महात्मा गांधी ने हिंद स्वराज को इंग्लैंड से साउथ अफ्रीका लौटते समय सन् 1909 में पानी के जहाज पर लिखा था. इस पुस्तक में एक पाठक की भूमिका निभाते हुए वे तरह-तरह के सवाल करते हैं और एक संपादक की भूमिका में उनके जवाब देते हैं. यह सबसे पहले उनके अखबार इंडियन ओपिनियन में प्रकाशित हुई थी. 1921 में इस किताब के बारे में उन्होंने लिखा कि इसे उन्होंने ‘हिन्दुस्तानियों के हिंसावादी पंथ को और उसी विचारधारा वाले दक्षिण अफ्रीका के एक वर्ग को दिये गये जवाब के रूप में’ लिखा था.

पाठक: हिन्दुस्तान की शांति के बारे में मेरा जो मोह था वह आपने ले लिया. अब तो याद नहीं आता कि आपने मेरे पास कुछ भी रहने दिया हो.

संपादक: अब तक तो मैंने आपको सिर्फ धर्म की दशा का ही खयाल कराया है. लेकिन हिंदुस्तान रंक क्यों है, इस बारे में मैं अपने विचार आपको बताऊंगा तब तो शायद आप मुझसे नफ़रत ही करेंगे; क्योंकि आज तक हमने और आपने जिन चीज़ों को लाभकारी माना है, वे मुझे तो नुकसानदेह ही मालूम होती हैं.

पाठक: वे क्या हैं?

संपादक: हिन्दुस्तान को रेलों ने, वकीलों ने और डॉक्टरों ने कंगाल बना दिया है. यह एक ऐसी हालत है कि अगर हम समय पर नहीं चेतेंगे, तो चारों ओर से घिर कर बरबाद हो जायेंगे.

पाठक: मुझे डर है कि हमारे विचार कभी मिलेंगे या नहीं. आपने तो जो कुछ अच्छा देखने में आया है और अच्छा माना गया है, उसी पर धावा बोल दिया है! अब बाकी क्या रहा?

संपादक: आपको धीरज रखना होगा. सभ्यता नुकसान करने वाली कैसे है, यह तो मुश्किल से मालूम हो सकता है. डॉक्टर आपको बतलायेंगे कि क्षय का मरीज़ मौत के दिन तक भी जीने की आशा रखता है. क्षय का रोग बाहर दिखाई देने वाली हानि नहीं पहुंचाता और वह रोग आदमी को झूठी लाली देता है. इससे बीमार विश्वास में बहता रहता है और आखिर डूब जाता है. सभ्यता का भी ऐसा ही समझिए. वह एक अदृश्य रोग है. उससे चेत कर रहिए.

पाठक: अच्छा, तो अब आप रेल-पुराण सुनाइए.

संपादक: आपके दिल में यह बात तुरंत उठेगी कि अगर रेल न हो तो अंग्रेज़ों का काबू हिन्दुस्तान पर जितना है उतना तो नहीं ही रहेगा. रेल से महामारी फैली है. अगर रेलगाड़ी न हो तो कुछ ही लोग एक जगह से दूसरी जगह जायेंगे और इस कारण संक्रामक रोग सारे देश में नहीं पहुंच पायेंगे. पहले हम कुदरती तौर पर ही ‘सेग्रेगेशन’ सूतक पालते थे. रेल से अकाल बढ़े हैं, क्योंकि रेलगाड़ी की सुविधा के कारण लोग अपना अनाज बेच डालते हैं. जहां मंहगाई हो वहां अनाज खिंच जाता है, लोग लापरवाह बनते हैं और उससे अकाल का दुख बढ़ता है. रेल से दुष्टता बढ़ती है. बुरे लोग अपनी बुराई तेज़ी से फैला सकते हैं. हिन्दुस्तानियों में जो पवित्र स्थान थे, वे अपवित्र बन गये हैं. पहले लोग बड़ी मुसीबत से वहां जाते थे. ऐसे लोग वहां सच्ची भावना से ईश्वर को भजने जाते थे; अब तो ठगों की टोली सिर्फ ठगने के लिए वहां जाती है.

पाठक: यह तो आपने इकतरफा बात कही. जैसे खराब लोग वहां जा सकते हैं वैसे अच्छे भी तो जा सकते हैं. वे क्यों रेलगाड़ी का पूरा लाभ नहीं लेते?

