अदम्य और उज्ज्वल

कोरोना महामारी ने जो घरबंदी की है उसने लाचारी, ऊब, एकरसता और कई बार चिढ़ उपजायी है. पर अगर उन करोड़ों भारतीय बन्धुओं का ख़याल करें जो बेघरबार, बेरोज़गार, बेराहत हो गये हैं और जिनकी घरवापसी की कोशिश हमारी व्यवस्था की क्रूरता का ताण्डव दिखा रही है तो आपको अपने घर-परिवार में बन्द रहना बड़ा सौभाग्य लगता है. करोड़ों अभागे भारतीय नागरिकों की तुलना में आप सुरक्षित और, कुल मिलाकर, सुपोषित हैं. यह कहने और स्वीकार करने में शर्म सी आती है. आपने इस सुरक्षा को लगभग अनायास पाने के लिए कुछ विशेष नहीं किया है और उन मज़दूरों-कामगारों-ग़रीबों ने ऐसी सुरक्षा न पा सकने के लिए कोई चूक नहीं की है.

इस सब गिड़चयाव के बीच जब आपको लगता है कि राजनीति, अर्थतन्त्र, सत्ता, धर्म, मीडिया आदि से सीधी-सच्ची मानवीयता गा़यब हो गयी है, तब आपको प्रायः हर दिन ऐसा कुछ पता चलता रहता है जिसमें साधारण, अक्सर अनाम और अज्ञात कुलशील लोग, इस भयावह संकट में, निजी जोखिम उठाकर, दूसरों की, बिना किसी क़िस्म का भेदभाव बरते, तरह-तरह की मदद कर रहे हैं. उनमें सभी धर्मों, जातियों, वर्गों के लोग शामिल हैं. उनमें कई परोपकारी संस्थाएं, गुरुद्वारे-मंदिर-मसजिद-गिरजाघर शामिल हैं. पर जो बात विशेष रूप से ध्यान खींचती है वह यह है कि उनमें बहुत सारे ऐसे नागरिक शामिल हैं जिन्होंने ऐसे किसी प्रयत्न या अभियान में पहले कभी कोई हिस्सा नहीं लिया था. उनमें डाक्टर, नर्सें, सरकारी अस्पतालों के अक्सर साधनहीन कर्मी सफ़ाई कर्मचारी, सब्जी वाले, छोटे दूकानदार भी शामिल हैं. अपनी बेरहमी और क्रूरता के लिए बदनाम पुलिस में भी ऐसे कई लोग हैं जो संवेदनशीलता के साथ व्यवहार और सहायता कर रहे हैं. पता नहीं यह सही है या नहीं, पर लग ऐसा रहा है कि राजनीति और मीडिया में ऐसे लोग कम नज़र आ रहे हैं.

हर दिन कोरोना से पीड़ित होने वाले और उसका शिकार होकर मरने वालों के जो आंकड़े आ रहे हैं उनके बरक़्स मानवीयता, सहायता-सहयोग-सहानुभूति और करुणा की जो न आंकी गई कहानियां सामने आती हैं उनसे हमारा मनोबल बढ़ता है और मानवीयता को बचाने, उसे इस हालात में भी सहज-सक्रिय रखने वालों के प्रति गहरी कृतज्ञता उपजती है. यह आश्वस्ति भी होती है कि आधुनिक विकास ने जिस स्वार्थी लालची हत्यारी मानसिकता को बहुत फैलाया है वह हमारी बुनियादी मानवीयता को नष्ट नहीं कर पाया है, भले उसे क्षत-विक्षत करने में उसे एक तरह की बेशरम कामयाबी मिल गयी हो.

प्रतिमानों की बहुलता

मदन सोनी एक गंभीर विचारवान् आलोचक हैं. हाल ही ही उन्होंने एक सजीव कार्यक्रम में कहा कि हमारी ज़्यादातर आलोचना कुछ रूढ़ और विजड़ित हो गये प्रतिमानों से आक्रान्‍त है और उसमें अनके तरह की श्रेष्ठ कृतियों को एक ही तराजू और बटखरों से तौलने का अनर्जित उत्साह रहता है. उनके अनुसार प्रतिमानों की बहुलता होना चाहिये क्योंकि रचनाओं में इतनी अधिक बहुलता होती है. यह भी कि जिन प्रतिमानों के आधार पर अज्ञेय श्रेष्ठ कवि सिद्ध होते हैं, उनके आधार पर मुक्तिबोध को श्रेष्ठ नहीं ठहराया जा सकता. दोनों की रचनात्मकता, दृष्टि, शैली, भाषा आदि एक-दूसरे से बहुत अलग हैं और इसलिए, उनको जांचने-परखने के प्रतिमान अलग होने चाहिये. ऐसे प्रतिमान खोजने-गढ़ने में जो बौद्धिक श्रम और जोखिम चाहिये, उससे ज़्यादातर आलोचक बचते रहे हैं.

