1-कोरोना वायरस के संकट से जूझती दुनिया में आपसी रिश्तों के नए आयाम खुल रहे हैं. बीते कुछ समय से भारत-मलेशिया की दोस्ती में पड़ी दरार भी संकट के इस दौर में सिमटती दिख रही है. क्या इन दोनों देशों की दोस्ती फिर परवान चढ़ेगी? डॉयचे वैले हिंदी पर राहुल मिश्रा की रिपोर्ट.

क्या कोरोना का संकट भारत मलेशिया के रिश्तों को सुधारेगा

2- 1933 में इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया के बीच हुई बॉडीलाइन सीरीज की बहुत चर्चा होती है. लेकिन 40 साल पहले हुए एक टेस्ट में मेजबान वेस्टइंडीज के तेज गेंदबाज़ों ने भी भारत के खिलाफ सारी सीमाएं पार कर दी थीं. इस टेस्ट में उन्होंने इतनी खतरनाक गेंदबाज़ी की कि भारत के छह खिलाड़ी जख्मी हो गए. उस मैच को याद करता बीबीसी पर रेहान फ़ज़ल का लेख.

जब वेस्ट इंडीज़ के गेंदबाज़ों ने पार की वहशीपन की इंतेहा

3-कोरोना वायरस संकट ने भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था की कमजोरियां उजागर की हैं. खासकर, सरकारी और निजी तंत्र के बीच के विरोधाभास की तो इसने अच्छे से कलई खोली है. पहले से स्वास्थ्य सेवाओं की भारी कमी का सामना कर रहे सरकारी तंत्र के सामने जैसे ही कोरोना संकट से लड़ने की चुनौती आई, वैसे ही निजी स्वास्थ्य सेवाओं की वकालत करने वाले मूकदर्शक बन गए या फिर एक बेलआउट पैकेज की मांग में जुट गए. डाउन टू अर्थ हिंदी पर कुंदन पांडेय की रिपोर्ट.

कोविड-19: कहां हैं प्राइवेट अस्पतालों की वकालत करने वाले लोग?

4- युद्ध, पराधीनता, अपहरण, असुरक्षा…इन शब्दों के अर्थ किसी के लिए भले नहीं रहे, लेकिन एक स्त्री के लिए इनकी भयावहता एक कदम आगे जाती है. असल में समाज में व्याप्त किसी भी बुराई की छाप औरत पर जरा ज्यादा पड़ती है. विश्वव्यापी लॉकडाउन के चलते घरेलू हिंसा की घटनाएं एक नए संकट का द्वार खोल चुकी हैं. न्यूजलॉन्ड्री हिंदी पर रीवा सिंह की टिप्पणी.

लॉकडाउन: औरतें इसकी एक अदृश्य कीमत चुका रही हैं

5-इंटरनेट पर ट्रोल्स की तादाद इतनी हो चुकी है कि लगता नहीं कि वे जल्दी यहां से जाने वाले हैं. लेकिन अगर उनकी चरित्रगत ग्रंथियां, उनके तरीके और तकनीकें समझ लें, तो अपनी मानसिक शांति और संतुलन खोए बिना उनके उत्पात और हमलों का सामना कर पाएंगे. द वायर हिंदी पर निर्मल चंद्र अस्थाना का लेख.

आख़िर कैसे काम करता है ट्रोल्स का दिमाग़