प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 24 मार्च को देश में लॉकडाउन का ऐलान किया था. इसके लगभग एक सप्ताह बाद देश के सबसे बड़े चिकित्सा शोध संस्थान का कहना था कि कोविड-19 पर लॉकडाउन का असर एक हद तक और अस्थायी ही होगा. संस्थान का कहना था कि इससे महामारी की सबसे बुरी अवस्था के दौरान कोविड-19 के मामलों में लगभग 20-25 फीसदी की कमी तो आएगी लेकिन अगर सरकार ने इससे निपटने के लिए कुछ दूसरे जरूरी कदम नहीं उठाये तो यह कमी भी ‘अस्थायी’ ही होगी. यानी इससे देश भर में संक्रमित लोगों की कुल संख्या में कोई फर्क नहीं पड़ेगा, बस ऐसा थोड़े ज्यादा समय में होगा.

इस जानकारी को सार्वजनिक नहीं किया गया लेकिन यह मेडिकल रिसर्च के क्षेत्र में भारत सरकार की सबसे बड़ी संस्था इंडियन काउंसिल ऑफ मेडीकल रिसर्च (आईसीएमआर) द्वारा किये गये एक आंतरिक आकलन पर आधारित थी. इस वक्त देश में उस कोरोना वायरस से निपटने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी इसी संस्था के ऊपर है. कोरोना वायरस 22 अप्रैल 2020 तक भारत में 19818 लोगों को संक्रमित कर चुका है और 652 लोगों की जान ले चुका है.

महामारी के मामले में मोदी सरकार के सबसे प्रमुख सलाहकारों में से एक डॉक्टर विनोद के पॉल का अप्रैल के पहले सप्ताह में (पहले लॉकडाउन के बीच में) सरकार को दी गई एक प्रेजेंटेशन में कहना था कि ‘आने वाले दिनों में जनरलाइज्ड ट्रांसमिशन स्पष्ट तौर पर दिखने लगेगा.’ उनका यह प्रजेंटेशन आईसीएमआर के आकलन पर आधारित था.

विनोद के पॉल सरकारी थिंक टैंक नीति आयोग के सदस्य हैं और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में डॉक्टर भी रह चुके हैं. वे ‘कम्यूनिटी ट्रांसमिशन’ को ही ‘जनरलाइज्ड ट्रांसमिशन’ कह रहे थे. कम्यूनिटी ट्रांसमिशन का मतलब होता है वायरस का आम जनता में बेलगाम फैलना और यह पता नहीं लगा पाना कि यह किससे किसको हो रहा है. सरकार का मानना है कि भारत में ऐसा अभी नहीं हो रहा है हालांकि कई विशेषज्ञ उसकी इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मानना है कि लॉकडाउन की वजह से लोगों और खासकर गरीबों को काफी आर्थिक और दूसरी परेशानियों का सामना करना पड़ा है. जबकि विनोद पॉल की प्रेजेंटेशन के मुताबिक इसकी वजह से अपने चरम पर एक दिन में अधिकतम 40 फीसदी संक्रमण कम होगा और यह सरकार को उन कदमों की तैयारियां करने का मौका भर देगा जिनमें से कइयों को - जैसाकि कि इस श्रृंखला के दूसरे हिस्से में बताया गया है - शायद उसने अनदेखा कर दिया है.

इन कदमों में घर-घर जाकर स्क्रीनिंग करना और प्रभावित इलाकों में कोराना के लक्षणों वाले लोगों को क्वारंटीन करने के प्रयास और तेज करना शामिल है. नीचे दिये ग्राफ के हवाले से पॉल का यह भी कहना था कि इन कदमों से अपने चरम पर कोरोना वायरस के संक्रमण में काफी कमी आएगी.

अपनी प्रेजेंटेशन में पॉल का कहना था कि लॉकडाउन का सबसे अच्छा उपयोग इन कदमों की तैयारी करना है. उनका मानना था कि सरकार इस पर जब भी सहमति देती है उसके बाद (पहला) लॉकडाउन खत्म होने से पहले इसकी तैयारी करने में एक सप्ताह का वक्त लगेगा.

विनोद पॉल की प्रेजेंटेशन के मुताबिक देश भर में बुखार और खांसी के लक्षणों वाले लोगों की बड़ी संख्या में स्क्रीनिंग के लिए सरकार को नीचे लिखी बातों को सुनिश्चित करना होगा.

