इरफ़ान जब तुम अनंत यात्रा पर निकल चुके हो, लोगों से बार-बार कहने का जी करता है कि तुम राजस्थान के थे. यूं तो यह बहुत आम सी बात है. क्योंकि हर किसी को कहीं न कहीं का तो होना ही होता है. सो तुम भी थे. और यह बात सभी जानते भी हैं. लेकिन जो राजस्थान सदियों तक कला और साहित्य के क्षेत्र में सिरमौर रहा, वहां की यह पहचान, ढालों की टंकार और तलवारों की चमक से जुड़ी एक दूसरी पहचान के आगे कहीं कुंद सी होती चली गई. ये दोनों पहचानें साथ-साथ चल सकती थीं, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. पर तुम अपनी शक्ल में एक पूरी पीढ़ी को राजस्थान की उस पहचान से जोड़कर इस घाटे की जितनी हो सकती थी भरपाई करते रहे.

तुम्हारी यादें इस बात को हमेशा पुख़्ता करती रहेंगी कि इस शुष्क प्रदेश के लोग, जिनकी छवि या तो दूर रेगिस्तान में पानी का घड़ा भरकर लाने की है या इतिहास के भारी-भरकम बख़्तरबंद से दबे होने की, वे फ़न के भी सबसे बड़े माहिर हो सकते हैं. यह सही है कि तुम्हारी ही तरह अल्लाह जिलाई बाई, रेशमा, हसरत जयपुरी, खेमचंद प्रकाश - जिन्होंने किशोर दा और लता मंगेशकर को दुनिया से मिलवाया, पंडित जसराज, जगजीत सिंह, मेहंदी हसन, असरानी, ओम शिवपुरी, श्रेया घोषाल और सुनिधि चौहान जैसे न जाने कितने कलाकारों के अलावा कई बड़े संगीत और नृत्य घरानों का नाता भी इसी प्रदेश से है. लेकिन इसके बावजूद अपने समय में कला के कारोबार में तुम राजस्थान के सबसे बड़े झंडाबरदार दिखते थे.

नहीं तो आज इस प्रदेश का एक दागदार चेहरा वह भी है जब तुम्हारे अपने जयपुर में कथित आहत भावनाओं के संकीर्ण बोझ से दबे लोगों ने कलाकारों के साथ हाथापाई की थी. अफ़सोस कि ऐसी ही सेनाएं एक बार फ़िर तैयार हैं एक नई फ़िल्म का विरोध करने के लिए. और लोग फिर से राजस्थान को गलत समझेंगे. जबकि तुम्हारी इस धरती पर सिर्फ़ पृथ्वीराज चौहान ही नहीं हुए, पृथ्वीराज राठौड़ भी हुए थे. अकबर के दरबार में रहने वाले राठौड़ ने राजस्थान के गौरव राणा प्रताप को तब हौसला दिया था जब इसकी उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत थी. कहते हैं कि तब उन्होंने राणा के नाम ऐसे ओजस्वी सोरठे लिखकर भेजे कि उन्हें पढ़ने के बाद राणा कभी कमजोर नहीं हुए.

लेकिन इसे एक तरह की विडंबना ही तो कहेंगे कि लोगों ने राठौड़ को उतना याद नहीं रखा और प्रताप की भी पहचान को सिर्फ़ तीर और भालों तक समेट दिया. अब यह भी कौन बताए कि राणा ने अपने सबसे मुश्किल वक़्त में भी साहित्य के सृजन से कभी मुंह नहीं मोड़ा था. ठीक वैसे ही जैसे तुम भी अपने अंदर पल रहे दुश्मन से जूझते समय भी अभिनय की कई सौगातें हमें देते रहे. उस दौरान तुम्हारे दर्द की भला कोई थाह पा सकता है? लेकिन तुमने अपनी जिजीविषा और अपने अंदर के कलाकार को नहीं मरने दिया. क्या तुम किसी योद्धा से कम थे इरफ़ान? नहीं ना.

तुम्हारे अंदर एक मीरा भी तो थीं. वे नाचती, गातीं अपने इष्ट की साधना में मगन रहतीं. और तुम्हारे लिए तुम्हारा अभिनय ही इष्ट भी बना और साधना भी. बड़ी बेपरवाह होकर वे अपने ज़माने की परंपराओं को चुनौती दिया करती थीं और तुमने भी तो कुछ साल पहले ऐसा ही किया था. तब कई दीनी लोगों की नज़रों में तुम खटक गए थे. लेकिन तुमने फ़िक्र नहीं की. बस अपनी धुन में रमे रहे. तुम्हारी शख़्सियत राजस्थान की सदियों पुरानी प्रीत-प्रेम की उस तहज़ीब से बनी थी, जिसे बाबा रामदेव और ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती जैसे संत-फ़कीरों ने सींचा था. फ़िर, तुमने इस मरुधरा में परवान चढ़ने वाली मूमल-महेंद्र, ढोला-मारू और उजळी-जेठवे जैसी न जाने कितनी प्रेम गाथाओं को भी तो ताउम्र अपनी धड़कन की ही तरह संभाले रखा. सुतपा और तुम्हारे इश्क से बड़ा गवाह इस बात का और कौन होगा जिसने तुम्हें आख़िर तक लड़ने का जज्बा दिया था.

