कोविड -19 के लक्षण वाले लोगों की सक्रिय पहचान करने के लिए हर जिले में घर-घर जाकर निगरानी करें. परीक्षणों के परिणामों की प्रतीक्षा किए बिना ऐसे लोगों को जल्द से जल्द क्वारंटीन करें. अगर किसी जिले में ऐसा करने के 14 दिनों बाद कोविड -19 के मामलों में कम से कम 40 फीसदी की गिरावट आती है और वहां की चिकित्सा का बुनियादी ढांचा भविष्य में इस तरह के नये मामलों से निपटने के लिए तैयार है, केवल तब ही लॉकडाउन को ढीला करें.

हर जिले में लॉकडाउन तभी उठाया जा सकता था जब ये शर्तें पूरी हो जाएं. भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने सरकार को यह सलाह दी थी. आर्टिकल 14 ने अप्रैल के पहले सप्ताह में सरकार को आईसीएमआर द्वारा दी गई एक प्रेजेंटेशन की समीक्षा की. इसमें दुनिया के सबसे बड़े और सख्त लॉकडाउन को हटाने के मानक निर्धारित किए गये थे.

आईसीएमआर के वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी थी कि “केवल सबसे अच्छा यही किया जा सकता है” और “मामले फिर से बढ़ने लगेंगे अगर ऐसा नहीं किया गया.” उन्होंने यह भी कहा कि “स्थानीय निगरानी और डेटा के बिना लॉकडाउन को ढीला करने पर विचार नहीं किया जा सकता है.”

आईसीएमआर के प्रेजेंटेशन में लॉकडाउन को हटाने का निर्णय लेने में प्रशासन की मदद के लिए एक फ्लोचार्ट भी था.

दो एक्सटेंशंस और छह सप्ताह के लॉकडाउन के बावजूद, सरकार ने आईसीएमआर के घर-घर जाकर निगरानी के सुझाव पर अमल नहीं किया है और न ही लॉकडाउन को उठाने के लिए उसके “डिसीजन-मेकिंग ट्री” (एक तरह का फ्लोचार्ट) की ही मदद ली गई है. इसके बजाय, उसने लॉकडाउन के असर का आकलन करने और देश भर के जिलों में छूट देने का निर्णय लेने के लिए अपारदर्शी तरीके से फैसले लिये हैं. इनके बारे में पूरी जानकारी राज्य सरकारों को भी नहीं दी गई है.

विशेषज्ञों की सलाह की अनदेखी का नतीजा तालाबंदी के बावजूद कोविड-19 के मामलों में भारी उछाल के रूप में देखने को मिला है.

जब 24 मार्च को तालाबंदी शुरू हुई, तब तक कोविड-19 के 618 सक्रिय मामले ही सामने आये थे. 11 मई तक यह आंकड़ा 67,000 हो गया जो 10,841 फीसदी की वृद्धि है. 7 मई को, दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और अहमदाबाद सहित 15 प्रमुख शहरों में कुल सक्रिय मामले देश भर के कुल मामलों के 60 फीसदी थे. इन सभी शहरों में अभी लॉकडाउन है लेकिन फिर भी, मामले लगातार बढ़ रहे हैं. मुंबई में 67 मामलों के साथ लॉकडाउन शुरू हुआ था जिसने 11 मई तक 19,402 फीसदी की बढ़ोत्तरी के साथ 13,000 का आंकड़ा छू लिया. दिल्ली में शुरुआत में सिर्फ 35 सक्रिय मामले थे जो 11 मई को 7,233 हो गये. यानी 20,565 फीसदी की वृद्धि. अहमदाबाद में 25 मार्च को 14 मामलों के बारे में पता था जो 41557 फीसदी की वृद्धि के साथ 11 मई को 5,818 पर पहुंच गये.

