जर्मनी यूरोपीय महाद्वीप की सबसे बड़ी और विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. विश्व में उससे पहले तीसरे स्थान पर जापान है और उसके बाद पांचवें स्थान पर भारत है. किंतु भारत और जर्मनी के बीच इस उल्लेखनीय निकटता और इस बात को यदि छोड़ दें कि दोनों देश संघात्मक लोकतांत्रिक गणराज्य हैं, तो दूरियां ही दूरियां हैं.

सबसे बड़ी दूरी तो यही है कि तमिलनाडु की जनसंख्या के बराबर वाले जर्मनी की अपेक्षा भारत में 16 गुना अधिक लोग रहते हैं. इस भारी अंतर के कारण जर्मनी में प्रतिव्यक्ति औसत वार्षिक आय (48 हज़ार डॉलर) भारत की अपेक्षा (2104 डॉलर) 24 गुना अधिक है. कहने की आवश्यकता नहीं कि जर्मनी में लोगों का जीवनस्तर भारत की अपेक्षा कहीं ऊंचा, आरामदेह और सदा सुरक्षित रहा है. किंतु जबसे जर्मनी भी कोरोना वायरस की चपेट में आया है, सारी सुख-सुविधाएं व सामाजिक सुरक्षाएं गंभीर चिंता का विषय बन गयी हैं.

जर्मनी में पहला मामला 28 जनवरी को दिखा

जर्मनी में कोरोना वायरस के संक्रमण के सबसे पहले मामले की पुष्टि 28 जनवरी को हुई थी. इससे कुछ ही दिन पहले फ्रांस में भी तीन मामलों की पुष्टि हो चुकी थी. इन दोनों देशों के प्रथम संक्रमित चीन से आये थे. भारत में इटली से आए ऐसे पहले मामले की पुष्टि 30 जनवरी को हुई थी. इस प्रकार भारत और जर्मनी में इस वायरस का प्रकोप लगभग एक ही समय शुरू हुआ था. लेकिन इस बीच जर्मनी में तो संक्रमितों की कुल संख्या क़रीब डेढ़ लाख और मृतकों की 5,200 से अधिक हो गयी, जबकि भारत में क्रमशः 20, 471और 652 ही थी (22 अप्रैल तक). मृत्यु दर दोनों देशों में लगभग तीन प्रतिशत, यानी एक जैसी होना, विकासशील भारत के पक्ष में जाता है.

जर्मनी की सरकार ने जब देखा कि कोरोना वायरस से होने वाली कोविड-19 नाम की बीमारी की रोकथाम के आरंभिक उपाय काम नहीं आ रहे हैं, तो 16 मार्च को उसने एक बड़ा क़दम उठाया. सरकार ने बैंकों, डाकघरों, सुपरबाज़ारों, डॉक्टरों के दवाख़ानों और दवा की दूकानों, पेट्रोल पंपों और दैनिक जीवन के लिए अनिवार्य दुकानों एवं सेवाओं को छोड़कर सब कुछ बंद करने का अदेश दिया. सारे स्कूल-कॉलेज, विश्वविद्यालय, संग्रहालय, सिनेमाघर, चिड़ियाघर इत्यादि बंद हो गये. सभी सभा-सम्मेलनों, मेलों-ठेलों, खेल-कूद के आयोजनों आदि पर रोक लगा दी गयी. पर रेल,बस और विमान जैसी सार्वजनिक परिवहन की सेवाएं चालू रखी गयीं. लोगों से कहा गया कि सार्वजनिक जगहों पर उन्हें दूसरों से कम से कम डेढ़ मीटर की दूरी रखनी होगी. सबको यथासंभव घर में ही रहना होगा.

