रिज़वाना तबस्सुम की मौत अब न तो अख़बारों की सुर्खियों में बाकी है और न ही सोशल मीडिया पर. मगर एक निडर, न थकने वाली पत्रकार के इस तरह ‘जान दे देने’ पर अब भी बहुत से लोगों को यकीन नहीं है. मैं वाराणसी जाना चाहती थी, जानना चाहती थी कि आखिर हुआ क्या. लेकिन लॉकडाउन के चलते ऐसा नहीं हो सका. मैंने अन्य पत्रकारों की खबरों की प्रतीक्षा की. हर खबर के बाद उसकी मौत की गुत्थी सुलझने के बजाय उलझती गई.

उन खबरों में नए खुलासे तो थे, पर वह नज़रिया कहीं नहीं था जिसका मैं इंतज़ार कर रही थी. यह लिखा गया कि उसने किन-किन कारणों से अपनी हत्या की होगी. किसी खबर में उसके साथ एक लड़के का नाम जुड़ा हुआ था तो किसी में उसे यह कहकर हीरो बनाने की कोशिश की गई थी कि भूखों तक राशन पहुंचाने के लिए उसने अपनी जान दे दी. लेकिन, जैसा कि स्क्रोल.इन पर उसकी दो साथी पत्रकारों का यह लेख बताता है, रिज़वाना बहुत हिम्मती, मेहनती और महत्वाकांक्षी लड़की थी. उसी रिजवाना को मैं भी जानती थी.

रिज़वाना की मौत की पहली खबर पढ़ने से लेकर यह सब लिखने तक, उसकी मौत के इर्द-गिर्द सवाल बढ़ते ही गए हैं. उसके बारे में आईं खबरों पर रिज़वाना को जानने वाले जिस भी शख्स से बात हुई, यही सुनने को मिला - ‘रिज़वाना तबस्सुम खुदकुशी नहीं कर सकती. रिज़वाना तबस्सुम खुदकुशी करने वाली लड़की नहीं है.’

पहली बार रिज़वाना से मेरी बातचीत पिछले साल हुई, तारीख़ और महीना मुझे याद नहीं. शायद यही मई का महीना रहा होगा. उसने अपने बारे में बताते हुए कहा था कि वह फ्रीलांस काम करती है और मैं उसे बताऊं कि वह अपना काम और किस तरह बेहतर कर सकती है. उसके बाद मैं उसके काम को जानने लगी. वह निडर थी, मेहनती थी.

फ़रवरी में जब ग़ाज़ीपुर में मुझे गिरफ़्तार किया गया तो रिज़वाना इसके खिलाफ लिखने वालों में काफी मुखर थी. वह पदयात्रा के बारे में भी लगातार लिख रही थी. जेल से बाहर आने के बाद जब मैं बनारस पहुंची तो मैं उससे मिली. उसने ‘न्यूज़क्लिक’ के लिए बाकी लोगों के साथ मेरी भी वीडियो बाइट ली और मुझसे अपने घर चलने के लिए कहती रही.

अगले दिन वह फिर मिली, और तब वह सोनभद्र ज़िले से गायब होती आदिवासी लड़िकियों के बारे में चिंतित थी. वह उन पर लिखने के लिए सोनभद्र जाना चाहती थी, कॉन्टेक्ट्स जुटा रही थी. सोनभद्र की अराजकता के बारे में जानकारी होने के बावजूद रिज़वाना वहां अकेले जाने के लिए तैयार थी. मैंने उसमें एक क़िस्म की वल्नरेबिलिटी देखी. लेकिन यह वह उसे कमज़ोर नहीं करती थी, उसे और काम करने, और आगे जाने को उकसाती थी.

मैंने गौर किया कि वह बार-बार अपने परिवार की बात करती थी, कि उसका परिवार उसे बहुत सपोर्ट करता है. अगर आपका परिवार साधारण रूप से आपको बहुत सपोर्ट करता है तो आपको यह बार-बार कहने की ज़रूरत नहीं होती. मैं समझ पा रही थी कि उस पर खुद को साबित करने का दबाव था. वाराणसी के लोहता जैसे इलाके से निकली हुई लड़की को बहुत कुछ साबित करना होता है. क्या साबित करना हो सकता है, यह मैं आपकी समझ पर छोड़ती हूं.

