हमारे कानों में पड़ रही हजारों मधुमक्खियों के एक साथ गुनगुनाने की सी आवाज लगातार तेज होती जा रहीं थीं. लेकिन उनसे हमें आनंद के बजाय भय की अनुभूति हो रही थी. लगभग 140 लाख वर्ग किमी क्षेत्रफल में फैले, बर्फ से ढके, पृथ्वी के सातवें महाद्वीप अंटार्कटिका में सुनाई दे रही यह गूंज हमारे लिए किसी बड़ी मुश्किल की चेतावनी जैसी थी. इस बेहद दुर्गम क्षेत्र में लगभग डेढ़ मीटर चौड़े, तीन मीटर लंबे और डेढ़ मीटर ऊंचे धातु के एक बख्तरबंद से पोर्टा कैबिन में किसी तरह अटे हुए हम तीनों लोगों के चेहरों पर उस डरावने तूफ़ान की छाया साफ़ देखी जा सकती थी जो हमारे इर्द-गिर्द कई सौ किलोमीटर के इलाके को बुरी तरह झकझोर रहा था.

हम उस वक़्त जिस जगह पर थे वहां से पचासों किलोमीटर तक इंसान या किसी अन्य प्राणी का कोई नामोनिशान तक नहीं था. चारों तरफ शुष्क बर्फ का जबर्दस्त बवंडर था और उस बवंडर के बीच भारत के पहले अंटार्कटिक अनुसंधान केंद्र दक्षिण गंगोत्री अथवा डीजी के बिलकुल करीब हम, आने वाले तूफ़ान की भयावहता से मुकाबला करने के लिए स्वयं को तैयार कर रहे थे.

तब हम लॉकडाउन या क्वारंटीन जैसे शब्दों से तो परिचित नहीं थे मगर आज जब पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि अंटार्कटिका के भीषण एकांत और नीरवता के बीच प्रचंड हिम तूफ़ान से लड़ते हुए जो लगभग 224 घंटे हमने बिताये थे वे किसी घनघोर लॉकडाउन से भी कई गुना त्रासद और जानलेवा थे. इन 224 घंटों में हर पल हमने मृत्यु को बहुत निकट से देखा था और सबसे अलग-थलग पड़ जाने की पीड़ा का भी बहुत गहराई से अनुभव किया था.

1991-92 के ग्यारहवें भारतीय अंटार्कटिका अभियान दल में कला और मानविकी के क्षेत्र से पहले व्यक्ति के रूप में चयनित होने के कारण मैं उस वक्त दक्षिण गंगोत्री केंद्र के निकट बनाये गए एक अस्थाई केंद्र में मौजूद था. हमारा यह अस्थाई केंद्र अंटार्कटिका के एक क्षेत्र विशेष के भू-चुंबकीय अध्ययन के लिए बना था. इस अध्ययन में उस समय अंटार्कटिका की इंडिया बे में खड़े और हमें वहां ले जाने वाले जलयान एमवी थुलेलैंड, भारत के मुख्य केंद्र मैत्री और दक्षिण गंगोत्री के बीच के त्रिभुजाकार क्षेत्र की भू-चुम्बकीय गतिविधियों को मापा जाना था.

चूंकि दक्षिण गंगोत्री केंद्र को असुरक्षित मानकर फरवरी 1989 में हमेशा के लिए छोड़ दिया गया था इसलिए हमारे लिए उसके निकट एक बहुत छोटा सा अस्थायी केंद्र बनाया गया था. मेरे पर्वतारोहण के अनुभव को देखते हुए अभियान के नेता डॉक्टर शरदीन्दु मुखर्जी ने मुझे उस केंद्र का लीडर मनोनीत किया था. मुझे वहां भारतीय भू-चुंबकत्व संस्थान के एक वैज्ञानिक के साथ रहना था. हमारे पास भू चुंबकीय अंकन के लिए एक विशेष उपकरण था, उसे चलाने के लिए एक ख़ास तरह की बैटरी और उसे चार्ज करने के लिए एक छोटा ग्रीन जेनेरेटर. इसके अलावा हमें मैत्री या शिप से संपर्क स्थापित करने के लिए एक एचएफ और एक वीएचएफ उपकरण, कुछ ईंधन और खाद्य सामग्री भी दी गई थी.

हमारा अस्थायी केंद्र तीन अलग-अलग मॉड्यूल्स या धातु के ख़ास तरह के कैबिनों से मिल कर बना था. एक पोर्टा कैबिन हमारे रहने और संचार उपकरणों के लिए था. उससे करीब 15 मीटर दूरी पर एक बड़ा कैबिन था जिसके बाहर अच्छी तरह से बांध कर जेनेरेटर रखा गया था. इस कैबिन के अंदर कुछ ईंधन, एक छोटी किचन टेबल, भू-चुंबकत्व मापने वाला उपकरण, कुछ खाद्य सामग्री और एक ख़ास तरह का स्टोव रखा था. ये दोनों कैबिन बर्फ की सतह से करीब डेढ़ मीटर की ऊंचाई पर ड्रमनुमा आधारों पर स्थापित थे. तीसरा कैबिन हमारा टॉयलेट मॉड्यूल था. चूंकि अंटार्कटिका में शौच करने के कुछ विशेष नियम हैं और वहां मानव मल-मूत्र ऐसे ही छोड़ा नहीं जा सकता इसलिए हमारा यह टॉयलेट मॉड्यूइल उसी हिसाब से डिजाइन किया गया था. यह हमारे पोर्टा कैबिन से करीब बीस मीटर दूर था.

