केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्षवर्धन कहां हैं? पूरी दुनिया की तरह भारत भी बीते कई हफ़्तों से कोरोना महामारी से जूझ रहा है, लेकिन इस मुश्किल वक़्त में देश के स्वास्थ्य मंत्री नज़र नहीं आ रहे हैं. वे नदारद नहीं हुए हैं. लेकिन नज़र भी नहीं आ रहे हैं. उन्हें ढूंढना पड़ रहा है. गूगल पर. ट्विटर पर. वहां पता चलता है कि उन्होंने हाल ही में जी-20 देशों के स्वास्थ्य मंत्रियों के साथ वीडियो कॉन्फ़्रेंस की थी. भारत में भी वे स्वास्थ्य कर्मचारियों के संपर्क में बने हुए हैं. मंत्रालय में भी उन्होंने कुछ अहम बैठकें की हैं. रिपोर्ट लिखे जाते समय वे भारतीय जनता पार्टी के कुछ वरिष्ठ सदस्यों के साथ लाइव वीडियो कॉन्फ़्रेंस के ज़रिए संवाद कर रहे थे. इससे कुछ दिन पहले उन्होंने अपने संसदीय क्षेत्र चांदनी चौक के रेजिडेंट वेलफेयर असोसिएशन (आरडब्ल्यूए) के पदाधिकारियों, कुछ नागरिकों और पुलिस अधिकारियों के साथ भी वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए चर्चा की थी.

लेकिन क्या डॉ हर्षवर्धन सिर्फ़ भाजपा, चांदनी चौक या कुछ स्वास्थ्य कर्मचारियों के स्वास्थ्य मंत्री हैं या पूरे देश के? विश्लेषकों के अनुसार इस चुनौती भरे समय में एक विशेषज्ञ चिकित्सक (डॉ हर्षवर्धन ईएनटी सर्जन हैं) और परिपक्व नेता होने की वजह से उनका जनता के साथ संवाद एक सकारात्मक प्रभाव डाल सकता था. लेकिन अभी तक ऐसा नहीं हो पाया है. हालांकि डॉ हर्षवर्धन बीच-बीच में मीडिया से बात करते रहे हैं, किंतु उसकी अपनी सीमाएं रही हैं.

इन दिनों दुनिया भर की अधिकतर सरकारें कोरोना की वजह से अपने-अपने देशों में हुए नुकसान और उससे निपटने की तैयारियों से जुड़े ताजा ब्यौरे को हर रोज मीडिया के माध्यम से अपने देशवासियों के साथ साझा कर रही हैं. अमेरिका की बात करें तो वहां यह काम राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ख़ुद अपने कंधों पर ले रखा है. दूसरे कई देशों में भी यह जिम्मेदारी वहां के सबसे बड़े नेता ही निभा रहे हैं. लेकिन भारत में स्थिति थोड़ी अलग है. प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही नरेंद्र मोदी प्रेस कॉन्फ्रेंस न करने के लिए जाने जाते हैं. ऐसे में विश्लेषकों का मानना है कि प्रधानमंत्री ना सही लेकिन इस काम के लिए कम से कम स्वास्थ्य मंत्री को तो आगे किया ही जाना चाहिए था. किंतु इस दायित्व के लिए जिस तरह से स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल को चुना गया, उसने देश-विदेश के कई जानकारों का ध्यान अपनी तरफ़ खींचा है.

सवाल है कि स्वास्थ्य से जुड़ी इस गंभीर आपदा के समय देश के स्वास्थ्य मंत्री ही प्रत्यक्ष भूमिका में नज़र क्यों नहीं आ रहे हैं? इसके जवाब में विशेषज्ञ अलग-अलग मत रखते हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीति पर नजर रखने वाले कुछ लोग मानते हैं कि वे सरकार को ‘वन मैन शो’ की तरह चलाना चाहते हैं. इसलिए सामान्य तौर पर उन्हें अपनी जगह किसी और नेता का जनता से सीधा जुड़ाव पसंद नहीं. वहीं कुछ लोगों का यह मानना है कि डॉ हर्षवर्धन भारतीय जनता पार्टी के उन नेताओं में शामिल हैं जिन्हें भाजपा के शीर्ष नेतृत्व द्वारा उतना पसंद नहीं किया जाता है. ऐसे लोग अपनी बात के पक्ष में दिल्ली के विभिन्न चुनावों का उदाहरण देते हैं.