अब मैं उस रात पर आती हूं जिस रात ने उसे फांसी के फंदे पर लटके देखा. तीन मई की रात उसने न्यूज़क्लिक के लिए एक रिपोर्ट लिखी. रिपोर्ट में बनारस शहर और उसके निवासियों पर कोरोना वाइरस के असर पर तफ़सील से लिखा गया था. अगली सुबह हम तक खबर पहुंची कि रिज़वाना तबस्सुम ने रात को खुदकुशी कर ली. कहा जा रहा था कि सवेरे उसके कमरे का दरवाज़ा न खुलने पर जब उसे तोड़ा गया तो उसका शव एक रॉड से झूलता मिला जिसे परिवार ने पुलिस के आने से पहले से उतार लिया था. बस सवाल यहीं उठने चाहिए थे.

यह पूछना इतना मुश्किल क्यों रहा कि जो लड़की रात के साढ़े नौ बजे एक रिपोर्ट फाइल करती है, वह इसके तुरंत बाद आत्महत्या करने की मनःस्थिति तक कैसे पहुंच सकती है?

मैं रिज़वाना के भाई आज़म से पूछती हूं कि तीन मई को क्या-क्या हुआ था. वे बताते हैं, ‘रात 9:29 पर दीदी ने रिपोर्ट पब्लिश की. उसके बाद हमारे साथ खाना खाया. दिन में वे कहीं बाहर नहीं गई थीं.’ शमीम नोमानी के बारे में सवाल करने पर वे बताते हैं कि राशन के सिलसिले में इन दोनों में बहस हुई थी. वे यह भी बताते हैं कि शमीम पिछले कुछ दिनों से कोरोना के कारण खाने की क़िल्लत से जूझ रहे परिवारों तक राशन पहुंचाने में रिज़वाना की मदद कर रहा था और इनमें किसी तरह की कोई दोस्ती नहीं थी.

जबकि बनारस में रिज़वाना तबस्सुम से जुड़े लोग बताते हैं कि शमीम नोमानी और वह पिछले एक-डेढ़ साल से करीबी दोस्त थे. अक्सर रिपोर्टिंग या अन्य कामों के लिए लोहता से बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी या शहर के बाकी हिस्सों तक शमीम ही अपनी दोपहिया से उसे लाता-ले जाता था. रिज़वाना के बारे में लिखी गई कुछ रिपोर्ट्स में भी शमीम नोमानी के रिज़वाना के भाई के निकाह में आने और उन दोनों के बीच दोस्ताना संबंध होने का ज़िक्र मिलता है.

चार मई की सुबह के बारे में आज़म बताते हैं, ‘दीदी सुबह नौ बजे तक उठ जाती थी. लेकिन उस दिन जब नौ बजे के बाद भी नहीं उठी तो हमने उसे फोन किया. फोन न उठाने पर आवाज़ें दी गईं. और उसके बाद दरवाज़ा तोड़ा गया.’ डॉक्टर को बुलाने की बाबत पूछने पर उन्होंने बताया कि दीदी का चेहरा काला पड़ चुका था इसलिए डॉक्टर को फोन नहीं किया गया. फोन पुलिस को किया गया. इसी तरह घटना वाले कमरे को पुलिस द्वारा सील न करने के सवाल पर उन्होंने बताया कि पुलिस ने कई कोणों से कमरे की तस्वीरें उतारीं. ‘दीदी के कमरे के नोटिस बोर्ड पर एक ए-फ़ोर साइज़ के पर्चे पर लिखा था शमीम नोमानी ज़िम्मेदार है. पुलिस ने वह काग़ज़ ले लिया. और हैंडराइटिंग मिलाने के लिए दीदी की एक-दो डायरी भी उठा लीं. जब सबकुछ सामने ही मिल गया था तो कमरे को सील करने की कोई ज़रूरत नहीं थी.’

एक और बार फोन करके जब मैंने आज़म से पूछा कि क्योंकि बातचीत में उन्होंने ज़िक्र किया कि रिज़वाना रोज़े रख रही थी, तो फिर उस रात सहरी के लिए रिज़वाना को क्यों नहीं जगाया गया. इस पर आज़म ने बताया, ‘दीदी ही रोज़ हमें सहरी के लिए जगाती थी. उस दिन जब वो नहीं आई तो किसी की नींद नहीं खुली.’ रिज़वाना के परिवार में उसके माता-पिता, तीन भाई, एक भाभी और तीन बहनें हैं.

कमरे को सील किए जाने की ज़रूरत न होना या फिर सहरी जैसे ज़रूरी काम के लिए पूरे परिवार में से किसी का भी न जागना हैरान करता है. सवाल भी खड़े करता है.