अंटार्कटिका में आने वाले बर्फ के तूफानों और उड़ती बर्फ के कारण पैदा हो जाने वाली दृष्टि शून्यता (जीरो विजिबिलिटी) की स्थिति में एक कैबिन से दूसरे कैबिन तक सुरक्षित आने-जाने के लिए इन तीनों कैबिनों के बीच रस्सियां बांधकर एक सुरक्षित मार्ग सा बना दिया गया था. हमारे इस अस्थाई केंद्र के एक ओर एक बर्फ की सपाट सी पहाड़ी थी जिस पर शिप और मैत्री के बीच आने-जाने वाले हेलीकॉप्टर कभी-कभी हमारी जरुरत का सामान लाने-ले जाने के लिए उतरा करते थे. दूसरी तरफ एक लम्बी ऐंटेनानुमा आकृति थी जो लगातार हिलती रहती थी. यह भारत के पहले अंटार्कटिक केंद्र दक्षिण गंगोत्री की निशानी थी.

अंटार्कटिका में भारतीय दल का अस्थायी केंद्र

दक्षिण गंगोत्री केंद्र का निर्माण आइस शेल्फ में हुआ था. इसमें समुद्र की ओर से लगातार उड़कर आने वाली ड्रिफ्ट आइस जमा होती रहती थी. इसके कारण डीजी केंद्र हर वर्ष बर्फ की तीन से चार मीटर मोटी परत में दब जाता था. कुछ वर्षों तक बर्फ को बुलडोजरों की सहायता से हटा कर उसमें आने-जाने का रास्ता बनाया जाता रहा. मगर जब मुख्य द्वार लगभग 15 मीटर बर्फ के नीचे दब गया तो बर्फ में एक वर्ग मीटर चौड़ी डक्ट बना कर उसके जरिये डीजी केंद्र में जाने के लिए लकड़ी की सीढ़ियां लगा दी गयीं. लेकिन जब ये सीढियां भी दस मीटर से ज्यादा गहरी हो गयीं तो 1989 में डीजी केंद्र को असुरक्षित घोषित कर वह जिस स्थिति में था उसी स्थिति में हमेशा के लिए छोड़ दिया गया.

जिस डक्ट में सीढ़ियां बनायी गयी थीं उसे एक गोल दरवाजे से बंद कर दिया गया था ताकि बर्फ उसके अंदर न भर सके. इसके बाद हर वर्ष वहां जितनी भी बर्फ जमती डक्ट को उतना ही बढ़ाकर ढक्कन को और ऊपर उठा दिया जाता. और डीजी केंद्र के प्रवेश द्वार की पहचान बताने के लिए वहां पर एक ख़ास तरह का हमेशा हिलते रहने वाला ऐंटेना भी लगा दिया गया था.

हमारे अस्थाई केंद्र में जब हमें छोड़ा गया था, तब मौसम एकदम साफ़ था. अगले कुछ दिनों तक किसी भी तरह के तूफ़ान या हिम चक्रवात का उस समय कोई पूर्वानुमान नहीं था. मौसम की यह भविष्यवाणी हमारे मौसम विज्ञानियों के अलावा निकटवर्ती सोवियत और पूर्वी जर्मनी के केन्द्रों ने भी की थी. इसी के चलते भू-चुंबकत्व के अध्ययन के लिए यह समय चुना गया था. जब हम अपने अस्थाई केंद्र में पहुंचे थे तो वहां चारों ओर कई किलोमीटर तक अंटार्कटिका की चमकदार बर्फ की सतह और धूप की झुलसाने वाली तपिश हमारा स्वागत कर रही थी. हैलीकाप्टर जैसे ही हमें छोड़ कर हमारी आंखों से ओझल हुए, अनंत हिम महाद्वीप के उस हिस्से में सिर्फ हम दो व्यक्ति ही रह गए थे. एक मैं और एक भारतीय भू चुंबकत्व संस्थान के युवा वैज्ञानिक राजेश कालरा. हम दोनों के अलावा हमारे आसपास कुछ था तो घोर नीरवता, लगभग ध्वनिशून्यता जैसी स्थिति. प्रकृति का यह निर्मल नजारा हमारे लिए बेहद स्फूर्तिकारक था.

