पाकिस्तान के कराची में हुए विमान हादसे से ठीक पहले का एक ऑडियो सामने आया है. इसमें विमान के पायलट और एयर ट्रेफ़िक कंट्रोलर (एटीसी) के बीच की बातचीत रिकॉर्ड है. इस ऑडियो को दुनिया भर में एयर ट्रेफिक कंट्रोल से जुड़ी संचार सेवाएं (लाइव फीड) उपलब्ध करवाने वाली वेबसाइट लाइवएटीसी.नेट ने सार्वजनिक किया है. इस बातचीत का संपादित अंश कुछ यूं है-

पायलट : पीके 8303 पहुंच रहा है.

एटीसी : जी सर.

पायलट : हमें बायें मुड़ना है?

एटीसी : जी.

पायलट : हम सीधा उतर रहे हैं, हमारे दोनों इंजन ख़राब हो गए हैं.

एटीसी : क्या आप बेली लैंडिंग (गियर के बिना लैंडिंग) कर रहे हैं?

पायलट : (अस्पष्ट)

एटीसी : 25 पर लैंड करने के लिए रनवे उपलब्ध है.

पायलट : रोज़र.

पायलट : सर मे-डे, मे-डे, मे-डे, पाकिस्तान 8303...

और इसके थोड़ी देर बाद विमान दुर्घटनाग्रस्त हो जाता है.

सवाल है कि अपने आख़िरी संदेश में पायलट ने तीन बार जो ‘मे-डे’ शब्द कहा उसके क्या मायने हैं? ज़ाहिर सी बात है कि इसका अभी चल रहे महीने यानी ‘मे’ से कोई लेना-देना नहीं है. दरअसल यह एक कोड है जिसका इस्तेमाल किसी विमान का पायलट या पानी के जहाज़ का कप्तान शायद ही कभी करना चाहेगा! इसका मतलब है ‘कोई बहुत बड़ी मुसीबत.’ रेडियो (फ्रीक्वेंसी) कम्युनिकेशन के ज़रिए भेजे जाने वाले इस शब्द का इस्तेमाल सिर्फ़ तभी किया जाता है जब सवाल ज़िंदगी या मौत का हो. जहाज़ और विमानों के अलावा फायर ब्रिगेड और विभिन्न सुरक्षा बल भी ज़रूरत पड़ने पर इस कोड का उपयोग कर सकते हैं. इन क्षेत्रों से जुड़े लोग इसे ‘डिस्ट्रेस कॉल’ भी कहते हैं.

मे-डे संदेश भेजे जाते समय इस बात का ख़ास ख़्याल रखा जाता है कि इसे एक ही रौ में तीन बार कहा जाए. क्योंकि विमान या जहाज़ के केबिन में इतना शोर रहता है कि वहां से भेजे जाने वाले संदेश कई बार स्पष्ट रूप से सुनाई नहीं देते हैं. फ़िर आपातकाल की स्थिति में रेडियो सिग्नल भी आम तौर पर गड़बड़ा जाते हैं. ऐसे में इस शब्द को तीन बार लगातार दोहराकर यह सुनिश्चित किया जाता है कि ग़लती या भ्रम की कोई गुंजाइश ना रहे.

डिस्ट्रेस कॉल का एक ख़ास पैटर्न होता है जिसमें मे-डे कहने के बाद रिसीवर को आवश्यक जानकारी उपलब्ध करवाई जाती है ताकि मिलने वाली मदद के प्रकार और मापदंड को भी तय किया जा सके. जैसे किस तरह का विमान या जहाज है. उसमें कितने लोग सवार हैं. जहां मदद चाहिए वहां का मौसम कैसा है. ईंधन कितना बाक़ी है. किस तरह की मदद चाहिए आदि आदि.

जानकारी के अनुसार मे-डे को डिस्ट्रेस कॉल मानने का चलन 1923 से शुरु हुआ था. ये वो दौर था जब इंग्लैंड और फ्रांस के बीच अच्छा-खासा हवाई ट्रैफ़िक रहता था. इसके अलावा इंग्लिश चैनल पार करते समय भी इन देशों के विमानों और जहाज़ों को खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ता था. तब कोई आपात स्थिति आने पर संदेश के तौर पर ‘एस-ओ-एस’ भेजा जाता था. इसका मतलब होता था सेव अवर सोल्स (हमारी जान बचाओ) या सेव अवर शिप (हमारा जहाज़ बचाओ). लेकिन इसमें कुछ परेशानियां थीं.

