यह साल इंडियन प्रीमियर लीग के बिना गुजरने जा रहा है. 2008 में इस टूर्नामेंट की शुरुआत के बाद ऐसा पहली बार होगा. वैसे आईपीएल के जो प्रशंसक निराश हैं उन्हें जानना चाहिए कि इंग्लैंड में भी उनके जैसे क्रिकेट प्रेमी कुछ इसी तरह की भावना से गुजर रहे हैं. 1946 के बाद ये पहली गर्मियां हैं जब वहां कोई क्रिकेट टूर्नामेंट नहीं हो रहा. दूसरा विश्व युद्ध खत्म होने के बाद से हर साल इन दिनों इंग्लैंड में काउंटी चैंपियनशिप होती रही है. इसी दौरान इंग्लिश टीम दूसरे देशों के साथ टेस्ट मैचों की मेजबानी भी करती रही है.

1970 में दक्षिण अफ्रीका की टीम इंग्लैंड आने वाली थी. उन दिनों दक्षिण अफ्रीका रंगभेद की नीति पर चला करता था इसलिए मेहमान टीम में कोई भी अश्वेत खिलाड़ी नहीं होना था. लेकिन उसी समय रंगभेद की नीति को लेकर दक्षिण अफ्रीका के साथ खेल संंबंधों को तोड़ने के लिए एक आंदोलन भी खड़ा हो रहा था. इससे पहले 1968-69 की सर्दियों में इंग्लैंड का प्रस्तावित दक्षिण अफ्रीका दौरा रद्द हो चुका था. इसकी वजह यह थी कि दक्षिण अफ्रीका को इंग्लैंड की टीम में बेसिल डी ऑलिवेरा नाम के एक अश्वेत खिलाड़ी के शामिल होने पर एतराज था. दक्षिण अफ्रीकी शहर केप टाउन में जन्मा यह खिलाड़ी अब ब्रिटिश नागरिक था.

इससे अगली सर्दियों में सभी श्वेत खिलाड़ियों वाली दक्षिण अफ्रीका की एक रग्बी टीम इंग्लैंड आई थी. इस दौरान वामपंथी विचारधारा के प्रति झुकाव रखने वाले साप्ताहिक अखबार न्यू स्टेट्समैन ने ‘रंगभेद खेल नहीं है’ शीर्षक वाला एक लेख छापा था और इस दौरे के सभी मैचों के बहिष्कार का आह्वान किया था. उधर, दूसरे छोर वाली यानी कंजर्वेटिव विचारधारा के प्रति झुकाव रखने वाले साप्ताहिक स्पेक्टेटर का तर्क था कि खेल और राजनीति में घालमेल नहीं करना चाहिए. आखिर में दौरा हुआ और स्प्रिंगबोक्स के नाम से मशहूर दक्षिण अफ्रीकी रग्बी टीम को हर जगह विरोध प्रदर्शनों का सामना करना पड़ा. एक बार तो उनकी बस को ही बंधक बना लिया गया.

1970 के उस दौर के इंग्लैंड में क्रिकेट की दुनिया पर मार्लेबन क्रिकेट क्लब यानी एमसीसी की हुकूमत चलती थी. यह संस्था अपने मूल में ही रूढ़िवादी थी. जैसा कि इस विवाद का इतिहास लिखने वाले मार्टिन विलयमसन के शब्द हैं, ‘क्रिकेट को चलाने वाली सत्ता का रुख साफ था कि दौरा होना चाहिए. एमसीसी और आईसीसी के बीच जो कई बैठकें हुई उनका विवरण बताता है कि इनमें हिस्सा लेने वाले लोगों की बड़ी चिंता ब्रिटेन में लागू होने जा रही नई मापन व्यवस्था - मीट्रिक सिस्टम - को लेकर थी. विचार किया जा रहा था कि पिच की लंबाई के लिए 22 यार्ड्स की जगह 20.12 मीटर और गेंद के वजन के लिए साढ़े पांच आउंस के बजाय 155.8 ग्राम शब्द के इस्तेमाल जैसे बदलावों से कैसे निपटा जाएगा.’

