30 अप्रैल 2020 को हिंदुस्तान के एक बड़े हिस्से को बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता ऋषि कपूर के निधन की खबर अमिताभ बच्चन के एक ट्वीट के जरिए मिली. यहां तक कि न्यूज एजेंसी एएनआई और तमाम समाचार वेबसाइटों ने भी बिग-बी के ट्वीट का हवाला देते हुए ही यह खबर प्रकाशित की. लेकिन कुछ ही देर बाद अमिताभ बच्चन ने यह ट्वीट डिलीट कर दिया. ऋषि कपूर के जाने का अफसोस मना रहे उनके प्रशंसकों ने यह बात नोटिस कर ली. फिर सोशल मीडिया पर कयास लगाए जाने लगे कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? कई लोग यह कहते दिखाई दिये कि कुछ लोग किसी की मौत की खबर देने को अपशकुन मानते हैं और हो सकता है कि सीनियर बच्चन भी उनमें से एक हों. इन चर्चाओं ने जोर पकड़ा तो एक तबका इसे अमिताभ बच्चन का घोर अंधविश्वासी और रक्षात्मक रवैया बताते हुए इसकी आलोचना करता दिखाई दिया.

हालांकि यह कोई पहला मौका नहीं था जब अमिताभ बच्चन ऐसा करते और आलोचनाओं का शिकार होते दिखाई दिए. लेकिन ऋषि कपूर के देहांत के दिन आभासी संसार में हुई इस घटना ने एक विरोधाभासी बात सोचने पर मजबूर कर दिया. बॉलीवुड के एंग्री यंग-मैन कहे जाने वाले अमिताभ बच्चन हमेशा फूंक-फूंक कर कदम रखने के लिए जाने जाते हैं. लेकिन जिन ऋषि कपूर पर अपना ट्वीट डिलीट कर बच्चन आलोचनाओं के घेरे में आ गए, वे परदे पर तो रूमानी-चॉकलेटी नज़र आते थे लेकिन असल ज़िंदगी में अक्सर अपने एंग्री यंग-मैन वाले मिज़ाज के लिए सुर्खियों में रहा करते थे.

पहले ऋषि कपूर के चॉकलेटी और रूमानी पहलू की बात करें तो यह उनके फिल्मी सफर की सबसे बड़ी पहचान रहा है. उन्होंने तीन साल की उम्र में ‘श्री420’ और अठारह-उन्नीस की उम्र में ‘मेरा नाम जोकर’ से अपना करियर शुरू किया था. कहा जा सकता है कि बचपन, किशोरवय, जवानी और बुढ़ापा यानी उम्र के हर पड़ाव पर फिल्मों से उनका नाता बना रहा. अस्सी के दशक में जब वे हीरो की भूमिकाओं में आए तो बॉलीवुड में मल्टी-स्टारर एक्शन-थ्रिलर्स का दौर चल रहा था. लेकिन अमिताभ बच्चन नामक तूफान के उस दौर में जब हर कोई एक्शन फिल्म करना चाह रहा था, वे लगातार प्रेम कहानियों में नज़र आते रहे. लैला-मजनू, सरगम, प्रेमरोग, सागर जैसी फिल्मों में अपने सुंदर और मासूम चेहरे से उन्होंने एक ऐसे प्रेमी की आदर्श छवि बनाई जिसे जवान लड़कियां सपनों में देखा करती थीं. कहा जा सकता है कि अगर ऋषि कपूर न होते तो शायद एक पीढ़ी कभी न समझ पाती कि बैडमिंटन खेलना रूमानी हो सकता है और क्लब में पार्टियां करना या दोस्तों के बीच गिटार बजाना, कूल.