  • गरीब लोगों के घरों तक आवश्यक वस्तुएं पहुंचाना.
  • हर जिले में कोविड-19 के परीक्षण और निरीक्षण की व्यवस्था करना.
  • संक्रमित इलाकों की तेजी से पहचान और उन्हें क्वारंटीन करना
  • बहुत घने इलाकों - जैसे झुग्गी बस्ती आदि - में रह रहे लोगों को एक जगह पर और बाकी लोगों को उनके घरों में क्वारंटीन करना.
  • इंटेंसिव केयर यूनिट्स और हॉस्पिटल के बेड्स की संख्या में बहुत तेजी से बढ़ोत्तरी करना.

वेंटीलेटर्स और अस्पताल के बिस्तरों का पॉल का अनुमान बताता है कि अप्रैल की शुरुआत में भारत लॉकडाउन के बावजूद वैज्ञानिकों द्वारा बताये कोविड-19 के संभावित संक्रमणों का मुकाबला करने के लिए तैयार नहीं था. जबकि सरकार का दावा था था कि उसके द्वारा समय पर उठाये गये कदमों की वजह से भारत में स्थिति अब तक उतनी नहीं बिगड़ी है.

पॉल के द्वारा दिखाई गई एक गणना के मुताबिक ‘अगर किसी इलाके में संक्रमण की दर 500 प्रतिदिन है तो सरकार को वहां पर 150 वेंटीलेटर्स, 300 इंटेसिव केयर बेड्स और 1200-6000 बेड्स की जरूरत होगी.’

लेकिन विनोद के पॉल की प्रेजेंटेशन बड़ी तस्वीर का एक टुकड़ा ही थी. आईसीएमआर का शोध जिस पर यह आधारित थी वह इससे ज्यादा स्याह तस्वीर हमारे सामने रखता है. इससे यह सवाल भी उठता है कि क्या डॉक्टर विनोद के पॉल ने सरकार को पूरी सच्चाई नहीं बतायी थी और सरकार ने उस पर भी ठीक से अमल नहीं किया?

‘समय-समय और जगह-जगह पर भारी संख्या में भयावह परिणामों के साथ जनरलाइज्ड ट्रांसमिशन (कम्यूनिटी ट्रांसमिशन) होना तय है.’

आईसीएमआर ने यह भविष्यवाणी अपनी ड्राफ्ट प्रेजेंटेशन में की थी जिसे विनोद पॉल ने सरकार को सलाह देने के लिए इस्तेमाल किया था. आईसीएमआर की प्रेजेंटेशन पॉल को अप्रैल के पहले सप्ताह में ही भेजी गई थी. आईसीएमआर का अपनी प्रेजेंटेशन में कहना था कि कई चूकों के चलते लॉकडाउन की वजह से कोरोना वायरस के संक्रमण में सिर्फ 20-25 फीसदी की कमी ही देखने को मिल सकती है.

आईसीएमआर का यह आकलन केंद्र सरकार के उन बयानों से मेल नहीं खाता जो 21 दिनों के लॉकडाउन की सफलता के बारे में - जोकि अब तीन मई तक बढ़ा दिया गया है - उसने दिये हैं. 14 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ने कहा - ‘जब हमारे यहां केवल 550 मामले थे उसी समय भारत ने 21 दिनों के लॉकडाउन जैसा बड़ा कदम उठाया. भारत ने हालात बिगड़ने का इंतजार नहीं किया. इसके बजाय जैसे ही जरूरत पड़ी हमने तुरंत निर्णय लेकर समस्या को जड़ से उखाड़ने का प्रयास किया.

आर्टिकल-14 ने इस स्टोरी पर पॉल, स्वास्थ्य मंत्रालय और आईसीएमआर की प्रतिक्रिया के लिए इन सभी से संपर्क करने की कोशिश की है. अगर हमें इस पर उनका कोई जवाब मिलता है तो इस स्टोरी को अपडेट कर दिया जाएगा.

11 अप्रैल को स्वास्थ्य मंत्रालय ने मीडिया के लिए एक ग्राफ जारी किया और यह भी बता रहा था कि लॉकडाउन सफल रहा है. स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना था कि अगर लॉकडाउन न होता तो 10 अप्रैल को कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या साढ़े सात हजार (7447) के बजाय दो लाख से ज्यादा (208544) होती.