खबरों में कहा जा रहा है कि रिज़वाना ने शमीम के दबाव में आत्महत्या की. मसला राशन के बंटवारे में भ्रष्टाचार से संबंधित बताया गया. पर क्या राशन का बंटवारा या उससे जुड़ा भ्रष्टाचार इतना बड़ा मसला हो सकता कि एक निडर पत्रकार उसके लिए अपनी जान दे दे? जैसा कि रिज़वाना को जानने वाले कहते हैं कि अगर भ्रष्टाचार का मामला था तो वह उससे पर्दा हटाती, अपनी जान नहीं देती.

सवाल इस बात पर भी खड़ा होता है कि अगर मान लिया जाए कि रिज़वाना तबस्सुम ने किसी के दबाव में आकर आत्महत्या की तब भी उसका सुसाइड नोट उसके व्यक्तित्व से मेल नहीं खाता. रिज़वाना की पत्रकारिता गवाह है कि वह एक पंक्ति का सुसाइड नोट नहीं छोड़कर जा सकती. उसने सामाजिक अन्याय पर लगातार लिखा. वह लड़की जो रात के साढ़े नौ बजे तक बनारस पर कोरोना वायरस के बुरे असर पर एक लंबी रिपोर्ट लिख रही थी, अगर सुसाइड नोट छोड़कर आत्महत्या करती तो सामान्य बुद्धि यह कहती है कि वह नोट भी वैसा ही तफ़सील से लिखा हुआ होना चाहिए था.

इस बारे में मनोचिकित्सक से बात करने पर एक और तस्वीर सामने आती है. लखनऊ में कंसल्टेंट साइकाइट्रिस्ट डॉक्टर अभिनव पांडेय से जब पूछा कि यह कैसे मुमकिन है कि रात साढ़े नौ बजे रिपोर्ट फाइल करने वाली लड़की उसी रात आत्महत्या करने की मनःस्थिति तक पहुंच जाए, तो वे इस संभावना से इनकार नहीं करते. वे कहते हैं, ‘दो तरह की आत्महत्याएं होती हैं. एक मामले में आत्महत्या से पहले रोगी बाहर से हंसता-खेलता लगता है और अपनी मनस्थिति छुपाता है. ताकि वह आत्महत्या को अंजाम दे सके. दूसरे मामले में रोगी कुछ लोगों को अपनी परेशानी बताता है, उनका ध्यान खींचने की कोशिश करता है ताकि उसे बचाया जा सके. लेकिन दोनों ही मामलों में रोगी में काफी पहले से डिप्रेशन के लक्षण देखे जा सकते हैं.’

इस मामले में वे साइकोलॉजिकल ऑटोप्सी की सलाह देते हैं. मौत के कारणों को जानने के इस माध्यम में पीड़ित के परिवार और उससे जुड़े लोगों से लंबी पूछताछ की जाती है. और रोगी की मनःस्थिति जानने की कोशिश की जाती है.

लेकिन रिज़वाना में डिप्रेशन के लक्षण देखे गए हों, ऐसा किसी स्रोत से पता नहीं चलता. और राशन की बात इतनी बड़ी नहीं लगती कि उसे अपनी जान देनी पड़े. इस पर रिज़वाना के भाई का कहना था, ‘हम भी नहीं जानते कि उस रात बंद कमरे में ऐसा क्या हुआ कि दीदी को फांसी लगानी पड़ी.’

ऐसे में रिज़वाना तबस्सुम की तथाकथित खुदकुशी एक पहेली बन जाती है. सवाल उठता है कि क्या मामला कुछ और ही है जिसे ढकने के लिए शमीम को बलि का बकरा बनाया जा रहा है. इस सवाल के ज़रिए शमीम पर लगे आरोपों को ख़ारिज नहीं किया जा सकता. लेकिन यह देखना भी ज़रूरी है कि शमीम नोमानी के संभावित उकसावे के अलावा क्या कुछ और भी चीज़ें हैं जो रिज़वाना की मौत के लिए ज़िम्मेदार हो सकती हैं.

शमीम नोमानी के छोटे भाई वसीम भी कुछ इसी तरह के सवाल पूछते हैं. वे कहते हैं, ‘अगर शमीम ने रिज़वाना को खुदकुशी के लिए उकसाया होता तो सुबह उसकी मौत की खबर मिलने पर वह उसके घर क्यों जाता.’ वे ‘चार अक्षरों के सुसाइड नोट’ पर भी सवाल करते हैं. शमीम इस समय हिरासत में है. और लॉकडाउन के कारण परिवार को उससे मिलने की इजाज़त नहीं है. वसीम यह भी कहते हैं कि इस पूरे मामले में किसी भी पत्रकार ने उनके परिवार का पक्ष जानने के लिए उनसे संपर्क नहीं किया है.