कोविड-19 महामारी जैसी आपदा के दौर में भी शासन-प्रशासन की जुगलबंदी और लालफीताशाही किस तरह मानव संसाधनों का दुरुपयोग करती है, इसे राजस्थान के एक उदाहरण से समझा जा सकता है. इस मुश्किल समय में जब एक-एक स्वास्थ्य कर्मचारी बहुत अहम हो गया है, तब राज्य में आयुर्वेद विभाग के 31 चिकित्सक डेप्युटेशन (प्रतिनियुक्ति) पर पंचायती राज विभाग में खंड विकास अधिकारी (बीडीओ) के पद पर बने रहना ज्यादा पसंद कर रहे हैं. इनमें से अधिकतर की नियुक्ति पिछड़े ज़िलों और दूरदराज़ वाले क्षेत्रों में है. उदाहरण के लिए यदि आदिवासी बहुल बांसवाड़ा ज़िले की बात करें तो वहां खंड विकास अधिकारी के नौ में से सात पदों पर आयुर्वेद चिकित्सक बैठे हुए हैं. जबकि ज़िले में आयुर्वेद चिकित्सकों के स्वीकृत 125 पदों में से सिर्फ़ 70 पद ही भरे हुए हैं और 55 खाली पड़े हैं. उधर कई बीडीओ अपनी पोस्टिंग होने का इंतजार कर रहे हैं और बिना काम के तनख्वाह ले रहे हैं.

ग़ौरतलब है कि राजस्थान का आयुर्वेद एवं भारतीय चिकित्सा विभाग क़रीब डेढ़ महीने पहले ही यह आदेश निकाल चुका है कि कोविड-19 महामारी के दौरान उसके अधीन आने वाले सभी आयुर्वेद, होम्योपैथी एवं यूनानी चिकित्सकों, नर्सों और कंपाउंडरों को अपनी सेवाएं चिकित्सा विभाग को ही देनी होंगी. लेकिन यह आदेश हवा कर दिया गया. जानकारी के अनुसार आयुर्वेद विभाग ने इससे पहले 2017 में भी इन प्रतिनियुक्तियों को समाप्त करने के आदेश ज़ारी किये थे लेकिन तब से अब तक इस मामले में कुछ नहीं किया गया.

आयुर्वेद एवं भारतीय चिकित्सा विभाग राजस्थान का आदेश

यह बात कहने-सुनने में चौंकाती है. क्योंकि पूछा जा सकता है कि आयुर्वेदिक चिकित्साधिकारियों और प्रशासनिक व्यवस्थाओं का आपस में क्या लेना-देना? सूत्र बताते हैं कि इन अधिकारियों की पिछली सरकार में ऊंचे स्तर पर बैठे कुछ लोगों से गहरी नज़दीकियां थीं, उसी के चलते इन्हें यह सौगात मिल गई. दरअसल खंड विकास अधिकारी के पद को एक मलाईदार पोस्ट माना जाता है और इलाके में इस पद का रुतबा भी ऐसा होता है कि एक आयुर्वेदिक चिकित्सक या वैद्य उसके बारे में सोच भी नहीं सकता. जानकारी के अनुसार बीडीओ की पोस्ट पर तैनात इन चिकित्साधिकारियों में से कुछ पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे लेकिन उन्हें नज़रअंदाज़ कर दिया गया. मामला सामने आने के बाद जांच की बात तो कही गई, लेकिन यह जांच कहां तक पहुंची है, इस बारे में कोई पुख़्ता जानकारी उपलब्ध नहीं है.

इसका एक पहलू यह भी है कि राजस्थान में इस समय कई विकास अधिकारियों को बिना कोई कारण बताए एपीओ (अवेटिंग पोस्टिंग ऑर्डर) किया हुआ है. राजधानी जयपुर से ताल्लुक़ रखने वाले ऐसे ही एक अधिकारी नाम न छापने की शर्त पर सत्याग्रह को बताते हैं कि ‘यदि हमारे पदों पर चिकित्सक बैठे रहेंगे तो हमें तो पोस्टिंग का इंतजार करना ही पड़ेगा. जबकि चिकित्सकों को प्रशासनिक ज़िम्मेदारियां सौंपना वैसे ही अव्यवहारिक है जैसे किसी प्रशासनिक अधिकारी से चिकित्सकीय काम करवाना.’ जानकार बताते हैं कि ऐसे विकास अधिकारियों की संख्या 15 तक हो सकती है.

