प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना वायरस संकट से जूझ रही अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए 20 लाख करोड़ रु के आर्थिक पैकेज का ऐलान किया है. मंगलवार को देश के नाम अपने संबोधन में उनका कहना था, ‘यह पैकेज 2020 में देश की विकास यात्रा को नई गति देगा.’ नरेंद्र मोदी ने आगे कहा कि इस पैकेज में आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को पूरा करने के लिए सभी क्षेत्रों पर बल दिया गया है. प्रधानमंत्री का कहना था, ‘ये आर्थिक पैकेज हमारे कुटीर उद्योग, लघु उद्योग और मंझोले उद्योग (एमएसएमई) के लिए है जो करोड़ों लोगों की आजीविका का साधन हैं, जो आत्मनिर्भर भारत के हमारे संकल्प का मजबूत आधार हैं. ये आर्थिक पैकेज देश के उस श्रमिक के लिए है, देश के उस किसान के लिए है जो हर स्थिति, हर मौसम में देशवासियों के लिए परिश्रम कर रहा है. ये आर्थिक पैकेज हमारे देश के मध्यम वर्ग के लिए है, जो ईमानदारी से टैक्स देता है, देश के विकास में अपना योगदान देता है.’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ऐलान के बाद आज वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 20 लाख करोड़ रु के उस पैकेज के कुछ अहम बिंदुओं के बारे में जानकारी दी. आज की उनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों (एमएसएमई) पर केंद्रित रही. उन्होंने कहा कि अगले कुछ दिनों में और भी क्षेत्रों के लिए बड़े ऐलान होंगे.

कोरोना वायरस संकट शुरू होने से पहले ही अर्थव्यवस्था मुश्किलों से जूझ रही थी. माना जा रहा है कि इस संकट ने उन मुश्किलों को कई गुना बढ़ा दिया है. सरकार का खर्च पहले ही आमदनी से ज्यादा है. ऐसे में सवाल उठता है कि नए आर्थिक पैकेज का पैसा कहां से आएगा. सवाल यह भी है कि वह पैसा कहां जा सकता है.

20 लाख करोड़ रु के इस पैकेज के एक बड़े हिस्से का क्रियान्वयन पहले ही हो चुका है. उदाहरण के लिए इसी साल फरवरी, मार्च और अप्रैल के महीनों में भारतीय रिजर्व बैंक कई उपायों के जरिये वित्तीय तंत्र में आठ लाख करोड़ रु से ज्यादा की अतिरिक्त नकदी डाल चुका है. जानकारों के मुताबिक सरकार इसे भी आर्थिक पैकेज का हिस्सा मान सकती है. इसके अलावा 27 मार्च को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 1.7 लाख करोड़ रु के जिस आर्थिक पैकेज का ऐलान किया था वह भी 20 लाख करोड़ रु के पैकेज का ही हिस्सा है. यह रकम मोटा-मोटी 10 लाख करोड़ रु बैठती है. यानी बाकी बचे 10 लाख करोड़ रु जिनके बारे में वित्त मंत्री आज ऐलान करेंगी.

सवाल उठता है कि यह पैसा कहां से आएगा. पहला विकल्प तो सरकार ने ही साफ कर दिया है. उसने कुछ दिन पहले ही इस वित्तीय वर्ष के लिए तय उस अनुमानित रकम के आंकड़े में बदलाव किया है जो वह उधार के रूप में बाजार से उठाने वाली है. पहले यह आंकड़ा 7.8 लाख करोड़ रुपये था जिसे अब 12 लाख करोड़ रु कर दिया गया है. यानी कि 4.2 लाख करोड़ की बढ़ोत्तरी. सरकार यह पैसा लघु या दीर्घकालिक बॉन्ड बेचकर जुटाती है जिन्हें बैंक और एलआईसी जैसी संस्थाएं खरीदती हैं. इस संबंध में जारी रिजर्व बैंक के बयान में कहा गया था कि कोरोना वायरस संकट के चलते उधारी के आंकड़े में यह बदलाव जरूरी हो गया था.

कुछ विशेषज्ञों के मुताबिक बाजार से पैसा उठाने के अलावा सरकार उस पैसे का भी इस्तेमाल कर सकती है जो खर्च हुए बिना उसके पास यूं ही पड़ा हो. शिक्षा या स्वच्छ भारत अभियान जैसे कई सेस या उपकर हैं जो आयकर और अन्य करों का ही एक हिस्सा होते हैं. इस आपात स्थिति में उन्हें खर्च किया जा सकता है. कुछ महीने पहले ही खबर आई थी कि उपकरों के रूप में वसूली गई 3.59 लाख करोड़ रु की रकम खर्च ही नहीं हुई है.