संपादक: जो अच्छा होता है वह बीरबहूटी की तरह धीरे चलता है. उसकी रेल से नहीं बनती. अच्छा करने वाले के मन में स्वार्थ नहीं रहता. वह जल्दी नहीं करेगा. वह जानता है कि आदमी पर अच्छी बात का असर डालने में बहुत समय लगता है. बुरी बात ही तेज़ी से बढ़ सकती है. घर बनाना मुश्किल है, तोड़ना सहज है. इसलिए रेलगाड़ी हमेशा दुष्टता का ही फैलाव करेगी, यह बराबर समझ लेना चाहिए. उससे अकाल फैलेगा या नहीं, इस बारे में कोई शास्त्रकार मेरे मन में घड़ी-भर शंका पैदा कर सकता है; लेकिन रेल से दुष्टता बढ़ती है यह बात जो मेरे मन में जम गई है वह मिटनेवाली नहीं है.

पाठक: लेकिन रेल का सबसे बड़ा लाभ दूसरे सब नुकसानों को भुला देता है. रेल है तो आज हिन्दुस्तानियों में एक-राष्ट्र का जोश देखने में आता है. इसलिए मैं तो कहूंगा कि रेल के आने से कोई नुकसान नहीं हुआ.

संपादक: यह आपकी भूल ही है. आपको अंग्रेज़ों ने सिखाया है कि आप एक-राष्ट्र नहीं थे और एक-राष्ट्र बनने में आपको सैकड़ों बरस लगेंगे. यह बात बिलकुल बेबुनियाद है. जब अंग्रेज़ हिन्दुस्तान में नहीं थे तब हम एक-राष्ट्र थे, हमारे विचार एक थे, हमारा रहन-सहन एक था. तभी तो अंग्रेज़ों ने यहां एक-राज्य कायम किया. भेद तो हमारे बीच में बाद में उन्होंने पैदा किये.

पाठक: यह बात मुझे ज्यादा समझनी होगी.

संपादक: मैं जो कहता हूं वह बिना सोचे-समझे नहीं कहता. एक-राष्ट्र का यह अर्थ नहीं कि हमारे बीच कोई मतभेद नहीं था; लेकिन हमारे मुख्य लोग पैदल या बैलगाड़ी में हिन्दुस्तान का सफ़र करते थे, वे एक-दूसरे की भाषा सीखते थे और उनके बीच कोई अन्तर नहीं था. जिन दूरदर्शी पुरुषों ने रामेश्वरम्, जगन्नाथपुरी और हरद्वार की यात्रा ठहराई, उनका आपकी राय में क्या ख़याल होगा? वे मूर्ख नहीं थे, यह तो आप कबूल करेंगे. वे जानते थे कि ईश्वर-भजन घर बैठे भी होता है. उन्हीं ने हमें यह सिखाया है कि मन चंगा तो कठौती में गंगा. लेकिन उन्होंने सोचा कि कुदरत ने हिन्दुस्तान को एक-देश बनाया है, इसलिए वह एक-राष्ट्र होना चाहिए. इसलिए उन्होंने अलग-अलग स्थान तय करके लोगों को एकता का विचार इस तरह दिया, जैसा दुनिया में और कहीं नहीं दिया गया है. दो अंग्रेज़ जितने एक नहीं हैं उतने हम हिन्दुस्तानी एक थे और एक हैं. सिर्फ हम और आप जो खुद को सभ्य मानते हैं उन्हीं के मन में ऐसा आभास (भ्रम) पैदा हुआ कि हिन्दुस्तान में अलग-अलग राष्ट्र हैं. रेल के कारण हम अपने को अलग राष्ट्र मानने लगे और रेल के कारण एक-राष्ट्र का खयाल फिर से हमारे मन में आने लगा, ऐसा आप मानें तो मुझे हर्ज नहीं है. अफ़ीमची कह सकता है कि अफीम के नुकसान का पता मुझे अफीम से चला, इसलिए अफीम अच्छी चीज़ है. यह सब आप अच्छी तरह सोचिए. अभी आपके मन में और भी शंकाएं उठेंगी. लेकिन आप खुद उन सबको हल कर सकेंगे.