चीन से उपजे कोरोना वायरस ‘सार्स-कोव-2’ के कुल मामलों की संख्या 40 लाख को छूने वाली है. मौतों का आंकड़ा पौने तीन लाख के करीब पहुंच गया है. चीन के व्यवहार से पश्चिमी देशों को अब इसमें कोई संदेह नहीं दिखता कि वह इस वायरस के उद्गम की सच्चाई छिपाने और दुनिया को बेवकूफ़ बनाने में लगा है. चीन की सरकार अपने लोगों या विदेशियों की ओर से हर खोजबीन पर तिलमिला कर प्रतिबंध लगा देती है. लंदन स्थित चीनी दूतावास ने अप्रैल के मध्य में एक खुले पत्र में दावा किया कि पश्चिमी मीडिया का यह कहना सरासर ग़लत है कि यह वायरस वूहान की एक प्रयोगशाला में से लीक हो कर फैला था.

पश्चिमी मीडिया कहता रहा है कि वूहान की जानी-मानी जैविक शोध प्रयोगशाला में सूअरों और चमगादड़ों में कोरोना परिवार के विभिन्न वायरसों के पलने-बढ़ने के बारे में वर्षों से शोधकार्य हो रहे थे. लंदन के दैनिक ‘डेली मेल’ ने लिखा कि ‘कोविड-19’ नाम की नयी विश्वव्यापी महामारी इसी प्रयोगशाला के आस-पास से फैली. इस रिपोर्ट से चीन इस बुरी तरह बौखलाया कि चीनी विदेशमंत्री वांग यी ने ब्रिटेन के विदेशमंत्री डोमिनिक राब को तुरंत फ़ोन किया. कहा कि इस प्रकार की ‘’हानिकारक’’ रिपोर्टिंग का अतिशीघ्र अंत होना चाहिये.

मुंह बंद करने के नये सेंसरशिप नियम

चीन की सरकार चाहती है कि पत्रकार ही नहीं, वैज्ञानिक भी नये कोरोना वायरस की उत्पत्ति और प्रसार के बारे में कोई खोजबीन न करें. सरकार ने नये सेंसरशिप निर्देश जारी किये हैं. इन निर्देशों के अनुसार, चीनी वैज्ञानिक ‘सार्स-कोव-2’ के उद्गम और प्रसार के बारे में जो कुछ प्रकाशित करना चाहेंगे, उसकी संबंद्ध मंत्रालय पहले जांच करेगा. मंत्रालय की आधिकारिक अनुमति के बिना ऐसी कोई सामग्री प्रकाशित नहीं की जा सकती.

विश्व जनमत की तरह ही चीनी शोधकर्ता भी आरंभ में यही मान रहे थे कि ‘सार्स-कोव-2’ वायरस वूहान के उस मछली बाज़ार से फैला, जहां समुद्री जीव-जंतुओं के अलावा ऐसे अन्य जीव-जंतु भी बेचे जाते हैं, जिन्हें चीनी बड़े चाव से खाते हैं. चीन के ‘रोग-निरोधक और बचाव केंद्र’ के निदेशक गाओ फ़ू ने, 22 जनवरी को, एक पत्रकार सम्मेलन में कहा कि यह नया कोरोना वायरस इसी बाज़ार में किसी जानवर के माध्यम से मनुष्यों तक पहुंचा. गाओ फ़ू के अनुसार, जिन लोगों को शुरू-शुरू में इस वायरस का संक्रमण लगा है, उनमें से कुछ इसी बाज़ार में या तो काम कर रहे थे या वहीं उसके संपर्क में आये. 10 दिसंबर 2019 को बीमार पड़ी, झींगा बेचने वाली 57 वर्षीय वेई गुइच्यान नाम की एक महिला, इस संक्रमण का पहला शिकार बतायी जाती थी.

मछली बाज़ार ही अकेला स्रोत नहीं था

किंतु इस बीच कहा जा रहा है कि वायरस का पहला संक्रमण 17 नवंबर 2019 को ही हो गया था. प्रसिद्ध विज्ञान-पत्रिका ‘साइंस’ ने वूहान में शुरू-शुरू के 41 संक्रमितों को लेकर किये गये चीनी वैज्ञानिकों के एक अध्ययन के आधार पर हाल ही में एक लेख प्रकाशित किया ‘’वूहान, चीन में 2019 के नये कोरोना वायरस से संक्रमित रोगियों की नैदानिकी विशेषताएं.’’ इस लेख के अनुसार, शुरू के 41 संक्रमितों में से 13 का मछली बाज़ार से कोई लेना-देना नहीं था. लेख का निष्कर्ष है कि यह बाज़ार ‘कोविड-19’ के फैलने का एकमात्र स्रोत नहीं था.

