जर्मन शोधकों ने हाल ही में जर्मनी में कोरोना वायरस से संक्रमित हुए लोगों के शुरुआती समूह का फिर से अध्ययन किया. इसमें उन्होंने पाया कि इससे पहले कि कोरोना वायरस से संक्रमित कोई व्यक्ति अपने भीतर कोई लक्षण महसूस कर सके, वह दूसरों को संक्रमित कर सकता है! कम से कम 16 मामलों में उन्होंने यह पाया कि इससे पहले कि संक्रमित लोग स्वयं जान पाते कि वे शायद ‘सार्स-कोव-2’ से संक्रमित हैं, उनके संपर्क में आये दूसरे लोग भी उससे संक्रमित हो चुके थे. इन वैज्ञानिकों को संदेह है कि संभवतः पांच और मामलों में भी ऐसा ही हुआ था. उन्होंने कम से कम चार ऐसे मामले पाये, जिनमें किसी व्यक्ति ने दूसरों को अनजाने में ठीक उसी दिन संक्रमित कर दिया, जिस दिन उसे अपने प्रथम लक्षण महसूस होने शुरू हुए थे.

जर्मनी के ही बॉन विश्वविद्यालय की एक टीम ने, देश में संक्रमण शुरू होने के आरंभिक चरण में, एक छोटे-से शहर के 405 परिवारों के 919 सदस्यों के बीच एक अध्ययन किया था. इसमें उन्होंने पाया कि उस समय वहां करीब 15 प्रतिशत लोग संक्रमित थे. लेकिन इन संक्रमितों में से 22 प्रतिशत में टेस्ट के समय बीमारी के कोई लक्षण नहीं थे. उन्हें रत्ती भर भी ऐसा महसूस नहीं हो रहा था कि वे बीमार हैं. इसके आधार पर अध्ययनकर्ताओं ने अनुमान लगाया कि मई महीना आने तक जर्मनी में कुल 18 लाख ऐसे लोग रहे होने चाहिये, जो संक्रमित तो होंगे, पर उनमें संक्रमण के लक्षण नहीं दिख रहे होंगे. दूसरे शब्दों में, मई के आरंभ में जर्मनी में जितने लोग टेस्ट में संक्रमित पाये गये थे, उनकी अपेक्षा उन लोगों की संख्या दस गुना अधिक रही होगी, जो संक्रमित तो थे, पर इसे जानते-पहचानते नहीं थे.

स्वास्थ्यकर्मियों के लिए असाध्य चुनौती

यह तथ्य कि संक्रमितों की अज्ञात संख्या, ज्ञात संख्या से कई गुना अधिक हो सकती है और साथ ही कोरोना वायरस की संक्रामकता किसी संक्रमित व्यक्ति में अपने प्रथम लक्षण दिखाने से पहले ही, या लक्षण उभरने के शुरू में ही, इतनी प्रबल हो सकती है कि दूसरे लोग भी उससे संक्रमित होने लगें, स्वास्थ्यकर्मियों के लिए एक असाध्य चुनौती बन सकती है. जर्मन शोधकों का कहना है कि इस वजह से संक्रमण के कई मामलों में समय रहते कोई कदम उठा सकना बहुत ही मुश्किल सिद्ध होगा.

आशंका है कि इस जानकारी के प्रकाश में ‘कोविड-19 की वैश्विक स्तर पर रोकथाम बेहद दुष्कर बनने जा रही है.’ जर्मनी के कोलोन विश्वविद्यालय-अस्पताल के डॉक्टरों का अनुमान है कि संक्रमण फैलने के लगभग आधे मामले, किसी व्यक्ति में लक्षण उभरने से पहले ही, उसके माध्यम से अन्य लोगों में भी संक्रमण फैल जाने के मामले होते हैं. इन पर केवल संपर्क अनुरेखण ऐप (कॉन्टैक्ट ट्रेस ऐप) जैसी नयी तकनीकों के माध्यम से ही किसी हद तक लगाम लगायी जा सकती है.’

