दो दिसंबर 2019. चीन के एक प्रमुख शहर दोंगुआन में एक बड़े अस्पताल के डॉक्टर उलझन और चिंता में थे. इसकी वजह एक डॉक्टर ही था जिसे कफ और तेज बुखार की शिकायत के चलते भर्ती कराया गया था. जांच में पता चला था कि 51 साल के इस डॉक्टर के फेफड़ों में संक्रमण है जिसके चलते उसे न्यूमोनिया हो गया है. लेकिन चिंता की वजह यह नहीं बल्कि इस न्यूमोनिया की वजह थी. कोरोना वायरस को इससे पहले इंसानों में नहीं देखा गया था. दोंगुआन का यह डॉक्टर इस वायरस के चलते अस्पताल पहुंचने वाला पहला मरीज था.

22 दिसंबर आते-आते कोरोना वायरस के चलते चीन में मौतों का आंकड़ा नौ तक पहुंच चुका था. दुनिया ने चौंकना शुरू ही किया था कि इसने खतरनाक रफ्तार पकड़ ली. 31 दिसंबर तक यह चीन में 213 लोगों की जान ले चुका था और 9,692 लोग इसकी चपेट में थे.

इसके करीब एक महीने बाद भारत में इस वायरस का पहला मामला दर्ज किया गया. मरीज केरल के त्रिचूर का रहने वाला एक छात्र था जो चीन के वुहान विश्वविद्यालय में पढ़ता था और थोड़े ही दिन पहले वहां से लौटा था. इसके बाद खबर आई कि राज्य सरकार ने करीब 400 लोगों को निगरानी में रखा है. थोड़े ही दिन बाद राज्य में दो और मामले दर्ज किए गए. यह दो और तीन फरवरी की बात है. दोनों ही मामले केरल के थे और इनमें भी संक्रमण की चपेट में आने वाले वुहान विश्वविद्यालय के छात्र ही थे. इन तीनों को ही अलग-थलग रखकर इनका इलाज किया गया और ये सभी ठीक हो गए.

इससे कुछ ही दिन पहले 30 जनवरी को विश्व स्वास्थ्य संगठन कोरोना वायरस के संक्रमण को स्वास्थ्य के लिहाज से अंतरराष्ट्रीय आपात स्थिति घोषित कर चुका था. इससे पहले ऐसा उसने सिर्फ पांच बार ही किया था. ठीक इसके एक दिन बाद यानी 31 जनवरी को इटली में भी कोरोना वायरस के चलते आपातकाल घोषित किया जा चुका था. अब तक भारत के पड़ोसी चीन में भी कोरोना वायरस से मरने वालों का आंकड़ा 350 से ऊपर जा चुका था. उसके 10 दिन में 1000 बेड वाला अस्पताल तैयार करने की खबर भी दुनिया भर में सुर्खियां बन रही थी. उधर, चार फरवरी को भारत ने चीनी नागरिकों और बीते दो हफ्तों में चीन गए विदेशी नागरिकों के मौजूदा वीजा रद्द कर दिए.

फिर भी देखा जाए तो फरवरी के पहले हफ्ते तक भारत में कोरोना वायरस खबरों और प्राथमिकताओं की फेहरिस्त में बहुत पीछे दिख रहा था. उस समय दिल्ली में विधानसभा चुनाव के लिए वोट डाले जाने थे. सबकी नजरें इसी पर थीं. मुकाबला केंद्र में सत्ताधारी भाजपा और दिल्ली में सत्तासीन आम आदमी पार्टी के बीच था. ये वही दिन थे जब शाहीन बाग और कई और जगहों पर एनआरसी और सीएए के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो रहे थे, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शाहीन बाग को संयोग नहीं प्रयोग बता रहे थे, भाजपा नेता अनुराग ठाकुर देश के गद्दारों को गोली मारने के नारे लगवा रहे थे और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हनुमान चालीसा पढ़ रहे थे. चारों तरफ इन्हीं खबरों की चर्चा थी.

फरवरी का दूसरा हफ्ता शुरू हुआ. इसके पहले दिन यानी आठ फरवरी को चीन में कोरोना वायरस से मरने वालों का आंकड़ा 722 हो चुका था. इसी दिन दिल्ली चुनाव के लिए वोट भी पड़े थे. 11 फरवरी को नतीजे आए और खबरों में आम आदमी पार्टी की प्रचंड जीत छाई रही. यह वही दिन था जब चीन में कोरोना वायरस से मरने वालों का आंकड़ा 1000 पार हो चुका था. विश्व स्वास्थ्य संगठन चेतावनी दे रहा था कि कोरोना वायरस के चीन से बाहर जाने का मतलब दुनिया पर बड़ी आफत का आना है और मानवजाति भरसक कोशिश करे कि यह महामारी काबू के बाहर न निकल जाए.

