कोरोना संकट की जटिलताएं

एक कवि-बन्धु से फ़ोन पर बात हो रही थी. उनका ख़याल है कि कोरोना महामारी और इतने विशाल भयावह लॉकआउट ने जीवित रहने को ही एक परम मूल्य में बदल दिया हैं. अब वह समय बीत गया, कम-से-कम अभी, जिसमें किसी बड़े मूल्य, लक्ष्य या आदर्श के लिए लोग अपने जीवन का बलिदान तक देने को, ऐसा उत्सर्ग करने को सबसे बड़ा मूल्य मानते थे. यह सही है कि कई लोगों में, संस्थाओं और समूहों में मानवीयता बची हुई है. वे सहयोग और सहकार में विश्वास करते और इन दुर्दिनों में भी उन पर अमल कर रहे हैं. लेकिन ये सभी प्रयास अंत में एक ही उद्देश्य की पूर्ति के लिए होते दिख रहे हैं. बाकी सभी काम स्थगित हैं.

एक और रिटायर्ड आईएएस अधिकारी ने टिप्पणी की है कि ग़रीब मज़दूरों और अन्य, जो लाखों की संख्या में अपने घर-गांवों की तरफ़, इस बेदर्द मौसम में, जैसे भी हो भाग रहे हैं और जिनकी तकलीफ़ों की अनेक हृदयविदारक छवियां रोज़ ही नज़र आ रही हैं, वे एक तरफ के हेमलेटनुमा द्वन्द्व में फंसे हैं. अगर वे अपने काम-रोज़गार की जगह रूकते हैं तो कोरोना प्रकोप उन्हें मार सकता है और अगर वे किसी तरह, सारी तकलीफ़ उठाकर, अपने घर-गांव पहुंच भी जाते हैं तो बेरोज़गारी उन्हें ख़त्म कर देगी. दोनों हालत में उनका सामना यन्त्रणा, भुखमरी और मृत्यु से है.

तीसरी ओर ऐसी आशंका व्यक्त की जा रही है कि प्रकोप अभी और बढ़ेगा और हमें कोरोना के साथ, याने सारे निषेधों, सावधानियों का सतर्कता से पालन करते हुए जीवन बिताने की आदत डालनी होगी. इसका एक दुराशय यह है कि हमें काफ़ी दिनों तक भौतिक दूरी और अलगाव बनाकर रखने होंगे.

चौथा पक्ष यह है, जैसा कि फिर एक कवि-बन्धु ने कहा, कि इस महामारी के पीछे कई तरह के षड्यन्त्र भी सक्रिय हैं या हो सकते हैं. दवाई बनाने वाली अन्तरराष्ट्रीय कंपनियां सत्ताओं और बाज़ारों पर एक नये तरह की तानाशाही स्थापित करने का प्रयत्न कर रही हो सकती हैं. वूहान की जिस चीनी प्रयोगशाला में यह वायरस जन्मे होने की बात की जा रही है उसे अमेरिकी सहायता भी प्राप्त रही है. वह चीन और अमेरिका का संयुक्त उपक्रम रही है और इसलिए सारा दोष चीन के मत्थे मढ़ कर अमेरिका अपने को ज़िम्मेदारी से बरी नहीं कर सकता. भले सबसे अधिक नुकसान, जान-माल का, अमेरिका को ही उठाना पड़ा है.

पांचवा पक्ष यह है कि लॉकआउट और अन्य निषेधों से सामान्य जीवन के अलावा सारी अर्थव्यवस्था अन्तरराष्ट्रीय स्तर तक बहुत बुरे रूप से प्रभावित हुई है. करोड़ों लोग, भारत में ही, बेरोज़गार, बेघरबार, बेराहत हो गये हैं और उनकी सहायता और पुनर्वास में समय और साधनों की कई सीमाएं धीरे-धीरे स्पष्ट हो रही हैं. यह आशंका व्यक्त की जा रही है कि महामारी की तुलना में भुखमरी-बेरोज़गारी से कहीं कई गुना ज़्यादा लोग मर सकते हैं!

छठवां पक्ष यह है कि इस दौरान राजनीति कुल मिलाकर, लोकतांत्रिकता, अधिकार-चेतना-न्याय आदि से पिछड़ रही है और उसकी सत्ता-लोलुपता नागरिकता की बुनियादी मानवीयता से मुंह मोड़ रही है.

इतनी जटिलताओं के बीच से हमारा बेदाग़ और साबित निकल पाना असम्भव लगता है. इन जटिलताओं ने जो उलझाव पैदा किया है, उससे निपटना बहुत दुष्कर है. हम एक मोड़ पर हैं जो, कम से कम, हममें से ज़्यादातर के जीवन में अभूतपूर्व है. समाज, व्यक्ति, राजनीति, अर्थव्यवस्था, संस्थाएं आदि क्या मोड़ लेंगी इसकी अटकल तक लगाना कठिन है. इतना तो तय है कि हम पहले की तरह की सामान्यता या साधारणता, हस्बे-मामूल में लौट नहीं पायेंगे. उस हालत में हमारा व्यवहार कितना अटपटा, अनाश्वस्त, विचित्र आदि हो जायेगा यह इस मुक़ाम पर कहना मुश्किल है. बदलना तो होगा, पर कैसे, किस हद तक यह अभी न तो स्पष्ट है, न ही निकट भविष्य में हो पायेगा.