सरकार के लिए एक अतिरिक्त आमदनी की राह कच्चे तेल ने भी खोली है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में बीते कुछ समय से इसकी कीमतें गिरती गई हैं. वैसे तो भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों के उतार-चढ़ाव से ही जोड़ दी गई हैं, लेकिन हाल के दिनों में सरकार ने एक्साइज ड्यूटी बढ़ाकर तेल की कीमतों में आई कमी का पूरा फायदा अपनी तरफ मोड़ने की व्यवस्था कर दी है. अभी तो लॉकडाउन के चलते उसे यह फायदा नहीं हो रहा होगा, लेकिन आर्थिक गतिविधियां शुरू होने लगीं और तेल की कीमतों में कोई तीखी बढ़ोतरी नहीं हुई तो जल्द ही सरकार के पास पैसा जुटाने का एक बड़ा विकल्प यह भी होगा. कहा जा रहा है कि हाल में एक्साइज ड्यूटी में हुई दो बढ़ोतरियों से सरकार को करीब दो लाख करोड़ रु का अतिरिक्त राजस्व हासिल होगा.

इसके अलावा एक रास्ता प्रत्यक्ष कर जैसे कि इनकम टैक्स का भी है. हालांकि अभी की स्थिति में इसे आदर्श नहीं कहा जा सकता, लेकिन जानकार मानते हैं कि अर्थव्यवस्था के उबरने की शुरूआत होने के साथ ही सालाना 20 लाख से ज्यादा की आय वाले लोगों पर कोविड उपकर लगाया जा सकता है. एक अन्य रास्ता विश्व बैंक या अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थाओं से कर्ज लेने का भी है, लेकिन यह आखिरी विकल्प ही होना चाहिए.

जानकारों के मुताबिक अगर सरकार जितना भी सही मायने में खर्च करना चाहती है - जो कि प्रभावी तौर पर शायद 10 लाख करोंड़ रुपयों से कम ही होगा - उसका समझदारी से इस्तेमाल करे तो इसका ‘मल्टीप्लायर इफेक्ट’ जीवनदायी हो सकता है. अर्थशास्त्र में यह स्थिति तब होती है जब आय से मांग, उससे उपभोग, उससे आय और फिर इस आय से दोबारा मांग, उपभोग और आय बढ़ने का एक चक्र चलने लगता है. एक वर्ग का मानना है कि अभी कुछ समय गरीब मजदूरों या किसानों के खाते में प्रत्यक्ष नकदी हस्तांतरण यानी सीधे पैसे भेजकर मांग बढ़ाई जा सकती है. यह उस हालत में तो बहुत ही महत्वपूर्ण है जब तमाम जानकार कह रहे हैं कि वित्तीय वर्ष 2020-21 में भारतीय अर्थव्यवस्था 0.4 फीसदी तक सिकुड़ सकती है.

जानकारों के मुताबिक नकदी हस्तांरण के बाद बचे पैसे को कारोबार जगत के लिए इस तरह से इस्तेमाल किया जा सकता है कि इसका अधिकतम लाभ हो. उदाहरण के लिए सरकार कुछ विशेष क्षेत्रों में ऐसा कर सकती है कि वह कंपनियों द्वारा न लौटाई जा सकी कर्ज की रकम का 10 फीसदी खुद वहन कर ले. इससे बैंक ज्यादा कर्ज देने के लिए प्रोत्साहित होंगे क्योंकि आज एक बड़ी समस्या यह भी है कि पैसा डूबने और बैलेंस शीट खराब होने की चिंता में वे कर्ज देना ही नहीं चाहते. महामारी से सबसे बुरी तरह जूझ रही कंपनियों के पास पैसा आएगा तो उनकी हालत सुधरेगी और आगे के लिए आसार बेहतर होंगे. सरकार यही काम बैंकों के पुनर्पूंजीकरण के जरिये यानी उनमें पैसा डाल कर भी सकती है जैसा उसने हाल में किया भी है.

जानकारों के मुताबिक अभी सबसे पहली जरूरत डेढ़ महीने से थमी अर्थव्यवस्था को आईसीयू से निकालकर वार्ड में शिफ्ट करने की है. उनका यह भी कहना है कि अभी की स्थिति में सरकार इससे ज्यादा करने की स्थिति में है भी नहीं क्योंकि उसकी अपनी कमाई का हाल पहले से ही अच्छा नहीं है. यानी वित्तीय लिहाज से देखें तो वह इस स्थिति में नहीं है कि हाथ खोलकर खर्च कर सके.