उधर, भारत सरकार का कहना था कि चिंता की कोई बात नहीं. 13 फरवरी को स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन का बयान आया कि कोरोना वायरस से घबराने की जरूरत नहीं है और मास्क-दस्तानों से लेकर दवाओं तक तमाम जरूरी चीजों का स्टॉक तैयार है. उन्होंने यह भी बताया कि भारत खुद तो तैयार है ही, पड़ोसी चीन को भी वह मेडिकल सप्लाई, उपकरण और अन्य सामान भेज रहा है. इन्हीं दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को फोन कर उन्हें मदद की पेशकश की थी. हर्षवर्धन का यह भी कहना था कि पूरी सावधानी बरतते हुए हवाई अड्डों के अलावा 12 प्रमुख और 65 छोटे बंदरगाहों पर भी लोगों की थर्मल स्क्रीनिंग की जा रही है. हालांकि बाद में पता चला कि यह कोई फूलप्रूफ तरीका नहीं है क्योंकि कोरोना वायरस संक्रमण की शुरुआत में कई दिन तक ऐसा भी हो सकता है कि शरीर का तापमान सामान्य ही रहे. खैर, इस तरह फरवरी का दूसरा हफ्ता भी खत्म हो गया.

फरवरी का तीसरा हफ्ता आने के साथ ही चीन में कोरोना वायरस से मरने वालों की संख्या 1800 के पार जा चुकी थी. लेकिन उसके साथ तीन हजार किलोमीटर से भी लंबी सीमा साझा करने वाले भारत में तब भी कोई खास हलचल नहीं दिख रही थी. अब सभी का सारा ध्यान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भारत दौरे और इससे जुड़ी तैयारियों की तरफ लगा दिख रहा था. इसी दौरान झारखंड विकास मोर्चा का भाजपा में विलय और इसके मुखिया बाबूलाल मरांडी की ‘घर वापसी’ भी चर्चा में रही.

फरवरी का चौथा हफ्ता डोनाल्ड ट्रंप के दो दिवसीय भारत दौरे और इस दौरान राजधानी दिल्ली में सीएए समर्थकों और विरोधियों के बीच हिंसा के नाम रहा. इस दौरान भारत ने अमेरिका के साथ तीन अरब डॉलर का रक्षा खरीद समझौता किया. उधर, दिल्ली में हुई हिंसा बढ़ती गई और जब तक यह रुकी तब तक इसमें 50 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी थी. इस हिंसा की सारी दुनिया में चर्चा हुई. इस समय तक चीन में कोरोना वायरस से मरने वालों का आंकड़ा तीन हजार को छूने वाला था.

इसलिए बहुत से लोग हैं जो मानते हैं कि भारत ने उस अवधि में कुछ खास नहीं किया जब उसके पास कोरोना वायरस रूपी इस आपदा पर जड़ में ही प्रहार करने का मौका था. यानी पूरी फरवरी लगभग बेपरवाही में निकल गई. कई इस बात के समर्थन में 24 फरवरी को अहमदाबाद के मोटेरा स्टेडियम में आयोजित नमस्ते ट्रंप नाम के कार्यक्रम का उदाहरण देते हैं जिसमें सोशल डिस्टेंसिंग को धता बताते हुए करीब एक लाख लोग जुटे थे.

इस तरह के आरोपों को इस खबर से भी बल मिलता है कि पूरी दुनिया में कोरोना वायरस से बचाव के लिए सुरक्षा उपकरणों (पीपीई) की किल्लत की जानकारी होने के बावजूद भारत से इनका निर्यात जारी रहा. असल में 27 फरवरी को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने आगाह कर दिया था कि दुनिया भर में पीपीई का भंडारण पर्याप्त नहीं है और जल्द ही इनकी किल्लत होने लगेगी. इसके बावजूद भारत ने पीपीई के निर्यात पर रोक लगाने में 19 मार्च तक का वक्त लगा दिया. इसका नतीजा डॉक्टरों और नर्सों को चुकाना पड़ा जो बार-बार सरकार से इनकी पर्याप्त आपूर्ति की गुहार लगाते रहे. कई डॉक्टरों ने अपने वीडियो भी बनाए और कहा कि जंग के मैदान में उन्हें पर्याप्त संसाधनों के बिना ही उतार दिया गया है.

बहरहाल, मार्च की शुरुआत हुई. अब तक फरवरी में केरल में दर्ज हुए तीन मामलों के अलावा भारत में कोरोना वायरस का कोई नया मामला सामने नहीं आया था. दो मार्च को इस वायरस ने देश में दूसरी बार दस्तक दी. इस बार यह पहले की तरह दरवाजे से वापस नहीं जाने वाला था.

