कोरोना वायरस न सिर्फ वैज्ञानिकों और डॉक्टरों के लिए नई चुनौतियां लेकर आया है बल्कि इस वैश्विक महामारी ने तमाम अन्य क्षेत्रों के विशेषज्ञों के सामने भी अलग-अलग किस्म की चुनौतियां खड़ी कर दी हैं. कोरोना वायरस की वज़ह से विश्व भर के अलग-अलग जलवायु और संस्कृति वाले देशों में लोगों को एक साथ अपने जीवन जीने के तरीके बदलने पड़ रहे हैं. यह सब अचानक और इतने बड़े पैमाने पर हुआ है. इसके लिए न तो किसी देश के योजना विशेषज्ञ तैयार थे और न ही राजनेता व समाज के अन्य अगुआ. आज जब कई विशेषज्ञ कह रहे हैं कि यह वैश्विक महामारी बमारे आसपास एक लंबे समय तक रहने वाली है, तब अपनी जीवन शैली में परिवर्तन लाना और रोज़मर्रा के जीवन में नयी सावधानियां बरतना एक सामान्य और जरूरी चीज़ हो गया है.

कोरोना वायरस की वैश्विक महामारी के लगातार फैलाव को देखते हुए 24 मार्च, 2020 को संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण कार्यक्रम ने दुनिया भर की सरकारों से कोविड-19 से सम्बंधित कचरे के सावधानीपूर्वक निस्तारण की अपील की. संयुक्त राष्ट्र ने सन 1992 से प्रभाव में आये बेसल संधिपत्र (Basel Convention) का हवाला देते हुए इसके लिए दिशानिर्देश भी जारी किये हैं. खतरनाक कचरे के आवागमन से जुड़े इस संधिपत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में दूसरे देशों के अलावा भारत भी शामिल है. संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि स्वास्थ्य और पर्यावरण पर इस महामारी के प्रभाव को कम से कम करने के लिए इस प्रकार के जरूरी कदम उठाने ही होंगे.

सीवेज की समस्या

विशेषज्ञों का मानना है कि कोरोना वायरस वैश्विक महामारी में अप्रभावशाली और ख़राब सीवेज-प्रबंधन बीमारी को बहुत तेज़ी से फैलाने में सहायक होगा. ‘केन्द्रीय प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड’ के आंकड़ों के अनुसार मार्च 2015 में देश के शहरी इलाकों से लगभग 619,480 लाख लीटर सीवेज पानी प्रतिदिन निकलता था. इसमें से लगभग 232,770 लाख लीटर गंदे पानी के शोधन की क्षमता ही हमारे पास थी. यानी कुल सीवेज के सिर्फ 37 प्रतिशत का ही शोधन हम कर पाते हैं. वैज्ञानिक रिपोर्ट्स के अनुसार कोविड-19 वायरस मल में ही सबसे अधिक लम्बे समय यानी एक हफ्ते से भी अधिक समय तक सक्रिय रह सकता है. ऐसे में कन्टेनमेंट क्षेत्रों और क्वारंटीन केन्द्रों से निकलने वाला सीवेज पानी कोविड-19 वायरस के फैलने की एक बड़ी वजह बन सकता है.

बायोमेडिकल कचरा

चीन के वूहान शहर में कोरोना वायरस के लिए न सिर्फ अस्पताल बनाया गया बल्कि वहां मेडिकल कचरे से निपटने के लिए एक ‘विशेष कोविड-19 कचरा प्रबंधन संयंत्र’ भी लगाया गया था. इस संयंत्र के साथ अन्य 46 अस्थाई कचरा संशोधन केंद्र भी बनाये गए थे. इसकी वजह यह थी कि वूहान के अस्पतालों में कोरोना वायरस वायरस से संक्रमित लोगों के इलाज के दौरान सामान्य दिनों की अपेक्षा लगभग छः गुना मेडिकल कचरा उत्पन्न हो रहा था.

कन्टेनमेंट क्षेत्रों और क्वारंटीन केन्द्रों से निकले कचरे के साथ-साथ कोविड-19 मरीजों का इलाज कर रहे अस्पतालों से निकले कचरे का उचित प्रबंधन अत्यंत आवश्यक और महत्वपूर्ण है ताकि इससे अन्य लोग संक्रमित न हों. इस कचरे में मरीजों का थूक, मल, परीक्षण के नमूने का बचा हुआ अपशिष्ट, माइक्रोबायलोजिकल और बायोटेक्निकल कचरा, ख़राब हो चुकी दवाइयां, ठोस, तरल और रासायनिक अपशिष्ट, फेंके हुए मास्क और ग्लव्स, इस्तेमाल की हुई पीपीई यानी व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण और अन्य सुरक्षा किट्स आदि शामिल होते हैं.

