इस समय पूरी दुनिया कोरोना वायरस की मार झेल रही है. अमेरिका से लेकर यूरोप और रूस से लेकर मध्यपूर्व तक सभी देशों की सरकारें इस महामारी से पार पाने की कोशिश में लगी हुई हैं. दुनिया के सबसे विकसित देश अमेरिका में कोविड-19 के 14 लाख से ज्यादा मामले सामने आ चुके हैं और 82 हजार से ज्यादा लोग इसके चलते अपनी जान गंवा चुके हैं. फ्रांस और ब्रिटेन जैसे अन्य संपन्न देश भी ऐसी ही मार झेल रहे हैं. लेकिन, कुछ देश ऐसे भी हैं, जिन्होंने अपनी बेहतर रणनीति के चलते इस महामारी को काबू में करने में कामयाबी पायी है. यहां हम ऐसे दो देशों की बात करने जा रहे हैं जिनमें से एक ने महामारी की आहट सुनकर तुरंत प्रतिक्रिया दी और खुद को बड़े संकट से बचा लिया. जबकि दूसरे ने देर से ही सही, लेकिन दुरुस्त प्रतिक्रिया देकर बड़ी तबाही को आने से रोक लिया. इन दोनों देशों में एक समानता यह है कि इन्होंने अपने यहां बिना पूर्ण लॉकडाउन के ही यह कामयाबी हासिल की है. और दूसरी यह कि इन दोनों ही देशों की प्रमुख महिलाएं हैं.

ताइवान

इस समय कोरोना वायरस पर लगाम कसने को लेकर सबसे ज्यादा सराहना एशियाई देश ताइवान की हो रही है. अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और कई यूरोपीय देश कोविड-19 से निपटने के लिए उससे सलाह ले रहे हैं. ताइवान की तारीफ की एक बड़ी वजह यह भी है कि उसके आगे अन्य देशों से अलग चुनौती थी. चीन जहां से कोरोना वायरस की शुरुआत हुई, वह ताइबान से महज 81 मील की दूरी पर है. हर रोज लाखों लोग चीन से ताइवान आते-जाते हैं. ऐसे में इस महामारी को लेकर उसके आगे अन्य देशों से कहीं बड़ी समस्या थी.

लेकिन, ताइवान की पहली महिला राष्ट्रपति साई इंग-वेन द्वारा जल्द लिए गए फैसलों के चलते वह एक बड़े संकट से बच गया. वेन ने सबसे पहले समझदारी दिखाते हुए देश के उपराष्ट्रपति और जाने-माने महामारीविद चेन चिएन-जेन के हाथ में बड़ी जिम्मेदारियां सौंपी. बीते दिसंबर के मध्य में जब चीन के वुहान से उड़ते-उड़ते केवल यह खबरें ही आयी थीं कि एक नए तरह के बुखार ने शहर के कुछ लोगों को अपनी चपेट में लिया है, तभी से ताइवान के स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने इस पर बैठकें शुरू कर दी थीं. इसके बाद 31 दिसंबर को जब चीन के वुहान से 27 लोगों को एक नए तरह का न्यूमोनिया होने की खबर दुनिया भर के अख़बारों में छपी तो इसके कुछ घंटे बाद ही ताइवान ने वुहान से अपने यहां आने वाले लोगों की स्वास्थ्य जांच शुरू कर दी. पांच जनवरी को ऐसे सभी लोगों के लिए फुल बॉडी चेकअप अनिवार्य कर दिया गया, जो बीते 15 दिनों के दौरान वुहान से आये थे. इन लोगों को कुछ दिनों के लिए निगरानी में भी रखा गया.

इसके बाद जनवरी के आखिरी सप्ताह में जब चीन में हालात बदतर हुए तो ताइवान की सरकार ने 26 जनवरी से चीन, मकाउ और हांगकांग से आने वाली उड़ानों पर पूरी तरह से रोक लगा दी. सभी शहरों की सड़कों, सार्वजनिक स्थलों और जिन कंपनियों में अधिकांश कर्मचारी चीन के थे, उनके कार्यालयों को सेनिटाइज किया जाने लगा. ऐसी कंपनियों में युद्धस्तर पर कर्मचारियों के कोरोना टेस्ट किये गए. करीब ढ़ाई करोड़ की आबादी वाले इस देश में हर किसी को मास्क मिल सकें, इसके लिए प्रति दिन एक करोड़ मास्क तक बनाये हैं. अफवाहों को रोकने के लिए कानून भी सख्त किए गए. फेक न्यूज पर 76 लाख रुपये का जुर्माना, मुनाफाखोरी के लिए सात साल तक की जेल या एक करोड़ रुपए तक का जुर्माना लगाने की घोषणा की गई.

