इन दिनों कोरोना की तमाम त्रासदियों से जूझते हमारे शहरों के लोग सुबह-शाम की हवा में एक नयी ताजगी महसूस करने लगे हैं. देश के अनेक भागों में शहरों और कस्बों की सड़कों पर वन्य जीव-जंतु विचरण करते दिखाई देने लगे हैं. कुछ ऐसे अचम्भित भाव से कि जैसे यह जानने की कोशिश कर रहे हों कि अभी मध्य मार्च तक जो इंसानी कौम हमेशा की तरह हर ओर हाहाकार मचाती दिखाई दे रही थी वह अचानक इस तरह से भयभीत और बेजान सी क्यों हो गयी है. इंसानी दखल से बुरी तरह प्रताड़ित धरती के ये प्राकृतिक रहवासी शायद इंसान की इस अजब ख़ामोशी की टोह लेने के लिए ही हमारे इलाकों में इतने बेखौफ और सक्रिय दिख रहे हैं. कुछ ऐसा ही हाल हमारे इर्द-गिर्द रहने वाले परिंदों का भी है. जिन लोगों के घरों के आसपास कुछ हरियाली बची है वहां अब परिंदों का कलरव ज्यादा साफ़ सुना जा सकता है. इन दिनों आसमान का रंग भी हर जगह से लगभग एक जैसा बेदाग नीला दिख रहा है. आकाश में चांद-सितारे भी बेहद चमकीले और साफ़ नजर आने लगे हैं और उनकी पहचान कर पाना भी अधिक आसान हो गया है.

कुछ ऐसा ही हाल हिमालय का भी है जिसकी चोटियां अब बीसियों मील दूर के शहरों से भी आसानी से साफ़-साफ़ निहारी जा सकती हैं. नजदीक से देख पाने वालों को वे हिमशिखर अब अधिक दिव्य एवं अधिक श्वेताभ दिख रहें हैं. शहरों के इर्द-गिर्द बहने वाली नालियों जैसी बन गयीं नदियां आजकल अपने साफ़ पानी के कारण इतराने लगीं हैं और गंगा-यमुना जैसी महानदियां जो बीसियों साल और अरबों रूपये स्वाहा करने के बाद भी स्वच्छ नहीं हो पायी थीं, अचानक उनकी भी रंगत बदलने लगी है. समुद्रों की लहरों में ताजगी बढ़ गयी है और वहां का जीवन भी नयी सांसें लेने लगा है. देश के शहरों में गहराते वायु प्रदूषण की पहचान करने वाला एयर क्वालिटी इंडेक्स भी अविश्वसनीय रूप से दो अंकों तक सिमट चुका है. साथ ही दुनिया भर में ध्वनि प्रदूषण भी अभूतपूर्व ढंग से कम हो गया है.

इन्सानियत के लिए सामूहिक आतंक बन कर आये कोरोना काल का शायद एकमात्र सकारात्मक पहलू यही है कि इसने इंसान की गुस्ताखियों पर लॉकडाउन की लगाम लगाकर हमारी पृथ्वी की उम्र कुछ वर्ष और बढ़ा दी है. प्रकृति और पृथ्वी पर मानवीय लालसाओं के चलते प्रदूषण का जो काला आवरण चढ़ता जा रहा था, कोरोना काल उसे लगातार छोटा कर रहा है. दिल्ली का नीला आसमान हो या इटली में वेनिस की नहरों में इठलाती मछलियों का विचरण, यह हमारी पीढ़ी के लिए शायद अपने जीवन का पहला अनुभव है.

जॉन हॉपकिंस विश्वविद्यालय के एन्वायरमेंट हेल्थ इंजीनियरिंग विभाग के प्राध्यापक पीटर डिकारलो ने एक अध्ययन के बाद यह स्थापना दी है कि ‘उपग्रहों से प्राप्त जानकारियों के मुताबिक जिन इलाकों को कोविड-19 के कारण लॉकडाउन या क्वारंटीन किया गया है, उनके आसपास वायु प्रदूषण में जबरदस्त कमी आयी है. चीन और इटली के औद्योगिक क्षेत्रों में नाइट्रोजन डाईआक्सॉइड की मात्रा में भी बड़ी कमी मापी गयी है.’ आंकड़े बताते है कि चीन में पिछले वर्ष फरवरी-मार्च की इसी अवधि की तुलना में इस वर्ष नाइट्रोजन डाईआक्सॉइड की मात्रा में 35 फीसद की कमी आयी है और इटली में तो 2019 की इसी अवधि की तुलना में यह 50 से 60 फीसद तक कम हो गयी है. नाइट्रोजन डाईआक्सॉइड मुख्यत: वाहनों से या फॉसिल ऊर्जा (कोयला, डीजल, पेटोलियम आदि) से होने वाला प्रदूषण है जो लोगों के फेफडों और श्वसन तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है.

