इन घर-घुसे दिनों में साहित्य क्या करे और लेखक क्या करें? ये दो अलग सवाल हैं. साहित्य तो विपुल पहले से ही इतना लिखा गया है कि अगर आपके पास पुस्तकें हैं तो वे आपको उस जीवन से जोड़ने का काम कर सकती हैं जिसके जीवित स्पन्दन से, इस समय, आप बहुत दूर फिंक गये हैं. वे आपका दिल बहला सकती हैं, जो समय, इस समय, बहुत भारी और धीरे गुज़रता है उसे सहने-बिताने का कुछ आधार बन सकती हैं.

ज़्यादा मुश्किल सवाल है कि लेखक क्या करें. ऐसे बहुत से होंगे जो चाहते होंगे कि, कम से कम इस समय, लेखक चुप ही रहें और अपनी अच्छी-बुरी रचनाओं का बोझ या ढेर बनाने-बढ़ाने से बाज़ आयें. ये लोग ऐसी अपेक्षा इसलिए कर सकते हैं क्योंकि इनकी अपेक्षाओं पर सही उतरने का लालच कुछ लेखक करते रहे हैं. बाक़ी तो इसलिए नहीं लिखते कि उसकी कोई मांग, प्रतीक्षा या उनसे कोई अपेक्षा है. वे लिखते हैं क्योंकि उन्हें ऐसा करना ज़रूरी लगता है. वे अपनी, अपने समय और समाज की तलाश, इस घरबन्द समय में, ज़ारी रखना चाहते हैं. उन्हें किसी सलाह की ज़रूरत नहीं होती. वे इस विश्वव्यापी और लम्बी चल रही महामारी की उपेक्षा नहीं कर सकते.

अब सवाल कुछ इस तरह की शक़्ल ले लेता है कि जिस घेराबन्दी में अन्य नागरिकों की तरह लेखक भी धंसे हैं उसका बखान, उस पर विचार, उसमें घुमड़ते अनुभवों और भावों की अभिव्यक्ति वे कैसे करें. क्या इसके लिए उनके पास भाषा-शैली-दृष्टि की पर्याप्त सम्पदा है? क्या उन्हें कुछ नया ईज़ाद करना होगा, नये ढंग से सोचना और भाषा को बरतना होगा?

जा़हिर है कि बेहद उलझे हुए सवाल के ख़ासे उलझे हुए और कई जवाब होंगे. यथार्थ कई तरह से अतियथार्थ हो चुका है. चूंकि गोदी इलेक्ट्रानिक मीडिया, लगातार अपने पालतूपन और स्वामिभक्ति में, सचाई के बहुत बड़े हिस्से को छिपा, बरका या हाशिये पर डाल रहा है, सचाई मात्र से सामान्य नागरिकों का संबंध बहुत विकृत, अप्रामाणिक और झूठ-भरा होता जा रहा है. कोरोना वायरस जितना फैल रहा है उससे कम तेज़ी से झूठ और घृणा, अफवाहें आदि नहीं फैल रहे हैं. इस परिस्थिति में लेखकों का सचाई और सच पर टिके रहना और उनसे किसी लालच या दबाव में न डिगना नागरिक अपेक्षा है और नैतिक ज़िम्मेदारी भी.

पर फिर यह सवाल भी उठता है कि लेखक का सच दूसरों से अधिक प्रामाणिक है यह कैसे तय होगा? अनेक सचों का जो ‘होता है शबोरोज़ तमाशा’ हमारे आगे, उसमें लेखक का सच अलग से कैसे पहचाना जायेगा? फ़िलवक्त सूझता है कि इस प्रामाणिकता के कुछ आधार सोचे जा सकते हैं: पहला तो यह कि अपने सच पर इसरार करते हुए भी लेखक उसे एकमात्र या पूरा या परम सच मानने-मनवाने का कोई हठ नहीं कर सकता. साहित्य का सच हमेशा आत्मसंशयग्रस्त होता है, अब भी होगा ही. दूसरा, कितनी ही विद्रूप सचाई लगे उसका बखान हमेशा मुक्तिदायी होगा. वह घृणा और भेदभाव, अलगाव-हिंसा का प्रतिरोध होगा. वह संसार से हमारे स्वाभाविक अनुराग को और गहरा करेगा.

तीसरा, लेखक उन सारी शक्तियों की शिनाख्त करते हुए, जो आज विभिन्न कारणों से मानव-विरोधी स्वतंत्रता-समता-न्याय-विरोधी हरकतें कर रही हैं, अपनी ज़िम्मेदारी भी स्वीकार करेगा. दुनिया को नरक बनाने के लिए दूसरों भर को ज़िम्मेदार-जवाबदेह ठहराने और अपने को पाक-साफ़ बख़्श देने वाला, व्यक्ति लेखक नहीं हो सकता: न कभी, न इन दुर्दिनों में भी. चौथा, ख़ासकर इसलिए कि अखबारी भाषा इन दिनों बेहद छिछली-सतही-अप्रामाणिक हो गयीं है, लेखक भाषा के अन्य संसाधनों का कल्पनाशील इस्तेमाल करेगा और निरी अभिधा का हर वक़्त सहारा नहीं लेगा. पांचवां, लेखक यह याद भी हमें दिलाता रहता है कि ऐसे कठिन समय में भी सहज जीवन्त गर्माहट भरे मानवीय संबंध और भावनाएं न तो निश्शेष हुए हैं, न ही अप्रासंगिक. साहित्य का काम आलोक देना न भी मानें पर भाषा की सर्जनात्मकता अपने आप में मानवीय आलोक है. अंधेरे का बखान करते हुए भी शब्द आलोक की वर्णमाला बन जाते हैं. जब तक यह आलोक है तब तक उम्मीद भी चुकती नहीं है. सच्चे लेखक के यहां भाषा उम्मीद बन जाती है.

