हमारा सूरज मद्धम हो रहा है! किसी गीतकार की कल्पना से मिलती-जुलती यह बात असल में एक वैज्ञानिक सच है जिसे सोलर मिनिमम कहा जाता है. ऐसा तब होता है जब सूर्य की सतह पर होने वाली सोलर ऐक्टिविटी या सौर गतिविधियों में कमी आ जाए. अब सवाल है कि सोलर ऐक्टिविटी क्या होती है, और यह कैसे घटती या बढ़ती है?

असल में सूरज एक ऐसा सितारा है जिस पर इलेक्ट्रिक्ली चार्ज्ड गैसें (प्लाज़्मा) मौजूद हैं. प्लाज़्मा अलग-अलग कारणों से एक स्थान से दूसरे स्थान पर लगातार गति करते रहते हैं. भौतिक विज्ञान की एक सामान्य सी अवधारणा कहती है कि यदि इलैक्ट्रिक्ली चार्ज्ड गैसें या तरंगें किसी निश्चित पैटर्न में गति करें तो चुंबकीय बल पैदा कर देती हैं और इस बल के प्रभाव वाला क्षेत्र चुंबकीय क्षेत्र कहलाता है. इस तरह सूरज पर बहुत सारे शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र अस्तित्व में आते रहते हैं.

सूरज पर जिस तरह गैसें इधर से उधर प्रवाहित होती रहती हैं, आपस में टकराती हैं, घुलती-मिलती हैं. ठीक उसी तरह इनकी गति के कारण पैदा हुए चुंबकीय क्षेत्र भी अक्सर एक-दूसरे से टकराते रहते हैं, एक-दूसरे में उलझ जाते हैं और कुछ अपनी क्षमता से ज़्यादा खिंच जाते हैं. इस सब के चलते सूर्य पर एक बड़ी हलचल पैदा हो जाती है जो सोलर फ्लेयर्स, कोरोनल मास इजेक्शन (सीएमई) और सनस्पॉट जैसी कई सौर घटनाओं को जन्म देती है. इन सभी को ही सामूहिक रूप से सोलर ऐक्टिविटी या सौर गतिविधि कहा जाता है.

सूरज पर बनने वाले चुंबकीय क्षेत्र

इनमें से पहले सनस्पॉट को समझते हैं. दरअसल सूर्य के भीतरी हिस्सों में लगातार नाभिकीय क्रियाएं (संलयन) चलती रहती हैं. इससे जो ऊष्मा मुक्त होती है वह अपने आस-पास मौजूद गैसों को गर्म कर देती है. ये गैसें अपनी स्वभाविक प्रकृति के चलते ऊपर यानी सतह की ओर उठती हैं जबकि सतह पर मौजूद अपेक्षाकृत ठंडी गैसें नीचे की तरफ़ गति करती हैं. फ़िर एक निश्चित अंतराल के बाद इन गैसों की तासीर बदलने लगती है. सतह पर पहुंचने वाली गर्म गैसें ठंडी हो जाती हैं और सूरज के गर्भ की गर्मी पाकर ठंडी गैसें गर्म हो जाती हैं. और ये फिर से आपस में जगह बदल लेती हैं. इस तरह यह घटनाक्रम बिना रुके चलता रहता है.

लेकिन इस चक्र की वजह से जो चुंबकीय क्षेत्र पैदा होते हैं वे कई बार आपस में उलझकर इतने घने हो जाते हैं कि अपने प्रभाव वाले क्षेत्र में गैसों के मार्ग को ही अवरुद्ध कर देते हैं. नतीजतन सूर्य की सतह पर कुछ हिस्से ऐसे छूट जाते हैं जहां तक गर्म गैसें पहुंच नहीं पातीं जबकि उनके आस-पास के क्षेत्र में वे अपनी जगह बना लेती हैं. इस तरह ये हिस्से अपेक्षाकृत ठंडे रह जाते हैं और काले रंग के धब्बे जैसे नज़र आते हैं. इन्हीं धब्बों को सनस्पॉट कहा जाता है. इन्हें सबसे पहले व्यवस्थित ढंग से 1609 में टेलीस्कोप के अविष्कारक गैलिलियो गैलिली और उनके बाद क्रिस्टोफ शायनर ने देखा था.