‘लंदन स्कूल ऑफ़ हायजिन ऐन्ड ट्रॉपिकल मेडिसिन’ की डॉ. अनेलीस वाइल्डर-स्मिथ ने इस शोध पर टिप्पणी करते हुए लिखा है, ‘वही देश, जिन्होंने कठोरता के साथ ‘कॉन्टैक्ट ट्रेस ऐप’ का उपयोग किया, नये संक्रमणों को सीमित रखने में सबसे अधिक कारगर रहे. दक्षिण कोरिया, ताइवान, थाइलैंड, वियतनाम और सिंगापुर इसके उदाहरण हैं.’’ जो लोग लोकतंत्र में अपनी निजी स्वतंत्रताओं को राज्य को सौंपे गये सबकी जीवनरक्षा के दायित्व से ऊपर मानते हैं, उन्हें इस टिप्पणी पर ध्यान देना चाहिये. सोचना चाहिये कि बिना जीवन के क्या निजी स्वतंत्रताओं को जिया जा सकता है! लेकिन राज्यों को भी जीवनरक्षा की आड़ में लोगों के जीवन में अनावश्यक हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए.

दुनिया के प्रमुख वायरस वैज्ञानिकों का अब यह भी कहना है कि ‘सार्स-कोव-2’ कहलाने वाला इस समय का नया वायरस दुनिया को अभी लंबे समय तक छकाता रहेगा. वह इतना बहुरूपिया और छलिया है कि उसके सारे छल-कपटों की कलई अभी तक खुल नहीं पायी है. उससे मरने वालों की बढ़ती हुई शवपरीक्षाओं (पोस्टमार्टम) से उसके रहस्यमय चरित्र के नित नये पहलू सामने आ रहे हैं.

कोविड-19 बहुअंगी बीमारी है

अब तक यह समझा जाता रहा है कि कोविड-19 इतनी घातक इसलिए होती है क्योंकि वह अपने सबसे बुरे स्वरूप में लोगों के फेफड़ों को खराब कर देती है. जर्मनी में हैम्बर्ग विश्वविद्यालय-अस्पताल के शोधकों ने पाया कि कोविड-19 केवल फेफड़ों की नहीं बल्कि एक एक बहुअंगी बीमारी है. उसका वायरस शरीर के और भी महत्वपूर्ण अंगों में पहुंच कर उन्हें क्षतिग्रस्त या पूरी तरह से खराब कर सकता है. शोधकों की टीम के मुखिया डॉ. टोबियास हूबर का कहना है कि उनके अस्पताल में इस बीमारी से मरे लोगों में से 27 की शवपरीक्षाओं से पता चला कि उनके फेफड़ों के बाद शरीर के गुर्दे (किडनी) दूसरे सबसे अधिक प्रभावित अंग थे. इनमें से 50 प्रतिशत ने काम करना बंद कर दिया था.

यह भी कई बार देखनें में आया है कि कोरोना वायरस हृदय, यकृत (लिवर), मस्तिष्क और रक्त में पहुंच कर उन्हें भी क्षतिग्रस्त करते हैं. उनकी सबसे अधिक मात्रा श्वसनतंत्र की कोशिकाओं में मिलती है. पीड़ितों के पेशाब में जो असामान्यताएं मिलती हैं, वे गु्र्दों के क्षतिग्रस्त होने के कारण ही पैदा होती हैं. कोविड-19 के मामले में 80 प्रतिशत मौतें शरीर के एक से अधिक अंगों के क्षतिग्रस्त हो जाने से होती हैं. सघन चिकित्सा इकाई (आईसीयू) में जिन लोगों का उपचार करना पड़ता है, उनमें से एक-तिहाई को वास्तव में गुर्दों का काम करने वाली डाइलिसिस की ज़रूरत होती है. डॉ. टोबियास हूबर का कहना है कि इटली, स्पेन और अमेरिका में मृतकों की भारी संख्या का एक बड़ा कारण वहां डाइलिसिस मशीनों की भारी कमी पड़ जाना भी है.

हैम्बर्ग के विश्वविद्यालय-अस्पताल के ही डॉ. स्तेफ़ान क्लूगे की टीम को 12 मृतकों की शवपरीक्षाओं से पता चला कि उनमें से सात की मृत्यु पैरों जैसे शरीर के निचले भाग की रक्तवाहिकाओं में रक्त के थक्के बन जाने से हुई थी. चार की मृत्यु फेफड़ों में एम्बोली के कारण रक्तप्रवाह बाधित होने से हुई थी, हालांकि उनकी मृत्यु से पहले ऐसे कोई संकेत नहीं देखे गये थे. ये परिणाम कुल 190 मृतकों की शवपरीक्षाओं का निचोड़ हैं. मृतकों की बढ़ती हुई शवपरिक्षाओं के बिना ये तथ्य सामने नहीं आ पाये होते.

