दुनिया भर में कोरोना वायरस से डेढ़ लाख से ज्यादा लोग अपनी जान गंवा चुके हैं. इस समय हर देश इस जुगत में लगा हुआ है कि किसी तरह इस वायरस से बचाव का तरीका और इससे होने वाली बीमारी - कोविड-19 - का इलाज ढूंढा जा सके. अपनी इन्हीं कोशिशों में सबसे आगे होने के चलते जर्मनी पिछले दिनों अंतर्राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में छाया रहा. चर्चा इस बात की भी रही कि जर्मनी की एक कंपनी ‘क्योरवैक’ कोविड-19 का टीका बनाने के इतना निकट है कि अमेरिका इस टीके को पाने के लिए उसे भारी प्रलोभन दे रहा है. क्योरवैक में जनवरी से इस टीके पर काम चल रहा है और अब ऐसा माना जा रहा है कि जून-जुलाई तक एक ऐसा प्रायोगिक टीका बन जायेगा, जिसका मनुष्यों पर परीक्षण किया जा सकेगा. ऐसे ही प्रयास कई दूसरे देशों में भी चल रहे हैं.

डब्ल्यूएचओ (विश्व स्वास्थ्य संगठन) भी इस समय कई तरह के परीक्षण कर रहा है जिनमें सार्स-सीओवी-2 (SARS-COV2 - सिवियर एक्यूट रेसपिरेटरी सिंड्रोम कोरोना वायरस-2) के इलाज के लिए कई पुरानी दवाइयों को परखा जा रहा है और नई दवाइयों की खोज करने का प्रयास हो रहा है. कोई टीका जहां बचाव का काम करता है वहीं ज्यादातर दवाइयां बीमारी होने पर उसके इलाज का काम करती हैं. कोरोना वायरस के मामले में ऐसी दवाओं खोजा जा रहा है जो या तो इसे कोशिकाओं से जुड़ने और प्रवेश करने से रोक सकें या फिर इसकी उस क्षमता को प्रभावित कर सकें जिसके चलते यह कोशिकाओं के अंदर अपने जैसे अनगिनत नये विषाणु बनवाता है.

इतनी तेजी से की जा रही कोशिशों के बावजूद कोविड-19 का इलाज खोज पाने में अभी महीनों का वक्त लगने वाला है. ऐसे में, जब इलाज अभी दूर की कौड़ी लग रही है तो लोग कई तरह की बातों के सहारे खुद को इस महामारी से बचने की उम्मीद देते नजर आ रहे हैं.

बीसीजी का टीका

ऐसा माना जा रहा है कि जिन्हें बचपन में बसिलस कालमेट ग्यूरेन यानी बीसीजी का टीका लगा है, उन्हे कोविड-19 होने का खतरा कम है. बीसीजी का टीका एक साल तक के बच्चों को लगाया जाता है जिससे ट्यूबरक्युलोसिस यानी टीबी से उनका बचाव हो सके. सौ साल पुरानी इस दवा को लेकर हाल ही में भारत सहित कई देशों में शोध शुरू हुए हैं. इन अध्ययनों में यह परखा जा रहा है कि क्या बीसीजी वैक्सीन कोरोना वायरस के इलाज या बचाव में काम आ सकता है. दरअसल यह टीका मनुष्य के रेस्पिरेटरी सिस्टम को मजबूत कर उन्हें टीबी से बचाता है. जरा विस्तार से समझें तो यह व्हाइट ब्लड सेल्स में एंटीबॉडीज पैदा कर शरीर के इम्यून रिस्पॉन्स को बढ़ाता है जिससे उसे एक खास तरह के वायरस का असर नहीं होता है. इसलिए इस बात की संभावना तलाशी जा रही है कि क्या बीसीजी इंसान में वह प्रतिरोधक क्षमता पैदा कर सकता है जो उसे कोविड-19 से बचा सके.

