सूसन सौण्टैग

एक ऐसी लेखक की जीवनी पढ़कर ख़त्म की जो जीवन भर भाषा के सच्चाई से संबंध पर लगातार विचार करती रही. राजनीति में, अमरीकी लेखक सूसन सौण्टैग की ज़िन्दगी बताती है कि कई बड़े शब्द जैसे ‘समाजवाद’, ‘कला’, ‘लोकतंत्र’ कितने अस्थिर हो सकते हैं. स्वयं अमरीका का आशय कितना घटता-बदलता रहता है. सूसन के नज़दीक न तो भाषा, न ही सच्चाई स्थिर थे, न हो सकते थे. एक हंगामी सदी में इन दोनों की अस्थिरता के बारे में लगातार विचार करने वालों में सूसन लगभग आगे की क़तार में रहीं. वे ऐसे अनेक अवसरों पर भौतिक रूप से मौजूद थीं जो बीसवीं शताब्दी में निर्णायक बिन्दु थे: क्यूबा क्रान्ति, बर्लिन दीवार का पतन, बमबारी के घटाटोप में हनोई, इज़रायल में योम किपर युद्ध के समय. सौण्टैग की जीवनी (700 पृष्ठों में फैली और 116 पृष्ठों के अतिरिक्त नोट्स) इस दौरान पूरी पढ़ डाली. सूसन एक विभाजित संसार में एक विभाजित व्यक्तित्व थीं.

वे अपने युग से समरस थीं पर उससे अलग भी. उन्होंने दिखाया कि कैसे रूपक आत्म को रूपायित करता और विकृत करता है, कैसे भाषा दिलासा दे सकती है पर नष्ट भी कर सकती है; कैसे प्रतिनिधित्व राहत दे सकता है पर अश्लील भी हो सकता है. वे व्याख्या के विरुद्ध थीं पर उन्हें अपने समय की बार-बार व्याख्या करनी पड़ी. उनका साहस कमाल का था. वे बड़ी से बड़ी सत्ता का खुलकर विरोध कर सकती थीं. उनकी यह हिम्मत ही थी कि उन्होंने सेरायेवो में, वहां चल रहे बेहद हिंसक गृहयुद्ध के दौरान, दैनंदिन गोलाबारी के बीच, सेमुएल बैकेट का नाटक ‘वेटिंग फ़ार गोडो’ निर्देशित किया.

सूसन का निजी जीवन रोमांच, नये-नये संबंध, प्रेम और रति, समलैंगिकता आदि से भरपूर था. उसमें अपार उत्साह और ललक लेकिन हिंसा, दुर्व्यवहार, अप्रत्याशित नाराज़गी आदि भी थे. उनका अपना आरंभिक जीवन अपनी मां के साथ बहुत कठिन बीता था. बहुत कम उम्र में उन्होंने प्रेम-विवाह किया था और उनका एक बेटा था. उसके साथ उनका संबंध उतना ही कठिन था जितना स्वयं उनका अपनी मां के साथ रहा था. उन्हें दूसरों की पीड़ा का गहरा अहसास था पर वे स्वयं जब-तब परपीड़न से विरत नहीं हो पाती थीं. उन्हें अमरीकी बौद्धिक और सांस्कृतिक जीवन में अपने वर्चस्व का पता था और वे अपने को, उचित ही, उसका सुपात्र मानती थीं. पर वे कब अप्रत्याशित रूप से कुछ मुंहफट और अप्रिय कह देंगी इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता था.

दिलचस्प यह है कि सूसन जीवन भर एक ऐसी आकर्षक व्यक्ति बनी रहीं जिनके अनेक स्त्री-पुरुष प्रेमी भी रहे और मित्र, सहायक भी. उनकी बुद्धि और कुशाग्रता का लोहा सभी मानते थे. उनके अन्तर्विरोध, निजी और सामाजिक व्यवहार की उग्रता अलक्षित नहीं जाती थी पर यह उनके आकर्षण और बौद्धिक आतंक में कोई कटौती नहीं कर पाती थी.