हम दिन में करीब दो बजे वहां पहुंचे थे. पहुंचते ही सबसे पहले हमने अपने संचार उपकरणों को संयोजित किया. जेनेरेटर चला कर बैटरियों को चार्जिंग पर लगाया. फिर राजेश अपने उपकरण चालू करने में जुट गये और मैं तीनों मॉड्यूलों के बीच रोप बांधने में. हमारा पहला दिन बेहद शानदार रहा. जनवरी के जिस अंतिम हिस्से में हम वहां प्रयोग कर रहे थे वह अंटार्कटिका के छह महीने के दिन वाला मौसम था. सूर्य बहुत थोड़े वक्त के लिए डूबता था और रात लगभग होती ही नहीं थी.

अभियान के दौरान हमने ऐसे भी नज़ारे देखे जब सूर्यास्त और सूर्योदय में कुछ ही क्षणों का अंतर था. वैसे तो अंटार्कटिका में कोई टाइम जोन नहीं है लेकिन फिर भी हम भारतीय समय के लिहाज से वहां से लगभग साढ़े चार घंटे आगे थे. यानी जब भारत में रात के दस बज रहे होते, वहां लगभग साढ़े पांच बजे शाम का वक्त होता था. इसके अलावा लगभग पूरी रात रहने वाली सूर्य की चमकदार रौशनी ने भी हमारी बायोलॉजिकल क्लॉक को बुरी तरह भ्रमित कर दिया था. इसलिए अंटार्कटिका में सोने के लिए हमें खासी मेहनत करनी पड़ रही थी. मैत्री या शिप के अंदर तो स्थितियां फिर भी ठीक थीं लेकिन दक्षिण गंगोत्री के हिम बियाबान में सो पाना काफी मुश्किल था. और फिर हमारे पोर्टा कैबिन में भी इतनी जगह नहीं थी कि हम ठीक से हाथ-पांव भी फैला सकें.

बहरहाल पहला दिन ठीक से बीत गया. हमारे उपकरण ठीक काम कर रहे थे. जहाज से चलते समय हमें इतना खाना दे दिया गया था कि वह हमारे एक दो-दिन के लिए काफी था. हमें बताया गया था कि शिप और मैत्री के बीच की उडानों के दौरान हमें लगातार ताजा भोजन पहुंचाया जाता रहेगा. इसलिए भोजन को लेकर हमें पूर्ण निश्चिंतता थी. लेकिन दूसरी रात हमारे रिकार्डर ने थोड़ा तंग करना शुरू कर दिया. चूंकि हमें लगातार रिकार्डिंग करनी थी इसलिए कालरा ने सुबह होते ही अपने वरिष्ठों को इस समस्या से अवगत करा दिया. यह तय हुआ कि शिप में मौजूद साथी वैज्ञानिक के जीवा पहली सॉर्टी से हमारे पास एक नया उपकरण भिजवा देंगे.

ग्यारह बजे के आसपास नौसेना के दो चेतक हेलीकाप्टर, जिन्हें अंटार्कटिका में पेंग्विन के नाम से पुकारा जाता था, हमारे पास उपकरण लेकर आ गए. मैत्री से वापस लौटते हुए उन्हें हमारे पास से ख़राब उपकरण लेना था. जब वे वापस आये तो वह हमारे दिन के खाने का समय था. रेडीमेड पुलाव की महक इतनी शानदार थी कि उसने शिप का एक जैसा खाना खाकर ऊब चुके हमारे उन साथियों को ललचा दिया. इस बीच कालरा ने पाया कि समस्या रिकार्डर में नहीं बल्कि उसके कंप्यूटरनुमा हिस्से में है. इसे सही करने के लिए जीवा को कुछ समय के लिए हमारे पास आना था. उन्हें लाने के लिए अपने दो साथियों को भोजन के लिए हमारे पास छोड़कर दोनों हेलीकॉप्टर शिप के लिए रवाना हो गए और करीब डेढ़ घंटे में एक हेलीकाप्टर जीवा को लेकर वापस भी आ गया.

एमवी थुलेलैंड और गोविंद पंत राजू

जीवा ने जल्द ही अपना काम ख़त्म कर लिया और जब हेलीकाप्टर वापस जाने की तैयारी करने लगा तब इस बात का अहसास हुआ कि अब वापस जाने के लिए कुल पांच लोग हो गए हैं. जबकि इन हैलीकाप्टरों में अधिकतम चार लोग ही बैठ सकते थे. जीवा शरीर से थोड़ा भारी भी थे और अंटार्कटिका में उड़ानों के दौरान सुरक्षा नियमों का अत्यंत कड़ाई से पालन किया जाता है. यह तय किया गया कि जीवा को अब कल की पहली उडान से शिप में वापस ले जाया जायेगा. जीवा ने भी इसे प्रसन्न भाव से स्वीकार कर लिया क्योंकि यहां उसे शिप के बंधे-बधाये ढ़र्रे से अलग एक नया अनुभव हासिल करने का सुनहरा अवसर मिल रहा था. हमें भी इस पर कोई आपत्ति नहीं थी. सोने के लिए जगह की कमी का तो कोई रोना था ही नहीं क्योंकि नींद तो आनी ही नहीं थी. तो इस तरह जीवा के लिए वह शाम अंटार्कटिका की हिम सतह पर उन्मुक्त जी सकने वाली यादगार शाम बन गयी.