कुछ प्रश्न

पहला तो यह कि क्या इस समय टेकनोलॉजिकल, विकसित, समुन्नत समाज एक ध्रुवांत पर पहुंच गये हैं? यह तथ्य अनदेखा नहीं जा सकता कि कोरोना महामारी का सबसे व्यापक और घातक प्रभाव बहुत ‘स्वच्छ’ समुन्नत विज्ञान-सम्पन्न देशों और समाजों पर है.

दूसरा, कम से कम मेरे ध्यान में नहीं आया है कि भारत के बड़े वैज्ञानिकों ने इस मामले में कोई सुचिन्तित दृष्टि का इज़हार किया हो: लेखक, कलाकार, पत्रकार, डाक्टर, बुद्धिजीवी आदि तो कुछ-न-कुछ कह रहे हैं पर वैज्ञानिक नहीं. उनकी चुप्पी का क्या यह आशय है कि भारत में विज्ञान अब निरी टेकनॉलजी बनकर रह गया है और सच्चे चिन्तक-वैज्ञानिक हमारे यहां अब नहीं हैं?

तीसरा, क्‍या इस पर गंभीरता से विचार करने की अब दरकार है कि विकास को एक अनिवार्य लक्ष्य मानकर, उसके लिए जिन असंख्य स्थानीयताओं को नष्ट किया गया है उसने हमारी प्रतिरोध की इच्छा और शक्ति को लगभग निश्शेष कर दिया है. हमारा नगर-प्रेम और प्रलोभन, बेतहाशा विकास तेज़ गति आदि पर क्या हम पुनर्विचार करने को तैयार या विवश होंगे?

चौथा, जो इलेक्ट्रोनिक मास मीडिया, ऐसे भयावह संकट के समय भी मानवीय दिलासा और हिम्मत, उम्मीद और धीरज देने के बजाय लगातार भेदभाव, भय, दूसरों से नफ़रत, झूठ, अफ़वाहें आदि फैला रहा है, उससे सामान्य नागरिकों को ऊब, चिढ़, नाराज़गी आदि होना कब शुरू होंगी? जो जोड़ सकता है वह तोड़ रहा है और हम उसे कब तक बरदाश्त करते रहेंगे?

पांचवां, क्या हमारे पास अब भी विकास का कोई अधिक मानवीय, अधिक समावेशी, अधिक समतामूलक, अधिक न्याय सम्मत विकल्प सोचने और टेकनॉलजी को आत्मघातक और मानवसंहारक होने से बचाने की कोशिश करने का समय और कौशल, कल्पना और संवेदन, पहल और साहस बचे हैं?

और छठवां, क्या यह वैकल्पिक सपना देखने वाले युवा हमारे बीच हैं जो नवाचार का जोखिम उठाने और दुनिया को न सही, भारत को बरबाद से बचाने का संकल्प कर सकते हैं?

प्रतिबंधित शब्द

हम पुर्तगाली कविता के बारे में बहुत कम जानते हैं. गोवा में, कोंकणी में शायद उससे अधिक परिचय होगा. पिछले वर्ष न्यू डायरेक्शन्स द्वारा प्रकाशित पुर्तगाली कवि यूजीनिओ द अन्द्रादे की कविताओं के अंग्रेज़ी अनुवाद की पुस्तक हाथ लगी: ‘फ़ॉरबिडन वर्ड्स’. इस कवि ने यह आकांक्षा व्यक्त की है कि ‘‘ऐसे चाहता हूं कविता का होना: रोशनी से कांपती हुई, खुरदरी धरती से/पानियों से बुदबुदाती हुई और हवा से.’’ उनकी दो कविताएं, हिन्दी अनुवाद में:

बारिश में घर

बारिश, एक बार फिर बारिश जैतून के पेड़ों पर

मुझे नहीं मालूम वह आज दोपहर कैसे गयी

क्योंकि मेरी मां तो चली गयी है

बालकनी में उसे गिरते देखने नहीं रही है

अपनी आंखें अपनी सिलाई से ऊपर नहीं उठा रही है

यह पूछनेतुम्हें वह सुनायी दे रही है

मैं उसे सुनता हूं, मां, फिर से बारिश

तुम्हारे चेहरे पर बारिश.

मकान का कायाकल्प

पत्थर-दर-बारीक़ पत्थर वह ऊंचा उठता है

वह मकान जो सिर्फ़ एक कविता में मेरा है.

वह सोता है, वह मकान सपना देखता है जब हवाएं बहती हैं

मस्तूल होने की अचानक खुशी है.

जब एक नाज़ुक शरीर सिहर रहा है

तो मकान भी, तो जहाज भी.

एक समुद्रपाखी उड़ता है और फिर दूसरा और फिर और

मकान रुक नहीं पाता: मंड़राने लगता है.

आह, एक दिन मकान जंगल में बदल जायेगा,

और उसकी छाया में मुझे मिलेगा एक झरना

जहां सिर्फ़ सन्नाटा आता है पानी के कल-कल स्वर से.