चीज़ों से नज़दीकी

हम इन दिनों लोगों से दूर हो गये हैं. एक-दूसरे से फ़ासला रखना जीने के लिए ज़रूरी हो गया है. पहले आदर्श माना जाता था दूसरों से फ़ासले कम करना. अब ज़रूरी है दूसरों से फ़ासला बनाये रखना. पहले जीने के लिए मेल-जोल ज़रूरी था. अब जीने के लिए ज़रूरी है मेल-जोल से दूर रहना.

हर मध्यवर्गीय घर में चीज़ों का अंबार होता है - मराठी में जिसे अटाला कहते हैं. सो हमारे घर में भी है. पुस्तकें बहुत अधिक हैं. मैंने ही इतनी सारी लिख रखी हैं. फिर चित्र, स्मृतिचिह्न, फ़ोटोग्राफ, मूर्तियां और तरह-तरह की अन्य चीज़ें. उन्हें इतने ध्यान से देखने और हर दिन उनकी धूल पोंछने का काम पहले कभी इस क़दर नियमित किया नहीं. लेकिन शहर की सड़कें निर्ज़न होने से, यातायात बहुत कम हो जाने के कारण धूल इन दिनों शायद कम है. पहले की तरह हर दिन एक महीन सी परत अब नहीं जम रही है. हाउसिंग सोसायटी में सुबह-शाम थोड़ा घूम-फिर आने का अब नियमित अभ्यास हो गया है. पर बाहर से आकर घर में दाखि़ल होने पर ‘पगधूरि झारने’ की ख़ास ज़रूरत नहीं लगती.

हुआ कुछ यह है कि हम दूसरे लोगों से तो दूर हो गये हैं पर अपनी ही चीजों के नज़दीक आ गये हैं. भले लाचारी है, हम उन्हें अब अधिक ध्यान से देख रहे हैं और लगता है कि चीज़ें भी हमें अब अधिक ध्यान से देख रही हैं. जीवन में हम देखा-देखी से ही तो एक-दूसरे के नज़दीक आते या आने की इच्छा-लालसा पालते हैं.

मेरे पास लिखने के लिए एक मेज़ है पर उस पर धीरे-धीरे इतने कागज़ात इकट्ठा हो गये हैं कि टाइपराइटर भर के लिए जगह, किसी तरह, बची है और वह भी इस समय ख़राब हो जाने के कारण निरुपयोगी हो गया है. सो खाने की मेज़ पर बैठकर लिख रहा हूं. ठीक सामने रज़ा के दो चित्र लगे हैं, उन कई चित्रों में से दो जो उन्होंने अपने अंतिम चरण में, दिल्ली में रहते, बनाये और, अपनी सहज पर अदम्य मित्र-उदारता से, मुझे उपहार में दे दिये. उन्हें देखता हूं कि उनके पीछे कहीं रज़ा की आंखें हैं, जो इस कठिन समय मुझ बेचैन-बेराहत को दिलासा देती हुई, देख रही हैं. बगल में चम्मचें-करछुले-गिलास, अचार की बर्नियां, शहद की एक बोतल, बिस्कुटों का एक डिब्बा, हंसते बुद्ध की एक चीनी मूर्ति आदि रखे हैं. अब उपयोग में न आने वाले अवन पर मेज़ कैलेण्डर है जिसमें एमएस शुभलक्ष्मी का फ़ोटो इस महीने है.

जहां बैठा हूं उसके बग़ल में तीन अलमारियां, पुस्तकों-भरी, पर उन्हें बहू ने ऐसा ढांक दिया है कि उनके पल्लों पर अब उपहार में मिले हुसेन, कृष्ण खन्ना, रज़ा और हर्षवर्द्धन के रेखांकन प्रदर्शित हैं. वाईफ़ाइ का जो यन्त्र लगा है उस पर हरी रोशनियों की तीन समान्तर पट्टियां हैं जो, रात में नींद न आने के कारण, बैठकखाने में आने पर, मेज़-कुर्सियों से टकराने से रोकने में मदद करती हैं.

हस्बे-मामूल टेलीविजन, जो पिछले 6-7 सालों से बन्द और अनदेखा पड़ा है, अब भी वैसा ही है. अख़बार आते तो रोज़ हैं पर मेरा बेटा उन्हें एहतियातन, वायरस-मुक्त रखने के लिए, दो दिन देर से पढ़ने लाता है. सो एक पिछड़ा आदमी ख़बरों से लगातार और पिछड़ता रहता है. ख़बरें हमारे, इस कठिन समय में, इस क़दर, झूठ, पूर्वाग्रह-ग्रस्त, अप्रमाणिक और सनसनीख़ेज हो गयी हैं कि वे न ख़बरें हैं, न उनसे सचाई का कोई ठीक पता चलता है. उन्हें मिस नहीं करता. यह अबोध विश्वास है कि झूठ को मिस क्या करना, सच न मिस हो जाये यही जतन करना चाहिये!