पानी के जहाज़ों में तो उचित व्यवस्था होने की वजह से एसओएस को एक स्पष्ट मोर्स कोड (एक तरह का टेलीग्राफ़) के ज़रिए रिसीवर तक भेज दिया जाता था. इसमें एसओएस को तीन डॉट, तीन डैश और तीन डॉट (...–-...) के द्वारा दर्शाया जाता था. लेकिन हवाई जहाजों में यह सहूलियत नहीं थी क्योंकि उनमें तब भी कम्युनिकेशन के लिए टेलीग्राफ की बजाय रेडियो का ही इस्तेमाल किया जाता था. ऐसे में एसओएस कभी-कभी भ्रम की स्थिति पैदा कर देता था. जैसे एस की जगह एच या एल सुनाई देना. फ़िर मुसीबत इस बात की थी कि यह संदेश आपातकाल में ही तो भेजा जाता था और तब पायलट के पास इसे समझाने या स्पष्ट करने का वक़्त नहीं होता था.

ऐसे में लंदन के क्रोयडोन एयरपोर्ट के अधिकारियों ने अपने कर्मचारियों से ऐसा शब्द ढूंढने के लिए कहा जो पायलट के साथ-साथ ग्राउंड पर मौजूद लोगों को भी आसानी से समझ आ जाए. कहते हैं कि तब फ्रेडरिक स्टेनली मॉकफोर्ड नाम के एक अधिकारी ने मे-डे शब्द सुझाया था. यह फ़्रेंच शब्द मे’डर (m’aider) से प्रभावित माना है जिसका अर्थ होता है - मेरी मदद करो. मॉकफोर्ड ने यह शब्द पहले विश्वयुद्ध के दौरान तब सुना था जब वे फ्रांस की राजधानी पेरिस में कार्यरत थे.

कहा जाता है कि इस नए शब्द को डिस्ट्रेस कॉल के तौर पर सबसे पहले एक फ्लाइंग बोट (एक तरह का हवाई जहाज़) के पायलट ने काम में लिया था. उस विमान के इंजन इंग्लिश चैनल को पार करते समय फेल हो गये थे. बताते हैं कि उस विमान तक उचित मदद पहुंचा दी गई थी. इसके बाद इस शब्द को सिंगापुर में भी बतौर डिस्ट्रेस कॉल उपयोग में लिया जाने लगा. 1927 में अमेरिका ने भी इसे आधिकारिक रेडियो/टेलीग्राफ़ डिस्ट्रेस सिग्नल के तौर पर स्वीकार कर लिया था.

विशेषज्ञों के मुताबिक कभी-कभी ऐसी स्थिति भी बन जाती है जब किसी विमान/जहाज़ द्वारा भेजी गई डिस्ट्रेस कॉल तकनीकी कारणों के चलते ग्राउंड तक तो नहीं पहुंच पाती, लेकिन निकटवर्ती किसी दूसरे विमान/जहाज़ पर रिसीव हो जाती है. ऐसे में वह विमान/जहाज़ मुसीबत में फंसे दूसरे विमान या जहाज़ की तरफ़ से उस कॉल को तब तक फॉरवर्ड करता है जब तक कि उस पर आवश्यक प्रतिक्रिया न मिल जाए. इसे मे-डे रिले कहा जाता है.

चूंकि मे-डे का इस्तेमाल बेहद गंभीर स्थिति में ही किया जाता है इसलिए कई देशों में इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए अलग-अलग क़ानून भी बनाए गए हैं. अमेरिका की बात करें तो वहां इसका झूठा उपयोग करने पर छह साल तक की जेल और पच्चीस हज़ार डॉलर तक का हर्जाना भरना पड़ सकता है.

मे-डे की ही तरह दुनियाभर में आपातकाल की सूचना देने के लिए कुछ अन्य शब्द भी प्रचलित हैं. जैसे पैन-पैन. यह फ़्रेंच शब्द ‘पेने’ से लिया गया है जिसका मतलब होता है ‘अवरोध’. आम तौर पर इसका इस्तेमाल किसी मैकेनिकल या मेडिकल ज़रूरत के समय किया जाता है. लेकिन सिर्फ़ तभी जब परेशानी बड़ी तो हो लेकिन इतनी भी नहीं कि किसी की जान पर बन आई हो.