ये शोध अभी अपने शुरूआती दौर में ही हैं. पिछले दिनों डब्ल्यूएचओ ने भी एक बयान जारी कर यह साफ किया है कि इस बात के कोई सबूत नहीं हैं कि बीसीजी का टीका नये कोरोना वायरस से बचा सकता है. डब्ल्यूएचओ का यह भी कहना था कि इस पर दो क्लीनिकल ट्रायल चल रहे हैं लेकिन उनके नतीजे आने से पहले इस बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता है. लेकिन फिलहाल कोई और इलाज या बचाव न होने की वजह से कई लोग इसी में तिनके का सहारा ढूंढ़ रहे हैं.

हाइड्रॉक्सी-क्लोरोक्विन

मार्च के आखिरी हफ्ते में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बयान दिया था कि क्लोरोक्विन नाम की एक दवा कोविड-19 का इलाज है. इस बयान के चर्चा में आने के बाद से दुनिया भर में इसकी मांग अचानक बढ़ गई. दुनिया भर में जहां अस्पतालों ने इन्हें थोक में खरीदा वहीं, भारत में एक बड़ा तबका इसे प्रोफिलेक्टिक मेडिसिन यानी रोग से बचाने वाली दवा के तौर पर इस्तेमाल करता नजर आया. इसके कुछ ही दिनों बाद अमेरिका के स्वास्थ्य नियामक एफडीए और फिर भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने क्लोरोक्विन के कम साइट इफेक्ट्स वाले संस्करण हाइड्रॉक्सी-क्लोरोक्विन को कोरोना वायरस से होने वाली बीमारी कोविड-19 के इलाज के लिए मंजूरी भी दे दी.

कुछ मौकों पर हाइड्रॉक्सी-क्वोरोक्विन को प्रिवेंटिव मेडिसिन की तरह इस्तेमाल करने की बात भी कही गई है. लेकिन इसे लेकर आईसीएमआर के स्पष्ट निर्देश हैं कि यह दवा केवल कोरोना वायरस के संदिग्ध या पुष्ट मामलों को देख रहे स्वास्थ्यकर्मियों और पुष्ट मरीजों के संपर्क में आने वाले उन लोगों को ही दी जानी चाहिए जिनके संक्रमित होने का खतरा ज्यादा हो. स्वस्थ लोगों के लिए बगैर डॉक्टरी सलाह के इसका इस्तेमाल खतरनाक भी हो सकता है. लेकिन इसके बावजूद लोगों में यह भ्रम लगातार कायम है कि हफ्ते में एक बार हाइड्रॉक्सी-क्लोरोक्विन खाकर कोविड-19 से बचा जा सकता है. इसके उलट, डॉक्टर आज तक इस पर एकराय नहीं हो पाए हैं और उनके लिए हाइड्रॉक्सी-क्लोरोक्विन, कोरोना संक्रमण के लक्षणों का इलाज करने वाली कई दवाओं के कॉम्बिनेशन का एक हिस्सा भर है.

रोगप्रतिरोधक क्षमता

कोरोना संक्रमण के खतरों से जुड़ी एक थ्योरी यह भी है कि भारतीयों की रोक प्रतिरोधक क्षमता ज्यादा होती है. यहां के गली-कूचे पश्चिमी देशों जितने साफ-सुथरे नहीं होते और स्ट्रीट फूड का कल्चर भी हमारे यहां बहुत ज्यादा है. इसके चलते, लोगों का सामना हर समय रोगाणुओं से होता रहता है, इसलिए उनमें किसी भी तरह की बीमारी का सामना करने की अपेक्षाकृत ज्यादा क्षमता होती है. इसे हाइजीन हाइपोथिसिस कहा जाता है. लेकिन जानकारों के मुताबिक अगर यह सही होता तो भारतीय उपमहाद्वीप के लोग दुनिया में सबसे स्वस्थ होते. फिलहाल लाइफ एक्सपेक्टेंसी इंडेक्स में भारत 128वें नंबर पर आता है और मधुमेह के रोगियों का आंकड़ा देखें तो दुनिया में इसका स्थान दूसरा है. इसके साथ ही दुनिया के 10 सबसे प्रदूषित शहरों में से सात भारत के हैं. इन तथ्यों पर गौर करें तो भारतीयों को कोरोना वायरस संक्रमण का खतरा पश्चिमी देशों की तुलना में ज्यादा नहीं तो कम भी नहीं है.