बच्चे भी उतने ही संक्रमणकारी जितने वयस्क

बर्लिन के सबसे बड़े अस्पताल ‘शारिते’ के मुख्य वायरसविद डॉ. क्रिस्टियान द्रोस्टन का कहना है कि बच्चों को कोविड-19 हालांकि अपेक्षाकृत कम ही होता है, पर श्वासनली के पास वाले उनके मुंह के ऊपरी तलवे में लगभग उतने ही वायरस मिलते हैं, जितने वयस्कों में पाये जाते हैं. ‘शारिते’ के वायरसविदों ने ‘सार्स-कोव-2’ से संक्रमित 3712 रोगियों के ऊपरी तलवे से लिए गये वायरस-नमूनों की तुलना बच्चों के साथ की. इनमें 37 किंडरगार्टन बच्चे, 16 प्राथमिक स्कूल बच्चे और 74 किशोरवय बच्चे थे.

डॉ. द्रोस्टन के अनुसार, इन परिणामों से यही संकेत मिलता है कि बच्चे भी प्रत्यक्षतः उतने ही संक्रमणकारी हो सकते हैं, जितने वयस्क होते हैं. चीन में शंघाई और शेनज़ेन में हुए दो अध्ययनों से भी लगभग यही बात सामने आयी है. इसे देखते हुए बर्लिन के शोधकों ने आगाह किया है कि स्कूलों और किंडरगार्टनों को पुनः खोलने में जल्दबाज़ी न की जाये!

अप्रैल महीने का अंत आते-आते ऐसी ख़बरें भी सबको स्तब्ध करने लगीं कि ‘सार्स-कोव-2’ से संक्रमित कतिपय बच्चों की बीमारी में एक ऐसी जटिलता देखी जा रही है, जिसका पहले कोई आभास तक नहीं था. पेरिस में इस संक्रमण वाले गंभीर रूप से बीमार 15 बच्चों में कुछ ऐसे लक्षण देखे गये, जो अन्यथा ‘कावासाकी सिंन्ड्रोम’ नाम की बीमारी में हुआ करते हैं. इसके मुख्य लक्षण होते हैं रक्तवाहिनियों में जलन-सूजन, कई-कई दिन तक बुख़ार और शरीर पर दिदोरे (रैश) पड़ जाना. यही बात ब्रिटेन में भी कुछ बच्चों में देखी गयी. जल्द ही अमेरिका, इटली, स्पेन और स्विट्ज़रलैंड के डॉक्टर भी अपने यहां इस प्रकार के मामले पाने लगे. अमेरिका के न्यूयॉर्क राज्य में इस तरह तीन बच्चों की मृत्यु भी हो गयी.

इस बीच कहा जा रहा है कि इन लक्षणों वाले अधिकतर बच्चे ‘सार्स-कोव-2’ से संक्रमित थे, पर सभी बच्चे नहीं. ‘कावासाकी सिंन्ड्रोम’ के मामले ‘कोविड-19’ से पहले भी होते रहे हैं. जर्मनी की ‘बाल-संक्रामकता रोकथाम संस्था’ के अनुसार, यहां हर वर्ष क़रीब 450 बच्चे ‘कावासाकी सिंन्ड्रोम’ से पीड़ित होते हैं. किंतु ब्रिटेन में इससे कुछ ऐसी हड़बड़ी मच गयी कि वहां की विज्ञान पत्रिका ‘लैन्सेट’ को इन मामलों को ‘अपूर्व’ कहना पड़ा.

10 दिनों के भीतर ही ब्रिटेन के आठ बच्चों को ‘हाइपर इन्फ्लामेटरी शॉक’ (अतिप्रदाही आघात) की स्थिति से गुज़रना पड़ा. ये सभी बच्चे इससे पहले पूर्णरूपेण फ़िट और स्वस्थ थे. इस स्थिति का मूल कारण पूरी तरह स्पष्ट नहीं है. अब अनुमान यह लगाया जा रहा है कि ‘सार्स-कोव-2’ से संक्रमित बच्चों की रक्तवाहिकाओं में जलन एवं सूजन उनकी रोगप्रतिरक्षण प्रणाली द्वारा उन्हें लगे संक्रमण से लड़ने की अतिरंजित प्रतिक्रिया का परिणाम होना चाहिये. दूसरे शब्दों में, कोरोना वायरस के संक्रमण से शरीर की अपनी ही रोगप्रतिरक्षण प्रणाली का अपने ही अंगों के प्रति घातक रूप से आक्रामक हो जाना भी असंभव नहीं है.