आज का दिन कल जैसा नहीं था. आज धूप में गर्मी थी. काम खत्म करने के बाद मैं घर के बाहर बैठी हुई थी. मन दूर सामने फैली देहरादून की इन गर्वीली पहाड़ियों में कहीं था. यहां एकांत पसरा है. पथरीला पर विराट एकांत. ऐसा एकांत जिसे आपने कभी सामने से नहीं देखा, लेकिन फिर भी वह कहीं आपके भीतर है. किसी की अनजान व्यक्ति को बहुत पहले से जानने के अहसास की तरह.

मैंने हाथ की किताब पढ़ना शुरू किया. किताब में एक लड़की है, जो ऑक्सफ़ोर्ड और कैंब्रिज की शानदार इमारतों और ख़ूबसूरत बगीचों से गुज़र रही है. एक ऐसी दुनिया जहां वह बस एक विज़िटर हो सकती है या फिर एक मेहमान. जिसे वहां के सुसमृद्ध, विशालकाय पुस्तकालय में, जहां उसके प्रिय कवियों और लेखकों की पांडुलिपियां सुरक्षित हैं, घुसने के लिए डीन की चिट्ठी चाहिए या फिर किसी पुरुष का साथ. क्यों? इसलिए कि वह एक महिला है. मैं वर्जीनिया वूल़्फ़ की बात कर रही हूं. वही वर्जीनिया वुल्फ जो आने वाले वक्त में न सिर्फ सदी की मशहूर लेखिका बल्कि फेमिनिज्म के सबसे बड़े प्रतीकों में से एक बनने जा रही थी.

इस पुस्तकालय में वर्जीनिया प्रवेश नहीं मिलता. गाउन पहनने वाला प्रबुद्ध रक्षक एक महिला को कैसे आने दे. उसके चेहरे पर लिखे भद्र निषेध में कोई तिरस्कार नहीं है, बस उसके समय की मान्यता है कि एक महिला पुरुषों की तरह पढ़ने-लिखने, शोध करने, स्कॉलर होने की अधिकारी नहीं है. वह उल्टे पांव लौट आती है. दोपहर के खाने की घंटी बजने पर वह सुसज्जित डाइनिंग हॉल में जाती है. यहां महिलाओं की उपस्थिति वर्जित नहीं है. पुरुषों के साथ मेज़ पर बैठी स्त्रियां, उंगलियों में वाइन के ग्लास उठाए उनकी कविताएं सुनती हुई, उनकी नई थियरी या नई उपलब्धि का गुणगान सुनती हुई स्त्रियां, उनकी तरफ़ प्रशंसा भरी नज़रों से देखती हुई स्त्रियां, उन्हें अच्छी लगती हैं.

इन स्त्रियों की आंखों में चमकती उनकी महात्वाकांक्षाएं पुरुषों को सितारों की तरह लुभाती हैं. लेकिन वे इन सितारों को उनकी आंखों के आसमान में ही रहने देना चाहते हैं. शायद इसीलिए कि वे यह मानते हैं कि ज़मीन सिर्फ़ उनके लिए है.

किताब में आगे वर्जीनिया उस डाइनिंग हॉल में परोसे गए शानदार खाने का ज़िक्र करती हैं. खाने में बहुत कुछ है, कई क़िस्में हैं, सब बेहतरीन. इस विश्वप्रसिद्ध परिसर में, जिसकी इमारतों की नींव में दुनिया के सबसे धनी राजाओं, व्यवसाइयों और अन्य धनाढ्यों का सोना-चांदी उड़ेला गया है. इसके गुंबदों, खिड़कियों और दीवारों को चुने हुए पत्थरों, लकड़ियों और कांच से, सबसे बेहतरीन कारीगरों ने सालों मेहनत करके बनाया है. वहां पढ़ने आने वाले युवा लड़कों के लिए खाना तो फ़िक्र करने की बात ही नही है. ये बेहतरीन और लज़ीज़ खाने तो इस क़ाबिल भी नहीं कि इनका ज़िक्र किया जाए. वर्जीनिया नोट करती है कि जब कभी इन ऐतिहासिक भोजनालयों की बात होती है तो ज़िक्र खाने का नहीं, उस खाने के दौरान कही जा रही चुटीली बातों और कविता की पंक्तियों का होता है.

खाने के बाद वे टहलती हुई फर्नहैम गांव की तरफ़ जाती हैं. यहां भी एक कॉलेज है जिसके बगीचे में जंगली झाड़ियां उगी हैं. यहां वक्त बिताने के बाद रात के खाने के लिए वे फिर भोजनालय में जाती हैं. सादी तश्तरियों में परोसे गए इस खाने में याद रखने लायक कुछ भी नहीं. सब कुछ बेहद मामूली और सादा. ये महिलाओं का कॉलेज है. इसकी नींव रखने के लिए कोई रानी या धनाढ्य परोपकारी अपने कंधे पर सोने के थैले लादे यहां नहीं आया. यहां वे औरतें ही जानती हैं कि इस इमारत के लिए पैसे कैसे आए. उन्हें कम से कम तीस हजार पाउंड जुटाने थे. उन्होंने कैसे जुटाए, इसकी कहानी सुनाकर वे थक चुकी हैं. वे आज भी बस यही जानती हैं कि ‘एमेनिटीज़ विल हैव टू वेट.’