पड़ोसी देशों के साथ की सीमाएं बंद

एक ही सप्ताह बाद, 22 मार्च को और अधिक कठोर नियम लागू किये गये. यूरोपीय संघ के सदस्य देशों के बीच की सीमाओं को सबके लिए सदा खुला रखने के शेंगन-समझौते को ताक पर रखते हुए जर्मनी ने सभी पड़ोसी देशों के साथ अपनी सीमाओं को बंद कर दिया गया. सभी विदेशियों के जर्मनी आने पर भी रोक लगा दी गयी. ट्रेनों और सार्वजनिक बस सेवाओं को 50 प्रतिशत घटा दिया गया. विमान सेवाएं भी लगभग पूरी तरह ठप हो गयीं. सड़कों पर, खुले स्थानों पर या पार्कों आदि में दो से अधिक लोगों के साथ-साथ पाबंदी लग गई. लेकिन इसके बावजूद जर्मनी में कोरोना वायरस का प्रसार, भारत की अपेक्षा, कहीं तेज़ गति से बढ़ने लगा.

भारत से भिन्न, जर्मनी के लोग अकेले, दुकेले या परिवार के साथ मौज-मस्ती-हवाख़ोरी के लिए घर से बाहर जा सकते थे. नौकरी-धंधे के लिए भी घर से निकल सकते थे. सभी सरकारी कार्यालय और मंत्रालय तथा आवश्यक सेवाओं के अतिरिक्त बहुत से उद्योग-धंधे और कल-कारख़ाने भी काम कर रहे थे, हालांकि सभी जगह कर्मचारियों की उपस्थिति काफ़ी घट गयी थी. दूसरी ओर, सांस्कृतिक गतिविधियों, होटलों, रेस्त्रां और पर्यटन उद्योग का दीवाला पिटना सुनिश्चित हो गया. निर्यात प्रधान जर्मनी को सबसे अधिक निर्यात-आय दिलाने वाले ऑटोमोबाइल, मशीन निर्माण और इलेक्ट्रॉनिक उद्योगों को भी भारी आंच पहुंचने लगी. उनका उत्पादनकार्य थम गया. अनुमान है कि कोरोना की मार से यहां 18 लाख लोग बेरोज़गार हो सकते है. 24 लाख (साढ़े पांच प्रतिशत) लोग पहले से ही बोरोज़गार हैं. यानी बेरोज़गारी दर एक ही झटके में क़रीब दोगुनी हो जाने की आशंका है.

ऑनलाइन विक्रताओं की बांछें खिल गयीं

अपूर्व राष्ट्रीय संकट की इस घड़ी में सुपरबाज़ारों तथा ऑनलाइन ऑर्डर की एमेज़न जैसी कंपनियों की बांछें खिल गयीं. उनकी बिक्री गगनचुंबी होने लगी. सड़कों पर के दुकानदार छाती पीटने लगे. लोग सुपर बाज़ारों पर टूट पड़े. टॉयलेट और टिश्यू पेपर, नूडल और डिब्बाबंद खाने इस तरह जमा करने लगे, मानो इन चीज़ों के फिर कभी दर्शन नहीं होंगे!

भारत की तरह ही जर्मनी की सरकार भी कह रही है कि निषेधों और प्रतिबंधों से प्रभावित हर छोटे-बड़े उद्योग और उद्यमी को, हर धंधे-व्यापारी को अग्रिम सहायता, अनुदान अथवा ब्याज-मुक्त ऋणदान की सरलीकृत प्रक्रिया के द्वारा त्वरित राहत पहुंचायी जायेगी. जर्मनी की संसद ने इस राहत-अभियान के लिए 156 अरब यूरो (1 यूरो=80 रूपये) के बराबर नये ऋण लेते हुए कुल 600 अरब यूरो (49.5 लाख करोड़ रुपये, भारत के 1.7 लाख करोड़ के मुकाबले करीब 29 गुना ज्यादा) का एक व्यापक सहायता पैकेट पारित किया है. अप्रैल आने के साथ लोगों के बैंक खातों में पैसा पहुंचने भी लगा, हालांकि कई हज़ार लोगों का पैसा कंप्यूटर- हैकरों और धोखाबाज़ों ने उड़ा भी लिया.