इसी तरह कार्बन उत्सर्जन (कार्बन डाईऑक्साइड औऱ मीथेन) की दर में भी भारी कमी आ गयी है. चीन में कार्बन उत्सर्जन में फरवरी में ही 25 फीसद की कमी आ गयी थी. यही स्थिति मार्च के अंत तक यूरोप तथा अमेरिका में भी देखी गयी है. कोरोना काल में ऐसे ओजोन डिप्लीटिंग सबस्टेंसेज यानी वायुमंडल में ओजोन को नष्ट करने वाले पदार्थों की कमी के कारण ओजोन के क्षरण की दर तेजी से गिरी है. वायुमंडल में करीब 15-35 किमी की ऊंचाई पर मौजूद ओजोन की परत सूरज से आने वाली यूवी किरणों को धरती पर आने से रोक लेती है. अगर यह परत न हो तो धरती पर जीवन का होना असंभव है.

ओजोन विशेषज्ञ वायु प्रदूषण की स्थिति में हुए इस बड़े गुणात्मक सुधार के लिए कोरोना महामारी को ही जिम्मेदार मानते हैं. इसके कारण पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव डालने वाली अनेक गतिविधियां एकदम बंद हो गयीं हैं. उदाहरण के तौर पर इस समय विश्व भर में सामान्य यात्री विमान सेवाएं बंद पड़ी हैं और प्रति मिनट आकाश में उड़ान भर रहे 20 हजार से अधिक विमानों के जमीन पर आ जाने से वायुमंडल को बड़ी राहत मिली है. अकेले भारत में लॉकडाउन के दौरान मार्च के महीने में 2019 की तुलना में एविऐशन फ्यूल की खपत में 32 फीसद की कमी आयी है. सेंटर फॉर एनर्जी एंड क्लीन एयर की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि इसी अवधि में हाई स्पीड डीजल की खपत में 24 फीसद और सुपीरियर कैरोसिन ऑइल की खपत में 48 फीसद की गिरावट आयी है. कोयले से बनने वाली बिजली की खपत में भी 26 फीसद की कमी हुई है. इसकी एक बड़ी वजह उद्योगों की रफ़्तार थम जाना भी है. कैलिफ़ोर्निया की स्टेनफर्ड यूनिवर्सिटी में ग्लोबल कार्बन प्रोजेक्ट के प्रोफ़ेसर रॉब जैक्सन के अनुसार ‘कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन में इस वर्ष वैश्विक स्तर पर पांच फीसदी से ज्यादा की कमी आने की उम्मीद है जो दूसरे विश्व युद्ध के बाद पिछले सत्तर सालों में पहली बार होगा.’

लॉकडाउन ने पाकिस्तान से लेकर तिब्बत तक के हिमालयी क्षेत्रों को भी सेहतमंद बनने का एक मौका दिया है. इन क्षेत्रों में पर्वतारोहण, ट्रेकिंग और पर्यटन की अन्य गतिविधियां कोरोना लॉकडाऊन की वजह से फिलहाल ठप पड़ी हैं. इससे इन इलाकों के अति संवेदनशील इकोसिस्टम को बर्फ पिघलने के बाद के इन दिनों में मानवीय गतिविधियों के हमले से बचकर स्वयं को पुनर्जीवित करने का एक अच्छा मौका मिल गया है.

इंग्लैण्ड के एक पर्यावरण समूह ने अपने ट्विटर एकाउंट पर कुछ समय पहले कुछ प्लैकर्ड्स पोस्ट किये थे. इनमें से एक में कहा गया था कि ‘कोरोना इस द क्योर, ह्यूमंस आर द डिजीज.’ इस ट्वीट में यह भी बताया गया है कि कोरोना वायरस के कारण इंसानों की गतिविधियों पर जो जबरिया अंकुश लगा है, उसने पृथ्वी को फिर से सेहतमंद बनने का एक अच्छा अवसर दिया है और हवा एवं पानी प्रदूषण मुक्त होने लगा है. ऐसे ही पर्यावरण संरक्षण के लिए काम कर रही एक बड़ी अव्यवसायिक अंतराष्ट्रीय संस्था के ट्वीट में कहा गया कि ‘वाह पृथ्वी पुनर्जीवित हो रही है. वायु प्रदूषण कम हो रहा है, जल प्रदूषण घट रहा है. प्राकृतिक वन्यजीवों की घर वापसी हो रही है. कोरोना वायरस पृथ्वी के लिए वैक्सीन साबित हुआ है.’ यह ट्वीट कई लाख लोगों ने पसंद किया है और एक लाख से अधिक लोगों ने इसे रीट्वीट भी किया है.

यानी इस कोरोना काल में इस तरह से सोचने वालों की संख्या लाखों में हो गयी है और तेजी से करोड़ों की ओर बढ़ रही है. राहत की बात यह भी है कि इस तरह की सोच अब आम आदमी के साथ उद्योग, व्यवसाय और राजनीति के संचालकों के अंदर भी विकसित होने लगी है जिसे पृथ्वी के भविष्य के लिए एक शुभ संकेत माना जा सकता है.

