भारत में आजादी के तुरंत बाद 1948 में भ्रष्टाचार के मामलों की शुरूआत सेना के जीप खरीद घोटाले से हुई थी. इसके बाद सरकारी स्तर पर इसे रोकने की कोशिशें भी शुरू हुईं. इस कड़ी में भ्रष्टाचार निरोधक कानून-1947 की समीक्षा के लिए बख्शी टेकचंद समिति के गठन को पहली कोशिश माना जा सकता है. इसके बाद 1950 में गोरवाला समिति का गठन हुआ जिसने पाया कि भारत में मंत्री और सांसद-विधायक भारी भ्रष्टाचार में लिप्त हैं.

हालांकि ऐसी समितियों और उनकी सिफारिशों के बावजूद भारत में भ्रष्टाचार की गति कभी थमी नहीं. 1957 का मूंदड़ा घोटाला भ्रष्टाचार का ऐसा बड़ा मामला था जिसमें केंद्रीय मंत्री शामिल पाए गए थे. इस मामले में तत्कालीन वित्तमंत्री टीटी कृष्णमचारी को इस्तीफा तक देना पड़ा. इन परिस्थितियों में तत्कालीन गृहमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने भ्रष्टाचार रोकने के तात्कालिक तंत्र की समीक्षा और सुझाव के लिए तमिलनाडु के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता के संथानम की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया. 1962 में गठित इस समिति की सिफारिशों के आधार पर ही प्रथम और द्वितीय श्रेणी के सरकारी अधिकारियों पर भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए 1964 में केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) की स्थापना हुई.

पहली बार लोकपाल नामक संस्था का विचार भी संथानम की रिपोर्ट से ही निकला हुआ माना जाता है. अपनी सिफारिशों में संथानम समिति ने कहा था कि भ्रष्टाचार की रोकथाम के लिए जो सर्वोच्च संस्था बनाई जाए वहां तक आम आदमी की पहुंच होनी चाहिए ताकि वह उसके समक्ष अपनी शिकायतें दर्ज करवा सके.

संसद ने उस वक्त माना था कि इस शक्ति के आते ही संबंधित संस्था काम के बोझ से दब जाएगी और अप्रभावी होने लगेगी, इसलिए आम नागरिकों के लिए अलग से संस्था गठित करने की आवश्यकता महसूस की गई. यह मूलरूप से लोकपाल के गठन का बीज विचार था.