लेकिन यह प्रसन्नता ज्यादा समय तक नहीं टिकी सकी. देर शाम से ही सारे पूर्वानुमानों को धता बताकर मौसम का मिजाज़ अचानक बदलने लगा. तेज हवायें तूफ़ान की चेतावनी देने लगी थीं. हमारे एचएफ उपकरण ने भी सिग्नल देना बंद कर दिया. हम अपने कैबिन में ज्यों-ज्यों बैचैन होते जा रहे थे त्यों-त्यों मौसम और आक्रामक होता जा रहा था. हालांकि हमें यह भी उम्मीद थी कि कुछ देर बाद सब ठीक हो जायेगा क्योंकि मौसम की भविष्यवाणी के आधार पर हमें अभी तीन दिन और वहां काम जारी रखना था. इसलिए हम घबराये नहीं और परिस्थिति के हिसाब से खुद को सहज रखने की कोशिश करते रहे.

उस समय हमें इस बात का जरा भी अहसास नहीं था कि हमारे लिए अगले कुछ दिन कितने खतरनाक और भयावह होने वाले थे. उस समय तो हम इसी उम्मीद में थे कि ख़राब मौसम का यह दौर जल्द ही खत्म हो जायेगा और हम अपना काम खत्म करके वापस शिप में लौट जाएंगे. लेकिन अगले दिन मौसम और बिगड़ गया. हवा की रफ़्तार तेज हो गयी और उसके साथ उड़कर आने वाली बर्फ की मात्रा भी बढ़ने लगी. शाम तक हालत यह हो गयी कि खाना खाने की इच्छा ही ख़त्म हो गयी.

इसके बाद समस्याएं बढ़ती ही गयी. पोर्टा कैबिन के अंदर इतनी जगह तो थी नहीं कि तीन लोग लेट सकते. इसलिए राजेश और मैं एक ओर बैठ गए और जीवा दूसरी तरफ. बारह बजे के आसपास मुझे ऐसा लगा कि जैसे सांस कुछ भारी सी हो रही है. मैंने खुद को रोपअप किया और कैबिन का दरवाजा खोल कर बाहर जाने की कोशिश की. लेकिन यह क्या, दरवाजा तो खुला ही नहीं. लगा जैसे किसी ने उसे बाहर से बंद कर दिया हो. काफी जोर लगाने के बाद दरवाजा थोड़ा सा खुला तो पता चला कि तूफान के साथ समुद्र की ओर से उड़कर आ रही पाउडर स्नो ने हमारे कैबिन को आधे से अधिक ढक लिया है.

यह बड़ी भयावह स्थिति थी. दस बजे जब हमने कैबिन का दरवाजा बंद किया था, उस समय हमारा पोर्टा कैबिन सतह से लगभग पांच फुट ऊपर था. यानी करीब दो घंटे में लगभग आठ फुट बर्फ हमारे कैबिन के चारों ओर जमा हो चुकी थी. आइस एक्स की मदद से दरवाजे को थोड़ा खोलने के बाद मैंने बाहर निकलने की कोशिश की और काफी जद्दोजहद के बाद किसी तरह ऐसा करने में सफल हो पाया. इसके बाद मैंने स्नो शवल की मदद से दरवाजे के आसपास की बर्फ को हटा कर दरवाजा खुलने लायक जगह बनाई. इसके बाद राजेश भी मेरी मदद के लिए बाहर आ गये थे. जीवा इस स्थिति से काफी घबराये हुये थे क्योंकि उन्होंने अंटार्कटिका अभियान से पहले हिमालय में हुई ट्रेनिंग के अलावा शायद अपने फ्रिज में ही बर्फ को देखा था.

हमारे चारों और चमकीली सी धुंध फैली थी इस कारण ज्यादा दूर तक देख पाना संभव नहीं था. हम अपने कैबिन के आसपास ही मुश्किल से देख पा रहे थे. लेकिन राहत की बात यह थी कि उस समय तूफ़ान के साथ बर्फ नहीं उड़ रही थी और तापमान गिर जाने के कारण हमारे चारों ओर जमा बर्फ भी कुछ-कुछ ठोस होने लगी थी. इससे हमें उसे अपने बर्फ के बेलचों से हटाने में आसानी हो रही थी. कैबिन के चारों ओर की बर्फ को हटाने के बाद अब एक और समस्या हमारे सामने आ गयी थी. अब हमारे कैबिन के चारों ओर एक ऊंची सी दीवार बन गई थी. यानी हमारे कैबिन की स्थिति किसी खाई में पड़े बक्से जैसी हो गयी थी. अब तक जीवा भी काफी हद तक खुद को परिस्थिति के अनुसार ढालने की कोशिश कर चुके थे और हमारे काफी थक चुकने की हालत में वे खुद भी कुछ काम करने को तत्पर थे.