88 प्रतिशत लोग सरकार से सहमत

भारत से भिन्न जर्मनी में देशव्यापी एकसमान ‘लॉकडाउन’ (संपूर्णबंद) नहीं था और न इस समय है. सभी सरकारी मंत्रालय एवं कार्यालय बंद दरवाज़ों के पीछे काम करते रहे. लोग उनसे टेलीफ़ोन पर संपर्क कर सकते थे. ट्रेनें, ट्रामें, मेट्रो और बसें भी चल रही थीं, हालांकि सामान्य दिनों की अपेक्षा आधी ही. महामारी से बचने के आपातकालीन नियमों की अनदेखी करने वालों को भारी अर्थदंड और जेल तक की सज़ा मिलने की चेतावनी दी गयी थी. तब भी, 23 मार्च के एक जनमत सर्वेक्षण के अनुसार, दो-तिहाई जर्मन अपनी निजी स्वतंत्रताओं में और अधिक कटौती भी स्वीकार कर लेते. सरकार द्वारा उठाये गये क़दमों से 88 प्रतिशत लोग सहमत थे. 32 प्रतिशत तो और अधिक कठोर नियम चाहते थे. केवल आठ प्रतिशत जर्मन मानते थे कि सरकार ज़रूरत से ज़्यादा कठोरता दिखा रही है. भारत में सरकार के प्रति इतना बड़ा समर्थन सपना ही कहलायेगा.

22 मार्च को घोषित नियम 19 अप्रैल को जर्मनी में ईस्टर की स्कूली छुट्टियां समाप्त होने तक बने रहे. 20 अप्रैल से मनोरंजन और खेल के आयोजनों, रेस्त्रां और कैफ़े, सैलून और मालिश जैसी सेवाओं को छोड़ कर ऐसी बहुत-सी दुकानों आदि को खोलने की अनुमति दे दी गयी है, जिनका बिक्री-क्षेत्र 800 वर्गमीटर से अधिक नहीं है. शिक्षा संस्थान भी खुलने लगे हैं. शहरी सड़कों पर चहल-पहल बढ़ने लगी है. दुकानदार इससे खुश हैं, पर डॉक्टर नहीं. भारत में भी अब सरकार ने मॉल्स और ‘कंटेनमेंट जोन्स’ को छोड़कर दूसरे सभी इलाकों में सभी दुकानें खोलने की इजाजत दे दी है. लेकिन इन व्यापारिक प्रतिष्ठानों को सिर्फ 50 फीसदी कर्मचारियों के साथ ही काम करना होगा. साथ ही, उन्हें मास्क, दस्ताने और सोशल डिस्टेंसिंग जैसे निर्धारित मानकों का पालन भी करना होगा.

जर्मनी के अधिकतर राज्यों ने भी मुंह और नाक ढकने वाले मास्क लगाना अनिवार्य कर रखा है, पर कुछ राज्यों में ऐसा नहीं है. हालांकि यहां नये संक्रमणों में अभी कोई बड़ी कमी आती नहीं दिख रही है. इसी कारण जर्मनी की चांसलर अंगेला मेर्कल को कहना पड़ा कि लोग यह न समझें कि ‘’हम पहाड़ पार कर चुके हैं’’. बर्लिन के सबसे बड़े अस्पताल ‘शारिते’ के वायरसरोग विभाग-प्रमुख डॉ. क्रस्टियान द्रोस्टन ने भी 22 अप्रैल को कहा कि कुछ नियमों में ढील ज़रूर दी गयी है, पर “स्थिति अब भी बहुत गंभीर है. इस समय के सुहावने मौसम में लोग इसे भूल जाते हैं.’’ उन्होंने आशंका प्रकट की अब तक का किया-कराया बेकार सिद्ध हो सकता है.