अक्सर खानदानी रईस या पॉपुलर शायर/गायक की भूमिकाएं करने वाले ऋषि कपूर ने एट्टीज के अर्बन युवा को एक नई छवि दी थी. उन्होंने जहां कुछ नए फैशन ट्रेंड्स शुरू किए तो कुछ ऐसे ट्रेंड्स में जान डाल दी जो पहले से मौजूद तो थे पर उतने लोकप्रिय नहीं थे. उदाहरण के लिए रंग-बिरंगे स्वेटर्स, पुलोवर्स और ऊनी-स्कार्व्स को बड़े परदे पर लाने का क्रेडिट उन्हें ही जाता है. कुछ साल पहले एक ट्वीट कर ऋषि कपूर ने कहा भी था कि उनके पास स्वेटर्स का एक बड़ा कलेक्शन है जिनमें से ज्यादातर को उन्होंने अपनी फिल्मों में पहना है. वे इस बात का जिक्र करना भी नहीं भूले कि उन्होंने कभी किसी स्वेटर को रिपीट नहीं किया. यहां पर रफूचक्कर, बॉबी, कर्ज़, चांदनी, हिना, दामिनी जैसी अलग-अलग समय की कई फिल्मों के नाम लिए जा सकते हैं जिनसे उनका यह पॉपुलर फैशन स्टेटमेंट एक अलग ऊंचाई पर पहुंचा था.

स्वेटर के अलावा, डफली और गिटार को भी यूथ-स्टाइल का हिस्सा बनाने का कारनामा ऋषि कपूर के नाम ही दर्ज है. सरगम के ‘डफली वाले डफली बजा’ और ‘रामजी की निकली सवारी’ जैसे गानों के जरिए उन्होंने डफली को कूल बनाया था. और कर्ज के ‘एक हसीना थी,’ ‘ओम शांति ओम,’ और ‘आशिक बनाया आपने’ सरीखे गानों के जरिए, उन्होंने पहले से ही रोमैंटिक हीरो का हथियार बने रहे गिटार को और भी जरूरी बना दिया. हालांकि इसके पहले भी वे ‘सागर जैसी आंखों वाली’ डिंपल कपाड़िया से उनका नाम पूछते हुए या ऐसे ही कई और मौकों पर गिटार बजाते हुए दिख चुके थे. लेकिन ‘कर्ज’ वह फिल्म थी जिसके बाद यह माना जाना लगा कि ‘स्वैग’ के लिए गिटार एक जरूरी चीज है. इन गानों की लोकप्रियता इस बात से भी समझी जा सकती है कि ऊपर जिन डफली वाले गानों का जिक्र किया गया है वे आज भी हर अंताक्षरी का हिस्सा बनते हैं. और कर्ज के तीनों गानों के टाइटल वाली फिल्में बॉलीवुड में बन चुकी हैं.

संगीत से जुड़ी एक और चीज जिसे चलन में लाने का श्रेय ऋषि कपूर को दिया जा सकता है, वह है कव्वाली. अमर अकबर एंथनी का ‘परदा है परदा…’ हो या फिर हम किसी से कम नहीं का टाइटल गीत, ये कव्वालियां ऋषि कपूर से इतनी जुड़ गईं कि आज भी फिल्मों में कव्वाल किरदार उन्हीं की तरह के चेहरे-मोहरे वाले लिए जाते हैं. फिल्मों के जानकार, मानते हैं कि ऋषि कपूर के चलते कव्वालियों को इतनी लोकप्रियता मिली कि बॉलीवुड ने इनके इस्तेमाल के नए रास्ते खोजने शुरू किए. इसका नतीजा यह हुआ कि कव्वालियां फिल्मों में रोमांस, एक्शन, टेंशन या सस्पेंस जैसी तमाम तरह की सिचुएशन्स दिखाने के लिए इस्तेमाल की जाने लगीं.

अब अगर बॉलीवुड में ऋषि कपूर की दूसरी पारी का जिक्र करें तो ‘अग्निपथ’ में जहां वे हिंसक रउफ लाला का डार्क किरदार निभाते दिखाई दिए, वहीं ‘102 नॉट आउट’ में उन्होंने एक अस्सी पार की उम्र वाले बेटे और बाप की परतदार भूमिका निभाई तो ‘मुल्क’ में वे एक ऐसे मुसलमान का चेहरा बने जो अपने ही देश में दोयम दर्जे का नागरिक समझा जाता है. स्टूडेंट ऑफ द ईयर, कपूर एंड संस, राजमा चावल जैसी फिल्मों के जरिए उन्होंने अपने अभिनय की वैरायटी में कोई कमी नहीं आने दी. यानी, अपनी उम्र और दौर के बाकी कलाकारों की तरह पिता-काका की अनगिनत भूमिकाएं निभाने के बाद भी वे टाइपकास्ट होने से खुद को बचाए रहे.