इसके बाद हमने कैबिन के चारों ओर बनी बर्फ की दीवार की ऊंचाई को कुछ कम करने का प्रयास किया. उस पर कूद-कूद कर हमने उसे दबाने का प्रयास किया. पर्वतारोहण के दौरान ऐसा बर्फ की पोली सतह पर टेंट लगाने से पहले किया जाता है ताकि टेंट के लिए ठोस आधार मिल सके. इस काम से हमारे चारों ओर की दीवार कुछ मीटर तक के दायरे में लगभग दो फुट तक कम हो गयी. इसके बाद तो हमारा यह नियमित काम हो गया कि लगभग हर डेढ़ दो घंटे में हम बाहर निकलते और अपने कैबिन को बर्फ में दफ़न होने से बचाने के लिए आसपास की बर्फ को हटाने में जुट जाते.

बर्फ का तूफ़ान लगातार डरावना होता जा रहा था. जब यह थोड़ा धीमा होता तो हम राहत महसूस करते मगर इसके तेज होते ही हमें चिंता होने लगती. हमारे चारों और इतनी बर्फ जमा हो गयी थी कि अगली सुबह हमारे लिए अपने टायलेट मॉड्यूल तक जा पाना भी असंभव हो गया. मॉड्यूल तक बांधी गईं रोप बर्फ में दबकर गायब हो चुकी थीं. हमें वहां तक जाने लायक रास्ता बनाने और दुबारा रोप बांधने में अत्यधिक परिश्रम करना पड़ा. दस बजे के बाद कुछ देर के लिए तूफ़ान थमता सा दिखा तो हमें उम्मीद बंधी कि शायद अब सब ठीक हो जायेगा. लेकिन जल्द ही फिर तेज होते तूफ़ान ने हमारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया.

बहरहाल दिन के खाने के बाद हमने खुद को सुरक्षित बनाने के लिए कुछ जरुरी काम किये. हमने अपने पोर्टा कैबिन को रस्सी की सहायता से इतना बांध लिया कि वह तेज तूफ़ान में भी अपनी जगह से उड़े नहीं. हमारा ग्रीन जेनेरेटर भी अब काम करने लायक नहीं रह गया था क्योंकि उसके ऊपर दो मीटर से अधिक बर्फ जम चुकी थी. हमारे बड़े वाले कैबिन जिसमें किचन का सामान और बाकी उपकरण रखे थे, उसकी हालत भी अब तक बहुत बिगड़ चुकी थी. उसकी छत पर जमी बर्फ से पानी टपकने लगा था. इस वजह से हमें अपने कुछ जरुरी उपकरण वहां से हटाकर पहले से ही छोटे पड़ रहे अपने पोर्टा कैबिन में रखने पड़े.

अब तक बर्फ को गर्म कर पानी बनाना भी काफी कठिन हो गया था. पहले हम बर्फ को खोद कर उसे गर्म करते तो जितनी बर्फ होती उसका करीब एक तिहाई पानी हमें मिल जाता था. लेकिन अब चारों ओर जो पाउडर स्नो या सूखी बर्फ बिछ गयी थी उसको एक बड़े कंटेनर में गर्म करने पर भी मुश्किल से एक-दो कप पानी ही मिल पाता था. जबकि हमें वहां डिहाइड्रेशन से बचने के लिए अनिवार्य रूप से काफी पानी पीने की सलाह दी गयी थी. पानी की कमी के कारण हमारे बर्तन भी साफ नहीं हो पा रहे थे और चाय पीना भी मुश्किल हो गया था. हालांकि अब तक हमने मौसम की प्रतिकूलताओं से जूझने के लिए खुद को काफी तैयार कर लिया था

लेकिन अब एक नयी और गंभीर कठिनाई हमारे सामने आने जा रही थी. दरअसल जब हम यहां आये थे तो यह तय हुआ था कि हमें शिप से मैत्री स्टेशन के लिए उड़ान भरने वाले हेलीकाप्टरों के जरिये हर रोज ताजा खाना भिजवाया जाता रहेगा. लेकिन तूफ़ान के कारण हेलीकाप्टरों का उड़ान भर पाना संभव नहीं था. हमारे पास जो रिजर्व खाना था उसका एक बड़ा हिस्सा हम अपने नौसेना के साथियों के साथ उसी दिन उड़ा चुके थे जब जीवा हमारे पास आये थे. उनके आने के बाद जो खाना हम दो लोगों के लिए था वह भी तीन लोगों में बंटने लगा था. तीसरे दिन शाम को हमने अपनी खाद्य सामग्री का हिसाब लगाया और तय किया कि अब हमें राशनिंग लागू करनी पड़ेगी. जो कुछ भी बचा था उसके एक हिस्से को आपातकाल के लिए रखने के साथ शेष को हमने बराबर हिस्सों में बांट लिया. यह तय हुआ कि चाय दिन में एक बार ही बनेगी, वह भी आधा-आधा कप. खाना भी एक बार ही खाया जायेगा.