ताइवान के ऐसे प्रयासों का ही नतीजा है कि 14 मई तक वहां केवल 440 लोग ही कोरोना वायरस से संक्रमित हुए और मृतकों का आंकड़ा महज सात है. गौर करने वाली बात यह है कि अब तक ताइवान में पूर्ण लॉकडाउन नहीं लगाया गया है. वहां केवल स्कूल, कॉलेज और ऐसे कार्यक्रमों पर रोक लगाई गयी है जिनमें बड़ी संख्या में लोग इकट्ठे हो सकते हैं.

ब्रिटिश अखबार द टेलीग्राफ को दिए एक साक्षात्कार में ताइवान के उपराष्ट्रपति चेन चिएन-जेन कहते हैं, ‘हमने बीते सालों के दौरान सामने आए सार्स वायरस और कई फ्लू से बहुत कुछ सीखा, आप बैठ नहीं सकते, आपको ऐसे में समझदारी के साथ तुरंत प्रतिक्रिया देनी होती है... चीन हमारे पड़ोस में है इसलिए हमारी वुहान पर नजर थी. हमें जब केवल यह पता लगा था कि वुहान में कुछ लोग एक ऐसे बुखार से पीड़ित हैं, जो एक व्यक्ति से दूसरे को हो रहा है और जिसके पीछे की कोई वजह समझ में नहीं आ रही, तभी हमने पूरे ताइवान में अलर्ट घोषित कर दिया था, चीन से लगे सीमाई इलाकों में चेकिंग और इन्हीं क्षेत्रों में आईसोलेट करने की व्यवस्था की.’

जर्मनी

बीते मार्च में जर्मनी की चांसलर एंगेला मर्केल का एक बयान आया था, जिसने जर्मनी के लोगों को काफी परेशान कर दिया था. मर्केल ने कहा था कि जर्मनी की 70 फ़ीसदी आबादी यानी क़रीब छह करोड़ लोग कोरोना वायरस से संक्रमित हो सकते हैं. इसके बाद लगा कि जर्मनी में भी हालात यूरोप के अन्य देशों - इटली, स्पेन, ब्रिटेन और फ्रांस - जैसे होने वाले हैं. एंगेला मर्केल का ऐसा कहना और लोगों का ऐसा सोचना गलत नहीं था. जर्मनी में भी उतनी तेजी से ही संक्रमित सामने आ रहे थे जितनी तेजी से यूरोप के अन्य देशों में ऐसा हो रहा था. और जर्मन सरकार तब तक बचाव के कोई ख़ास प्रयास करते हुए भी नहीं दिख रही थी जिसकी वजह से उसकी खासी आलोचना हो रही थी.

लेकिन अब करीब दो महीने बाद अगर आंकड़ों पर गौर करें तो इटली में संक्रमितों की संख्या दो लाख 22 हजार, फ्रांस में एक लाख 78 हजार, ब्रिटेन में दो लाख 29 हजार, स्पेन में दो लाख 71 हजार और जर्मनी में एक लाख 73 हजार है. आंकड़ों से जाहिर है कि जर्मनी संक्रमण के मामले में इटली, स्पेन और ब्रिटेन से काफी पीछे है और फ्रांस के आसपास ही है. लेकिन, दो महीने बाद जो एक बात सभी को हैरान करती है, वह है जर्मनी में कोरोना के मरीजों की मृत्यु दर. इटली, स्पेन, ब्रिटेन और फ्रांस में कोरोना मरीजों की मृत्यु दर की अगर जर्मनी से तुलना करें तो इसमें जमीन-आसमान का अंतर नजर आता है. इटली में 31 हजार और ब्रिटेन में अब तक 33 हजार, स्पेन और फ़्रांस में 27-27 हजार के करीब मौतें हुई है. लेकिन जर्मनी में यह आंकड़ा महज 7,792 ही है.