लेकिन ऋषि कपूर का सीनियर वर्जन सिर्फ उनकी फिल्मों से नहीं बल्कि असल जिंदगी के खट्टे-मीठे-बेबाक किस्सों से भी बनता है. उनका यह संस्करण ट्विटर पर अक्सर अपनी तीखी टिप्पणियों के जरिए कभी किसी बहस का हिस्सा बनता रहा तो कभी किसी बहस की वजह. महाराष्ट्र में गोमांस और गोहत्या पर लगी पाबंदी के बाद ऋषि कपूर ने सोशल मीडिया पर लिखा, ‘मैं गुस्से में हूं. आप खाने को धर्म के साथ क्यों जोड़ते हैं? मैं हिंदू हूं और बीफ़ खाता हूं, क्या ऐसा करने से मैं बीफ न खाने वाले से कम धार्मिक हो जाता हूं? सोचिए!’ एक दूसरे ट्वीट में इसी विषय पर उनका कहना था कि ‘आपको नहीं खाना बीफ/पोर्क मत खाओ.’ संकेत यह था कि देश में किसी के खाने-पीने पर पाबंदी नहीं होनी चाहिए.

उनके इन ट्वीटों के बाद विवाद छिड़ गया. उनसे कहा गया कि अगर वे बीफ खाते हैं तो अपने आप को हिंदू न कहें. यह भी कि ऋषि कपूर ज्यादातर वक्त तो पिए ही रहते हैं तो ढंग की बात कहां से करेंगे. लेकिन ऐसी बेलाग-लपेट बात कहने के लिए उनका समर्थन और प्रशंसा करने वाले भी कम नहीं थे. ऐसे ही उनके एक प्रशंसक का सोशल मीडिया पर कहना था, ‘मुझे आपकी यही बात पसंद है. सीधे दिल से और पेट से.’

मौका चाहे बीफ खाने जैसे संवेदनशील मुद्दे पर अपनी राय रखने का हो या फिर पर्सनल अटैक करने वालों को उनकी जगह दिखाने का, बाकी अभिनेताओं के उलट तीसरी पीढ़ी का यह कपूर कहीं भी झिझकता हुआ नज़र नहीं आया. अपनी मृत्यु से कुछ समय पहले ही उन्होंने एक ट्वीट में अपने चाहने वालों को निजी हमले करने के लिए यह कहकर धमकाया था कि अगर वे उनकी जीवन शैली पर कोई जोक या टिप्पणी भी करेंगे तो उन्हें ब्लॉक कर दिया जाएगा.

सिनेमा के जानकार कहते हैं कि ऋषि कपूर बाकी तमाम सितारों की तरह कभी पीआर (पब्लिक रिलेशन) एक्सरसाइज को गंभीरता से लेते नहीं दिखते थे. कभी उन्होंने कैमरे पर ही पेपराज़्जियों को झाड़कर वायरल कॉन्टेट दिया तो कभी अपने निजी जीवन या किसी मसले पर ऐसी टिप्पणी की कि लोगों की दिलचस्पी उनमें और बढ़ गई.

मार्च 2020 की ही बात करें तो लॉकडाउन के बाद डॉक्टरों और पुलिस वालों पर हुए हमले से वे इतने नाराज थे कि देश में इमरजेंसी लगाने तक की सलाह दे डाली. उनका कहना था कि ‘स्थिति को नियंत्रण में करने का कोई और उपाय नहीं है.’ इसके अलावा उन्होंने लॉकडाउन के दौरान दिन में कुछ देर के लिए शराब की दुकानें खोलने की सलाह भी सरकार को दी थी. उनका मानना था कि इस समय राज्य सरकारों को पैसे की जरूरत है और लोग भी कई तरह की मुसीबतों में घिरे हुए हैं. ऐसे में उन्हें अपनी हताशा और निराशा से निपटने के लिए एक सहारा चाहिए. और ‘ब्लैक में तो सेल हो ही रहा है.’

कुल मिलाकर, ऋषि कपूर नाम के तो ऋषि रहे लेकिन असल में किसी राजकुमार की तरह ही दिखे और जिए... पहले रूमानियत से भरे, फिर रौब और बेबाकी से लबरेज़.