‘पाताल लोक’ के हर एपीसोड की शुरुआत में स्क्रीन पर वही डिस्क्लेमर आता है जो सिनेमा और वेब सीरीज के सभी शौकीनों को याद ही होगा - इस कहानी के सभी पात्र और घटनाएं काल्पनिक हैं और इनका वास्तविक जीवन में किसी पात्र या घटना से मिलना महज एक संयोग माना जाए. डिस्क्लेमर यह नहीं कहता कि इस वेब सीरीज की कहानी का कोई हिस्सा अगर किसी उपन्यास या कहानी से मिलता लगे तो उसे भी संयोग ही माना जाए. लेकिन अगर वह ऐसा कुछ कहता भी तो वह सही नहीं होता.

क्योंकि ऐसे किसी मिलान को तभी तक संयोग कहा जा सकता है जब तक वह आटे में नमक जैसा हो. अगर आपने इन दिनों हर तरफ छाई हुई एमेजॉन प्राइम की वेब सीरीज ‘पाताल लोक’ के नौ एपीसोड देखें हों और करीब 11 साल पहले आया एक चर्चित उपन्यास भी पढ़ा हो, तो आपको इन दोनों की समानता संयोग नहीं लग सकती. तब आपको साफ-साफ ऐसा लगेगा जैसे कल जो आपने पढ़ा था आज आपके सामने घट रहा है - वही घटनाएं, वही पात्र, लगभग उसी क्रम में.

चर्चित पत्रकार और तहलका मैगजीन के संस्थापक और संपादक रहे तरुण तेजपाल के उपन्यास - ‘द स्टोरी ऑफ माई असेसिन्स’ - की शुरुआत एक बड़े पत्रकार के कत्ल की साजिश के आरोप में पांच लोगों की गिरफ्तारी से होती है. इसके बाद प्लॉट इन पांचों के अतीत के साथ मामले की जांच कर रहे पुलिसवाले के मौजूदा संघर्षों की डोर थामकर आगे बढ़ता है. आखिर में किस्सा एक ऐसी जगह जाकर खत्म होता है जहां हम पाते हैं कि जो दिखता था वह था नहीं. वेब सीरीज में भी यह सिलसिला लगभग इसी तरह दोहराया जाता है.

तो सवाल उठता है कि ‘पाताल लोक’ के क्रेडिट्स में कहीं भी तरुण तेजपाल का नाम क्यों नहीं है?

इस सवाल पर हो रहे बवाल के बाद सीरीज के कार्यकारी निर्माता और लेखक सुदीप शर्मा का बयान आया है कि ‘द स्टोरी ऑफ माइ असेसिन्स’, ‘पाताल लोक’ का छोटा सा हिस्सा भर है. लेकिन जिसने भी तेजपाल के उपन्यास को पढ़ा है और सीरीज देखी है वह बिना हिचक कह सकता है कि ‘पाताल लोक’ का छोटा सा नहीं बल्कि 80 फीसदी हिस्सा ‘द स्टोरी ऑफ माइ असेसिन्स’ ही है. इंस्पेक्टर हाथीराम से लेकर चीनी, कबीर एम, हथौड़ा त्यागी और दुनलिया गुज्जर तक ‘द स्टोरी ऑफ माइ असेसिन्स’ के सारे किरदार काफी हद तक वेब सीरीज में उसी तरह से मौजूद हैं. कुछ ऐसा ही चित्रकूट से लेकर दिल्ली के निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन तक उन तमाम जगहों के बारे में भी कहा जा सकता है जहां इन किरदारों की जड़ें हैं. जैसा कि थोड़ी ही देर पहले जिक्र हुआ, वेब सीरीज का कथानक भी उपन्यास की तरह ही आगे बढ़ता है और कमोबेश उसी तरह खत्म भी होता है.

और सीरीज में जो 20 फीसदी बदलाव हैं वे ऐसे ही हैं जैसे आप किसी कमरे में रखे गए फर्नीचर को थोड़ा इधर-उधर खिसका दें. मेज को किसी दूसरी दीवार से सटा दें या फिर सोफे का कुशन कवर बदल दें. इससे ज्यादा से ज्यादा सजावट थोड़ी सी बदलने का आभास होता है, कमरा नहीं बदल जाता. मिसाल के तौर पर सीरीज में हथौड़ा त्यागी की मौत का दृश्य बदल दिया गया है. या साजिश में गिरफ्तार लोगों की संख्या पांच की जगह चार दिखाई गई है या फिर हाथीराम के असिस्टेंट के रूप में अंसारी नाम का एक नया किरदार खड़ा कर दिया गया है. लेकिन इससे यह नहीं कहा जा सकता कि ‘इस वेब सीरीज की कहानी का कोई हिस्सा अगर किसी उपन्यास या कहानी से मिलता लगे तो वह भी संयोग ही होगा.’