जर्मनी में इतनी कम मृत्यु दर का सीधा श्रेय वहां की चांसलर एंगेला मर्केल को दिया जा रहा है जो 1989 से पहले तक एक रिसर्च साइंटिस्ट हुआ करती थीं. बीबीसी के मुताबिक भले ही जर्मनी में कोरोना का पहला संक्रमित फरवरी में सामने आया हो, लेकिन उन्होंने कोरोना संक्रमण को टेस्ट करने की तैयारी जनवरी में ही शुरू कर दी थी. इसके लिए उन्होंने बड़े स्तर पर टेस्टिंग किटों के उत्पादन का आदेश दे दिया था.

जानकार कहते हैं कि मार्च में एंगेला मर्केल ने देश की 70 फीसदी आबादी के कोरोना पॉजिटिव होने की बात कहकर लोगों को डरा जरूर दिया था, लेकिन इसके बाद जर्मन सरकार ने इससे निपटने के लिए कमर भी कस ली थी. जर्मनी में इसके बाद युद्ध स्तर पर कोरोना की टेस्टिंग शुरू हुई. इसके लिए जर्मनी के कई शहरों में टेस्टिंग टैक्सियां भी चलाईं गई, जिन्होंने घर-घर जाकर लोगों की टेस्टिंग की. लोगों से कहा गया कि उन्हें घर से बाहर आने की जरूरत नहीं है, वे केवल अधिकारियों को फोन कर घर पर ही अपनी टेस्टिंग करा सकते हैं. बताते हैं कि इस तरह जर्मनी ने हर हफ्ते पांच लाख लोगों की टेस्टिंग की.

जर्मनी के हीडलबर्ग में स्थित ‘यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल’ के प्रोफेसर हैंस-जॉर्ज क्रॉजलिक न्यूयॉर्क टाइम्स से बातचीत में कहते हैं, ‘जर्मनी ने बहुत पहले ही टेस्टिंग शुरू कर दी थी जिसका उसे लाभ मिला. ऐसे हल्के लक्षण वालों को बहुत जल्द ढूंढ लिया जो बाद में ज़्यादा बीमार पड़ सकते थे...पूरे देश में टेस्ट मुफ्त में किए गए जिसका फायदा ये हुआ कि जनता सामने आई और समय पर लोगों को इलाज मिला.’ संक्रमण ज्यादा न बढे इसके लिए जर्मनी ने ट्रेसिंग और ट्रैकिंग को भी टेस्टिंग के बराबर ही तरजीह दी.

जानकार जर्मनी की बेहतर स्वास्थ्य सेवा को भी इसका श्रेय देते हैं. दरअसल, जर्मनी ने समय रहते अपने यहां आईसीयू और बेड्स की संख्या बढ़ाने पर भी उतना ही ध्यान दिया. जनवरी में जर्मनी के पास वेंटिलेटर वाले आईसीयू बेड्स की संख्या 28 हज़ार ही थी, लेकिन अब ये संख्या बढ़कर 40 हजार के करीब पहुंच गई है. इसके अलावा आज वहां हर 1000 लोगों पर औसतन छह आईसीयू बेड्स हैं, जबकि फ़्रांस में ये औसत 3.1, स्पेन में 2.6 और ब्रिटेन में महज 2.1 ही है. जमर्नी की बेहतरीन स्वास्थ्य सेवा के चलते ही आज वह फ्रांस और ब्रिटेन जैसे कई यूरोपीय देशों के कोरोना मरीजों का भी अपने यहां इलाज कर रहा है.

जर्मनी के इन सभी प्रयासों के बीच गौर करने वाली दो बातें और हैं: उसने खेल के मैदान, मॉल्स, चर्च और चिड़ियाघर जैसी जगहों पर प्रतिबंध जरूर लगाए लेकिन ताइवान की तरह उसने भी देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा नहीं की. जर्मनी में सभी सरकारी मंत्रालय एवं कार्यालय बंद दरवाज़ों के पीछे काम करते रहे. लोग उनसे टेलीफ़ोन पर संपर्क कर सकते थे. करीब आधी संख्या में ट्रेनें, ट्रामें, मेट्रो और बसें भी चलती रहीं. हालांकि, जर्मन सरकार ने महामारी से बचने के आपातकालीन नियमों की अनदेखी करने वालों को भारी जुर्माना और जेल की सज़ा की चेतावनी दी थी. इसके अलावा वह कोरोना वायरस का स्थायी हल ढूंढ़ने वालों की कतार में भी सबसे आगे है. वहां वैक्सीन से लेकर कोविड-19 का इलाज ढूंढ़ने तक का काम दुनिया के बाकी देशों से ज्यादा तेजी से चल रहा है.