1-कोरोना वायरस के चलते भारत में जारी 21 दिनों के लॉकडाउन को और आगे बढ़ाया जा सकता है. खबरें हैं कि यह दो हफ्ते आगे बढ़ सकता है. 2.9 ट्रिलियन डॉलर की भारतीय अर्थव्यवस्था फिलहाल काफी हद तक थमी हुई है. सभी तरह के व्यापारिक प्रतिष्ठान बंद हैं और लोगों से घरों के भीतर रहने के लिए कहा गया है. लेकिन लॉकडाउन को लंबा खींचने के अपने खतरे भी हैं. बीबीसी की रिपोर्ट.

कोरोना वायरस: लॉकडाउन हटाने का जोख़िम क्यों नहीं ले पाएगा भारत

2-यह एक दिलचस्प विचार है कि क्या होता अगर आज मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री होते? या फिर क्या होता अगर कोरोना वायरस जैसे महामारी उनके समय में फैली होती. द प्रिंट हिंदी पर अपने इस लेख में कावेरी बामजई बता रही हैं कि नरेंद्र मोदी और मनमोहन सिंह दोनों का अपना एक अलहदा मिजाज है और इसलिए मौजूदा प्रधानमंत्री की जगह पूर्व प्रधानमंत्री को रख दिया जाए तो तस्वीर कुछ और होती.

कोरोनावायरस संकट अगर मोदी नहीं बल्कि मनमोहन सिंह के राज में आता तब क्या होता

3-कोरोना वायरस के बारे में जो बातें जोर-शोर से कही जा रही थीं उनमें एक यह भी थी कि अप्रैल में जब तापमान बढ़ेगा तो यह वायरस खत्म हो सकता है लेकिन, अब जानकार मान रहे हैं कि जैसे जैसे तापमान बढ़ता जाएगा, मुश्किलें और भी बढ़ जाएंगी. डॉयचे वेले हिंदी पर रोमान गोंचारेंको की रिपोर्ट.

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4-महामारियों का अपना एक अनूठा इतिहास रहा है. वर्तमान में कोरोना जनित विश्वव्यापी महामारी कोविड-19 ने मानव इतिहास की कुछ कुख्यात महामारियों पर फिर से चर्चा की शुरुआत कर दी है. असल में महामारियों के इतिहास और उपनिवेशवाद के बीच एक अभिन्न संबंध रहा है जिसके कई पहलुओं की पड़ताल होनी अभी भी बाकी है. न्यूजलॉन्ड्री हिंदी पर सौरव कुमार राय का लेख.

महामारियों का इतिहास एवं उपनिवेशवाद

5-कोरोना वायरस से बने हालात ने भारत में सामुदायिक पूर्वाग्रहों को एक नए पाताल में पहुंचा दिया है. सोशल मीडिया की बदौलत एक बड़े वर्ग के लिए यह मुद्दा हाल के कई दूसरे मुद्दों की तरह हिंदू-मुसलमान तक सिमटता दिख रहा है. इसकी सबसे ज्यादा मार गरीब वर्ग पर पड़ी है. दैनिक भास्कर पर राहुल कोटियाल की रिपोर्ट.

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