‘अप्रत्याशित चीजें हमें समझदार बनाती हैं, और ऐसा ही कुछ पिछले कुछ दिनों से हो रहा है. पता चला है कि मुझे न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर हुआ है. इसे अभी जज्ब करना थोड़ा मुश्किल है, लेकिन आसपास के लोगों के प्यार और ताकत से मुझमें उम्मीद जगी है. जिन्हें इस बारे में मुझसे सुनने का इंतजार था, मुझे उम्मीद है कि मैं उन्हें सुनाने के लिए और कहानियों के साथ वापस लौटूंगा.’

ये शब्द इरफान खान के उस संदेश के हैं जो उन्होंने ट्विटर पर अपने प्रशंसकों के नाम लिखा था. मार्च 2018 में यह संदेश लिखे जाने के कुछ ही दिन पहले पता चला था कि इरफान को न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर है.

बुधवार की सुबह इरफान कभी न लौटने के लिए चले गए. लेकिन इससे पहले प्रशंसकों से किए अपने वादे के मुताबिक लौटे और अंग्रेजी मीडियम जैसी फिल्म हमें दी. बीमारी के दौरान की गई उनकी फिल्मों का जिक्र करें तो इस बात को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता कि साल 2018 और उसके पहले का कुछ वक्त इरफान के लिए बहुत तकलीफदेह रहा होगा. मगर अचंभा इस बात पर होता है कि इस दौर में भी वे नई-नई कहानियों का हिस्सा बने और अपने कमाल अभिनय से बताते रहे कि वे अनोखी कहानियों के अभिनेता नहीं, देवता कहे जाएंगे. हीरोइज्म और सबसे लंबी भूमिकाओं के पीछे नहीं भागने वाला ऐसा स्थापित एक्टर, जिसमें अनकन्वेंशनल कहानियों में अपने अभिनय से प्राण और फिल्म के प्रति यकीन फूंक देने की ताकत थी.

अंग्रेजी मीडियम (2020)

होमी अदजानिया निर्देशित ‘अंग्रेजी मीडियम’ अब हमेशा इस बात के लिए याद की जाएगी कि यह इरफान खान की आखिरी फिल्म थी. इस फीलगुड फैमिली ड्रामा के फीलगुड बने रहने का सबसे ज्यादा क्रेडिट इरफान खान के निराले अभिनय को जाता है. राजस्थान से पर्सनल कनेक्शन रखने वाले इरफान इस फिल्म में उदयपुर के चंपक बंसल बनकर, वहां का लहज़ा पूरी तरलता (फ्लो) के साथ परदे पर लेकर आते हैं. फिल्म में बाप-बेटी के कई दृश्य हैं जिनमें वे कभी दीवारों तो कभी छत की तरफ देखकर बात करते दिखते हैं. इन दृश्यों में इरफान अपने अभिनय से भारतीय पिताओं की भावुक असहजता को पूरा विस्तार देते हैं.

सिनेमा की किताबें उठाकर देखिए, उनमें हर जगह मिलेगा कि थियेटर हो या फिल्म का सीन, दो लोग आपस में बात कर रहे हों तो सामने खड़े शख्स की आंखों में आंखें डालकर संवाद बोले जाने चाहिए. लेकिन इरफान खान उन अलहदा अभिनेताओं में से थे, जो सामने वाले की तरफ कम देखते थे और ज्यादातर वक्त किसी शून्य में टकटकी लगाकर संवाद बोला करते थे. फिर भी दर्शकों को खुशी अपरंपार मिलती. और इसी तरह के दुर्लभ अंदाजे-बयां इरफान खान को निराला फनकार बनाते हैं. उन्हें शायद सिनेमा की किताबों और पुराने तरीकों की जरूरत नहीं थी, क्योंकि वे खुद अभिनय की नयी परिभाषा गढ़ने वालों में से एक थे.