इस बीच, महाराष्ट्र के अधिकारियों ने आखिरकार यह स्वीकार कर लिया कि राज्य के कुछ हिस्सों में सामुदायिक संक्रमण (कम्यूनिटी ट्रांसमिशन) हो रहा है. ओडिशा में कोविड -19 के मामले एक सप्ताह में दोगुने हो गए. 24 अप्रैल को किया गया केंद्र सरकार का यह दावा कि भारत में 16 मई तक भारत में नये मामले दर्ज होने बंद हो जाएंगे, भी गलत साबित हुआ है.

30 अप्रैल को जारी स्वास्थ्य मंत्रालय के आदेश के अनुसार, केंद्र ने चार मापदंडों के आधार पर जिलों को रेड, ऑरेंज या ग्रीन ज़ोंस के रूप में बांटकर लॉकडाउन को आसान बनाने का निर्णय लिया - कोविड-19 के सक्रिय मामले, मामलों के दोगुना होने की दर, परीक्षणों की संख्या और निगरानी से मिला फीडबैक. रेड ज़ोन में लॉकडाउन के सख्त प्रतिबंध लागू होते हैं और ग्रीन ज़ोन में सबसे कम.

आर्टिकल 14 ने भारत के स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन, स्वास्थ्य सचिव प्रीति सूदन, आईसीएमआर के महानिदेशक डॉ बलराम भार्गव और आईसीएमआर के महामारी विज्ञान और संचारी रोग विभाग के प्रमुख रमन गंगाखेडकर से ज़ोनिंग नीति के लिए मंत्रालय द्वारा उपयोग में लाये गये मापदंडों के बारे में जानकारी मांगी थी. और इस बारे में भी कि आईसीएमआर की सलाह क्यों नहीं मानी गई? स्वास्थ्य सचिव ने इस ईमेल को मंत्रालय और आईसीएमआर में दूसरे लोगों को फॉरवर्ड कर दिया और इसे हमें भी कॉपी किया, लेकिन उन्होंने इसका अब तक कोई जवाब नहीं दिया है. अगर वे ऐसा करते हैं तो इस स्टोरी को अपडेट कर दिया जाएगा.

30 अप्रैल के अपने आदेश में, सरकार ने यह नहीं बताया कि प्रतिबंधों को उठाने के लिए इन चार मापदंडों का किस तरह से उपयोग किया जाएगा. स्वास्थ्य मंत्रालय के आदेश में केवल यह कहा गया था कि “फील्ड पर मिले फीडबैक और राज्य स्तर पर किये गये आकलन के आधार पर, राज्य सरकारें रेड या ऑरेंज ज़ोन्स की संख्या बढ़ा भी सकती हैं. लेकिन वे स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा घोषित रेड /ऑरेंज जोन वाले जिलों को उनसे नीचे वाली कैटेगरी में नहीं डाल सकती हैं.”

एक दिन बाद, 1 मई को, गृह मंत्रालय ने लॉकडाउन को आगे बढ़ाते हुए, अपनी बात को फिर दोहराया - “राज्य और केंद्रशासित प्रदेश किसी भी ऐसे जिले का वर्गीकरण कम नहीं कर सकते हैं, जो कि स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा रेड जोन (हॉटस्पॉट्स) और ऑरेंज जोन की सूची में शामिल है.’’ इससे भी यह पता नहीं चला कि ये फैसले किस आधार पर लिए गए?

मौकों को यों ही जाने देना

पिछले महीने की गई रिपोर्टर्स कलेक्टिव की एक इन्वेस्टिगेशन बताती है कि कैसे आईसीएमआर ने अप्रैल के पहले सप्ताह में सरकार को चेतावनी दी थी कि भारत में वायरस का बड़े पैमाने पर “कम्यूनिटी ट्रांसमिशन” होना निश्चित है और “लॉकडाउन का सबसे अच्छा उपयोग” सिर्फ यही है कि सरकार इसका इस्तेमाल खुद को तैयार करने के लिए करे. इस पड़ताल के मुताबिक आईसीएमआर का कहना था कि अगर सरकार ने कोरोना संकट से निपटने के लिए कुछ दूसरे जरूरी कदम नहीं उठाये तो लॉकडाउन से देश भर में संक्रमित लोगों की कुल संख्या में कोई फर्क नहीं पड़ेगा, बस ऐसा थोड़े ज्यादा समय में होगा.