दो मार्च को जो दो नए मामले दर्ज हुए उनमें एक राजधानी दिल्ली में था तो दूसरा तेलंगाना में. ये दोनों ही लोग विदेश यात्रा करके आए थे. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने दोनों मामलों की जानकारी देते हुए यह भी कहा कि लोगों को घबराने की जरूरत नहीं है. उनका कहना था कि अगर किसी को भी कोरोना वायरस के लक्षण नजर आ रहे हैं तो वह तुरंत सरकार की हेल्पलाइन के माध्यम से अधिकारियों से संपर्क करे. अगले ही दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी देशवासियों से न घबराने को कहा.

अब तक कोरोना वायरस ने इटली और ईरान में कहर बरपाना शुरू कर दिया था. पांच मार्च को भारत में भी इसके मामलों की संख्या तेजी से बढ़ते हुए 29 तक पहुंच गई. इसी दिन कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सरकार को एक बार फिर आगाह किया. एक ट्वीट में उनका कहना था, ‘’स्वास्थ्य मंत्री कह रहे हैं कि कोरोना वायरस संकट को लेकर हालात भारत सरकार के नियंत्रण में हैं. यह ऐसा ही है कि टाइटेनिक का कप्तान यात्रियों को बता रहा हो कि वे घबराएं नहीं क्योंकि यह जहाज डूब ही नहीं सकता. सरकार को इस संकट से निपटने के लिए एक कार्ययोजना सार्वजनिक करनी चाहिए जो ठोस संसाधनों पर आधारित हो.’

राहुल गांधी 28 फरवरी को ही दो हफ्ते का इटली दौरा करके लौटे थे. इससे पहले भी वे तीन मार्च को इशारों-इशारों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कोरोना वायरस और इसके चलते भारतीय अर्थव्यवस्था पर आने वाले संकट को लेकर चेतावनी दे चुके थे. उनका कहना था कि ऐसे वक्त में एक सच्चे राजनेता का ध्यान पूरी तरह से उस संकट को टालने पर होगा जो कोरोना वायरस की वजह से भारत और उसकी अर्थव्यवस्था पर आने वाला है.

हालांकि खबरों में इन सब बातों से ज्यादा चर्चा संसद में सरकार और विपक्ष के बीच दिल्ली की हिंसा को लेकर हो रहे टकराव की थी. इसके चलते कई दिन संसद की कार्रवाई ठप रही. इस तरह मार्च का पहला हफ्ता निकल गया. इस बीच छह मार्च को पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आगाह किया कि सामाजिक कड़वाहट, आर्थिक सुस्ती और कोरोना जैसी महामारी का मेल देश के लिए विकट हालात की आहट है. उनका यह भी कहना था कि ऐसे वक्त में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देश को आश्वस्त करना चाहिए. इसके एक दिन बाद अपने आलोचकों पर निशाना साधते हुए प्रधानमंत्री का बयान आया कि कि अलग-अलग कारणों से वैश्विक अर्थव्यवस्था एक मुश्किल दौर से गुजर रही है, लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियाद मजबूत है.

मार्च का दूसरा हफ्ता मध्य प्रदेश में तत्कालीन कमलनाथ सरकार पर आए संकट के साथ शुरू हुआ. इसकी परिणति ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके समर्थक विधायकों के भाजपा में जाने और नतीजतन कमलनाथ सरकार के गिरने के रूप में हुई. यानी जब आने वाली महामारी से निपटने के लिए राजनीतिक स्थिरता जरूरी थी उस वक्त मध्य प्रदेश में सियासी उथल-पुथल चल रही थी. करीब दो हफ्ते तक चले इस प्रकरण के दौरान सोशल डिस्टेसिंग को धता बताते हुए कांग्रेस और भाजपा के विधायकों के जमावड़े होते रहे. आखिरकार कमलनाथ ने इस्तीफा दे दिया और 23 मार्च को शिवराज सिंह चौहान ने चौथी बार मुख्यमंत्री की गद्दी संभाली.

जिस समय मध्य प्रदेश में इतनी उठापटक चल रही थी उस समय कोरोना का संकट कितना बड़ा हो चुका था इसका अंदाजा इस बात से लगाएं कि इसी दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनता कर्फ्यू का ऐलान किया और दिल्ली, राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे कई राज्यों में धारा 144 लगाई गई. 24 मार्च को मध्य प्रदेश की शिवराज सिंह सरकार ने विश्वासमत साबित कर लिया और उसी दिन शाम को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरे देश में 21 दिन के लॉकडाउन का ऐलान किया था. आज 1300 से ज्यादा मामलों के साथ मध्य प्रदेश कोरोना वायरस से सबसे ज्यादा प्रभावित राज्यों में शुमार है.