इस मुक़ाम पर यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आलोचना अगर इस क़दर रचना-सापेक्ष हो गयी तो किसी तरह के आलोचनात्मक मतैक्य के बनने-उभरने की संभावना बहुत क्षीण हो जायेगी जबकि वस्तुतः ऐसा मतैक्य बनता रहा है. अलबत्ता यह तथ्य भी हिसाब में लेना होगा कि जिन आलोचकों को अज्ञेय श्रेष्ठ कवि लगते हैं, उनमें से कइयों को, दशकों तक मुक्तिबोध श्रेष्ठ कवि नहीं लगते रहे हैं - इसका उलट भी सच रहा है.

मदन इस मतैक्य को प्रश्नांकित करते हैं और इसे सहमति, सुसंगति आदि से बुना गया वैष्णव कर्म मानते हैं. जब रचना में मतैक्य अभीष्ट या सच नहीं है तो आलोचना में उसे क्यों अभीष्ट होना चाहिये? इसके बरक़्स वे तोड़-फोड़, विसंगति, विद्रूप आदि को सहेजने-समझने वाले शैव हस्तक्षेप का आग्रह करते हैं. हिन्दी आलोचना में जो विवाद हुए हैं वे वैष्णव और शैव दृष्टियों के बीच नहीं हुए हैं - वे अन्ततः अक्सर पक्ष या विपक्ष की मर्दुमशुमारी बनकर निरर्थक हो जाते हैं.

इसमें कोई सन्देह नहीं है कि हिन्दी रचना के मुक़ाबले हिन्दी आलोचना बहुत कम अग्रगामी रही है. उसकी चेष्टा प्रायः रचनाओं को अनुकूलित करने की रही है. यह आकस्मिक नहीं है कि पिछले दो-ढाई दशकों में आलोचना में कोई नये प्रत्यय, नयी अवधारणाएं मौलिक रूप से सामने नहीं आयी हैं. रचना के बरक़्स आलोचना में बहुलता बहुत कम है और ऐसी बहुलता का स्वीकार उससे भी कम. आलोचना में अक्सर वैसी ही रचनाओं का बोलबाला रहा है जो उससे अनुकूलित या तो पहले से हैं या होने को लालायित हैं. हिन्दी आलोचना का जो प्रतिष्ठान अकादेमिक जगत्, विचारधाराओं, पत्रिकाओं और अन्य संस्थाओं ने मिलकर गढ़ा है वह सामाजिक-राजनैतिक जीवन में मौजूद सत्ता-प्रतिष्ठानों की ही तरह असहमति को न तो जगह देता है, न उसे किसी सार्थकता में बर्दाश्त करता है.

मदन ने एक और ज़रूरी बात यह भी उठायी है कि आलोचना न सिर्फ़ रचना को देखने का काम है, उसे अपने को और अपने देखने को भी देखना चाहिये. ऐसा कम होता है और यह खेद और चिन्ता दोनों का विषय है. रचनाओं में आत्मसंघर्ष की अपेक्षा करने वाली आलोचना में आत्मसंघर्ष बहुत कम नज़र आता है. रचना में विपथ होने का साहस जब-तब दीख पड़ता है, आलोचना विपथ होने से इतना क्यों घबराती है? कृष्ण बलदेव वैद की रचनाओं के सिलसिले में मैंने हाल ही में यह कहने की जुर्रत की थी कि हिन्दी आलोचना कभी तहख़ाने में जाने की कोशिश नहीं करती, वह अक्सर अटारी पर से, दूरी और ऊंचाई से लिखी जाती है.

उधार की भाषा!

विद्यानिवास मिश्र निबन्धकार और आलोचक होने के अलावा भाषा विज्ञान के विद्वान् भी थे. हिन्दी भाषा के खुलेपन और ग्रहणशीलता का विश्लेषण करते हुए वे हिन्दी में साधारण बोलचाल का यह वाक्य उद्धृत करते थे: मैं कमरे में घुसा, कमीज़ उतारकर कुरसी पर डाल दी, खिड़की खोलकर आकाश की तरफ़ देखा और टेलीवि़जन चला दिया. उनके अनुसार इस सादे से वर्णनात्मक वाक्य में कमरा इतालवी से, कमीज़ अरबी से, कुरसी पुर्तगाली से, आकाश संस्कृत से, तरफ़ फ़ारसी से और टेलीवि़जन अंग्रेज़ी से लिये गये शब्द हैं. यह छह भाषाओं से ली गयी उधारी है. क्या इस कारण हिन्दी को उदार और आतिथेय या उधार की भाषा कहा जा सकता है?