भारत में शीर्ष राजनेताओं के फिल्म कलाकारों से संबंध कभी अजूबा नहीं रहे. इसकी सबसे बड़ी मिसाल पंडित नेहरू के राज कपूर, दिलीप कुमार और देव आनंद के साथ मित्रवत संबंधों में देखी जा सकती है. लेकिन उस दौर में कोई भी जाना-माना फिल्म कलाकार सक्रिय राजनीति में भागीदारी नहीं करता था. न ही राजनेता अपनी जनसभाओं के लिए ही फिल्म कलाकारों को बुलाते थे. इसके विपरीत दक्षिण भारत में एमजी रामचंद्रन और एनटी रामाराव जैसे दिग्गज कलाकार थे जो न सिर्फ सक्रिय राजनीति में आए बल्कि मुख्यमंत्री भी बने.

हिंदी फिल्म कलाकारों के राजनीति से जुड़ाव की शुरूआत अस्सी के दशक से मानी जाती है. इसकी पृष्ठभूमि में 1975 के आपातकाल की काफी महत्वपूर्ण भूमिका रही. उस दौरान फिल्म उद्योग के एक तबके ने इसका बड़ा जबर्दस्त विरोध किया था. देव आनंद इन फिल्म कलाकारों में सबसे आगे थे. आपातकाल जब खत्म हुआ तब उन्होंने संजीव कुमार सहित फिल्म उद्योग कुछ और दिग्गज लोगों के साथ एक राजनीतिक पार्टी बनाने की घोषणा कर दी. नेशनल पार्टी ऑफ इंडिया (एनपीआई) नाम से बनी इस पार्टी के पहले अध्यक्ष खुद देव आनंद चुने गए.

1977 में जब इस नई-नवेली राजनीतिक पार्टी, एनपीआई की पहली रैली मुंबई के शिवाजी पार्क में हुई तो आम लोगों सहित मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियां भी यहां जुटी भीड़ को देखकर हैरान थीं. इस रैली में फिल्म अभिनेता देव आनंद, संजीव कुमार सहित प्रसिद्ध निर्माता एफसी मेहरा और जीपी सिप्पी (शोले) शामिल थे. यह पहला मौका था जब हिंदी फिल्म उद्योग से जुड़ी हस्तियां राजनीति की बात कर रहीं थीं और उनको सुनने के लिए भारी भीड़ जमा थी.

हालांकि इन लोगों में से किसी व्यक्ति को राजनीति का पूर्व अनुभव नहीं था, इसलिए जब लोकसभा चुनावों के लिए उम्मीदवार तय करने की बारी आई तो पार्टी यह काम नहीं कर पाई. इसके कुछ महीनों बाद देव आनंद ने इस पार्टी को भंग करने की घोषणा कर दी.

एनपीआई से जुड़े कलाकारों में से किसी ने बाद में सक्रिय राजनीति में कदम नहीं रखा, लेकिन इसका गठन बाकी राजनीतिक पार्टियों के लिए एक सबक साबित हुआ. पार्टियों को एहसास हो गया कि राजनीतिक मुद्दों पर भी फिल्म कलाकार भीड़ जुटा सकते हैं. इसी के बाद कांग्रेस ने प्रसिद्ध फिल्म अभिनेत्री नरगिस दत्त को राज्यसभा में भेजा था और सुनील दत्त को टिकट देकर लोकसभा का चुनाव लड़वाया था.