दो साल का स्टॉक, दो सप्ताहों में ही ख़त्म

अस्पतालों में डॉक्टरों-नर्सों के लिए सुरक्षा-मास्क, एप्रन और ओवर-ऑल का, श्वसनयंत्रों (वेंटिलेटर) और कीटनाशकों का आरंभिक भारी अकाल इस बीच काफ़ी कम हुआ है, पूरी तरह अब भी दूर नहीं हुआ है. संक्रमण की रोकथाम के आरंभिक क़दम उठते ही जर्मनी के अस्पतालों के साथ-साथ दवा की दुकानों में भी सुरक्षा-मास्क के अतिरिक्त पैरासेटामोल या आइबूप्रोफ़ेन जैसी दवाइयों का दो साल का स्टॉक, दो सप्ताहों में ही, ख़त्म हो गया!

सरकार का कहना था कि ये चीज़ें भारत और चीन से मंगायी जाती थीं. स्वयं उन्हें ही अब इनकी इतनी अधिक ज़रूरत है कि वे आपूर्ति नहीं कर पा रहे हैं. सच्चाई यह है कि सुरक्षा-मास्क और एप्रन तथा जिन दवाओं की पेटेंट-अवधि बीत चुकी है, उन्हें स्वयं बनाने के बदले भारत या चीन से मंगाना पश्चिम के देशों के लिए बहुत सस्ता पड़ता है. पश्चिम में ऐसी चीज़ें अब नहीं बन रही थीं. कोरोना वायरस की मार ने वैश्वीकरण (ग्लोबलाइज़ेशन) विरोधी तर्कों को अब एक नयी धार दे दी है.

दवाओं का भी अकाल

भारत और चीन से आने वाली कई प्रकार की एन्टीबायॉटिक दवाओं का भी अस्पतालों में अकाल पड़ गया. इसका और रोगियों की संख्या तेज़ी से बढ़ने का एक परिणाम यह हो रहा था कि जर्मनी ही नहीं, यूरोप के इटली, फ्रांस, स्पेन और ब्रिटेन जैसे देशों में भी पीड़ितों का इलाज़ करने वाले डॉक्टर, और उनके सहायक भी, इस बीमारी के शिकार होने लगे. उनकी मृत्यु तक होने लगी. इटली में एक ही महीने के भीतर 80 से अधिक डॉक्टरों-नर्सों की मौतें हो चुकी थीं.

पीड़ितों की संख्या जिस तेज़ी से बढ़ रही थी, इलाज़ की सुविधाएं उसी तेज़ी से घटती जा रही थीं. जर्मनी सहित उसके कई पड़ोसी देशों ने भी सेना के अस्पतालों की सेवाएं लेना और अपने रिज़र्व सैनिकों को बुलाना शुरू कर दिया. इटली और स्पेन में शवों को दफ़नाने के बदले उन्हें परिजनों को दिये बिना ही जलाया जाने लगा. इन दोनों देशों में हर दिन इतने अधिक लोग मर रहे थे कि ईसाई देश होने के कारण दाहसंस्कार की प्रथा नहीं होने पर भी दाहक्रिया की जा रही थी. दाहघर इतने कम पड़ रहे थे, कि किसी शव की दाहक्रिया होने तक कई-कई दिन बीत जाते थे. घर वालों को बाद में कभी मृतक की राख का केवल डिब्बा थमा दिया जाता था. बहुत ही हृदयविदारक दृश्य हुआ करते थे.

तीन लाख जर्मन विदेशों में फंसे

जर्मनी को एक और बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा. पश्चिमी जगत में जर्मनी एक ऐसा देश है, जिसके निवासी सबसे अधिक संख्या में अन्य देशों में घूमने-फिरने जाते हैं. कोराना वायरस का कहर शुरू होने के समय तीन लाख से अधिक जर्मन दूसरे देशों में सैर-सपाटे कर रहे थे. वे विश्व के कोने-कोने में जिन देशों में फैले हुए थे, कोरोना वायरस वहां भी पहुंचने लगा था. जैसे ही विश्व के इन अन्य देशों ने वायरस से बचाव के लिए अपनी सीमाएं रूंधनी और विमान सेवाएं बंद करना शुरू करदीं, जर्मन पर्यटक वहीं फंस गये.