दूसरी तरफ दक्षिण अफ्रीका से आकर इंग्लैंड में बस गए पीटर हैन जैसे रंगभेद विरोधी सामाजिक कार्यकर्ता थे जो इस दौरे को रुकवाने के लिए कृतसंकल्प थे. ताउम्र रंगभेद का विरोध करते रहे चर्चित क्रिकेट लेखक और प्रसारक जॉन एरलॉट उनके समर्थन में थे. एरलॉट ने ही डी ऑलिवेरा को इंग्लैंड बुलवाया था. उनका कहना था कि इस दौरे में उनकी जुबान और कलम खामोश रहेगी. दूसरे पत्रकारों ने भी उनका समर्थन किया. उधर, क्रिकेट के कर्ताधर्ताओं को उनकी कोई परवाह नहीं थी. 20 मई 1970 को ऐलान हुआ कि पहला मैच तय कार्यक्रम के अनुसार जून की शुरुआत में होगा.

लेकिन तीन दिन बाद अचानक ही दौरे को रद्द किए जाने की घोषणा कर दी गई. सवाल उठता है कि इंग्लिश क्रिकेट को चलाने वाले इतनी जल्दी ढीले कैसे पड़ गए.

असल में इंग्लैंड में उन दिनों लेबर पार्टी सत्ता में थी और उसके सदस्यों का एक बड़ा हिस्सा रंगभेद के विरोध में था. गृह मंत्री जेम्स कैलेगन ने आईसीसी को एक कड़ी चिट्ठी लिखी थी और उससे यह दौरा रद्द करने को कहा था. सरकार नाराज न हो जाए, इस डर से संस्था ऐसा करने पर राजी हो गई. अगर सत्ता में कंजरवेटिव पार्टी होती तो वह दौरा शायद हर हाल में होकर रहता.

काउंटी टूर्नामेंट हमेशा की तरह उस साल भी जारी थे. लेकिन सवाल था कि दक्षिण अफ्रीकी टीम का दौरा रद्द होने से हुई खाली जगह कैसे भरी जाए. फिर एक अनोखी बात हुई. बाकी दुनिया की एक टीम बनाई गई और तय हुआ कि वह इंग्लैंड के साथ पांच टेस्ट मैच खेलेगी. चर्चित शराब उत्पादक कंपनी गिन्नीज प्रायोजक के तौर पर इसके लिए 20 हजार पाउंड्स देने को तैयार हो गई जो उस समय के हिसाब से बड़ी रकम थी.

तो आज से ठीक पचास साल पहले इसी महीने कई नस्लों के मेल वाली एक शेष विश्व एकादश बनी जिसे इंग्लैंड के साथ पांच टेस्ट खेलने थे. सर्वकालिक महानतम गारफील्ड सोबर्स को इसका कप्तान बनाया गया. उनके अलावा टीम में वेस्टइंडीज के चार दूसरे खिलाड़ी भी शामिल थे. ये थे रोहन कन्हाई, क्लाइव लॉयड, लैंस गिब्स और डेरिक मरे. दक्षिण अफ्रीका के श्वेत खिलाड़ी बैरी रिचर्ड्स, ग्रीम पोलॉक, एडी बारलो, पीटर पोलॉक और माइक प्रॉक्टर भी इसमें शामिल हुए.पाकिस्तान की तरफ से इंतिखाब आलम और मुश्ताक मोहम्मद थे और आस्ट्रेलिया की ओर से ग्राहम मैकिंजी. भारत की तरफ से इस टीम में फारुक इंजीनियर थे.