जानकारी के मुताबिक़ ये सनस्पॉट आकार में हमारी पृथ्वी से भी कई गुना बड़े हो सकते हैं. इनका चुंबकीय क्षेत्र भी पृथ्वी से कई हजार गुना ज्यादा शक्तिशाली होता है. एक बड़े सनस्पॉट का तापमान 3700 डिग्री सेल्सियस तक हो सकता है. कहने-सुनने में यह आंकड़ा भले ही बहुत ज़्यादा लगता है लेकिन सूर्य की सतह के क़रीब 5500 डिग्री सेल्सियस तापमान की तुलना में बहुत कम होता है.

सनस्पॉट

इन सनस्पॉट्स के आस-पास मौजूद बहुत सघन और अव्यवस्थित चुंबकीय क्षेत्र अपने अंदर बहुत सारी ऊर्जा भी समाहित कर लेते हैं जो एक सीमा के बाद जब बाहर निकलती है तो विस्फोटक लपटों की शक्ल ले लेती है. इन्हें ही सोलर फ़्लेयर कहा जाता है. कभी-कभी इन सोलर फ्लेयर्स के साथ कोरोनल मास इजेक्शन (सीएमई) भी सूर्य की सतह से बाहर निकलते हैं. सीएमई असल में विकिरणों और प्रकाश के बड़े बुलबुले होते हैं जो फ्लेयर्स की ही तरह बहुत तीव्र विस्फोट के साथ अंतरिक्ष में फैल जाते हैं.

सोलर फ्लेयर

चूंकि वैज्ञानिक और शोधकर्ता अभी तक सूरज के अंदरूनी हिस्सों में घटने वाली कई क्रियाओं के बारे में पूरी तरह नहीं जान पाए हैं. इसलिए सूर्य की बाहरी सतह पर होने वाली घटनाओं जैसे कि सनस्पॉट को देखकर ही इस सितारे पर चल रही गतिविधियों का अंदाज लगाया जाता है. लेकिन अब इन सनस्पॉट्स की संख्या घट गई है. इसका सीधा मतलब है कि सूर्य पर उतने चुंबकीय क्षेत्र नहीं बन पा रहे हैं. और ऐसा तभी हो सकता है जब प्लाज़्मा का प्रवाह रुकने लग जाए. कुल मिलाकर इस सब को सूरज पर चलते रहने वाली सौर गतिविधियों के कम हो जाने के इशारे के तौर पर देखा जाता है.

हालांकि ऐसा होना एक सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा माना जाता है. क्योंकि सूर्य कुछ इस तरह गति करता है कि तक़रीबन 11 वर्ष के अंतराल में उसके उत्तर और दक्षिण ध्रुव एक दूसरे के स्थान पर आ जाते हैं और अगले 11 साल में फिर से परस्पर जगह बदल लेते हैं. सतत रूप से चलते रहने वाले इस क्रम को सोलर साइकल या सौर चक्र कहा जाता है. सूर्य के ध्रुवों के परस्पर स्थान बदल लेने से उस पर मौजूद चुंबकीय क्षेत्र भी पूरी तरह पलट जाते हैं. ज़ाहिर तौर पर इस घटना का सीधा प्रभाव सौर गतिविधि पर पड़ता है. सौर चक्र के 11 वर्ष के अंतराल में एक समय ऐसा आता है जब सूर्य पर सौर गतिविधियां सर्वाधिक होती है. इसे सोलर मैक्सिमम कहते हैं. और कुछ समय ऐसा होता है जब सोलर ऐक्टिविटी बहुत कम हो जाती है जिसे हम सोलर मिनिमम के तौर पर जान ही चुके हैं.