शीतल पेय की शेष बची एकमात्र बोतल को भी सुरक्षित रख दिया गया. चॉकलेट और खट्टी-मीठी टॉफियों को तीनों लोगों में बांट दिया गया. हालांकि इनकी संख्या इतनी कम थी कि इसमें बांटे जाने जैसी कोई बात थी ही नहीं. हमारे पास जो कुछ भी बचा था वह बहुत कंजूसी से खाये जाने के बाद भी दो दिन से ज्यादा के लिए नहीं था. मगर हम आश्वस्त थे कि इससे पहले ही तूफ़ान थम जायेगा और हमें मदद मिल जाएगी.

लेकिन तूफ़ान था कि थमने का नाम ही नहीं ले रहा था. इसलिए हमें बार-बार कैबिन के बाहर जाकर बर्फ हटाने का सिलसिला जारी रखना पड़ रहा था. इस बीच ठंड भी बढ़ती जा रही थी और उससे भी लगातार हम लड़ रहे थे. हालांकि हमारे पास पर्याप्त गर्म कपडे थे और हमारे स्लीपिंग बैग भी हमको गर्म बनाये रखने के लिए काफी थे. लेकिन जैसे ही हममें से कोई बर्फ हटाने बाहर जाता, बाहर के बेहद ठंडे तापमान के कारण उसकी हालत ख़राब हो जाती थी. नथुनों के इर्द-गिर्द सांस की नमी बर्फ के क्रिस्टलों में बदल जाती और उसे हटाना बहुत तकलीफदेह होता क्योंकि जरा सा जोर से खींचने पर मूछों और नाक के बाल भी तीक्ष्ण पीड़ा से उखड़ जाते.

यही नहीं हमारे लिए अब एक नयी परेशानी शुरू होने वाली थी. बैटरियों के डिस्चार्ज हो जाने के बाद हमारे रिकार्डर ने काम करना बंद कर दिया. इसके बाद हमारे पास कोई काम नहीं रह गया था. मेरे लिए तो ये हिम तूफ़ान एक तरह का एडवेंचर था और तमाम मुश्किलों के बावजूद मुझे इस स्थिति में भी एक ख़ास तरह का आनंद आ रहा था. लेकिन परिस्थितिवश ऑफशियल टास्क ख़त्म हो जाने से जीवा और राजेश बहुत बैचैन होते जा रहे थे. उनके लिए एक-एक पल बिताना कठिन हो गया था. इस चुनौती से लड़ने के लिए मैंने एक योजना बनाई.

अंटार्कटिका में भारतीय अभियान दल गणतंत्र दिवस बहुत धूमधाम से मनाते थे. इस बार भी मैत्री स्टेशन में यह आयोजन होना था. वहां पर मौजूद लोगों के साथ इसमें शिप पर मौजूद भारतीयों और निकटवर्ती सोवियत तथा पूर्व जर्मनी के अभियान दलों के लीडर आदि को भी अतिथि के रूप में बुलाया जाना था. लेकिन बर्फीले तूफ़ान के कारण सारी तैयारियां धरी की धरी रह गयीं. शिप और मैत्री स्टेशन के बीच आवागमन बंद हो जाने से यह तय था कि इस बार गणतंत्र दिवस के समारोह सीमित रूप से इन दोनों जगहों पर अलग-अलग होंगे. हमने भी यह तय किया कि हम भी अपनी विकट परिस्थितियों से लड़ते हुए दक्षिण गंगोत्री के हिम बियाबान में गणतंत्र दिवस समारोह आयोजित करेंगे. बस इस एक विचार ने हमारे मन में एक नयी तरह की स्फूर्ति भर दी. पर्वतारोहण के दौरान हमेशा साथ रहने वाला तिरंगा इस समय भी मेरे रकसैक में मौजूद था. हमने तय किया कि हम उसे फहराकर सलामी देंगे. हमारे पास अभी तैयारी के लिए 36 घंटे बाकी थे और एक तरह से इन 36 घंटों के लिए हमें एक बड़ा काम मिल गया था.

हमने सबसे पहले तीनों लोगों से सुझाव मांगे कि हम क्या-क्या कर सकते हैं और किस प्रकार कर सकते हैं. यह काम लिख कर करना था. चूंकि अंटार्कटिका में इंक पेन और बाल पेन ठीक से काम नहीं कर पाते इसलिए हम सभी वहां लिखने के लिए पेंसिल का इस्तेमाल करते थे. सो हम तीनों डायरी लेकर अपनी-अपनी योजनाएं बनाने में जुट गए. सामान्य स्थितियों में यह आसान काम था लेकिन यहां हमें अपने सीमित साधन देख कर ही योजना बनानी थी.

