड़ते हैं.

इस मामले में जब हमने तब्लीगी जमात के आयोजनों में शामिल होते रहने वाले दिल्ली के एक युवा कारोबारी से बात की तो उनका कहना था कि तब्लीगी जमात का उद्देश्य बुरा नहीं है. वह केवल दीन (धर्म) और अल्लाह से जुड़े रहने की बात करता है. लेकिन यह भी सही है कि इससे जुड़े कुछ लोग - खास कर कम पढ़े-लिखे लोग - ऐसा करने के लिए जिन तर्कों का सहारा लेते हैं उनमें से कइयों को पचा पाना मुश्किल है. उनका कहना था कि यह सिर्फ तब्लीगी या मुस्लिम समुदाय की बात नहीं है बल्कि ज्यादातर समुदाय में कुछ लोग उस समुदाय के खूब या कम पढ़े-लिखे लोगों को अपनी बातें समझाने के लिए ऐसे काम करते रहते हैं. इसकी वजह वे यह बताते हैं कि पढ़े-लिखे आधुनिक युवाओं को धर्म से जुड़ी अवधारणाओं को समझा पाना आसान नहीं हैं. और कम पढ़े-लिखे लोगों को कई बार ऐसी बातों से समझाना काफी आसान होता है.