इसके बाद से वूहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरॉलजी का चमगादड़ अध्ययन कार्यक्रम अनुमानों का पुनः मुख्य केंद्र बन गया है. यह प्रयोगशाला पशुओं वाले बाज़ार से कुछ सौ मीटर की ही दूरी पर है. उसके बारे में पहले से ही पता था कि 2002 में ‘सार्स·(SARS/ सिवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिन्ड्रम), 2012 में मेर्स (MERS/ मिडल ईस्ट रेस्पिरेटरी सिन्ड्रम) और 2009 में ‘स्वाइन फ्लू’ फैलने के बाद से कोरोना वायरस परिवार के सदस्यों के बारे में अपने शोधकार्य उसे बढ़ा देने थे. इस प्रयोगशाला की मुख्य विषाणु विशेषज्ञ, प्रोफ़ेसर ज़ेंग-ली शी, इस काम में ज़ोर-शोर से जुटी हुई थीं. उनकी प्रयोगशाला की वेबसाइट पर ली के बारे लिखा है कि ‘उनकी टीम ने पिछले 12 वर्षों में चमगादड़ों के शरीर में जो कई नये वायरस या वायरस-जन्य प्रतिजन (एन्टीबॉडी) खोज निकाले हैं, उनमें कोरोना वायरस भी हैं.’

चमगादड़ों का सबसे बड़ा वायरस डेटाबैंक

प्रो.शी कई वर्षों से पहाड़ी गुफाओं में चमगादड़ों के बीट (मल) वाले नमूने ढूंढती और जमा करती रही हैं. ‘साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, चमगादड़ों की खोज में वे चीन के 28 प्रदेशों के जंगलों-पहाड़ों में भटक चुकी हैं, ताकि उनके शरीर में पल रहे वायरसों का वूहान की अपनी राष्ट्रीय प्रयोगशाला में अध्ययन कर सकें. इन अध्ययनों द्वारा उन्होंने चमगादड़ी वायरसों का विश्व का सबसे बड़ा डेटाबैंक बनाया है. अख़बार के अनुसार, इसी डेटाबैंक के आधार पर पिछले दिसंबर के अंत में कोरोना वायरस वाली नयी बीमारी फैलते ही वे जल्द ही पहचान गयीं कि यह नया वायरस तो युन्नान प्रांत के एक ऐसे जंगली चमगादड़ की देन है, जिसे उसके बीट से उन्होंने स्वयं ही अपनी प्रयोगशाला में विकसित किया था. नये वायरस के और बीट में मिले मूल वायरस के 96 प्रतिशत जीन एकसमान हैं.

प्रो.ज़ेंग-ली शी के शोधकार्यों के कारण ही वूहान का वायरस विज्ञान संस्थान, 7 जनवरी 2020 को, वायरस के पूरे जीनोम (जीनों की आनुवंशिक कड़ी) जारी कर सका, ताकि विश्व के अन्य देश उसे पहचानने के लिए आवश्यक परीक्षण किट (सामग्री सेट) तैयार कर सकें और टीका इत्यादि बना सकें. चीनियों को अब शिकायत है कि दुनिया में प्रो. ज़ेंग-ली शी के शोधकार्य की सराहना के बदले उन्हें उलाहने मिल रहे हैं. लोग उन्हें कोसते-धिक्कारते हैं कि उन्होंने ही कोरोना वायरस वाली नयी बीमारी ‘कोविड-19’ पैदा की है. अपने बचाव में प्रो.शी ने चीन के सोशल मीडिया का सहारा लेते हुए लिखा, ‘’मैं अपनी जान को दांव पर लगा कर क़सम खाती हूं कि इस (वायरस) का (वूहान की) प्रयोगशाला से कोई संबंध नहीं है.’’

प्रो.ज़ेंग-ली शी (बाएं) | वूहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरॉलजी

प्रयोगों के दौरान दुर्घटना की संभावना

ब्रिटेन के ‘डेली मेल’ को इस सौगंध पर विश्वास नहीं है. उसका कहना है कि वूहान में अपने कई वर्षों के प्रयोगों और शोधकार्यों के दौरान प्रो.शी सूअर के बच्चों को चमगादड़ों वाले वायरस से संक्रमित करने के प्रयोग करती रही हैं. इन्हीं प्रयोगों के बीच एक ऐसी दुर्घटना हो गयी, जिसके कारण प्रयोग से जुड़े कुछ लोग संभवतः किसी संक्रमित सूअर के ख़ून के संपर्क में आ गये.