2019 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा ने किसी को भी अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया था और वह महज तीन सीटों पर सिमट गई. लेकिन डॉक्टर हर्षवर्धन के नेतृत्व में भाजपा 2013 के दिल्ली चुनाव में सबसे ज्यादा सीटें हासिल करने में सफल रही थी. वह भी आम आदमी पार्टी के जबर्दस्त उभार के बावजूद. भारतीय जनता पार्टी के एक वरिष्ठ नेता नाम ना छापने की शर्त पर इस बारे में कहते हैं, ‘नितिन गडकरी की ही तरह हर्षवर्धन भी थोड़े स्वतंत्र किस्म के नेता हैं. इसलिए एक सोची-समझी रणनीति के तहत इन दोनों को ही महाराष्ट्र और दिल्ली प्रदेश की राजनीति से दूर कर दिया गया और अब केंद्र में भी इन्हें जितना हो सके उतना हाशिए पर धकेलने की कोशिश की जाती रही है. चूंकि गडकरी मुखर हैं इसलिए अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराते रहते हैं. लेकिन शांत स्वभाव होने की वजह से हर्षवर्धन इस मामले में थोड़ा पीछे रह जाते हैं.’

लेकिन डॉ हर्षवर्धन मोदी सरकार के इकलौते मंत्री नहीं है जो अपनी सबसे ज्यादा ज़रूरत के वक़्त ही परिदृश्य में लगभग नज़र नहीं आ रहे हैं. बीते दिनों दिल्ली दंगों के दौरान गृहमंत्री अमित शाह को इसकी वजह से काफी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था. ये दंगे इसी साल फरवरी में तब भड़के थे जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत के दौरे पर थे. उस समय दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था के साथ सरकार के खुफिया विभाग का भी बेहद सक्रिय रहना अपेक्षित था. लेकिन राष्ट्रीय राजधानी में शुरु हुई मारकाट को अगले तीन दिन यानी 27 फरवरी तक काबू नहीं पाया जा सका था. इस हिंसा में पचास से ज्यादा लोग मारे गए थे.

इन दंगों को रोक पाने में बुरी तरह नाकाम होने की वजह से दिल्ली पुलिस की सबसे ज्यादा छीछालेदार हुई. चूंकि दिल्ली पुलिस केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन आती है इसलिए इस बदनामी की आंच देश के गृहमंत्री अमित शाह तक पहुंची और उनसे बड़े पैमाने पर इस्तीफ़े की मांग की गई. लेकिन यह पूरा मामला तब और ज्यादा चर्चाओं में आ गया जब दंगों को शांत कराने के लिए अमित शाह की बजाय राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल सामने आए.

कुछ जानकारों ने इस पूरे घटनाक्रम को भाजपा में गृहमंत्री अमित शाह के प्रभाव को कम करने की कोशिश और उनके प्रति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अविश्वास से जोड़कर देखा. दरअसल, अजीत डोभाल प्रधानमंत्री के बेहद विश्वस्त माने जाते हैं. यही कारण था कि डोभाल को जम्मू-कश्मीर में भी धारा 370 और 35ए के हटने के बाद हालात को सामान्य करने के लिए बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई थी. वहीं, दिल्ली में अजीत डोभाल ने जिस ढंग से मीडिया की मौजूदगी में दंगा पीड़ितों से मुलाकात कर उन्हें सांत्वना दी कि ‘अब तक जो हुआ सो हुआ, अब आगे ऐसा नहीं होगा’ वह भी खासी चर्चाओं में शामिल रहा. इसके बाद दिल्ली में हिंसा आश्चर्यजनक ढंग से थमती चली गई.

ये कुछ-कुछ वैसा ही था जैसे आजकल डॉ हर्षवर्धन की जगह लव अग्रवाल का हर रोज मीडिया से मुख़ातिब होना. हालांकि इसकी काट के तौर पर अमित शाह के समर्थक दलील देते हैं कि देश के इतिहास में उनसे पहले भी तो कोई गृहमंत्री दंगे शांत कराने के लिए सड़क पर नहीं उतरा था. फ़िर चाहे वो 1947-48 के दंगों के समय वल्लभ भाई पटेल हों या 1984 के दंगों के वक़्त के पीवी नरसिंहा राव. लेकिन ऐसा कहने वाले शायद भूल जाते हैं कि यदि ऐसे हाल में किसी गृहमंत्री के सड़क पर उतरने का इतिहास नहीं है तो आज तक किसी सुरक्षा सलाहकार ने भी ऐसा नहीं किया है. इसके प्रमुख उदाहरण के तौर पर ब्रजेश मिश्रा का नाम लिया जा सकता है जो 2002 के गुजरात के दंगों के समय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार थे.