मेजबान इंग्लैंड के पास इतनी बड़ी प्रतिभाएं तो नहीं थीं, लेकिन उसके तरकश में भी कुछ तीर तो थे ही. कप्तान रे इलिंगवर्थ को काफी तजुर्बा था और उन्हें बहुत चतुर रणनीतिक दिमाग माना जाता था. बल्लेबाजों की बात करें तो इंग्लैंड के पास ज्योफ बॉयकॉट और कॉलिन काउड्री थे. गेंदबाजी के मोर्चे पर जॉन स्नो और डेरेक अंडरवुड जैसे नाम थे. इंग्लैंड के विकेटकीपर एलन नॉट को उन दिनों दुनिया का सबसे अच्छा विकेटकीपर माना जाता था.

पहला टेस्ट 17 जून 1970 को लॉर्ड्स में शुरू हुआ. आखिरी टेस्ट ठीक दो महीने बाद ओवल में संपन्न हुआ. शेष विश्व एकादश ने चार मैच अपने नाम किए. इंग्लैंड ने नॉटिंघम में हुआ दूसरा टेस्ट जीता. दर्शकों ने मेहमान टीम की शानदार बल्लेबाजी का लुत्फ उठाया. सोबर्स, लॉयड और बारलो, तीनों ने दो-दो शतक लगाए. बारलो ने बढ़िया गेंदबाजी भी की और इसमें उनके हमवतन माइक प्रॉक्टर ने उनका बखूबी साथ दिया.

दक्षिण अफ्रीका ने जब 1965 में इंग्लैंड का दौरा किया था तो बाएं हाथ के बल्लेबाज ग्रीम पोलॉक ने बढ़िया प्रदर्शन किया था. इस बार भी उनसे ऐसी ही उम्मीदें थीं. पहले चार मैचों में तो वे बस ठीक-ठाक ही थे, लेकिन ओवल में उन्होंने शानदार शतक लगाकर सारी कमी पूरी कर दी. इस पारी के दौरान उन्होंने लंबे समय तक गैरी सोबर्स के साथ बल्लेबाजी की और दोनों ने देखते ही देखते 150 से ज्यादा रनों का स्कोर खड़ा कर दिया.

ग्रीम पोलॉक की उस पारी की कुछ झलकियां यूट्यूब पर भी हैं. इसके बारे में उस समय जो लिखा गया था वह पढ़कर आपको लगता है कि काश, आप यह पूरी साझेदारी देख पाते. द गार्डियन में जॉन एरलॉट ने लिखा था, ‘आखिरी सत्र के दौरान दुनिया में बाएं हाथ के दो सबसे अच्छे बल्लेबाजों का बोलबाला रहा. पहले सोबर्स, पोलॉक के हर शॉट को टक्कर देते दिखे. एक कवर ड्राइव मारता तो दूसरा भी और पहला स्क्वैयर कट लगाता तो दूसरे की तरफ से भी वही शॉट खेला जाता. दर्शकों का खूब मनोरंजन हुआ. लेकिन फिर जल्द ही सोबर्स कप्तान की भूमिका में आ गए और उन्होंने पोलॉक को खुलकर खेलने का मौका दिया. गाहे-बगाहे एक शॉट वे भी लगा देते, मानो दर्शकों को अपने कद की याद दिला रहे हों. लेकिन ज्यादातर वक्त गेंदबाज के सामने पोलॉक ही थे.’

द टाइम्स में जॉन वुडकॉक ने लिखा, ‘कुछ सालों से क्रिकेट जगत में चर्चा हो रही थी कि इन दोनों में बेहतर कौन है. और यहां वे एक साथ टेस्ट मैच खेल रहे थे और इंग्लैंड के खिलाफ शानदार फॉर्म में थे... सोबर्स ने शाम की शुरुआत हर शॉट के साथ होड़ लगाते हुए की थी, लेकिन थोड़ी ही देर बाद वे शांत हो गए ताकि पोलॉक अपना काम कर सकें. यह सिंहासन छोड़ने का नहीं बल्कि उनकी महानता का संकेत था. ’