‘डेली मेल’ के अनुसार, संभवतः इसी तरह ‘सार्स-कोव-2’ कहलाने वाले नये कोरोना वायरस का कुछ भाग प्रयोगशाला के बाहर पहुंच कर आम लोगों को संक्रमित करने लगा. उसके कारण फैली नयी बीमारी ‘कोविड-19’ पैदा करने वाले वायरस के जीनों की कड़ी (सीक्वेंस) उन वायरसों के जीनों से मेल खाती है, जो वूहान से एक हज़ार किलोमीटर दूर युन्नान की गुफाओं में रहने वाले चमगादड़ों में मिलते हैं. चीन की सरकार इन सारी बातों को ख़ारिज़ करती है. इसीलिए चीन के विदेशमंत्री ने ब्रिटेन के विदेशमंत्री को फ़ोन कर ऐसी रिपोर्टों पर आपत्ति जतायी. इस आपत्ति को ‘चोर की दाढ़ी में तिनका’ भी कहा जा सकता है.

विज्ञान पत्रिकानेचरका लेख

वूहान की प्रयोगशाला में चमगादड़ी वायरसों के साथ होने वाले प्रयोगों के बारे में इससे पहले भी कई लेख आदि प्रकाशित हो चुके हैं. अप्रैल 2018 की विज्ञान पत्रिका ‘नेचर’ में चीन के सूअर पालन फ़ार्मों में हुए ऐसे ही एक अध्ययन का वर्णन है, जिसके लिए गुफाओं में रहने वाले चमगादड़ों के बीट से नमूने लिये गये थे. इन नमूनों में मिले वायरसों को प्रयोगशाला में संवर्धित किया गया और केवल तीन दिन पहले पैदा हुए सूअर के नवजात बच्चों को उनके इन्जेक्शन दे कर संक्रमित किया गया.

पश्चिमी प्रेक्षकों और और कई वैज्ञानिकों का भी मानना है कि चीन के वूहान शहर की प्रयोगशाला में चमगादड़ों के साथ ही नहीं, अन्य जानवरों के साथ भी, कोरोना परिवार के वायरसों वाले एक-के-बाद-एक अनेक प्रयोग होते रहे हैं. चीन की सरकार इसे मानती नहीं, बल्कि कहती है कि उसकी इस विश्व प्रसिद्ध प्रयोगशाला में एड्स रोग के ‘एचआई’ वायरस, ‘ज़ीका’ वायरस और ‘एबोला’ वायरस के साथ भी प्रयोग आदि होते हैं.

बीमारी फैलने की भविष्यवाणी

लेकिन, एक विचित्र तथ्य यह भी है कि ठीक एक साल पहले, प्रो. ज़ेंग-ली शी का ही एक ऐसा लेख चीन की विज्ञान पत्रिकाओं में छपा था, जिसमें एक नयी संक्रामक बीमारी फैलने की भविष्यवाणी की गयी थी. अपने एक सहयोगी, विषाणु वैज्ञानिक पेंग झू के साथ मिल कर उन्होंने लिखा कि इस बात की प्रबल संभावना है कि चमगादड़ों द्वारा फैलाये जाने वाले कोरोना वायरस से जल्द ही चीन में पुनः एक नयी संक्रामक बीमारी फैल सकती है. इस लेख के प्रकाशन की तारीख़ 2 मार्च 2019 थी! यदि ऐसे वायरसों पर काम नहीं हो रहा था या उनके फैलने का कोई कारण नहीं रहा होता, तो प्रो. ज़ेंग-ली शी स्वयं ही यह गंभीर चेतावनी क्यों और कैसे देतीं!

अमेरिकी दैनिक ‘वॉशिंगटन पोस्ट’ अमेरिकी गुप्तचर सेवाओं की गोपनीय रिपोर्टों के विश्लेषण से इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि चीनी प्रयोगशाला में हुई कोई दुर्घटना ही वह सबसे बड़ा संभावित कारण है, जिससे नया कोरोना वायरस एक विश्वव्यापी महामारी बन गया. दैनिक ने ‘साउथ चाइना यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्नॉलॉजी’ के एक अध्ययन का उद्धरण देते हुए लिखा कि यह अध्ययन भी इसी नतीजे पर पहुंचा है कि नया कोरोना वायरस - ‘सार्स-कोव-2’ - संभवतः वूहान के उस ‘रोग-नियंत्रण एवं निरोध केंद्र’ से ही निकला है, जो वूहान के मछली बाज़ार से केवल 300 मीटर की दूरी पर है. यह अध्ययन चीनी सेंसरशिप का शिकार होकर अब इंटरनेट से ग़ायब हो गया है.