आईसीएमआर ने इसके लिए कई वैज्ञानिक तरीके सुझाए थे. मसलन घर-घर जाकर निगरानी की जाए और कोविड-19 के लक्षणों वाले हर दो में से एक संदिग्ध को क्वारंटीन करने के लिए एक सामुदायिक व्यवस्था बनाई जाए. वैज्ञानिकों का कहना था कि इन उपायों के बिना लॉकडाउन के फायदे ‘अस्थाई; होंगे.

इन सिफारिशों से पहले भी सरकार पूरे देश में लॉकडाउन न करने की उसकी वैज्ञानिकों की चेतावनी को दरकिनार कर चुकी थी. वैज्ञानिकों ने फरवरी में ही कह दिया था कि चीन की तर्ज पर लॉकडाउन हुआ तो इसके सामाजिक, आर्थिक और मानसिक प्रभाव लंबे तक रहेंगे. उनका सुझाव था कि इसके बजाय सरकार समय रहते स्वास्थ्य से जुड़ा जरूरी ढांचा बढ़ाने के अलावा निगरानी की एक सामुदायिक व्यवस्था बनाने और क्वारंटीन सुविधाएं तैयार करने पर ध्यान दे ताकि इस महामारी से लड़ा जा सके.

लेकिन सरकार ने इन चेतावनियों पर ध्यान नहीं दिया और 24 मार्च को ऐलान कर दिया कि अगले चार घंटे के भीतर देशव्यापी लॉकडाउन होने जा रहा है. इसने गरीबों और मजदूरों के लिए खाने और आजीविका का संकट पैदा कर दिया.

जब लॉकडाउन तय हो गया तो आईसीएमआर के वैज्ञानिकों ने इसके दौरान सरकार को कई दूसरे वैज्ञानिक उपायों का सुझाव दिया. उनका कहना था कि लॉकडाउन का ज्यादा से ज्यादा फायदा उठाने के लिए ये उपाय जरूरी हैं. उनके मुताबिक इनसे देश कोरोना वायरस के व्यापक संक्रमण - जो कुछ विशेषज्ञों के मुताबिक शुरू हो चुका है - की स्थिति के लिए तैयार किया जा सकता है. वैज्ञानिकों ने सुझाव दिया कि आखिर में लॉकडाउन से बाहर आने के लिए ‘डिसीजन मेकिंग ट्री’ होना चाहिए. सरकार ने अभी तक इन उपायों पर अमल नहीं किया है.

अब बीते एक महीने के दौरान सरकार द्वारा बार-बार जारी किए जा रहे आदेशों और दिशा-निर्देशों को देखें तो साफ होता है कि सरकार आईसीएमआर के सुझाए वैज्ञानिकों उपायों को लागू करने में नाकाम रही है. इसके बजाय उसने कुछ होने पर पर प्रतिक्रिया देने वाली रणनीति अपना ली है.

पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष और कोविड-19 पर बनी नेशनल टास्क फोर्स के सदस्य के श्रीनाथ रेड्डी कहते हैं, ‘भले ही इसका अभी कोई इलाज न हो, लेकिन यदि आप इसके मामले खोजना और मरीजों को आइसोलेट करना चाहते हैं तो यह महत्वपूर्ण है कि आप पहले बीमारी को पहचानें. यही वजह है कि पूरे जोन पर निगरानी रखना बेहतर है.’

वैज्ञानिक सलाह न मानना

नीति आयोग के सदस्य विनोद के पॉल ने अप्रैल के पहले हफ्ते में सरकार को आईसीएमआर के ‘डिसीजन मेकिंग ट्री’ की जानकारी दे दी थी. उनका कहना था कि वैज्ञानिकों ने जिन उपायों (घर-घर जाकर निगरानी और क्वांरटीन रणनीति) का सुझाव दिया है उनकी तैयारी करने में सरकार को अभी एक और हफ्ता लगेगा.

