बिहार का बॉबी हत्याकांड भारतीय राजनीतिज्ञों द्वारा महिलाओं के यौन शोषण से जुड़े उन हाईप्रोफाइल मामलों में से है एक है जिन्होंने मीडिया में तो खूब चर्चा बटोरी लेकिन उनकी जांच कभी अंतिम निष्कर्ष तक नहीं पहुंची.

बॉबी यानी श्वेतनिशा त्रिवेदी बिहार विधानसभा में टेलीफोन ऑपरेटर के पद पर कार्यरत थी. कहा जाता है कि दिखने में बेहद आकर्षक और महत्वकांक्षी इस युवती की पटना के कई राजनीतिज्ञों से मित्रता थी.

1983 में बॉबी की रहस्यमयी परिस्थितियों में मौत हो गई और उसे चुपचाप एक कब्रिस्तान में दफन कर दिया गया. (बॉबी को बिहार विधान परिषद की उपसभापति सुश्री राजेश्वरी सरोजदास ने गोद लिया था और इसके बाद उसने ईसाई धर्म अपना लिया था). चूंकि इस युवती के कई राजनीतिज्ञों से मित्रता थी इसलिए इस घटना पर कई तरह की क़यासबाज़ी होने लगी. मीडिया में छपी खबरों में कहा जा रहा था कि इस युवती की हत्या की गई है.

बिहार में तब कांग्रेस की सरकार थी और जगन्नाथ मिश्र मुख्यमंत्री थे. उस समय युवक कांग्रेस के कुछ नेताओं सहित बिहार विधानसभा के अध्यक्ष राधानंदन झा के बेटे, रघुवर झा पर भी यह आरोप लग रहा था कि वह बॉबी की कथित हत्या में शामिल है.

इसी बीच एक ऐसी घटना हुई जिससे यह लगभग स्पष्ट हो गया कि बॉबी की हत्या में राजनीतिज्ञ शामिल हैं. पटना के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक (एसपी) और काफी तेजतर्रार माने जाने वाले अधिकारी किशोर कुणाल ने असली दोषियों को पकड़ने के लिए कब्रिस्तान से बॉबी का शव निकलवा लिया. उन्होंने इस मामले की नए सिरे से जांच करवाने की घोषणा कर दी. प्रारंभिक जांच में पता चला कि इस युवती को जहर का इंजेक्शन देकर मारा गया है और यह भी इसका यौन शोषण हुआ है.

ये जानकारियां मिलने के बाद लगने लगा कि जल्दी ही कांग्रेस के कुछ नेताओं हिरासत में लिया जा सकता है. लेकिन इससे पहले कि कुछ कार्रवाई हो पाती कुणाल का पटना से तबादला कर दिया गया. इसके साथ ही मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र और उनकी पूरी सरकार राष्ट्रीय स्तर पर मीडिया के निशाने पर आ गई. हालांकि बाद में यह मामला सीबीआई को सौंप दिया गया, फिर भी यह जांच किसी अंतिम नतीजे पर नहीं पहुंच पाई.