यहीं इस मुद्दे का सिरा तरुण तेजपाल पर चल रहे अदालती मामले से जुड़ता दिखता है. सवाल उठता है कि क्या ‘पाताल लोक’ से उनका नाम इसलिए गायब हुआ है क्योंकि इस वरिष्ठ पत्रकार पर एक आपराधिक मामला चल रहा है? क्या इस वेब सीरीज के निर्माता नहीं चाहते थे कि तरुण तेजपाल का नाम उनसे जुड़े क्योंकि इससे उनकी परेशानी बढ़ाने वाला विवाद पैदा होगा? क्योंकि अतीत में ऐसा हो चुका है.

इन सवालों के जवाब में और भी सवाल उठते हैं जिनका संबंध एक बड़े संदर्भ से है. क्या किसी लेखक का नाम और उसकी रचना सिर्फ इसलिए अछूत हो जाने चाहिए कि वह किसी अदालती मामले का सामना कर रहा है? क्या साहित्य, कला और संगीत को इस तरह से बरता जा सकता है? इस देश को जो राजनीति चला रही है उसमें ही देखें तो कितने ही गंभीर आरोपों के साथ अदालती मामलों का सामना कर रहे लोग न सिर्फ चुनाव लड़ते हैं बल्कि संसद और विधानसभाओं में पहुंचकर कानून भी बनाते हैं. वहां तर्क दिया जाता है कि कोई भी शख्स आरोप साबित होने तक निर्दोष है. यही तर्क अगर कोई चाहे तो तरुण तेजपाल के लिए भी दे सकता है.

और अदालत से दोषी साबित होने के बाद भी क्या कला और साहित्य जैसे काम अछूत माने जा सकते हैं? दिल्ली की ही तिहाड़ जेल में बंद कैदी पापड़ से लेकर डिजाइनर कपड़े तक बनाते हैं और उन्हें मेड इन तिहाड़ कहकर ही बेचा जाता है. इन दिनों ये कैदी कोरोना वायरस से लड़ाई के मैदान में डटे योद्धाओं के लिए मास्क और हैंड सैनिटाइजर भी बना रहे हैं. जेल में रहते हुए लोगों के पढ़ाई-लिखाई या कोर्स करने और नौकरी पाने के उदाहरण भी हैं. यानी आरोपित ही नहीं, अपराधी का अच्छा काम भी मान्यता और यथोचित सम्मान का हकदार माना जाता है. और उपन्यास लिखना कोई संसद चलाने और कानून बनाने जैसा ऐसा भी कोई कार्य नहीं है जो लोगों की जिंदगी को सीधे-सीधे प्रभावित कर सकता हो. तो लोगों को किसी आरोपित के इस स्तर के लेखन से क्या आपत्ति हो सकती है.

इस लिहाज से कहा जा सकता है कि ‘पाताल लोक’ के लिए तरुण तेजपाल को कोई श्रेय न देकर इसके निर्माताओं ने वही पूर्वाग्रह दिखाया है जो ‘द स्टोरी ऑफ माइ असेसिन्स’ और उस पर आधारित यह वेब सीरीज दिखाती है. यह बताती है कि भारत में समाज का एक बड़ा हिस्सा सिद्धांतों और नैतिकता के बजाय पूर्वाग्रह के ठप्पों और आदर्शहीन व्यावहारिकता से चलता है. तरुण तेजपाल पर भी एक ठप्पा है और शायद ‘पाताल लोक’ के निर्माताओं ने सोचा होगा कि ऐसे में उनका नाम सीरीज से जुड़ा तो उसे व्यावसायिक नुकसान हो सकता है.

लेकिन यहीं पर एक दूसरा सवाल उठता है. ‘द स्टोरी ऑफ माइ असेसिन्स’ 2009 में लिखा गया था. तरुण तेजपाल पर मामला 2013 में दर्ज हुआ. बताया जाता है कि एमेजॉन ने इस किताब के अधिकार 2015 में खरीदे थे. यानी निर्माताओं ने उन पर चल रहे मामले की जानकारी रखते हुए ही उपन्यास के अधिकार खरीदे थे. तो फिर ऐसा क्या हुआ कि निर्माताओं ने खुद को तरुण तेजपाल से दूर कर लिया?