इसमें कई घंटे बीत गए. हम वहां ठीक से सो सकने की हालत में नहीं थे. एक तो जगह की कमी उस पर तूफ़ान के और अधिक तेज हो जाने की आशंका और उस पर भी थोड़ी-थोड़ी देर में बाहर जाकर बर्फ हटाने का झंझट. इसलिए हमने तय किया था कि एक वक्त में दो लोग बारी-बारी से इस ड्यूटी में रहेंगे और तीसरे को इस बात की आजादी होगी कि वह सोने की कल्पना कर सकता है. यह चक्र दो-दो घंटे का था.

अपनी निराशा और असहायता से बचने में इस तरकीब ने हमारी खूब मदद की. बारह घंटे बीतने तक हमारी योजना बन चुकी थी. हमें अपने टायलेट मॉड्यूल के सहारे तिरंगा लहराना था. वहां बर्फ में हमारे पास उस जगह के अलावा कोई और तरीका नहीं था जहां हम ऐसा कर सकते. इसके बाद तय हुआ कि मैं झंडे को सलामी दूंगा और मेरे दोनों साथी मिलकर जन गण मन गाएंगे. 25 जनवरी का दिन जन गण मन की रिहर्सल और बाकी कार्यक्रम की तैयारियों में बीत गया. हमारे पास रेडीमेड हलवे का एक पैकेट बचा था. मिष्ठान वितरण में इसी का उपयोग किया जाना था. वैसे मन के किसी कोने में अब भी हम यह उम्मीद कर रहे थे कि किसी भी क्षण तूफ़ान थम जायेगा और हम वापस मैत्री जाकर गणतंत्र दिवस समारोह में हिस्सा ले सकेंगे. लेकिन हमने खुद को इस बात के लिए भी पूरी तरह तैयार कर रखा था कि विषम से विषम परिस्थिति में भी हम झंडा जरूर फहराएंगे. लेकिन 26 की सुबह हमारी उम्मीदों को डिगाने वाली थी.

सुबह अचानक तूफ़ान की गति और तेज हो गयी. बर्फ की आंधी इतनी भयावह थी कि कैबिन से बाहर निकल पाना तक असंभव हो गया. एकाध बार कोशिश की भी लेकिन तूफ़ान की रफ़्तार के कारण अपनी जगह पर खड़ा हो पाना भी संभव नहीं था. ऐसे में हमने कुछ समय तक इंतजार करने के बाद भी तूफ़ान की गति कम न होने पर अपने कैबिन के दरवाजे पर लटककर तिरंगा फहराने की योजना बना ली थी. लेकिन शायद हमारी जिद के आगे अंटार्कटिका के तूफ़ान ने हार मान ली थी. भारतीय समय के अनुसार दस बजे के आसपास तूफ़ान कुछ धीमा पड़ गया. इसके बाद हमने अपने निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार किसी तरह झंडा फहरा दिया और राष्ट्रगान गाकर झंडे को सलामी भी दे दी.

मेरे लिए यह हिमालय की अनेक ऊंचाइयों में राष्ट्रगान गाने के विलक्षण अनुभवों में से सर्वश्रेष्ठ अनुभव था. यह क्षण हमारे लिए पिछले कुछ दिनों की उदासी और निराशा को एक झटके से मिटा देने वाला भी था और खुद को अत्यंत गौरवान्वित महसूस कराने का भी. कुछ क्षणों में यह कार्यक्रम पूरा करने के बाद हम झंडा समेटकर फिर से कैबिन में घुस गए. हवा के तेज और सर्द थपेड़ों ने हमारी हालत ख़राब कर दी थी ऐसे में हलवे ने हमें फिर से नयी जान दे दी.

मगर हमारा यह जोश और ख़ुशी ज्यादा देर तक कायम नहीं रह सके. एक तो गणतंत्र दिवस समारोह मना लेने के बाद हमारे सामने अब कोई लक्ष्य नहीं रह गया था. दूसरा, थोड़ी सी चाय के सिवा अब हमारे पास खाने के लिए भी कुछ नहीं था. मौसम के तीक्ष्ण हमलों से तो अब तक हम किसी तरह बच गये थे लेकिन अब भूख हमारा किस्सा ख़त्म करने पर उतारू हो गयी थी. अंटार्कटिका में खुद को बचाए रखने के लिए पौष्टिक और संतुलित आहार बेहद जरुरी होता है मगर हम तो यहां दाने-दाने को मोहताज थे. मेरे दोनों साथियों का चिड़चिड़ापन बढ़ने लगा था और यह बहुत चिंता की बात थी. क्योंकि ऐसी ही अवसाद भरी स्थितियों में लोग हेल्युसिनेशन का शिकार हो जाते हैं.