जर्मन विदेश मंत्रालय विदेशी सरकारों को मनाते और विभिन्न कंपनियों के विमान किराए पर लेते हुए, क़रीब ढाई लाख जर्मन पर्यटकों को वापस लाने में लगा रहा. पाकिस्तान जैसे कई देशों में अब भी कुछेक हज़ार जर्मन फंसे हुए हैं. एशिया-अफ्रीका के कई देशों में उन्हें कोरोना वायरस का वाहक मान कर उनके साथ अभद्र व्यवहार होने की घटनाएं भी हुई हैं. जर्मनी पहुंचने के बाद इन सब को भी –– कोई संक्रमण न होने पर भी–– अपने घरों में दो सप्ताहों तक सबसे अलग-थलग रहना पड़ता है.

बिस्तरों की कमी पड़ी

कारें बनाने वाली संसार की सबसे बड़ी कंपनी फ़ोल्कस्वागन के शहर वोल्फ्सबुर्ग के मुख्य अस्पताल में स्वयं उसके अपने इतने कर्मी संक्रमित हो गये कि उसे नये बीमारों की भर्ती बंद करनी पड़ी. यह स्थिति तब है, जब जर्मनी में अस्पतालों की, उनमें उपलब्ध सभी बिस्तरों की, गंभीर मामलों के लिए सघन देखभाल (इन्टेन्सिव केयर) सुविधा वाले विशेष बिस्तरों की तथा आधुनिक तकनीकी उकरणों की प्रति एक लाख जनसंख्या पर उपलब्धता का अनुपात यूरोप के अन्य देशों से कहीं बोहतर है. जर्मनी में प्रति एक लाख जनसंख्या पर 29 सघन देखभाल बिस्तर हैं. अमेरिका में 34, इटली में 12 और स्पेन में केवल 10. जर्मनी लंबे समय से न केवल एक खुशहाल विकसित औद्योगिक देश है, उसकी जनता भी भारत की अपेक्षा कहीं अधिक सुशिक्षित, अनुशासित और देश के प्रति समर्पित है. जर्मनी अपनी आर्थिक नीति को बड़े गर्व से समाजकल्याणकारी बाज़ारवादी अर्थव्यवस्था बताता है. किंतु जर्मनी में भी ग़रीबी और अमीरी के बीच की खाई लगातार चौड़ी ही होती गई है. साधनहीनों को हालांकि सामाजिक सुरक्षा के नाम पर जीवनयापन भत्ता मिलता है, तब भी ग़रीबी नापने के जर्मनी के अपने पैमाने के अनुसार, 15 प्रतिशत से अधिक लोग ग़रीबी रेखा से नीचे जी रहे हैं. सड़कों या रेलवे स्टेशनों पर सोने वाले बेघर या भीख मांगते लोग कई वर्षों से अब कोई अपवाद नहीं रहे. कोरोना की मार ऐसे लोगों पर सबसे अधिक पड़ रही है.

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की सबसे बड़ी चुनौती

स्वयं जर्मन भी इसे स्वीकार करते हैं कि कोविड-19 नाम की यह नयी महामारी अब तक के समाजकल्याणकारी ताने-बाने को झकझोर देने वाली, द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की सबसे बड़ी चुनौती है. इस ताने-बाने में सुधार के नाम पर पिछले दशकों में अस्पतालों इत्यादि की संख्या घटाने और उन्हें लाभकारी बनाने के लिए उनका जिस तरह निजीकरण किया गया, सरकारी के बदले निजी अस्पतालों को जिस तरह प्रोत्साहन दिया गया, वह वर्तमान संकट में एक नयी विपत्ति सिद्ध हो सकता था.