यह सब इस प्रकार का कचरा है जो महामारी के और अधिक फैलने से जुड़े गंभीर खतरे उत्पन्न कर कोविड-19 के खिलाफ छेड़ी गई लड़ाई को कमज़ोर कर सकता है. आंकड़ों के अनुसार सन 2017 तक भारत में उत्पन्न होने वाले लगभग 200,000 टन बायोमेडिकल कचरे का लगभग 78 फीसदी भाग देश की “कॉमन बायो मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट फैसिलिटी” (CBWTF) निस्तारित कर रही थी. बाकी कचरा या तो अन्य विभाग निस्तारित करते थे या उसे ज़मींदोज कर दिया जाता था. कोविड-19 की वैश्विक महामारी से इस कचरे की उत्पादन मात्रा में कई गुना इजाफा हुआ है.

इस प्रकार के कचरे से संक्रमित होने की सबसे अधिक आशंका कचरा उठाने वालों और उसे फेंकने के स्थान के आस-पास रह रहे लोगों को है. कचरा उठाने वालों के स्वास्थ्य की सुरक्षा कोविड-19 महामारी के समय में चिंता का विषय होना चाहिए. मेडिकल स्टाफ के साथ-साथ ये भी हमारे सबसे महत्वपूर्ण ‘कोरोना योद्धाओं’ में से एक हैं. कचरा उठाने वाले कर्मचारियों को इंग्लैंड में “मुख्य-कार्यकर्ताओं” का विशेष दर्जा दिया गया है.

कोविड-19 कचरा प्रबंधन

कोविड कचरे की समस्या से निबटने के लिए केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने हाल ही में कुछ दिशानिर्देश जारी किये हैं, जिनका पालन बेहद आवश्यक है. इन दिशा निर्देशों में कहा गया है कि:

  • कोविड-19 के मरीजों वाले एकांत शिविरों और अस्पतालों में कचरा इकठ्ठा करने के लिए दो-परतों वाले झोलों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए, जिससे कि रिसाव की संभावना न रहे.
  • कोविड-19 से सम्बंधित कचरा “कॉमन बायो मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट फैसिलिटी” (CBWTF) भेजे जाने से पहले इस तरह के कचरे के झोलों पर कोविड-19 का स्टीकर लगा होना चाहिए. इस कचरे को सामान्य कचरे से अलग किसी अन्य कमरे में रखा जाना चाहिए. इस प्रकार इस कचरे को सीधे “कॉमन बायो मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट फैसिलिटी” के कर्मियों को सौंपा जाना चाहिए ताकि संक्रामक कचरे को प्रमुखता और प्राथमिकता के साथ निस्तारित किया जा सके.
  • विभिन्न प्रदेशों में बने कोविड-19 एकांत शिविरों आदि की जानकारी प्राथमिकता के साथ प्रादेशिक प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड्स को भेजी जानी चाहिए. कोविड-19 वाले कचरे के ढ़ोने के लिए अलग वाहनों का इस्तेमाल होना चाहिए जिनके शुद्धिकरण के लिए 1प्रतिशत हाइपोक्लोराईट विलयन का इस्तेमाल अति-आवश्यक है.
  • कोविड के कचरे को इकठ्ठा करने के लिए प्रदेशों को तुरंत विशेष सफाई कर्मचारियों को नियुक्त करना चाहिए जो कि प्राथमिकता के आधार पर कोविड-कचरा अस्थाई कचरा भण्डारण केन्द्रों तक पहुंचा सकें.

इसके अलावा जिन कोलोनियों या क्षेत्रों को कन्टेनमेंट क्षेत्र बनाया गया है उनके घरों से निकलने वाले कचरे को “हेजर्डस वेस्ट ट्रीटमेंट स्टोरेज एंड डिस्पोजल फैसिलिटी” (HWTSDFs) के ज़रिये स्थानीय शहरी संस्थाओं की सहायता से निस्तारित किया जाना आवश्यक हो गया है.

इसी प्रकार वे अन्य स्थान जहां कोविड-19 के मरीजों से जुड़ा कचरा उत्पन्न होता है वहां भी इसी तरह के दिशानिर्देशों के पालन के आदेश दिए गए हैं. इन दिशा-निर्देशों को नागरिकों को जानना भी ज़रूरी है ताकि वे कोविड-19 कचरा प्रबंधन में सरकारी कर्मचारियों की मदद कर सकें. अब जितना आवश्यक मास्क पहनना हो गया है, इस्तेमाल किये गए मास्क का सही तरीके से निस्तारण भी उतना ही आवश्यक है. नहीं तो कई इलाकों में हो सकता है कि मास्क पहनने का कोई मतलब ही न रह जाये.