कोरोना के तांडव के बीच शुद्ध हवा में सांस लेने के फायदों ने कई देशों और तमाम लोगों को एकाएक जाग्रत कर दिया है. दुनिया के अनेक देशों की सरकारें अब ग्रीन इकोनॉमी पर गंभीरतापूर्वक विमर्श करने लगी हैं. फॉसिल फ्यूल के बजाय क्लीन पॉवर जैसे विकल्पों की चर्चाएं होने लगी हैं और अनेक संस्थाओं ने कार्बन कैप्चर टैक्नोलॉजी पर शोध एवं विकास का कार्य बहुत तेज कर दिया है. कोरोना काल में बड़े व्यावसायिक समूहों ने कारोबारी मीटिगों के विकल्प के रूप में जिस तरह वीडिओ मीटिंग्स को अपनाया है, उससे यह उम्मीद की जा रही है भविष्य में बिजनेस ट्रैवल में कुछ कमी आ सकती है. इसका सीधा असर पर्यावरण में सुधार के रूप में सामने आएगा. इसी तरह वर्क फ्रॉम होम और वर्चुअल ऑफिस जैसे नए तरीकों को कोरोना काल में मजबूरीवश अपनाने वाली कम्पनियां और संस्थान अब इन तरीकों को स्थाई विकल्प के तौर पर अपनाने के लिए तत्पर हो रहे हैं. उन्हें ऐसा लगने लगा है कि बहुत छोटे ऑफिस या फिर पूरी तरह से वर्चुअल दफ्तर चलाने से वे प्रदूषण के साथ-साथ अपने खर्चों में भी बड़ी कटौती भी कर सकेंगे. भारत जैसे विकासशील देशों में भी कार्यालय परिसरों के महंगे होते जा रहे किरायों और जगह की कमी, पार्किंग की समस्या आदि को देखते हुए इस विकल्प के बारे में गंभीरता से सोचा जाने लगा है. जाहिर है कि अगर ऐसा हुआ तो इससे ऊर्जा की खपत और प्रदूषण दोनों में कमी आएगी. कोरोना काल ने इस सोच को तेजी देने में भी कैटेलिस्ट का काम किया है.

हालांकि वैश्विक लॉकडाउन के कारण पर्यावरण में दिखाई दे रहे सकारात्मक प्रभाव स्थाई होंगे, इसमें कइयों को संदेह है. इस बात की पूरी आशंका है कि कोरोना मुक्त होते ही दुनिया फिर से उसी पुरानी भागमभाग में जुट जाएगी और इंसान फिर से पर्यावरण के शत्रु की भूमिका में दिखने लगेगा. यह भी आशंका है कि यह शत्रुता पहले से भी ज्यादा हो सकती है. दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में से एक ‘द इकॉनॉमिस्ट’ के मुताबिक कोरोना संकट की वजह से आया आर्थिक संकट आने वाले समय में पर्यावरण की हालत पहले से भी खराब कर सकता है. पत्रिका के मुताबिक 2008 के आर्थिक संकट के बाद कई क्षेत्रों को मिले प्रोत्साहन पैकेज और फॉसिल फ्यूल की कम कीमतों की वजह से आर्थिक गतिविधियां पहले से बढ़ गईं थीं और इसकी वजह से दुनिया भर में कार्बन उत्सर्जन की मात्रा पहले से और ज्यादा हो गई.

ऐसा सिर्फ 2008 के बाद ही नहीं हुआ बल्कि इससे पहले आईं आर्थिक आपदाओं के बाद भी यही चलन देखने को मिला था. इनमें 1973 और 1979 के तेल संकट, 1991 में यूएसएसआर का विघटन और 1997 का एशियाई आर्थिक संकट भी शामिल है. पत्रिका के मुताबिक कोरोना वायरस की वजह से पैदा हुईं आर्थिक समस्याओं से जल्द से जल्द पार पाने की कोशिश पर्यावरण की हालत फिर से पहले जैसी या उससे भी खराब कर सकती है.

हालांकि कोरोना संकट मनुष्यता के लिए जिस तरह की चुनौती बन रहा है उससे कई लोगों को यह उम्मीद भी बंधती है कि मानव जाति इससे कुछ तो सबक सीखेगी ही. सुधरने का जो अवसर कोरोना के बहाने पृथ्वी को मिला है, मानव जाति उसका लाभ अवश्य उठाएगी. आशा की जा सकती है कि कोरोना कहर के बाद मनुष्य की लालसाएं थोड़ी कम होंगी, उसका लालच कम होगा और शायद हमारी प्रकृति फिर से अपना स्वाभाविक स्वरूप वापस पा सकेगी. महात्मा गांधी कहते थे कि ‘यह पृथ्वी सारे इंसानों की जरूरतें पूरी करने में समर्थ है. लेकिन वह एक भी मनुष्य के लालच को पूरा नहीं कर सकती.’ शायद यह कोरोना काल हमें लालच और वास्तविक जरूरतों के बीच का अंतर समझा रहा है. कोरोना की तमाम त्रासदियों और संकटों के बीच यही एक बड़ी उम्मीद भी है.