चीन पश्चिमी गुप्तचर सेवाओं की नज़र में है

अमेरिकी गुप्तचर सेवा ‘सीआईए’ सहित कई अन्य देशों की गुप्तचर सेवाओं और सरकारों के बारे में कहा जा रहा है कि उनका यही मानना है कि चीन से चला नया कोरोना वायरस सैनिक उद्देश्यों वाला कोई जैविक हथियार नहीं है, पर उसके कारण हो रही समस्याओं और नुकसानों की ज़िम्मेदारी चीन पर ही जाती है. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और ऑस्ट्रलिया की विदेशमंत्री मैरिस पैन सहित कई देशों के नेता इस सारे प्रकरण की निष्पक्ष अंतरराष्ट्रीय जांच की मांग कर रहे हैं.

अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने 28 अप्रैल को कहा कि उनकी सरकार पता लगा रही है कि चीन से क्षतिपूर्ति की मांग हेतु ‘’चीन की सरकार को कोरोना वायरस फैलने के लिए कैसे ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है.’’ राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि ‘’काफ़ी भारी-भरकम रकम (वसूलनी) होगी,’’ पर उन्होंने यह नहीं बताया कि वह कितनी बड़ी होगी. ब्रिटेन के एक थिंक टैंक ‘हेनरी जैक्सन सोसायटी’ ने हिसाब लगाया है कि चीन ने अकेले ‘जी-7’ कहलाने वाले देशों को ही, क़रीब चार खरब डॉलर की चपत लगा दी है. वहां के 15 कंज़र्वेटिव सांसदों ने अपनी सरकार के नाम एक पत्र में लिखा है कि किसी वैश्विक महामारी के बारे में जानकारी देने के बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय नियमों की चीन ने जिस तरह अनदेखी की है, उसके कारण ब्रिटिश सरकार को ‘’चीन के साथ अपने संबंधों पर पुनर्विचार’’ करना चाहिये.

जर्मनी की चुप्पी

जर्मनी की बात करें तो यहां की सरकार या किसी सरकारी अधिकारी ने अब तक क्षतिपूर्ति की कोई बात नहीं कही है. पर देश के सबसे अधिक बिक्री वाले सड़कछाप दैनिक ‘बिल्ड त्साइटुंग’ ने जर्मनी को हुए नुकसानों के लिए चीन से क्षतिपूर्ति की मांग अवश्य की है. इस पर जर्मनी में चीन के राजदूत ने ‘बिल्ड’ के प्रधान संपादक के नाम तुरंत एक खुला विरोधपत्र लिख डाला. चीनी राजदूत की तिलमिलाहट-भरी प्रतिक्रिया के कारण विदेशों में अफ़वाह फैल गयी कि जर्मनी भी चीन से क्षतिपूर्ति मांग रहा है.

लगता नहीं कि चीन कोई क्षतिपूर्ति या किसी जांच की अनुमति देगा. उसे कोई सज़ा भी नहीं दी जा सकती. अमेरिका के येल विश्वविद्यालय में क़ानून के प्रोफ़ेसर स्टीफ़न कार्टर सहित यूरोप के कई विधिवेत्ताओं का भी कहना है कि एक स्वतंत्र राष्ट्र होने के नाते ‘’चीन को सार्वभौमिक निरापदता के सिद्धांत के अंतर्गत सज़ा से सुरक्षा मिली हुई है.’’ उसकी सरकार का ग़लत व्यवहार भी ‘’इस सिद्धांत की अनदेखी करने के लिए पर्याप्त नहीं है.’’ अंतरराष्ट्रीय क़ानून बनाने और उनका पालन करवाने वाली प्रमुख संस्था, संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद भी, चीन का कुछ नहीं बिगाड़ सकती. सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य होने के नाते वह वीटो के अपने अधिकार द्वारा अपने विरुद्ध किसी भी प्रस्ताव को पारित होने से रोक देगा.पश्चिमी देश अधिक से अधिक चीन के आर्थिक बहिष्कार की सोच सकते हैं.

चीन के अभय में भारत और अमेरिका की भूमिका

चीन की इस सुखद स्थिति के लिए भारत भी ज़िम्मेदार है. 1950 में अमेरिका ने और 1955 में उस समय के सोवियत संघ ने भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के सामने प्रस्ताव रखा था कि यदि वे चाहें तो भारत को सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता मिल सकती है. नेहरूजी ने कहा, नहीं, भारत से अधिक चीन इसका सुपात्र है. चीन उस समय संयुक्त राष्ट्र का सदस्य तक नहीं था. अमेरिका के ही प्रयासों से उसे संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता और सुरक्षा परिषद की स्थायी सीट नवंबर 1971 में मिली. नेहरू का आदर्शवाद चीन के लिए आशीर्वाद बन कर आज भारत को ही नहीं, सारी दुनिया को अपार मंहगा पड़ रहा है!