इस ग्राफ पर जो गणना थी वह जिस स्रोत से आई थी उसका उल्लेख नहीं था. जानकारों के मुताबिक इसमें इस बात का भी जिक्र नहीं था कि भारत टेस्टिंग के मामले में पूरी दुनिया में काफी पीछे है.

‘सरकार के आंकड़े विश्वास करने लायक नहीं हैं क्योंकि हमारी परीक्षण की दर बहुत कम है. अप्रैल के मध्य तक किसी कोरोना संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने की आशंका के बिना इसके लक्षण होने पर भी परीक्षण नहीं किया जा रहा था’, नेशनल हेल्थ सिस्टम्स रिसोर्स सेंटर के पूर्व निदेशक और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के पूर्व डीन टी सुंदरम कहते हैं.

देखा जाए तो जैसे-जैसे सरकार ने टेस्टिंग बढ़ाई दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में हॉटस्पॉट और सील होने वाले इलाकों का आंकड़ा बढ़ गया. ज्यादा टेस्टिंग होने की वजह से आज देश में कोविड-19 के कुल मामलों में से एक चौथाई इन्हीं दोनों शहरों से हैं.

लॉकडाउन शुरू होने के एक हफ्ते बाद तीन मार्च को सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यह दावा भी किया सोशल डिस्टेंसिंग को पूरी तरह से लागू करवाने और वायरस संक्रमण की चेन को तोड़ने के लिए देशव्यापी लॉकडाउन जरूरी थी. उसका कहना था, ‘यह फैसला विशेषज्ञों के साथ विस्तृत विचार-विमर्श के बाद सावधानीपूर्वक लिया गया और इससे पहले इसके सभी संभावित नतीजों और विकल्पों पर भली-भांति विचार कर लिया गया था.’

संदिग्ध संक्रमितों की सीमित जांच और संभावित हॉटस्पाॉट्स पर अपर्याप्त निगरानी के बावजूद सरकार लगातार दावा कर रही है कि अभी संक्रमण कम्यूनिटी स्टेज पर नहीं पहुंचा है. यानी उसके मुताबिक अभी यह लोकल स्टेज में ही है जहां संक्रमण फैलने की दर इतनी धीमी होती है कि सभी संक्रमितों और उनके संक्रमण के स्रोत को खोजा जा सकता है. इनमें ज्यादातर विदेश से आए लोग होते हैं.

आईसीएमआर ने क्या सुझाव दिए थे?

आईसीएमआर के आंतरिक आकलन में कहा गया था, ‘नियंत्रण के दूसरे उपायों के बगैर लॉकडाउन हटाने से संक्रमण के मामलों में बढ़ोतरी होगी.’ इन उपायों में पूरे देश से डेटा इकट्ठा करना, हफ्ते में दो बार घर-घर जाकर जानकारी जुटाना और ऐसे लोगों का बड़े पैमाने पर क्वारंटीन शामिल है जिनमें कोविड-19 के लक्षण दिख रहे हैं.

आईसीएमआर ने अपने आकलन में दिल्ली में संक्रमण से जुड़ी जानकारियों का हवाला देकर यह समझाया कि लॉकडाउन का देश भर में कोरोना वायरस के प्रसार पर क्या असर होगा. उसका कहना था कि 21 दिन के लॉकडाउन के बावजूद यहां करीब 13 लाख लोग संक्रमित हो सकते हैं.

अपने आंतरिक आकलन में आईसीएमआर का कहना था कि लॉकडाउन से यही होगा कि हम संक्रमण के चरम पर देर से पहुंचेंगे. उसके शब्दों में ‘लॉकडाउन नहीं हो तो संक्रमण को पहले मामले से चरम पर पहुंचने में 100-150 दिन का समय लगेगा. लॉकडाउन के साथ यह आंकड़ा 150-200 दिन का होगा.’ यानी देश भर में कुल मामलों की संख्या आखिर में उतनी होगी.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 14 अप्रैल को लॉकडाउन बढ़ाने का ऐलान किया था. उधर, आईसीएमआर का अपने आकलन में कहना था कि यह कवायद चुनौतीपूर्ण होगी. उसने कहा था, ‘अभी तक संक्रमण को रोकने का सिर्फ यही तरीका है कि जितनी जल्दी हो सके लोगों को क्वारंटीन किया जाए.’ उनका ही नहीं जिनमें कोविड-19 की पुष्टि हो चुकी है, बल्कि उनका भी जिनमें इस महामारी के लक्षण दिख रहे हैं, जो सरकार ने किया भी है.