अन्याय की इस कहानी को भी वर्जीनिया इतनी गहराई में जाकर लिखती हैं कि उनकी आवाज़ में शिकायत नहीं दिखती. शिकायत सतही चीज़ है. गहराई में जाना, सब देख लेना है, जान लेना है. सब जान लेने के बाद आप शिकायत नहीं कर सकते. उनकी भाषा, उनके प्रवाह और उनकी दृष्टि से मैं इतनी प्रभावित होती हूं कि उनके बारे में बात करना चाहती हूं. मैं पुनीत से कहती हूं कि ‘आइ एम अमेज़्ड एट हाउ रीडिंग अ गु़ड टेक्स्ट मेक्स यू फ़ील डिज़ी, अनसैटल्ड, ऑल्मोस्ट एट द क्लाइमेक्स... एंड लीव्स यू हंग्री फॉर मोर.’

‘व्हाट पोइट्स, आइ क्राइड अलाउड, एज़ वन डज़ इन द डस्क, व्हाट पोइट्स दे वर!’

वह क्या औरत थी! वह क्या लेखक थी!

वर्जीनिया को पढ़ते हुए मुझे अचानक ही ये अहसास होता है कि मैं एक महिला लेखक को पढ़ रही हूं. महिला लेखक होना कभी सिर्फ़ लेखक होना नहीं रहा है. उसके साथ इन दो तरह की विरासतों से गुज़रते हुए मैं देखती हूं कि अब भी कितना कुछ वैसा ही है. मुझे अपना विश्वविद्यालय याद आता है. 24 घंटे खुलने वाली साइबर लाइब्रेरी जो महिलाओं के लिए 24 घंटे नहीं खुलती है. भोजनालय का खाना जहां पुरुषों के लिए समिष (नॉनवेज) भोजन भी बनता है पर महिलाओं के लिए सिर्फ़ निरामिष (वेज). और भी कितना कुछ…

मेरे घर के सामने तीन काले कुत्ते रहते हैं. एक मां है और दो अलग-अलग पैदाइश की बच्चियां. बड़ी वाली बच्ची एक साल की है. बहुत शर्मीली. घर के भीतर, खाना खाने के लिए आंगन में तभी आती है जब कोई बाहर न हो. कोई आता है तो भाग खड़ी होती है. छोटी कुछ महीने की है. दिन में अक्सर बरामदे में पड़ी आराम करती है. बाकी समय मां या बहन से सरवाइवल के दांव-पेंच सीखती है. हम सब अक्सर उन्हें देखते हैं और कहते हैं कि यह पौआ बड़ी समझदार मां है.

इस समय मां गायब है. बच्चियां खेल रही हैं. मैं बाहर कुर्सी डाले बैठी हूं. भाई ने मुझे खाना वहीं लाकर दे दिया है. खाने की ख़ुशबू से बड़ी मेरी तरफ़ आती है. मैं एक कौर नीचे ज़मीन पर रखती हूं. वह पास नहीं आती दूर से देखती है. वह इंतज़ार करती है. मैं एक और कौर रखती हूं, इस बार कुछ दूर. वह खा लेती है. सामने कुछ दूरी पर न जाने किसने एक एल्युमिनियम फ़ॉइल में कुछ पूड़ियां लाकर डाल दी हैं. शायद इन तीनों में से ही कोई लाया होगा. मेरी नज़र उन पर जाती है जब एक कौआ पूड़ी उठाकर उड़ता है. बड़ी दौड़कर उस तरफ़ जाती है. पूड़ियां सूंघती है, फिर वापस मेरे पास आ जाती है. शायद उसे वही खाना है जो मैं खा रही हूं. पिछला कौर अब भी वहीं पड़ा है, मेरे नज़दीक.

अब मैं खाना ख़त्म कर वापस किताब उठा चुकी हूं. बड़ी इस बार थोड़ा नज़दीक आती है. मैं ऐसे बैठी रहती हूं जैसे मैंने उसे देखा तक नहीं. वह इस बार पास आकर खा लेती है. आराम से खाती है. खाने के बाद मेरा घुटना चाटती है. वह कभी इस तरह प्यार जताती नहीं दिखी. उन्हें भी नहीं, जो यहां रहते हैं और उसे रोज़ खाना खिलाते हैं. मैं बहुत भावुक महसूस करती हूं. खाने के बाद बड़ी वहीं कुछ दूरी पर तसल्ली से बैठ जाती है. मुझे लगता है कि मेरे एकांत में वह मेरी गार्जियन है, साथी है. उसे क्या लगता है, मैं उससे पूछ नहीं पाती. पर मैं उसका साथ महसूस करती हूं. साथ दोनों तरफ़ महसूस होने वाली चीज़ है.

मेरी मेमोरी मुझे स्कूल के दिनों की एक वाद-विवाद प्रतियोगिता तक ले जाती है. स्त्रीवाद के पक्ष और विपक्ष में बहस चल रही है. मैं नवीं क्लास में पढ़ती हूं. ग्याहरवीं में पढ़ने वाले मेरे पसंदीदा सीनियर विपक्ष में बोल रहे हैं. वे एक कहानी से अपना भाषण शुरू करते हैं. ‘एक बैलगाड़ी थी. सड़क पर चल रही थी. काफ़ी धूप थी. एक कुत्ता जो साथ ही चल रहा था, धूप के कारण वह बैलगाड़ी की छाया में चलने लगा. कुछ देर बाद उसे लगने लगा कि बैलगाड़ी उसके दम पर चल रही है.’

इस विचित्र तर्क में बैलगाड़ी पुरुष है, और कुत्ता स्त्री.

मुझे नहीं पता कि मेरे वे सीनियर इस तर्क को कहां से लाए पर याद है कि इस तर्क को मैं आज तक नहीं भूली हूं.

मैं समझ पाती हूं कि वर्जीनिया वूल्फ को अपना पब्लिकेशन हाउस क्यों खोलना पड़ा होगा.