सौर चक्र की गणना का आधार वर्ष 1755 माना जाता है. यानी पहला सौर चक्र 1755 से 1766 तक चला थी. हम अभी 25वें सौर चक्र के दौर में हैं. इसकी शुरुआत 2019 के आख़िरी महीनों में हुई थी और इसके 2030 तक चलने का अनुमान है. यदि पिछले यानी 24वें सोलर साइकल की बात करें तो उसमें अप्रैल-2014 में सोलर मैक्सिमम की स्थिति बनी थी. तब सूरज की सतह पर 82 सनस्पॉट देखे गए थे. और 2009-10 के दौरान सोलर मिनिमम देखने को मिला था.

पीला ग्राफ सोलर साइकल 25 का है

दुनिया भर की मीडिया रिपोर्ट्स में इस सोलर मिनिमम को ख़तरे की घंटी माना जा रहा है. ये रिपोर्ट बताती हैं कि 2020 शुरु होने के बाद से मई के मध्य तक सौ से ज्यादा दिन ऐसे गुज़र चुके हैं जब सूर्य की सतह पर कोई सनस्पॉट नहीं दिखाई दिया. यानी इस दौरान क़रीब 75 प्रतिशत समय सूरज पर बिना किसी गतिविधि के ही गुज़र चुका है. 2019 में यह आंकड़ा 77 फ़ीसदी था. तब साल के 281 दिन सनस्पॉट नज़र नहीं आए थे. लगातार दो वर्षों में इतने समय तक किसी सौर गतिविधि का न दिखना चिंता की बात मानी जा रही है.

अमेरिकी खगोल विज्ञानी डॉ टोनी फिलिप्स के मुताबिक इस बार ‘हमें पिछली एक सदी के सबसे गहरे सोलर मिनिमम का सामना करना पड़ सकता है. हमारे सूर्य का चुंबकीय क्षेत्र बहुत कमजोर हो रहा है.’ इस बात का एक बड़ा नुकसान यह हो सकता है कि सुदूर ब्रह्मांड से आने वाली जिन कॉस्मिक किरणों को पहले सूरज का चुंबकीय क्षेत्र रोक लिया करता था, वे हमारे सौरमंडल के दूसरे ग्रहों की तरह अब सीधी पृथ्वी तक भी पहुंचने लगेंगी और यहां के चुंबकीय क्षेत्र और जीवों पर विपरीत असर डाल सकती हैं. इसके अलावा ये तीक्ष्ण कॉस्मिक किरणें हमारी कई अंतरिक्ष परियोजनाओं को भी नुकसान पहुंचा सकती हैं.

लेकिन कई विशेषज्ञों को इससे भी बड़ा डर इस बात का है कि कहीं ये सोलर मिनिमम कुछ वैसे ही हालात खड़े न कर दे जो 1645 से 1715 तक और 1790 से 1830 के बीच देखने को मिले थे. इन दोनों अवधियों में हुए सोलर मिनिमम को क्रमश: माउन्डर और डॉल्टन मिनिमम के नाम से जाना जाता है. इनमें से माउन्डर मिनिमम को तो लिटिल आइस एज (हिमयुग) भी कहते हैं. तब यूरोप और उत्तरी अमेरिका भयंकर सर्दी की चपेट में आ गए थे. कई बंदरगाहों को मीलों तक समुद्री बर्फ़ ने ढक लिया. ज़मीन पर कई फीट ऊंची बर्फ़ जम गई थी. दुनिया के कई हिस्सों में अकाल पड़ा और खेती चौपट हो गई. चीन में उस साल गर्मी की फसलें पनप ही नहीं पाई थीं.

कुछ ऐसा ही हाल डॉल्टन मिनिमम के समय भी हुआ था. लेकिन इस बार कुछ ज्वालामुखी विस्फोटों ने कोढ़ में खाज का काम किया. इनमें से एक विस्फोट दस अप्रैल, 1815 को इंडोनेशिया के तंबोरा में भी हुआ जिसे आधुनिक इतिहास की सबसे बड़ी ज्वालामुखी त्रासदी माना जाता है. इस घटना में क़रीब एक लाख लोगों ने जान गंवाई थी. तब चेन्नई जैसे शहर का भी तापमान माइनस में चला गया था जो कि आम तौर पर सर्दियों के दिनों में भी गर्म रहता है. उस साल दुनिया के अधिकतर हिस्सों में गर्मी का मौसम ही नहीं आया था.