आईसीएमआर के वैज्ञानिकों की राय थी कि रणनीति कम्यूनिटी बेस्ड टेस्ट और क्वारंटाइन की हो - यानी बड़े पैमाने पर लोगों की जांच की जाए और फिर उन्हें बाकियों से अलग किया जाए. उसका सुझाव था कि जिन लोगों में लक्षण दिख रहे हैं उनमें से हर दूसरे आदमी को 48 घंटे के भीतर क्वारंटाइन किया जाए और लक्षण दिखने के चार दिन के भीतर हर चार में से तीन लोगों के साथ ऐसा किया जाए.

लेकिन अभी तक सरकार सिर्फ उन लोगों को क्वारंटाइन करने की कोशिश कर रही है जो या तो जांच में पॉजिटिव आए हैं या फिर जो लक्षण दिखने पर खुद ही अस्पताल पहुंच रहे हैं. आईसीएमआर के वैज्ञानिकों का कहना था कि बड़े पैमाने पर निगरानी हो, टेस्टिंग की प्रक्रिया को बढ़ाने के लिए घर-घर जाकर सैंपल लिया जाए और जिनमें भी लक्षण मिलें उन्हें क्वारंटाइन किया जाए.

कुल मिलाकर कहें तो वैज्ञानिकों का निष्कर्ष यह था कि ‘चेन ब्रेक’ करने के लिए लॉकडाउन पर निर्भरता ठीक नहीं है जिसका सरकार ने 24 मार्च को दावा किया था.

आईसीएमआर के इस निष्कर्ष के आधार पर विनोद के पॉल की राय यह थी कि लॉकडाउन से सिर्फ यही हुआ है कि सरकार को वक्त मिल गया है और उसे इस मौके का इस्तेमाल टेस्टिंग के साथ-साथ मरीजों के इलाज की सुविधाएं बढ़ाने के लिए करना चाहिए. अपने प्रेजेंटेशन में उनका कहना था कि इस पूरी कवायद का मकसद कोविड-19 लक्षण मिलने के 48 घंटे के भीतर हर दूसरे शख्स का क्वारंटीन होना चाहिए.

अभी तक लॉकडाउन का पालन सख्ती से करवाया गया है जिसमें अक्सर पुलिस ने कड़ाई की है. सरकार की इसके लिए भी आलोचना हुई है कि उसने लॉकडाउन के लिए सिर्फ चार घंटे का नोटिस दिया और इसके चलते हजारों प्रवासियों को रोजगार और खाने-पीने के लाले पड़ गए हैं.

विनोद के पॉल की सलाह से संकेत साफ था कि लक्षण मिलने के 48 घंटे के भीतर हर दूसरे व्यक्ति के क्वारंटीन के लिए रणनीति बदलने की जरूरत होगी. स्क्रीनिंग से लेकर निगरानी, टेस्टिंग और लोगों को सबसे अलग रखे जाने की व्यवस्था में तेजी से और असाधारण पैमाने पर बढ़ोतरी करनी होगी.

सरकार और प्रधानमंत्री दावा कर रहे हैं कि उनकी तैयारी पूरी थी. 14 अप्रैल को लॉकडाउन तीन मई तक बढ़ाने का ऐलान करते हुए उनका कहना था, ‘यदि भारत ने समग्र दृष्टिकोण नहीं अपनाया होता, एकीकृत नजरिया नहीं अपनाया होता और समय पर त्‍वरित एवं निर्णायक फैसले न किए होते तो आज भारत में स्थिति बिल्‍कुल भिन्‍न होती.’ उनका आगे कहना था कि भारत को लॉकडाउन से काफी लाभ हुआ है. प्रधानमंत्री ने कहा, ‘आर्थिक संकटों का सामना करने के बावजूद यही स्पष्ट रूप से बिल्‍कुल सही मार्ग है क्योंकि इसने देश में अनगिनत लोगों की जान बचाई है.’ नरेंद्र मोदी का यह भी कहना था कि कोविड-19 से निपटने के लिए देश में एक लाख बेड और 600 अस्पताल तैयार हैं.

यह दो रिपोर्ट्स वाली श्रृंखला का पहला भाग है. इसका अंग्रेजी संस्करण आर्टिकल-14 पर प्रकाशित किया गया है. इसे आप नीचे दिए गए वीडियो पर भी देख सकते हैं.

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