दिलचस्प यह भी है कि सौण्टैंग फ्रेंच उत्तर-आधुनिकों देरिदा, फ़ूको, एलेन सिक्सू आदि से निजी रूप से परिचित थीं और उन पिछले लेखकों से भी जैसे बार्थ, वेन्यामिन और सार्त्र जिन्हें ये उत्तर-आधुनिक भी बखूबी जानते-गुनते थे, पर उन्हें उत्तर-आधुनिकता कभी स्वीकार्य नहीं हुई - ‘उसका हर चीज़ को समान बनाना’.

बार-बार सौण्टैग इस धारणा पर लौटती रहीं कि साहित्य, कलाओं आदि का बुनियादी काम हमें अधिक देखना, अधिक सुनना और अधिक महसूस करना सिखाना है. ईराक युद्ध के अवसर पर उन्होंने लिखा:

‘‘.... जो लोग आज सार्वजनिक पदों पर हैं उन्होंने हमें यह बताया है कि उनका काम प्रबन्धात्मक है: भरोसा दिलाना और शोक का प्रबन्धन. राजनीति, लोकतंत्र की राजनीति, जो असहमति और बेबाकी की जगह होती है, साइकोथैरेपी में बदल दी गयी है. हम सबको हर तरह से शोक मनाना चाहिये. पर हमें एक साथ मूर्ख नहीं होना चाहिये.... हमसे बार-बार कहा जा रहा है कि ‘‘हमारा देश मजबूत है’. मैं इसे पूरी तरह से आश्वस्तिकर नहीं पाती. कौन सन्देह कर रहा है कि अमरीका मजबूत है. पर अमरीका को यही भर नहीं होना है.’’

दुन्या मिखाइल

दुन्या मिखाइल ईराकी-अमरीकी कवि हैं जो अरबी और अंग्रेज़ी में लिखती हैं. वे बगदाद में पली-बढ़ी और वहीं पढ़ीं. उन्हें अपने लेखन की वजह से ही 1996 में स्वदेश छोड़ना पड़ा था. अब वे डेट्रॉयट में रहती हैं और मिशिगन विश्वविद्यालय में अरबी पढ़ाती हैं. वे अरबी और अंग्रेजी दोनों में लिखती हैं. कार्कानेट से उनका नया संग्रह ‘इन हर फ़ेमिनाइन साइन’ पिछले वर्ष ही प्रकाशित हुआ है. उनका मानना है कि दो समूह प्रोत्साहन से सबसे अधिक लाभाविन्त होते हैं: बच्चे और कवि. कोरोना एकान्त में उनका संग्रह पढ़ गया और कुछ कविताओं का हिन्दी अनुवाद भी कर लिया.

रंगों में युद्ध

दीवार पर डिजिटल नक़्शा

अमरीकी युद्ध दिखाता है

रंगों में.

ईराक बैंगनी में

सीरिया पीले में

कुवैत नीले में

अफ़गानिस्तान लाल में

वियतनाम हरे में.

युद्ध

नक्शे पर

सुन्दर है.

उन्होंने अरबी में हाइकूनुमा छोटी कविताएँ भी लिखीं हैं ‘टैबलेट’ शीर्षक से. उनमें से कुछ यों हैं:

मेरी कागज़ की नाव नदी में बह गयी

एक दुनिया अपने पीछे लिये हुए

उसमें एक ख़ास नोट था.

वह एक दिन पहुंचेगा,

देर से सही,

सारे सच देर से पहुंचते हैं.

000

कछुए की तरह

मैं हर जगह चलती हूं

अपना घर अपनी पीठ पर लिये.

000

जब चन्द्रमा पूर्ण होता है

वह एक शून्य की तरह दीखता है.

जीवन गोल है

अन्त में.

000

पृथ्वी बहुत सीधी है

तुम उसे एक आंसू या एक हंसी से समझा सकते हो.

पृथ्वी इतनी जटिल है

तुम्हें एक आंसू या एक हंसी दरकार होगी

उसे समझाने के लिए.

000

हम विचलित नहीं होते जब

घास मरती है. हमें पता है

वह वापस आयेगी

एक ऋतु या दूसरी में.

मृतक वापस नहीं आते

पर वे हमेशा प्रकट होते हैं

घास की हरीतिमा पे

000

सब बच्चे कवि होते हैं

जब तक कि वे आदत छोड़ नहीं देते

उन तितलियों को पकड़ने की जो वहां नहीं होतीं.