कुछ और मुद्दे

कुछ और मुद्दे भी कुछ कवि-बन्धुओं ने उठाये हैं. कोरोना का प्रकोप भारत में सत्तर प्रतिशत उन शहरों में केन्द्रित है जो तथाकथित स्मार्ट सिटीज़ हैं. दिल्ली, अहमदाबाद, मुंबई, पुणे, सूरत, चेन्नई, इन्दौर, भोपाल, जयपुर आदि. इसका आशय यह है कि शहरी विकास का जो मॉडल हमने अपनाया है वह न सिर्फ़ असफल दिख रहा है बल्कि हत्यारा और संक्रमण फैलाने वाला भी साबित हो रहा है. क्या अब सत्ताएं इस अन्धाधुन्ध शहरीकरण को मापने की ओर प्रवृत्त होंगी. याने इस मानसिकता को त्याग कर कि ‘हर गांव को अन्ततः किसी शहर का उपनिवेश बन जाना है’ क्या हम गांवों की ओर जाने की विकेन्द्रीकृत नीति अपनायेंगे? शहरीकरण और औद्योगिकीकरण में जो अपार वित्तीय साधन लगे हैं उन्हें वहां से हटाने की राजनैतिक और संस्थागत हिम्मत हमारी सरकारें करेंगी जो कि केन्द्रीकरण को बढ़ाने में अपना हितसाधन देखती आयी हैं? राजनैतिक दलों को जिनसे चन्दे और वित्तीय सहयोग मिलते हैं, वे लोग और संस्थाएं भी शहरों में ही केन्द्रित हैं.

जो प्रवासी मज़दूर मूलतः झारखण्ड, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार आदि से लाखों की संख्या में आकर अधिक विकसित राज्यों की अर्थव्यवस्था का सशक्त आधार बनते हैं और जिन्हें उनकी इच्छा होते हुए भी आसानी से विकसित राज्य छोड़ना नहीं चाहते, उन मज़दूरों का उनके मूल राज्यों की सरकारें, अपनी अर्थव्यवस्था को बेहतर बनाने और रोजगार देने के लिए उपयोग करने की कोई पहल कर पाएंगी? क्या हिन्दी राज्य अपनी बुनियादी नीतियों पर गंभीरता और निर्भीकता से पुनर्विचार कर उनका कायाकल्प कर पायेंगे?

स्वास्थ्य के नाम पर सही, हम एक तरह के निगरानी राज्य की ओर बढ़ रहे हैं. यह प्रवृत्ति, दुर्भाग्य से, विश्वव्यापी है. अपनी ज़िम्मेदारी खुले पारदर्शी लोकतांत्रिक ढंग से निभाने में सुस्त राज्य निगरानी के मामले में बड़ी फुरती दिखा रहे हैं.

मुश्किल यह है कि भारत एक विकल्प बनकर नहीं नकलची बनकर आत्मतुष्ट है. साफ़ है कि हमने पश्चिमी विकल्प का ऐसा अन्धानुकरण किया है कि आज पढ़ने-सोचने वाला तबका, हमारा मध्यवर्ग, ज़्यादातर पश्चिम की गुलामी को अपना अभीष्ट मानकर आत्मसन्तुष्ट है. कोरोना का प्रकोप, हम न भूलें, सबसे अधिक उन्‍नत देशों में, बुरी तरह से शहरीकरण में रमे हुए अंचलों में, सबसे ज्यादा है.

इस मुक़ाम पर यह याद करना दुखद है कि भारत एक देशमात्र नहीं, एक सभ्यता भी है और हम मानवता के सामने विकल्प की तरह रहे हैं. आज हम अपनी सभ्यता के सबसे क्रूर हो गये पक्षों जातिपरक-साम्प्रदायिक-धर्मान्ध हिंसा के लिए जाने जाते हैं. भारतीय सभ्यता का लय-भंग हो चुका है. यह मुक़ाम है जब हम थोड़ा ठिठककर इस लय को पुनराविष्कृत करने की सोच सकते हैं. इस लय को समझना, उसके स्पन्दन को महसूस करना और उसे फिर से पाने की कोशिश किसी भी क़दर आसान नहीं है, न होगी. एक महामारी, जो हम पर इस क़दर हावी हो गयी है उसे हमने किसी भूल-चूक से नहीं उपजाया है. वह मूलतः पश्चिमी आधुनिकता की विकृतियों से उपजा एक महारोग है. सारे संसार में उसे फैलाने या फैल जाने देने के बाद, उसका कोई उपचार भी, अन्ततः वहीं से आयेगा. हम महामारी के भी गुलाम, हम उनके द्वारा निर्धारित प्रोटोकोल के गुलाम और उनके आविष्कृत उपचार के भी विवश खरीदार गुलाम! क्या यह दुश्चक्र हमें नज़र आता है? क्या हम समृद्धि, सम्पन्नता, उन्नति, विकास, प्रगति आदि अवधारणाओं को सख़्ती से प्रश्नांकित कर उनमें भारतीय विकल्प खोजने को तत्पर हो सकते हैं?

यह स्पष्ट नहीं है कि मनुष्यों पर कहर बरपा करने वाली कोराना महामारी का अन्य प्राणियों और वनस्पति जगत पर क्या-कितना प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है या पड़ेगा. हमारी हाउसिंग सोसायटी में जो पेड़-पौधे-घास आदि हैं और पक्षियों का समूह वह तो अभी पहले जैसा ही है!