इस पूरे समय सरकार सार्वजनिक रूप से यही कहती रही कि महामारी नियंत्रण में है. लेकिन अंदर ही अंदर वह भी मान रही थी कि आगे हालात और खराब होने वाले हैं. 14 अप्रैल को आईसीएमआर के महानिदेशक बलराम भार्गव ने राज्य सरकारों को एक नोट भेजा. इसमें कहा गया था कि भारत में कोविड-19 के मामलों में अभूतपूर्व बढ़ोतरी हो रही है.

प्रभावी टेस्टिंग को लेकर आईसीएमआर की तरफ से राज्यों को भेजी गई एडवाइजरी कहती है कि अब मामले असाधारण रूप से बढ़ रहे हैं और यह बढ़ोतरी सिर्फ कोविड-19 के मरीजों के साथ संपर्क में आने से नहीं हो रही

उसी दिन केंद्र ने पहली बार देश के सभी जिलों का वर्गीकरण कर दिया. इसके लिए उसने उन चार मापदंडो में से सिर्फ एक का इस्तेमाल किया जिन्हें वह ऐसा करने के लिए आगे इस्तेमाल करने वाली थी. लेकिन उस वक्त उसने सिर्फ मामलों के दुगुना होने की दर को ही जिलों को रेड, ऑरेन्ज और ग्रीन जोन में बांटने का आधार बनाया. रेड जोन में वे जिले थे जिनमें कोरोना वायरस के मामले चार से भी कम दिनों में दोगुने हो रहे थे. जिन इलाकों में 28 दिनों में कोई नया मामला नहीं आया वे ग्रीन जोन में थे और बाकी ऑरेन्ज जोन में.

हॉटस्पॉट्स और रेड जोन्स के बारे में समझाता भारत सरकार का वह प्रेजेंटेशन जो उसने अप्रैल के मध्य में राज्यों के साथ साझा किया था

‘उस समय बहुत से जिले थे जो दावा कर रहे थे कि उनके यहां कोविड-19 के कोई मामले नहीं हैं. होते भी कैसे... वे पर्याप्त टेस्टिंग या निगरानी ही नहीं कर रहे थे’ कोविड-19 पर सरकार द्वारा बनाई गई जनस्वास्थ्य विशेषज्ञों की समिति के एक सदस्य नाम गोपनीय रखने की शर्त पर कहते हैं, इसका मतलब यह नहीं था कि जिले में कोविड-19 के मामले ही नहीं थे.’

उदाहरण के लिए दो मरीजों को अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लब देब ने 23 अप्रैल को राज्य को कोरोना मुक्त घोषित कर दिया. इसके बाद राज्य में मौजूद बीएसएफ के जवानों की टेस्टिंग शुरू हुई तो अगले दो हफ्ते में ही कोरोना वायरस के मामलों की संख्या 62 तक पहुंच गई. 10 मई तक यह आंकड़ा 100 तक पहुंच गया था.

लॉकडाउन के पहले विस्तार यानी 15 अप्रैल से एक मई के दौरान सरकार ने देशव्यापी तो क्या किसी एक शहर के स्तर पर भी घर-घर जाकर निगरानी करने और कोविड-19 के लक्षण वाले मरीज मिलने पर उन्हें क्वारंटीन करने की व्यवस्था नहीं बनाई, जबकि आईसीएमआर ने इसका सुझाव फरवरी में ही दे दिया था. उसने यह सुझाव अप्रैल के पहले हफ्ते में भी दोहराया था. इसके बजाय सरकार ने यह व्यवस्था सिर्फ उन्हीं इलाकों में अपनाई जहां मामलों की संख्या ज्यादा थी. यह काम भी उसने 17 अप्रैल के बाद किया.