विश्लेषक इन प्रतिनियुक्तियों को नैतिक ही नहीं क़ानूनी तौर पर भी अनुचित करार देते हैं. नियमों के हवाले से वे बताते हैं कि ज़्यादा पे-ग्रेड वाले आयुर्वेद चिकित्साधिकारियों को उनसे कम पे-ग्रेड वाले बीडीओ के पद पर स्थापित नहीं किया जा सकता है. यह सरकार पर बिना वजह का आर्थिक भार है. फ़िर इस सब की वजह से एपीओ किए गए विकास अधिकारियों के वेतन पर खर्च हो रहे और ट्रेनिंग पर खर्च हुए लाखों-लाख रुपए भी व्यर्थ होते नज़र आते हैं.

हालांकि तर्क दिया जा सकता है कि चूंकि कोरोना का इलाज आयुर्वेद में नहीं है इसलिए इन अधिकारियों द्वारा अपनी ज़िम्मेदारियों को संभालने या न संभालने से क्या फ़र्क पड़ेगा? लेकिन कोरोना का इलाज तो दूसरी पद्धतियों में भी नहीं है! किंतु उन पद्धतियों से जुड़े स्वास्थ्य कर्मचारी अपनी जिम्मेदारियों से मुंह नहीं मोड़ रहे. फ़िर ऐसा भी नहीं है कि इन आयुर्वेद चिकित्सकों की इस बीमारी के दौरान कोई उपयोगिता ही नहीं. राजस्थान सरकार ने आयुर्वेदिक कर्मचारियों को लोगों के इम्यूनिटी सिस्टम को मजबूत करने के उपाय करने की जिम्मेदारी सौंप रखी है.

संभव है कि किसी को सिर्फ़ 31 अधिकारियों के लिए इतनी हाय-तौबा मचाना अतिरेक लगे. लेकिन इस वैश्विक संकट के समय जब हर स्वास्थ्य कर्मचारी कई-कई घंटे अतिरिक्त काम कर कोविड-19 से जूझने में अपनी जी-जान एक किए हुए हैं, तब इन चिकित्सकों और प्रशासन के इस रूख़ पर सवाल क्यों नहीं उठाए जाने चाहिए? फ़िर राजस्थान में इस महामारी से जुड़े सर्वे, इमदाद पहुंचाने और क्वारंटीन सेंटरों पर सेवाएं देने के लिए शिक्षकों और ऐसे अन्य लोगों की भी मदद ली जा रही है जिनका चिकित्सा व्यवस्था से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं. ऐसे में इन 31 वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारियों को उनकी ज़िम्मेदारियों से कैसे मुक्त रखा जा सकता है? फिर सवाल यह भी है कि यदि यह सिस्टम इस घोर आपदा में भी आंखें मूंदे अपने ढर्रे पर चलता रहा तो उससे सामान्य समय में क्या ही उम्मीद की जा सकती है?

राजस्थान की राजनीति पर नज़र रखने वाले लोग इस मामले के तार प्रदेश सरकार की अंदरूनी तनातनी से भी जोड़ते हैं. दरअसल राजस्थान में ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज विभाग इस समय प्रदेश के उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के पास है और चिकित्सा मंत्रालय रघु शर्मा के. कुछ साल पहले तक इन दोनों नेताओं के संबंध काफी मधुर हुआ करते थे. लेकिन अब स्थिति पहले से उलट मानी जाती है. पार्टी से जुड़े सूत्रों की मानें तो सत्ता में आने के बाद से सचिन पायलट के कुछ बेहद विश्वस्त नेता उनसे दूरियां बढ़ाते हुए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की तरफ़ झुकते चले गए. इनमें से कुछ कैबिनेट मंत्री भी थे जिनमें रघु शर्मा भी शामिल हैं. दरअसल मुख्यमंत्री पद को लेकर गहलोत और पायलट के बीच के असहज रिश्ते किसी से नहीं छिपे हैं. इस पद को लेकर इन दोनों नेताओं के बीच भी उसी तरह की खींचतान चलती रहती है जैसी कि मध्यप्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच चला करती थी. यहां तक कि पायलट के समर्थक उन्हें मुख्यमंत्री बनाने की मांग को लेकर सड़कों पर भी उतर आए थे.