आनुवांशिकता

पिछले दिनों इस बात की चर्चा भी रही कि भारतीयों के आनुवांशिक गुण उन्हें कोरोना वायरस से सुरक्षित बनाते हैं. कहा जा रहा था कि भारतीयों में दुनिया की किसी भी नस्ल के लोगों की तुलना में संक्रमणों को खत्म करने वाले नैचुरल किलर सेल्स ज्यादा होते हैं. इसमें सबसे पहले समझने वाली बात यह है कि साल 2008 में हुई जिस रिसर्च के आधार पर यह दावा किया जा रहा है, उसका संबंध कोरोना वायरस से जोड़ना ही ठीक नहीं है. यह एकदम नया वायरस है जिसके एंटीबॉडीज अब तक दुनिया की किसी भी नस्ल के लोगों में नहीं बन पाए हैं. इसके अलावा, यह अध्ययन बहुत छोटे सैंपल साइज का था और कृत्रिम वातावरण में किया गया था, इसलिए महामारी के मामले में तो दूर सामान्य परिस्थितियों में भी इस दावे को सही नहीं माना जा सकता था कि भारतीय जेनेटिक्स दुनिया में सबसे अच्छे हैं. फिर कोरोना वायरस से सुरक्षा का तो सवाल ही नहीं उठता है.

जलवायु

दुनिया भर में कोरोना वायरस के चलते हो रही मौतों का आंकड़ा कहीं पर भी एक जैसा नहीं हैं. इस बीमारी में मृत्यु दर 0.2 फीसदी से लेकर 15 फीसदी तक है. साथ ही इटली, अमेरिका जैसे देश जहां कोविड-19 से होने वाली मौतों की दर सबसे ज्यादा है. ये देश उत्तरी गोलार्ध में आने वाले ठंडे देश हैं. इसलिए कुछ लोग मानते हैं कि जो देश दक्षिणी गोलार्ध में आते हैं या जिनसे होकर कर्क रेखा गुजरती है, वहां संक्रमण फैलने का खतरा कम है. इसके पीछे दिए जाने वाले तर्कों में यह भी कहा जा रहा है कि इन देशों की जलवायु अपेक्षाकृत गर्म होती और ज्यादा तापमान होने से कोरोना वायरस जल्दी नष्ट हो जाता है. इसलिए गर्मी बढ़ने के साथ यहां पर संक्रमणों की संख्या कम होती जाएगी.

लेकिन वैज्ञानिक अभी तक यह पता नहीं लगा पाए हैं कि तापमान का नए कोरोना वायरस (सार्स-सीओवी-2) पर क्या असर होता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन की मानें तो कोरोना संक्रमण ठंडे और गर्म देशों में लगभग एक जैसी रफ्तार से ही फैला है. यहां ध्यान खींचने वाला एक तथ्य यह भी है कि साल 2003 में कोरोना परिवार के जिस सार्स (SARS) नाम के वायरस का प्रकोप हुआ था, वह गर्म और सूखी जगहों पर कहीं ज्यादा तेजी से फैल रहा था. इसके बावजूद, आम लोगों के साथ-साथ वैज्ञानिक तबका भी इस बात की उम्मीद जता रहा है कि तापमान बढ़ने के साथ-साथ स्थितियां कुछ बेहतर हो सकती हैं. लेकिन यह निश्चित रूप से और कितनी बेहतर होंगी, कह पाना फिलहाल संभव नहीं है.