बहरहाल, ऐसे संवेदनशील मौकों पर अजीत डोभाल या लव अग्रवाल जैसे अधिकारियों का लोकतांत्रिक तरीके से चुने हुए नेताओं के स्थान पर जनता से संवाद करने के लिए आगे आना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नौकरशाहों के प्रति खासे झुकाव की चर्चाओं को भी बल देता है. यह कोई दबी-छिपी बात नहीं है. नौकरशाहों को प्रधानमंत्री मोदी तब से ही तवज्जो देते आए हैं जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे.

प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने 2017 में जब तीसरी बार अपने मंत्रिमंडल में फ़ेरबदल किया था तो आरके सिंह, हरदीप सिंह पुरी, सत्यपाल सिंह और केजे अल्फ़ोंस जैसे पूर्व आईएएस, आईएफ़एस और आईपीएस अधिकारियों को मंत्री या राज्य मंत्री बनाया. इनमें से आरके सिंह और हरदीप पुरी दूसरी बार भी मोदी कैबिनेट में शामिल किए गए हैं. अपने इस कार्यकाल में प्रधानमंत्री मोदी ने नृपेंद्र मिश्रा, पीके मिश्रा और अजीत डोभाल को भी दोबारा अपना (क्रमशः) मुख्य सचिव, अतिरिक्त मुख्य सचिव और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) नियुक्त कर कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया. यही नहीं, इस बार प्रधानमंत्री मोदी ने पूर्व विदेश सचिव एस जयशंकर को विदेश मंत्री बनाकर किसी पूर्व नौकरशाह को सीधे कैबिनेट मंत्री बनाने की भी परंपरा शुरु कर दी है. यह भी कहा जाता है कि वर्तमान केंद्र सरकार में प्रधानमंत्री का दफ्तर यानी पीएमओ अब तक का सबसे मजबूत सत्ता केंद्र है.

प्रधानमंत्री मोदी के इस तरह नौकरशाहों को आगे बढ़ाने या दूसरे शब्दों में कहें तो उन पर आश्रित होने को लेकर भी जानकारों की अलग-अलग राय है. इनमें से एक प्रमुख वजह तो वही बताई जाती है जिसका ज़िक्र हमने ऊपर किया था - प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘वन मैन शो’ की तरह काम करना. इसके अलावा कई वरिष्ठ पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों का इस बारे में यह भी मानना है कि देश ही नहीं बल्कि दुनिया की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी कही जाने वाली भाजपा की सरकार में ऐसे नेताओं की काफी कमी है जो केंद्रीय मंत्रालयों के स्तर का कामकाज देखने की योग्यता रखते हों. इसकी कई वजहें हो सकती हैं. लेकिन इसका परिणाम यह हुआ है कि सरकार में मजबूरन नौकरशाहों को आगे किया जाता है ताकि वे स्थिति को कुछ बेहतर ढंग से संभाल सकें.

2015 में भाजपा के उपाध्यक्ष रहे विनय सहस्रबुद्धे ने भी रॉयटर्स से हुई बातचीत में माना था कि प्रतिद्वंदी दलों की तुलना में भाजपा के पास अनुभवी और प्रतिभाशाली लोग कम हैं. पार्टी सांसद सुब्रमण्यम स्वामी भी बार-बार कुछ ऐसी ही बात दोहराते रहे हैं. हालांकि उनका निशाना खास तौर पर भारतीय जनता पार्टी के अर्थशास्त्रियों की तरफ़ ज्यादा होता है. रॉयटर्स की ही रिपोर्ट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के किसी विश्वस्त सहयोगी के हवाले से कहा गया था कि मोदी सरकार के सामने तेज गति से सुधारों और नीतियों पर काम करने वाले लोगों को ढूंढ़ना एक चुनौती है.