“उन्नत कनेक्टिविटी और बेहतर कानून-व्यवस्था का सकारात्मक परिणाम है कि राज्य में निवेशकों की रूचि में 18.6 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. इन्वेस्टर्स समिट 2018 में 4.68 लाख करोड़ रूपये के निवेश प्रस्ताव मिले जिनसे 371 परियोजनाएं क्रियान्वित हुई हैं. इन सभी के माध्यम से प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से 33 लाख से अधिक रोजगार के अवसर सृजित होंगे.”

यह बात उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के तीन साल पूरे होने के मौके पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हिंदी के एक बड़े अखबार के सम्पादकीय पृष्ठ पर अपने एक लेख में कही है. आम तौर पर सरकारों के साल पूरे होने पर कथित उपलब्धियों के बड़े-बड़े बखान किये जाते रहे हैं. अपने सरकारी विज्ञापनों में ‘सब कुछ हरा ही हरा’ बताने के यथासंभव प्रयास करके अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने का कोई मौका छोड़ा नहीं जाता. तीन साल पूरे होने पर योगी सरकार भी इसकी अपवाद नहीं रही.

लेकिन प्रचार से इतर राज्य सरकार की तीन साल की उपलब्धियों की वास्तविकता क्या है यह योगी आदित्यनाथ के लेख की उपरोक्त पंक्तियों से भी कुछ स्पष्ट हो जाता है. मुख्यमंत्री अपनी प्रशंसा में बताते हैं कि ‘राज्य में निवेशकों की रूचि में 18.6 प्रतिशत की वृद्धि हुई है’, यानी कि निवेशक बढ़े या नहीं यह तो नहीं पता लेकिन उनकी रूचि जरूर बढ़ गयी है. इसी तरह मुख्यमंत्री लिखते हैं कि ‘2018 में 4.68 लाख करोड़ रूपये के निवेश प्रस्ताव मिले’ लेकिन इनके जरिये निवेश कितना आया यह वे नहीं बताते. इस संबंध में वे सिर्फ 371 परियोजनाओं के क्रियान्वयन की बात ही लिखते हैं. रही बात इनसे मिलने वाले रोजगारों की, तो इसके जवाब में योगी आदित्यनाथ लिखते हैं कि इन सभी के माध्यम से प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से 33 लाख से अधिक रोजगार के अवसर सृजित होंगे. यानी वे यह बता पाने की स्थिति में नहीं हैं कि उनके तीन साल के कार्यकाल में निजी क्षेत्र में कितने लोगों को रोजगार मिला है. उनका सारे दावे अस्पष्ट या भविष्य के हैं.

इसी तरह सरकार के तीन सालों की उपलब्धियों का बखान करने वाले सरकारी विज्ञापनों में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मुस्कुराती तस्वीर और भगवा रंग की छपाई के अलावा ऐसा कुछ भी नहीं है जो पिछली सरकारों के विज्ञापनों से ज़रा भी अलग हो. मसलन रिकार्ड गन्ना मूल्य भुगतान, कृषक कल्याण, सिंचाई व्यवस्था में सुधार, सबसे ज्यादा गन्ना व चीनी उत्पादन व गेहूं ,गन्ना ,आलू ,दूध आदि के उत्पादन में प्रथम स्थान और कानून व्यवस्था में सुधार आदि आदि.

यानी खुद मुख्यमंत्री की कलम भी, उनकी सरकार की प्रेस कांफ्रेंसों और तमाम तरह के विज्ञापनों की तरह ही, राज्य की जनता के हित में उन्होंने ठोस और खास क्या किया, यह बता पाने में असफल रही है. ऐसे हालात में विपक्ष ने भी योगी सरकार के तीन साल की उपलब्धियों के गुणगान को पूरी तरह ख़ारिज कर दिया. समाजवादी पार्टी नेता और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने योगी सरकार के तीन साल पूरे होने पर उसके द्वारा किये जा रहे उपलब्धियों के दावों को झूठ का पुलिंदा बताया. अखिलेश के मुताबिक योग आदित्यनाथ की सरकार निर्णय न लेने वाली सरकार है और उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उनके तीन सौ से अधिक विधायक दुखी बैठे हुए हैं.