लेकिन राहत इस बात की है कि कई विश्लेषक इस बात से इत्तेफाक़ नहीं रखते कि इस बार हमें माउन्डर या डॉल्टन मिनिमम जैसी घटनाओं का सामना करना पड़ेगा. सौर विज्ञानी अलेक्ज़ेंडर शापिरो भी इनमें से एक हैं. वे सोलर सिस्टम रिसर्च से जुड़े जर्मनी के मैक्स प्लेंक इंस्टीट्यूट को अपनी सेवाएं देते हैं. शापिरो बताते हैं, ‘पिछले पचास साल में कई बार असामान्य सौर गतिविधियां देखने को मिली है. इस बार भी कुछ वैसा ही है. यह सही है कि ये सौर चक्र पिछले चार चक्रों से भी ज़्यादा कमज़ोर नज़र आ रहा है. लेकिन ये उतना कमज़ोर साबित नहीं होगा जैसा कि कई लोग कयास लगा रहे हैं. यदि हम सौर गतिविधियों के पिछले एक हजार साल के इतिहास के परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह सौर चक्र हमें डरने की कोई वजह नहीं देता है.’

अमेरिकी वैज्ञानिक एजेंसी नेशनल ओशिअनिक एंड एट्मॉस्फियरिक एडमिनस्ट्रेशन के मुताबिक सौर चक्र-25 की शुरुआत भले ही धीमी हो सकती है, लेकिन 2023 से 2026 के बीच एक दमदार सोलर मैक्सिमम देखने को मिल सकता है. अनुमान है कि इस चक्र के अन्य वर्षों के अतिरिक्त इन तीन साल के अंतराल में ही 95 से 130 तक सनस्पॉट नज़र आ सकते हैं. यह संख्या इसलिए संतोषजनक मानी जा सकती है क्योंकि 11 वर्ष के पूरे सौर चक्र में औसतन 140 से 220 सनस्पॉट नज़र आते हैं. नेशनल ओशिअनिक एंड एट्मॉस्फेरिक एडमिनस्ट्रेशन के विश्लेषकों का मानना है कि सौर चक्र-25 बीते चार सोलर साइकल के कमज़ोर रहने का क्रम तोड़ने वाला साबित होगा.

वहीं कुछ अन्य सौर विज्ञानियों के मुताबिक यदि कोई बड़ा सोलर मिनिमम घटित होता भी है तो उसकी भूमिका पृथ्वी पर उस अतिरिक्त गर्मी को कम करने तक ही सीमित रहेगी जो तमाम इंसानी गतिविधियों के चलते यहां पैदा हुई है. इन विज्ञानियों का अनुमान है कि मनुष्य दशकों तक चलने वाले सोलर मिनिमम से भी छह गुना ज्यादा गर्मी पृथ्वी पर पैदा कर चुके हैं.

बहरहाल, इस पूरी चर्चा को यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग (यूके) में स्पेस फ़िज़िक्स के प्रोफ़ेसर मैथ्यू ओएन्स के शब्दों में समेटा जा सकता है. न्यूज़वीक नाम की एक अमेरिकी समाचार संस्था को लिखे एक ईमेल में ओएन्स कहते हैं ‘यूं तो सोलर मिनिमम की घटना सामान्य सौर चक्र का हिस्सा है. लेकिन मौजूदा मिनिमम उतना सामान्य भी नहीं है. यदि ये ऐसे ही चलता रहा तो सबसे लंबा मिनिमम बन सकता है. पर अभी से इसकी भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है, क्योंकि ठीक पिछला सोलर मिनिमम (2009-10) ही इससे लंबा था. पिछले सौर चक्रों को देखते हुए मुझे स्थिति में जल्द सुधार की उम्मीद नज़र आती है. लेकिन इस बारे में भी स्पष्ट तौर पर कह पाना जल्दबाज़ी होगी... सूरज हमें कभी भी चौंका सकता है!’