डर था कि लाभ के लोभी निजी अस्पताल किसी वैश्विक महामारी का भारी बोझ न तो संभालना चाहेंगे और न संभाल पायेंगे. वे वृद्ध जनों या पहले ही किसी बीमारी से पीड़ित दुर्बल स्वास्थ्य वालों के बदले कम आयु के रोगियों को वरीयता दे सकते हैं. बेघरों, बेरोज़गारों, वयोवृद्धों और गरीबों को वह उपचार शायद सुलभ नही हो पायेगा, जो उन्हें मिलना चाहिये. सौभाग्य से ऐसा नहीं हुआ. सरकार ने निजी अस्पतालों को आश्वासन दिया कि उनके ख़र्च की पूरी भरपाई की जायेगी.

जर्मनी एक धनी देश है. सभी लोगों को चाहे वे नौकरी-पेशे में हों, धंधे-व्यापारी हों या उद्यमी बीमारी की स्थिति के लिए स्वास्थ्य बीमा करवाना अनिवार्य है, डॉक्टरों के लिए भी. जो लोग वेतनभोगी हैं, उन्हें अपने मासिक वेतन का 14.6 प्रतिशत स्वास्थ्य बीमे के लिए देना पड़ता है. इतना ही पैसा उनका नियोक्ता भी देता है. जो लोग वेतनभोगी नहीं हैं, उन्हें सारा पैसा अकेले देना पड़ता है. जर्मनी में स्वास्थ्य ही नहीं, पेंशन, बेरोज़गारी के भत्ते, बुढ़ापे में देखभाल, घर के सामान इत्यादि बहुत सारी चीज़ों का बीमा कराना पड़ता है. सरकारी अस्पतालों में भी इलाज मुफ्त नहीं है, पॉलिसी की शर्तों के अनुसार बीमा कंपनी बिल चुकाती है.

कोरोना वायरस का कहर वास्तव में पश्चिमी जगत के साधनसंपन्न अमीर देशों के लिए भी एक ऐसी आकस्मिक अग्निपरीक्षा बन गया है, जिसकी उन्होंने कभी कल्पना तक नहीं की थी. इस अग्निपरीक्षा ने कम से कम दो ऐसे प्रश्न सबके सामने रख दिये हैं, जिनके उत्तर देर-सवेर (भारत सहित) सभी देशों को ढूंढने होंगे. पहला यह कि जनस्वास्थ्य के दायित्व को लाभकारी हाथों में देने वाला निजीकरण कहां तक उचित है? दूसरा यह कि वैश्वीकरण क्या परनिर्भरता का ही एक नया पर्यायवाची नहीं बनता जा रहा है? भारत के स्वदेशी विरोधियों को भी इस पर ध्यान देना चाहिये.

चीन से चले कोरोना वायरस ने पूरी तीव्रता के साथ दिखा दिया है कि सुरक्षा-मास्क और जेनेरिक एन्टीबायॉटिक दवाओं के कच्चे माल जैसी मामूली चीज़ों के लिये भी आज पूरी दुनिया चीन पर ही कितना अधिक निर्भर है! चीन यदि मनमानी करे, कोरोना वायरस यदि उसी की किसी जैविक अस्त्र प्रयोगशाला की ही देन हो, तब भी उसे भला कौन दंडित कर पायेगा! सभी अनेक प्रकार से उसी पर तो निर्भर हैं! एक सार्वभौम राष्ट्र होने के नाते उसे किसी भी अदालत के कठघरे में खड़ा नहीं किया जा सकता. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद भी उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकती. सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य होने के नाते वह अपने विटो अधिकार द्वारा अपने विरुद्ध कोई प्रस्ताव पारित होने ही नहीं देगा.