के श्रीनाथ रेड्डी कहते हैं, ‘लॉकडाउन के दौरान भी आंध्र प्रदेश और केरल में वार्ड और विलेज वॉलंटियर्स हर हफ्ते घर-घर जाकर लोगों से पूछ रहे हैं कि किसी सदस्य में लक्षण तो नहीं देख रहे.’ वे आगे जोड़ते हैं, ‘इसके लिए डॉक्टरों की जरूरत नहीं. वॉलंटियर्स और आशा वर्कर ही ये काम कर सकते थे.’

इस बीच पूरे देश में टेस्टिंग की दर बढ़ गई और पता चला कि सरकार जिस रणनीति पर चल रही थी वह नाकामयाब रही है. अगले 15 दिनों के दौरान यानी लॉकडाउन का दूसरा चरण खत्म होते-होते यह साफ हो गया था कि महामारी अब भी पहले की अपेक्षा ज्यादा तेजी से फैल रही है. 14 अप्रैल को एक्टिव केसों का आंकड़ा 12 हजार था. 30 अप्रैल को यह 33 हजार हुआ और नौ मई तक 60 हजार तक पहुंच गया.

इसके बाद सरकार ने फिर अपनी रणनीति में बदलाव किया.

नया आधार

एक मई को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 12 पन्नों का एक नया आदेश जारी किया. इसमें जोनों के वर्गीकरण के मापदंड एक से बढ़ाकर चार कर दिए गए थे. आदेश में कहा गया था, ‘स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा सक्रिय मामलों की कुल संख्या, मामलों के दोगुने होने की दर, टेस्टिंग के स्तर और निगरानी से मिले फीडबैक के आधार पर जिलों का रेड जोन या हॉटस्पॉट में वर्गीकरण किया जाएगा.’

सरकार ने न तो इस आदेश में और न ही इसके बाद राज्यों को दिए गए निर्देशों में यह समझाया कि वह इन मापदंडों का इस्तेमाल क्यों और किस तरह से कर रही है. नाम गोपनीय रखने की शर्त पर एक अधिकारी कहते हैं, ‘लॉकडाउन यह सुनिश्चित करने के लिए है कि संक्रमण के चरम पर जिन लोगों को अस्पताल में रखने या क्वारंटीन की जरूरत होगी उनका आंकड़ा हमारे पास मौजूद क्षमता से कम रहे. किसी जिले में अस्पताल या क्वारंटीन की कितनी सुविधाए हैं, इसका हिसाब लगाए बिना इन मापदंडों का कोई मतलब नहीं है.’

ये अधिकारी एक ऐसे राज्य से हैं जिसने केंद्र से औपचारिक रूप से अनुरोध किया है कि वह किसी जोन को निर्धारित करने की अपनी नीति की समीक्षा करे. वे कहते हैं, ‘अगर किसी जिले में एक समय 500 पॉजिटिव केस हैं तो इसे तब असाधारण कहा जा सकता है जब बेड सिर्फ 50 हों. अगर बेड 1000 हों और रोज आने वाले मामलों की संख्या नीचे जा रही हो तो यह स्थिति संभाली जा सकती है. ऐसी स्थिति में प्रतिबंध हटाने के बारे में सोचा जा सकता है. लेकिन केंद्र के फरमानों से हमारे सामने यह साफ ही नहीं होता कि वह इन मापदंडों का इस्तेमाल कैसे कर रहा है.’

निगरानी बतौर मानक

अपने आदेश में सरकार ने निगरानी से मिले फीडबैक का भी जिक्र किया था. आईसीएमआर ने घर-घर जाकर निगरानी करने का सुझाव दिया था. तो सवाल उठता है कि निगरानी से मिले फीडबैक को एक मापदंड बनाकर क्या सरकार ने यह सुझाव या इसका एक हिस्सा मान लिया. जवाब है नहीं. यह बात वे विशेषज्ञ भी कहते हैं जो सरकार के लिए ही काम कर रहे हैं और वे भी जो ऐसा नहीं कर रहे.