ऐसे में कुछ जानकार इस संभावना से इन्कार नहीं करते कि दोनों मंत्रियों के अधीन आने वाले विभागों के बीच फाइलों को जान-बूझकर अटकाया जा रहा है. इस बारे में जानने के लिए सत्याग्रह ने राजस्थान के चिकित्सा मंत्री रघु शर्मा और ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव राजेश्वर सिंह से संपर्क करने की कोशिश की लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया. अगर इनसे या इन दोनों के विभागों से आगे हमें कोई प्रतिक्रिया मिलती है तो इस स्टोरी को अपग्रेड कर दिया जाएगा.

हालांकि आयुर्वेद विभाग में कार्यरत एक वरिष्ठ अधिकारी इस मामले से जुड़े कुछ अन्य पहलुओं की तरफ भी हमारा ध्यान ले जाते हैं. नाम न छापने के आग्रह के साथ वे कहते हैं, ‘यह सही है कि इस मुश्किल समय में अपनी ज़िम्मेदारी न संभालना किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता है. लेकिन यह भी सच है कि इस समय यदि किसी भी आयुर्वेदिक कर्मचारी को ऐसा मौक़ा मिले तो वह शायद ही अपने विभाग में सेवाएं देना चाहेगा. लेकिन इसकी वजह कोरोना के चलते पैदा हुआ अतिरिक्त कार्यभार या इस बीमारी का डर नहीं है. बल्कि हमारे साथ होने वाला विभागीय भेदभाव है.’

ये अधिकारी आगे जोड़ते हैं, ‘आयुर्वेद कर्मचारी इस समय सेनेटाइज़र, मास्क, ग्लव्स और किसी अन्य सुरक्षा के बिना ही फ़ील्ड में जाने के लिए मजबूर हैं. ग्रामीण और अंदरूनी क्षेत्रों से जुड़े प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर भी आयुर्वेदिक विभाग के कर्मचारियों के साथ दोहरा बर्ताव किया जा रहा है. इस बात को आप इससे समझ सकते हैं कि आयुर्वेद के वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारियों तक को इस समय अपने से कई ग्रेड नीचे की एएनएम (नर्स) को रिपोर्टिंग करनी पड़ रही है. ऐसे में हमारे विभाग के आम कर्मचारियों को क्या सम्मान मिलता होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है!’

इन अधिकारी के शब्दों में, ‘स्वास्थ्य बजट का न के बराबर हिस्सा हमें दिया जाता है. हालात ये हैं कि राजधानी जयपुर के बारह आयुर्वेदिक अस्पतालों में से सिर्फ़ दो के पास अपनी बिल्डिंग हैं. बल्कि बाक़ी के अस्पताल मंदिरों, धर्मशालाओं और सरकारी कब्जों वाली जगहों में किराए पर चलने को मज़बूर हैं. दूसरे ज़िलों की चर्चा छोड़ ही दो.’ निराशा और आक्रोश के मिले-जुले भाव के साथ ये अधिकारी कहते हैं, ‘चूंकि हमारे विभाग में कर्मचारियों की संख्या कम है, हमारे कर्मचारी संगठन राजनीतिक दलों को चंदा नहीं दे पाते हैं, इसलिए हमारे आत्मसम्मान की परवाह किसी को नहीं है. ऐसे में हमें मौका मिले तो हम कोई भी दूसरा पद ले लेगें, फिर बीडीओ का पद तो बहुत सम्मान और रुतबे वाला है.’