कांग्रेस ने तो योगी सरकार के तीन साल के कामकाज पर बाकायदा एक पुस्तक जारी की है - ‘यूपी करे सवाल ,क्या किया तीन साल’. उसने योगी सरकार के कामकाज पर एक वेबसाइट भी बनाई है ताकि सरकार पर हमले तेज किये जा सकें. लेकिन विपक्ष के हमलों से ज्यादा समस्या बीजेपी को उसके अपने विधायकों और कार्यकर्ताओं के असंतोष से हो सकती है. क्योंकि जैसे-जैसे योगी सरकार का कार्यकाल ख़त्म होता जा रहा है वैसे-वैसे इन लोगों में कोई भी ‘काम’ न करा सकने की अधीरता भी बढ़ती जा रही है.

योगी आदित्यनाथ की सरकार भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की केंद्र सरकार की ही तरह ‘सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास’ की बातें करती है. लेकिन एक बड़े वर्ग को ऐसा लगता है कि इस पर अक्सर उनका भगवा एजेंडा भारी पड़ जाता है. लखनऊ में 19 -20 दिसंबर को हुए दंगे से निपटने का योगी सरकार का तरीका इसका एक उदाहरण माना जा सकता है. योगी आदित्यनाथ ने दिसंबर के दंगों के बाद जो बयान दिया उसमें ‘बदला लेने’ की बात कही गयी थी. वे शायद उस वक्त यह भूल गए थे कि किसी भी अपराध के लिए सिर्फ क़ानूनी करवाई ही की जा सकती है बदले की कार्रवाई नहीं. लोकतंत्र में चुनी हुई सरकार का काम अपने नागरिकों से बदला लेने का नहीं बल्कि उनकी रक्षा करने का होता है. फिर भले ही उनमें से कुछ लोगों ने उसे वोट दिया हो या नहीं. लेकिन योगी सरकार ने दंगों की आरंभिक जांच के बाद आरोपियों की गिरफ्तारी शुरु कर दी और फिर उन्हें वसूली के नोटिस भिजवाने भी शुरू कर दिए.

फिर इसके लगभग ढाई महीने के बाद दंगों की शुरूआती जांच में दोषी ठहराए गए 57 आरोपियों के पोस्टर राजधानी लखनऊ के प्रमुख चौराहों पर चस्पा कर दिए गए. पोस्टरों में इन लोगों से 88.6 लाख रूपये के नुकसान की भरपाई करवाने की बात कही गयी थी. इस तरह के पोस्टर गोरखपुर, कानपुर आदि शहरों में भी लगाए गए. सरकार के इस भड़काऊ कदम पर बुद्धिजीवियों और समाज के जागरूक नागरिकों की कड़ी प्रतिक्रियाएं सामने आयीं. निजता का सम्मान करते हुए सरकार से पोस्टर हटवाने की गुहार भी लगायी गयी. मगर योगी सरकार को दया नहीं आयी. इस बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट ने योगी सरकार के पोस्टरों पर स्वतः संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार को फटकार लगाई और दो दिन के भीतर सभी पोस्टरों को हटवा कर इस बारे में अदालत को सूचित करने का निर्देश भी दिया.

इस हालत में अगर चाहती तो योगी सरकार सड़कों से पोस्टरों को हटवा कर नुकसान की भरपाई की कार्रवाई जारी रख सकती थी. इससे न केवल इस मामले में कड़वाहट थोड़ी कम हो सकती थी बल्कि अदालत के आदेश का सम्मान भी हो जाता. लेकिन सरकार ने इसे ‘प्रतिष्ठा का प्रश्न’ बनाकर फिर से अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगा दी. वह पोस्टर हटाने के बजाय मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले गयी. साथ ही साथ योगी सरकार ने अपने कदम को जायज ठहराने और भविष्य में भी ऐसा ही कर सकने के लिए एक अध्यादेश भी जारी कर दिया. इससे पहले सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने से इंकार कर राज्य सरकार को एक बड़ा झटका दे चुका था. इसके बाद राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को यह समझाने की कोशिश की थी कि उसने इस अध्यादेश के जरिये सुप्रीम कोर्ट के 2011 के उस आदेश का ही अनुपालन करने की कोशिश की है. इसमें कहा गया था कि यदि किसी प्रदर्शन के दौरान सरकारी या निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जाता है तो इसे रोकने के लिए कड़े नियम बनाये जाने चाहिए. हालांकि अदालत इस दलील से संतुष्ट नहीं हुई और अब मामला बड़ी बेंच को सौंप दिया गया है.