चीज़ों का सच शायद कुछ-कुछ जानने का सुयोग हो रहा है. चीज़ें अपने आप में तो सच हैं ही, वे कुछ-न-कुछ सच हमें कभी-कभार बताती भी रहती हैं. शायद वे कोई विराट सच नहीं होते. चीज़ों का अपने नन्हेपन, अपनी विनयशीलता में, मनुष्य जैसे अहंकारी के सामने, ऐसा कोई दावा भी नहीं होता. उन्हें तो शायद इसकी ख़बर ही नहीं होगी कि अपनी अकिंचन-अलक्षित सचाई में वे हमारी सहज मानवीयता को उद्दीप्त, किसी हद तक, सत्यापित करती हैं.

कोरोना एकान्त में कविता पर

ऐसा समय, कुसमय या दुर्दिन, हो सकता है जब कविता किसी काम की न लगे: न उससे मन बहले, न सचाई का कोई अक़्स उभरे, न शब्दों का खेल हमें देर तक उलझा सके. हर समय कविता का समय नहीं होता, कविता हर समय के लिए नहीं हो पाती.

अकसर जब कविता ब्योरों में जाती है और वहां रसे-बसे जीवन को चरितार्थ करती है तब कुछ रसिकों को ऊब होती है. उन्हें संक्षेप चाहिये, उन्हें ब्योरों से सूक्ति ज़्यादातर चमकदार और स्मरणीय लगती है.

कविता को एकान्त चाहिये पर ऐसा नहीं कि उसमें दूसरे न हों, किसी भी ढंग से उनकी मौजूदगी का अहसास सक्रिय न हो. पर-स्पन्दित एकान्त ही कविता के लिए सर्जनात्मक एकान्त होता है.

क्या कविता के लिए कवि भी अन्ततः ‘दूसरा’ है? क्या कविता की असली आकांक्षा कवि का भी अतिक्रमण करने की होती है?

कविता भाषा में होकर भी उससे आगे, कई बार उसके पार जाती है. क्या अपने बेहद कल्पनाशील और साहिसक क्षणों में कविता भाषा का अतिक्रमण भी कर देती है.

कविता एक पताका है - होने की, अर्थ की खोज में कांपती हुई, स्थिति और नियति की पताका. उसके राज्यपताका बनते ही, चाहे सत्ता की या किसी वैचारिक प्रतिष्ठान की, वह शिखर पर नज़र तो आने लगती है पर अपनी सच्ची आभा खो बैठती है.

कविता राह नहीं दिखाती, न मार्गनिर्देश देती है. वह रसिक-पाठक को राह की खोज में शामिल होने का खुला न्योता ज़रूर देती-होती है.

कविता भाषा, समय, आत्म, समाज, सचाई से संघर्ष करती है. जिस-तिस मोर्चे पर वह हारती या पिछड़ती भी रहती है. विरले होते हैं ऐसे कवि जो इस पचकोनी संघर्ष में समान रूप से विजयी हों. बुनियादी बात है इन मोर्चों पर संघर्ष, हारना या जीतना नहीं.

बीसवीं शताब्दी में कविता की वीरगाथा उसके अथक और असमाप्त संघर्षों की कथा होगी, जय-पराजय की नहीं.

क्या पिछले कुछ दशकों से कविता के सार्थक होने पर इतना आग्रह किया गया है कि उसने सुन्दर होना छोड़ दिया? क्या कविता बिना सुन्दर हुए सार्थक हो सकती है? सुन्दरता और सार्थकता का जो आवयविक संबंध था वह भंग हो गया लगता है.

कविता किसी व्यापक लक्ष्य के प्रयत्न में सहचर हो इसमें कुछ भी अस्वाभाविक या आपत्तिजनक नहीं हो सकता. पर क्या कविता को परखने का एक ज़रूरी पैमाना अब यह हो गया है कि वह किस हद किसी व्यापक लक्ष्य के लिए किये जा रहे प्रयत्न में शामिल है? क्या कविता अपने आप में लक्ष्य नहीं है - सुन्दर, सार्थक, मानवीय!

गद्य कविता जैसा लगे तो उसे गुण माना जाता है - पर अगर कविता गद्य जैसी लगे तो इसे दुर्गुण क्यों माना जाये?

ऐसे कथाकार तो कई रहे हैं जैसे निर्मल वर्मा, कृष्णा सोबती, कृष्ण बलदेव वैद, ज्ञानरंजन जो कविता-प्रेमी रहे हैं. पर ऐसे कवि शायद कम हैं जो उतने ही कथा-प्रेमी हों. रघुवीर सहाय, श्रीकान्त वर्मा, कुंवरनारायण आदि इसलिए अपवाद माने जा सकते हैं कि इन सभी ने उल्लेखनीय कहानियां लिखी हैं. वे सिर्फ़ कवि नहीं बल्कि कवि-कथाकार रहे हैं.