सूत्रों के हवाले से चल रही खबरें बता रही हैं कि ऐसा तब हुआ जब हॉलीवुड के मशहूर फिल्म निर्माता हार्वी वाइंस्टीन पर यौन शोषण के आरोप लगने के बाद 2018 में दुनिया भर में मीटू अभियान ने जोर पकड़ा. इसके बाद एमेजॉन इंडिया की मूल कंपनी एमेजॉन यूएस ने इस सीरीज को छोड़ने का फैसला कर लिया था. तब तक तरुण तेजपाल पर भी यौन शोषण का मामला दर्ज हो चुका था. वाजपेयी सरकार के दौरान रक्षा सौदों में भ्रष्टाचार का भांडाफोड़ करने वाले मशहूर स्टिंग ऑपरेशन के बाद से तरुण तेजपाल दक्षिणपंथी विचारधारा के निशाने पर भी रहे हैं. ऐसे में मीटू अभियान शुरू होने के बाद हो सकता है एमेजॉन यूएस को लगा हो कि अब सीरीज पर आगे बढ़ना समझदारी नहीं होगी. क्योंकि इस अभियान के साथ-साथ इसकी आड़ में वे लोग भी मुश्किल बन सकते हैं जो तरुण तेजपाल को पहले से ही पसंद नहीं करते थे.

लेकिन बताया जाता है कि सुदीप शर्मा इस पर अड़े रहे. उनका कहना था कि यह किताब सिर्फ शुरुआती बिंदु है और इसमें काफी बदलाव कर दिए गए हैं. एक साक्षात्कार में वे खुद ही कहते हैं कि ‘द स्टोरी ऑफ माइ असेसिन्स’ से एक लाइन का प्लॉट लिया गया और फिर लेखकों ने अलग-अलग सिचुएशंस लिखीं. सुदीप शर्मा के शब्दों में, ‘हमारी कहानी में कई दूसरे पहलू जोड़े गए हैं. हमने फैसला किया कि इसे एक पुलिसवाले की नजर से देखा जाए.’

एमेजॉन प्राइम की तरफ से भी यही बयान आया है कि यह सीरीज ‘द स्टोरी ऑफ माइ असेसिन्स’ से हल्की सी प्रेरित है. कंपनी के मुताबिक तरुण तेजपाल की इसके निर्माण के किसी भी चरण में भागीदारी नहीं रही है. उसका यह भी कहना है कि यह सीरीज एक ईमानदार पुलिसवाले की कहानी है जो अपराध के एक गहरे गठजोड़ का पता लगाता है.

लेकिन ऐसे दावों पर भी बड़ा सवाल है. कुछ साल पहले हुई एक बातचीत के दौरान तरुण तेजपाल ने इन पंक्तियों के लेखक से जिक्र किया था कि सीरीज में कहानी को उपन्यास से थोड़ा सा अलग तरीके से रखा जाएगा. उनके मुताबिक इंस्पेक्टर हाथीराम के नजरिये से दिखाने का आइडिया उन्होंने ही एक बैठक के दौरान सुदीप शर्मा को दिया था. इसके पीछे विचार था कि यह एक ऐसा किरदार है जो स्वर्ग लोक (अमीरों) और पाताल लोक (वंचितों) की जिंदगी को काफी करीब से देखता है, इसलिए केंद्र में उसे रखना बेहतर होगा. यानी सीरीज के ट्रीटमेंट हुए बदलाव में भी शायद तरुण तेजपाल की ही भूमिका है.

11 साल पहले जब ‘द स्टोरी ऑफ माइ असेसिन्स’ आया था तो इसने पूरी दुनिया में सुर्खियां बटोरी थीं. साहित्य के नोबेल विजेता वीएस नायपॉल ने इसकी तारीफ करते हुए कहा था कि इसमें असाधारण मौलिकता है. चर्चित लेखक खुशवंत सिंह ने इसे मास्टरपीस बताया था. लेखन की दुनिया के एक और मशहूर नाम पंकज मिश्रा ने लिखा था कि इस उपन्यास ने भारत में हो रहे अंग्रेजी लेखन में ऐसे ऊंचे प्रतिमान स्थापित कर दिए हैं जिन्हें छूना बहुत मुश्किल होगा. ‘द स्टोरी ऑफ माइ असेसिन्स’ को लेकर बहुत से लोगों का यह भी मानना है कि भारतीय समाज में जाति-धर्म-भाषा जैसी तमाम दरारों और इन्हें पोसने और इनसे पोषण पाने वाली राजनीति का सजीव खाका खींचने वाली किताबों की सूची में इसे सबसे ऊपर होना चाहिए.

क्या किसी ऐसी किताब के लेखक को सिर्फ इसलिए उसकी कहानी के दूसरे रूपों से दूर रखना सही होगा कि वह किसी अदालती मामले का सामना कर रहा है. अगर संगीत को भाषा के दायरे में नहीं बांधा जा सकता है और कला को सरहदों के, तो लेखन को इस तरह की संकीर्णता के दायरे में बांधने को कैसे ठीक ठहराया जा सकता है?