योगी सरकार के लिए ‘सबका विश्वास’ हासिल करने का यह सुनहरा अवसर था. अगर वह सरकार के तीन साल पूरे होने पर सीएए विरोधी हिंसा के सामान्य आरोपियों को कड़ी चेतावनी और पाबंदियों के साथ आम माफ़ी दे देती तो इससे प्रदेश में एक सकारात्मक माहौल बन सकता था. लेकिन सरकार यहां पर चूक गयी. दंगों या विरोध प्रदर्शनों के दौरान होने वाली हिंसा ,तोड़फोड़ व आगजनी आदि से निपटने तथा उसकी क्षतिपूर्ति के लिए कड़े कदम उठाने का स्वागत होना चाहिए लेकिन इसके लिए सत्ता को बदले की भावना के बजाय निष्पक्ष क़ानूनी रास्ता अपनाना चाहिए था. मगर योगी सरकार इसके लिए तैयार होती नहीं दिखी.

अब कोरोना संकट ने योगी आदित्यानाथ और उनकी सरकार को एक नया मौका दिया है. बदली हुई परिस्थितियों में अगर वे बिना किसी भेदभाव के कुछ अच्छा कर देते हैं तो वह उनके बीते तीन सालों पर भारी पड़ सकता है. इस दिशा में बीते कुछ दिनों से वे काफी कुछ करते भी दिख रहे हैं. उदाहरण के लिए वे कोरोना के संकट से निपटने के लिए तुंरत और कठोर निर्णय ले रहे हैं. और राज्य की पुलिस प्रशासन तब्लीगी जमात के हवाले से पूरे मुस्लिम समुदाय को ही खलनायक बनाने के कुछ प्रयासों पर भी उचित कदम उठा रही है. उदाहरण के तौर पर हाल ही में एक समाचार चैनल ने यह खबर चलाई थी कि प्रदेश के फिरोज़ाबाद ज़िले में तब्लीगी जमात के चार लोग करोना से संक्रमित हो पाए गये हैं और उन्हें लेने जब पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की टीम पहुंची तो उस पर पथराव किया गया. फिरोजाबाद पुलिस ने न्यूज चैनल की इस खबर का तुरंत खंडन किया और इससे जुड़े ट्वीट को हटाने का निर्देश भी दिया. ऐसा ही कुछ दूसरे ऐसे कुछ मामलों में भी देखा गया है.

कोरोना संकट से निपटने में योगी सरकार तो कठोर निर्णय लेती दिख रही है लेकिन इनके क्रियान्वयन के मामले में प्रशासन उतना चुस्त अब तक नहीं दिख पा रहा है. इस मामले में राज्य सरकार के स्तर पर कभी-कभी अस्पष्टता का अभाव भी देखा जा रहा है. इसी के चलते जब उसने आठ अप्रैल को राज्य के 15 जिलों के कुछ इलाकों को पूरी तरह से सील करने की घोषणा की तो नोएडा जैसे राज्य के सबसे विकसित और व्यवस्थित शहरों में अफरा-तफरी का आलम बना रहा. अगर योगी सरकार संकट की इस घड़ी में राज्य के हर समुदाय को दूसरे के बराबर न्याय और सभी को जरूरी चीजें उपलब्ध कराने का भरोसा दिला दे तो न केवल कोरोना को हराने में यह बड़ी भूमिका निभा सकता है बल्कि आदित्यनाथ को भी एक नई तरह से स्थापित करने का काम कर सकते हैं.

नहीं तो वे कितने ही उत्सव मना लें सबके विश्वास का दावा नहीं कर सकते.