कारवां (2018)

‘कारवां’ में हमेशा की तरह अद्भुत इरफान खान को देखकर उन्हें बार-बार सलाम करने का मन होता है. उनकी वजह से अंदरुनी यात्रा पर निकली यह गंभीर रोड-मूवी हर वक्त मनोरंजक और फीलगुड बनी रहती है. यह देखना रोमांचक था कि जब फिल्म रिलीज हुई तो सारा थियेटर उनकी ही वजह से अंत तक हंस-हंसकर दोहरा होता रहा था. हंसाने वाली फिल्में हिट होती हैं, इस बात को तो ‘कारवां’ सच साबित नहीं कर पाई लेकिन इस वजह से इरफान से किसी को कोई शिकायत नहीं हुई. हालांकि फिल्म देखते हुए कभी-कभी ऐसा जरूर लगता है कि हास्य पैदा करने के लिए बेवजह ही इरफान को कई संवाद दिए गए, लेकिन उनकी अदायगी की वजह से ये शिकायतें भी फानी हो जाती हैं. अच्छे लिखे संवादों में इरफान हमेशा जान फूंकते रहे हैं और इस फिल्म में भी जोरदार संवादों के सहारे उन्होंने अपनी मौजूदगी का जादू फूंका था.

ब्लैकमेल (2018)

दर्शकों को कुछ खास पसंद ना आने वाली ‘ब्लैकमेल’ में भी इरफान सबको बहुत-बहुत पसंद आए थे. इसमें वे थोड़ा-थोड़ा खुद को अंडरप्ले करते हैं. इसके पहले की कुछ फिल्मों में उन्होंने अपना एक हीरोइक स्टाइल बार-बार दिखाया था - लाउड डायलॉग डिलीवरी व कई सारे हाव-भाव से भरे हुए रिएक्शन देने वाला. उससे इतर ‘ब्लैकमेल’ में अपना किरदार देव प्ले करते हुए वे बिलकुल सहज और मिनिमलिस्टिक एक्सप्रेशन देते हैं और क्या खूब देते हैं! रोचकता से भरे पड़े जिस किरदार में बहुत कुछ करने की गुंजाइश होती है, उसे प्ले करते वक्त जब कोई एक्टर बहुत कम करके सब कुछ कर जाता है, तब उसे भी अभिनय का शिखर छूना ही कहा जाना चाहिए. इरफान ने यह कारनामा कई बार किया था और ‘ब्लैकमेल’ में आखिरी बार.

करीब-करीब सिंगल (2017)

‘करीब-करीब सिंगल’ में खुद पर मोहित सच्चे दिल वाले शायर के किरदार में इरफान खान एक बार फिर एकदम लाजवाब दिखाई दिए थे. यह उनका ही हुनर था कि जो किरदार आसानी से फूहड़ और लफंगा हो सकता था, उसे उन्होंने प्यारा और हद दर्शनीय बना दिया. दूर से देखने पर योगी-वियोगी का यह किरदार ‘लाइफ इन अ मेट्रो’ और ‘हिंदी मीडियम’ के किरदारों के बेहद करीब का लगता है, लेकिन करीब जाकर देखो तो बतौर अभिनेता उनका हुनर आंखें चौंधिया देता है. चाहे रंग-बिरंगे कपड़े पहनने और छोटों को बेटा जी बोलने का अंदाज हो. सामने वाले के उन्हें नहीं समझने पर उदास आंखों और आधी मुस्कान से चेहरे को सजा लेना हो. या जब मन चाहा दर्शकों को चहका देना हो.

इसे देखकर लगा था कि इरफान खान के अभिनय में खोट निकालने का अब एक ही तरीका बचा है. एक राष्ट्रव्यापी प्रतियोगिता आयोजित कराई जाए और अभिनय में खोट खोज पाने वालों को तगड़ा इनाम देने की घोषणा की जाए. तब जाकर ही शायद एक-आध कमी दुनिया की नजर हो पाएगी!

लेकिन, शायद उनके अभिनय की सबसे बड़ी कमी अब यही होगी कि आगे वह कभी देखने को नहीं मिलेगा.