एरलॉट निश्चित रूप से और वुडकॉक भी शायद यह जानते थे कि जो वे देख रहे हैं उसे भविष्य में समाज और खेल जगत एक ऐतिहासिक घटना के तौर पर याद करेगा. पोलॉक और सोबर्स का एक साथ क्रीज पर होना केवल मनोरंजन की बात नहीं थी. यह एक बेहतर और ज्यादा न्यायपसंद दुनिया की झलक थी. इससे पहले कभी भी ऐसा नहीं हुआ था कि कोई श्वेत दक्षिण अफ्रीकी खिलाड़ी और अश्वेत वेस्ट इंडियन खिलाड़ी किसी अंतरराष्ट्रीय मैच में एक ही टीम का हिस्सा रहे हों. पांच-पांच दक्षिण अफ्रीकी श्वेत खिलाड़ियों का बिना किसी शिकायत के सोबर्स की कप्तानी में खेलना रंगभेद के विचार और बर्ताव दोनों को अस्वीकार करने जैसा था. यहां यह याद रखना होगा कि इंग्लैंड की टीम में भी दो खिलाड़ी थे जो मूल रूप से दक्षिण अफ्रीका से ताल्लुक रखते थे - टोनी ग्रेग और बेसिल डी ऑलिवेरा. ऐसे दो खिलाड़ियों, यानी एक श्वेत और अश्वेत, का एक ही टीम में खेलना उनके मूल देश में अकल्पनीय बात थी.

अगस्त 1870 में मैं 12 साल का था. तब तक क्रिकेट का मेरा शौक दीवानगी तक पहुंच चुका था. मैंने टेस्ट मैच स्पेशल (उस समय रेडियो पर आने वाला खेल का एक चर्चित कार्यक्रम) पर इन मैचों की चर्चा सुनी थी और अखबारों में भी इनके बारे में खूब पढ़ा था. जब मैंने यह लेख लिखना शुरू किया तो मुझे यह अच्छी तरह याद था कि किसी मैच में गैरी सोबर्स और ग्रीम पोलॉक ने एक शानदार साझेदारी की थी. जरूर मैंने इस बारे में रेडियो पर सुना होगा या द क्रिकेटर में पढ़ा होगा. (मेरे पिता ने मेरे लिए इस मशहूर पत्रिका का सब्सक्रिप्शन ले लिया था). श्वेत और अश्वेत खिलाड़ियों की इस जुगलबंदी ने दूर भारत में रह रहे एक स्कूली लड़के पर गहरा असर डाला था. यह सोचकर अच्छा लगता है कि हो सकता है दक्षिण अफ्रीका में रह रहे कुछ श्वेत या अश्वेत खिलाड़ियों पर भी इसका ऐसा ही असर पड़ा हो.

इंग्लैंड और शेष विश्व एकादश के बीच हुए उन पांच मैचों को आधिकारिक टेस्ट मैचों का दर्जा दिया गया था. हालांकि बाद में आईसीसी ने इसे वापस ले लिया. लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि इन मैचों के आंकड़े खिलाड़ियों के रिकॉर्ड में नहीं जुड़े. इससे 50 साल पहले की गर्मियों में खेले गए उन मैचों की ऐतिहासिक अहमियत जरा भी कम नहीं होती. दुर्लभ ही होता है कि कोई खेल मनोरंजन के परे कुछ और भी हो जाए. उन महीनों में ऐसा ही हुआ था. वे मैच भविष्य की झलक थे.

दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ लड़ाई का ज्यादातर हिस्सा राजनीति के अखाड़े में लड़ा और जीता गया. लेकिन थोड़ी ही सही, क्रिकेट ने भी इस लड़ाई में भूमिका निभाई थी. गैरी सोबर्स को आम तौर पर रंगभेद के खिलाफ किसी अभियान के लिए याद नहीं किया जाता. बल्कि उनकी छवि राजनीति से दूर रहे एक शख्स की ही रही है. लेकिन 1970 की उन गर्मियों में वे एक राजनीतिक शख्स बन गए थे. यही बात उस श्रृंखला में उनके साथ या खिलाफ खेले बाकी खिलाड़ियों के बारे में भी कही जा सकती है.