पर्वतारोहण के अपने अनुभव के कारण मैं यह बात भली-भांति समझ रहा था कि मेरे साथियों के मनोबल और मनोस्थिति पर हमारी लगातार विकट होती जा रही परिस्थितियों का बहुत प्रतिकूल असर होता जा रहा है. कोई लक्ष्य या काम न होने से वे तरह-तरह की आशंकाओं में घिरते जा रहे हैं. चूंकि वे दोनों एक ही विभाग के थे इसलिए काम न रहने पर भी उनमें अक्सर अपने सहकर्मियों अथवा आफिस के कामकाज के बारे में ही बातें होती थीं. लेकिन अब वे इनसे जुड़ी ऐसी बातें करने लगे थे जो झगड़े की वजह बन रही थीं. एकाध बार तो मामला गुत्थमगुत्था तक भी पहुंच गया.

यह कटुता निजी संबंधों तक न पहुंचे इसलिए मैंने यह निर्णय लिया कि हम लोग आपस में दफ्तर, सहकर्मियों या अपनी टीम के बारे में कोई भी बात नहीं करेंगे. हम अपनी परेशानियों पर भी ज्यादा चर्चा नहीं करना चाहते थे क्योंकि इससे निराशा और अवसाद बढ़ सकता था. हां दिन में एक-दो बार हमें अपने साथियों तक सकुशल वापस पहुंचने की बातें जरूर करनी थी ताकि यह आशा बनी रहे कि खराब मौसम का यह दौर अनंत काल तक नहीं चलने वाला है. यह कभी भी खत्म हो सकता है और हमें उस वक्त तक खुद को कमजोर नहीं पड़ने देना है.

इसके बाद हमने बातचीत के विषय तय करने शुरू किये. खेल पर बातचीत में खतरा था क्योंकि किसी खेल या खिलाडी को लेकर हमारी पसंद दूसरे से एकदम भिन्न हो सकती थी. ऐसा ही राजनीति को लेकर भी था. बातचीत के लिए कोई भी ऐसा विषय हम नहीं चाहते थे जिसमें बहस की जरा भी गुंजाइश हो. इसलिए हमने तय किया कि हम फिल्मों की बातें करेंगे. हम तीनों ही लगभग हमउम्र थे. अविवाहित राजेश कालरा देहरादून से थे और गुड़गांव में पोस्टेड थे. वे काफी हंसमुख और मिलनसार थे. जबकि आंध्र प्रदेश के रहने विवाहित के जीवा चेन्नई में सेवारत थे. वे काफी गंभीर और परिवार की चिंता करने वाले व्यक्ति थे. हम तीनों ही एक-दूसरे से अंटार्कटिक अभियान के दौरान ही परिचित हुए थे और अब लगातार रौद्र रूप दिखा रहा तूफ़ान हमारे धैर्य, आत्मविश्वास, शारीरिक और मानसिक दृढ़ता, जिजीविषा तथा एक-दूसरे के प्रति संवेदनशीलता की परीक्षा ले रहा था. यह मेरे लिए भी खुद की क्षमताओं को परखने का एक अच्छा अवसर था और मैं लगातार इसी विषय पर चिंतन करता रहता था कि किस तरह इन विषम और आतंकित करने वाली स्थितियों से पार पाया जाये.

इसलिए हमने फिल्मों की चर्चा शुरू कर दी थी. हर रोज हम तीनों अपनी-अपनी पसंदीदा फिल्मों में से एक की बात शुरू करते. फिल्म की कास्ट, संगीत और निर्देशन की बात करते. फिल्म की कहानी सुनाते, कलाकारों के अभिनय की चर्चा करते और इस तरह हर फिल्म हमारे दो-ढाई घंटे निकाल देती. यानी हमारे सात-आठ घंटे इसी में निकल जाते. हमारी बातचीत के विषयों में हिंदी फिल्मों के साथ-साथ तमिल और तेलगू फ़िल्में भी होती थीं. जीवा को हिंदी फिल्मों की चर्चा में आनद आता तो हमें उनसे दक्षिण की अनेक बेहतरीन फिल्मों की जानकारियां मिलतीं.

मानसिक संतुलन ठीक बनाये रखने के मामले में तो हमारा यह प्रयोग सही साबित हो रहा था लेकिन उससे भी कई गुना बड़ी समस्या मुंह बाए खड़ी थी और वह थी पेट की भूख. हमारे पास खाने के लिए अब कुछ भी नहीं बचा था. कहीं से कुछ मिल पाने की भी किसी तरह की कोई उम्मीद नहीं थी. ऐसी हालत में हमें सदा के लिए छोड़ दिए गए दक्षिण गंगोत्री स्टेशन की याद आयी. हम डूबतों के लिए अब वही एकमात्र तिनका था और उसी का सहारा लेने के लिए हमने तीस मीटर बर्फ में दबे डीजी स्टेशन के भीतर उतरने का दुस्साहसिक निर्णय लिया.


इस संस्मरण का दूसरा भाग यहां पर पढ़ा जा सकता है.