जो भी तुम्हें चाहते हैं जानते हैं कि तुम्हारी पहली झलक शरत चंद्र चटर्जी के उपन्यास पर आधारित नाटक ‘श्रीकांत’ में देखने को मिली थी. अब अगर तुम्हारे बहाने उन्हें बताया जाए कि जिस राजस्थान का तुम प्रतिनिधित्व करते थे उसी के अजमेर में भारत के सबसे प्राचीन नाटकों में से एक ‘हरिकेली’ (1153) को राजा विग्रहराज ने संस्कृत भाषा में रचा था, तो क्या यह जानना उन्हें दिलचस्प नहीं लगेगा?

इस मरूभूमि के गर्भ में अनगिनत कहानियां पलती-फलती रही हैं. इनमें से एक पृथ्वीराज राठौड़ के ही भतीजे कल्ला रायमलौत की भी है. किसी बात पर उनकी बादशाह अकबर से ऐसी तनातनी हुई कि जंग की स्थिति बन गई. कल्ला ने अपने काका से अपने मरसिए लिखने के लिए कह दिया. बड़ी असमंजस की स्थिति थी. ये मृत्युगीत तो किसी की वीरगति के बाद ही लिखे जाते थे. लेकिन कल्ला ने अपने काका को यक़ीन दिलाया कि ‘आप तो अपनी कल्पनाओं के दम पर मेरे लिए वो पराक्रम लिख डालो जो एक योद्धा के लिए आदर्श समझा जाता हो. मैं उसी शान से लड़ूंगा और उसी शान के साथ मरुंगा.’ कहते हैं कि युद्ध में उस रणबांकुरे ने अपने काका की क़लम और अपनी बात का पूरा मान रखा था.

इरफ़ान अगर तुम्हारा मरसिया तुम्हारे जाने के बाद भी लिखा जाए तो क्या कोई टोंक के एक छोटे से गांव से निकले उस ‘रणविजय’ के ‘हासिल’ को ठीक से हमारे सामने रख सकता है! श्रीकांत के बाद तुमने दसियों नाटक और किए. पचासों फ़िल्में और वेबसीरीज़ की. पचासों तरह के किरदार निभाए. इनमें से हर एक, दूसरे से अलग. इस बारे में कई लिख चुके हैं और अभी जितना लिखा जाए उतना कम है. अभिनय के लिए तुमने देश-दुनिया के तमाम पुरस्कार पाए. जयपुर के रवींद्र मंच के नाटकों से लेकर हॉलीवुड तक तुम हर जगह एक ही से ‘मक़बूल’ थे इरफ़ान.

अपनी फ़िल्मों में तुमने जो संवाद बोले वे भी तो कुछ ऐसे ही थे मानो किसी ने ये पहले ही तय कर दिया था कि तुम्हें वे बोलने ही थे! हैदर का कालजयी संवाद तुम्हारे सिवाय आज किस के लिए सोचा जा सकता है कि ‘मैं नहीं मरुंगा डॉक्टर साहब, आप जिस्म हो, मैं रूह हूं, आप फानी मैं लाफानी…’ तुम्हारे जाने के बाद उन लाखों आखों की नमी, जो तुम्हें हमेशा पर्दे पर देखते रहना चाहती थीं, ने साबित कर दिया है इरफ़ान कि तुम सच में लाफ़ानी (अमर) ही हो.

पानसिंह में तुमने कहा था, ‘बाबा रेस को एक नियम होतो है, एक बार रेस शुरु हो गई, फिर आप आगे हो कि पीछे हो, रेस को पूरो करनो पड़तो है.’ अफ़सोस कि तुमने अपनी रेस कुछ जल्द ही ख़त्म कर ली. लाइफ़ ऑफ पाई में तुम कहते हो, ‘मुझे लगता है कि ज़िंदगी का मतलब ही जाने देना है. लेकिन सबसे ज़्यादा दर्द तब होता है जब यह अलविदा कहने तक का समय नहीं देती.’ सो तुमने भी तो अलविदा कहने का मौका नहीं दिया.

यह यूं ही तो नहीं हो सकता कि ‘अंग्रेजी मीडियम’ की शक्ल में अपने अभिनय की जो आख़िरी याद तुम जाते-जाते छोड़कर गए, उसमें तुमने एक आम राजस्थानी के ही किरदार को पर्दे पर जिया. क्या तुम्हारे अभिनय का सफ़र अपने घर आकर ही मुकम्मल नहीं होना था!

इरफ़ान यूं तो तुम पूरे हिंदुस्तान के हो, बल्कि अब तो दोनों जहान के, लेकिन राजस्थान के लिए यह बात हमेशा मायने रखेगी कि तुम उसके थे.

अलविदा!