आईसीएमआर ने सुझाव दिया था कि जिन लोगों में कोविड-19 के लक्षण हैं उनका पता लगाने के लिए भारत के सभी 700 जिलों में हफ्ते में दो बार घर-घर जाकर एक निगरानी अभियान चलाया जाए. उसका यह भी कहना था कि सरकार अस्पतालों, क्लीनिकों और बुखार जांचने के लिए बने कैंपों में ऐसे लोगों की जांच करे जिन्हें कोविड-19 होने की संभावना है. आईसीएमआर के मुताबिक इससे उस इलाके में संक्रमण की एक मोटी-मोटी दर पता चल सकती है. उसका यह भी कहना था कि जिन इलाकों में अभी कोरोना वायरस के एक भी मामले की पुष्टि नहीं हुई है वहां इस कवायद के तहत उन लोगों की भी टेस्टिंग हो जो अस्पताल आ रहे हैं.

लेकिन 17 अप्रैल को जारी केंद्र सरकार की एक एडवायजरी के मुताबिक उसने घर-घर जाकर सर्वे को ‘कंटेनमेंट जोन’ में ही अनिवार्य किया था. यानी वे इलाके जहां कोरोना वायरस के कम से कम एक मामले की पुष्टि हो चुकी हो. एडवायजरी में कहा गया था कि इन इलाकों में सक्रिय मामलों की खोज तभी होगी जब इन्हें पूरी तरह से सील कर दिया जाएगा यानी बाहरी दुनिया के साथ उनका कोई संपर्क नहीं होगा.

केंद्र का यह भी कहना था कि किसी ‘कंटेनमेंट जोन’ से सटे इलाके यानी ‘बफर जोन’ में मामले खोजने की जरूरत नहीं है. ‘कंटेनमेंट जोन’ वे पूरे इलाके भी हो सकते हैं जहां कोविड-19 के बहुत से मामले हों और इसके दायरे में शहर भी आ सकते हैं. इसके बाद 30 अप्रैल को सरकार ने यह परिभाषा बदल दी. अब इसमें कोई बिल्डिंग, गली या थाना क्षेत्र भी आ सकता था.

आईसीएमआर की टास्क फोर्स के एक सदस्य कहते हैं, ‘मुझे लगता है कि अब आईसीएमआर की सलाह मानने के लिए अब बहुत देर हो गई है. लॉकडाउन ने बड़ी आर्थिक चुनौतियां खड़ी कर दी हैं और सरकार ने महामारी से निपटने के लिए एक अलग रास्ता पकड़ लिया है. आईसीएमआर ने लॉकडाउन खत्म करने से पहले हम घर-घर जाकर निगरानी प्रक्रिया पूरी करने और क्वारंटीन और दूसरी स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ाने का सुझाव दिया था. पता नहीं हम इसका इंतजार क्यों कर रहे हैं. हो सकता है अब मिला-जुला तरीका चल रहा हो.’

आंध्र प्रदेश, केरल और महाराष्ट्र जैसे कुछ राज्यों ने घर-घर जाकर सर्वे किए हैं लेकिन किसी ने भी इसे पूरी तरह से नहीं किया है. एक सरकारी सूत्र के मुताबिक दिल्ली में भी इस तरह के सर्वे जारी हैं. लेकिन आईसीएमआर की सलाह - जिसमें कहा गया था कि जिनमें भी लक्षण मिलें उन सभी को क्वारंटीन किया जाना चाहिए - के उलट सिर्फ उन्हीं लोगों को क्वारंटीन किया जा रहा है जिनमें लक्षण गंभीर हैं या फिर जिनमें कोरोना वायरस की पुष्टि हो चुकी है.

इसका अंग्रेजी संस्करण आर्टिकल-14 पर प्रकाशित किया गया है. इस सीरीज के अगले हिस्से में यह पड़ताल होगी कि क्या केंद्र के पास ऐसी पर्याप्त ठोस जानकारी है जिसके आधार पर वह देश के 700 जिलों में कोविड-19 को काबू करने के उपायों पर फैसला कर सके.