सबसे पहले तो लोकतंत्र अपने हर वयस्क नागरिक को चुनने का अधिकार देकर उसे राजनैतिक बनाता है. आप वोट दें या न दें पर आप एक राजनैतिक इकाई बन जाते हैं. हमारी एक बड़ी विडम्बना यह है कि फिर हम सभी गतिविधियों को, समूचे मानव-व्यापार बल्कि अपने तक को राजनीति का हिस्सा बनाने लगते हैं. ज्ञान, आस्था, सृजन आदि अनेक क्षेत्र में जिनमें लोकतंत्र किसी राजनैतिक हस्तक्षेप या घुसपैठ के सुनिश्चय के लिए समवर्ती संस्थाएं बनाता है और एक तरह से उन्हें स्वयं को अपनी सीमाओं में, अपनी मर्यादा में रहने के लिए अधिकृत करता है. पर लोकतंत्र में राजनीति के मुंह इतना खून लग चुका होता है कि यह लगातार इन सीमाओं और मर्यादा का उल्लंघन करती रहती है. और कम से कम आज ऐसी सभी संस्थानों का इस क़दर अवमूल्यन हो चुका है कि न्याय आदि तक की संस्थाएं अब राजनीति के अनुकूल आचरण करने से गुरेज नहीं करतीं.

साहित्य अपने आप में संस्था है यह अवधारणा काफ़ी पुरानी है. यह ऐसी संस्था है जो लेखकों-पाठकों-प्रकाशकों-शिक्षकों आदि से मिलकर बनती है. पर उसमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सुनिश्चय होता चलता है. हर लेखक अपना आत्म, समय, समाज, संबंध आदि लिखने की कोशिश करता है और इसके लिए स्वतंत्र होता है कि वह अपना विषय, शिल्प, शैली, भाषा आदि अपनी दृष्टि के अनुसार चुने. साहित्य सिर्फ़ संस्था ही नहीं वह एक तरह का अनौपचारिक जनतंत्र भी होता है. वहां व्यक्ति, समाज, सचाई, समय आदि को देखने-बदलने-समझने की कई दृष्टियां मुक्त भाव से सक्रिय रहती हैं और उसमें सबके लिए जगह होती है. जगह आगे-पीछे, कम-ज़्यादा होती रहती है लेकिन जगह की कमी साहित्य में कभी नहीं होती.

इस संस्था से लोकतांत्रिक और अन्य क़िस्म की सत्ताएं एक तरह की चुनौती पाती हैं. साहित्य का आग्रह नीति पर नैतिक होता है, राजकामी नहीं. साहित्य अपनी नैतिक सत्ता तो स्थापित करता है पर राज्य नहीं. इस संस्थागत ढांचे के अन्तर्गत दृष्टियों के बीच वाद-विवाद-संवाद और द्वन्द्व होते रहते हैं. इन्हें साहित्य की अपनी राजनीति कहा जाता है. कई बार कुछ लेखक अपनी सामूहिक दृष्टि के प्रक्षेपण-पोषण आदि के लिए कोई संगठन बना लेते हैं. कुछ और लेखक उनसे असहमत होकर एक ओर संगठन स्थापित करते हैं. हिन्दी साहित्य में ऐसे कई संगठन सक्रिय हैं और उनके बीच तमाम-विवाद होते रहते हैं. ये संगठन अपना वर्चस्व क़ायम करने की भी लगातार चेष्टा करते रहते हैं. अपनी दृष्टि से असहमत लेखकों और पुस्तकों का अनौपचारिक निषेध या बहिष्कार, अकादेमिक जगहों पर अपने सदस्यों को प्राथमिकता, पत्र-पत्रिकाओं द्वारा खंडन-मंडन, पुरस्कारों आदि में जोड़-तोड़ आदि हथकंडे भी अपनाये जाते हैं. लेकिन इसके बावजूद साहित्य में कुछ सार्थक विवाद भी इस राजनीति के चलते उभरते-होते रहे हैं जिनका संबंध साहित्य के उद्देश्य, उसकी सामाजिकता आदि से रहा है.

इसका निषेधात्मक पक्ष यह है कि साहित्य की यह राजनीति साहित्य की बुनियादी बहुलता को अवमूल्यित करती है और मान्यता के लिए प्रतिबद्धता का एक मंडल बना लेती है. हिन्दी में जनधर्मी संगठनों की इस भूमिका को नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता. उनमें से प्रायः हरेक ने आरम्भ में बड़ी कट्टरता का बर्ताव किया और धीरे-धीरे उनमें नरमी आती गयी. लेकिन बहिष्कार और कट्टरता की नीति ने कुछ ऐसा माहौल पैदा किया जिसमें इन संगठनों का सदस्य भर होने से आप समाजधर्मी मान लिये गये और उसके बाहर के लेखक समाज-विरोधी. अज्ञेय जैसे बड़े लेखक तक इसके शिकार हुए.

साहित्य की राजनीति का व्यापक राजनीति से क्या संबंध या संवाद रहा है यह एक टेढ़ा प्रश्न है. भारतीय राजनीति में जैसे-जैसे लोकतंत्र की आयु बढ़ती गयी वैसे-वैसे उसमें भाषा, साहित्य और कलाओं के बारे में चिन्ता और सरोकार घटते गये हैं. हिन्दी अंचल में तो यह और भी सच है. वहां ऐसा परिवेश विकसित हुआ कि सत्ता के भक्त या लालची मीडियोकरों की जमातों ने पद और पुरस्कार हथियाये और साहित्य के लिए अकादेमियों आदि का जो ढांचा था वह पूरी तरह से निष्क्रिय और अप्रासंगिक हो गया. इसमें जब-तब अपवाद होते रहते हैं पर वे कुल मिलाकर लगातार अवमूल्यन का नियम ही सिद्ध करते हैं. जहां धर्मान्ध-साम्प्रदायिक-हिंसक राजनीति सत्ता में है वहां किसी पद या पुरस्कार के लिए कोई महत्वपूर्ण लेखक या कृति उन्हें नहीं मिलती! वामधर्मी और वामविरोधी कट्टरता और असहिष्णुता दोनों ने अहित किया है. ऐसे समूहों या संगठनों के विचारधारी दरोगा स्वनियुक्त हैं जो यह फ़ैसला देते हैं कि किस लेखक के पास ‘सामाजिक यथार्थ’ या ‘भारतीयता’ आदि है या नहीं. एक तरह की वैचारिक पोलिसिंग.

दूसरी और यह भी सही है कि सच्चे लेखकों को यह कट्टरता अतिक्रमित करने में कभी संकोच नहीं हुआ है और उन्होंने अपने विरुद्ध ऐसे इस्तगासों की परवाह नहीं की है. सही यह भी है कि लोकतंत्र की बुनियादी भावना और मूल्यों के अनुरूप हमारा साहित्य पिछले पचास-साठ वर्षों में, इन विचलनों और अपवादों को छोड़कर, व्यवस्था का आलोचक साहित्य ही रहा है. जो लेखक या कृतियां वैचारिक असहिष्णुता के शिकार हुए उन्होंने अपना रास्ता या दृष्टि न तो बदली, नहीं कोई समझौता किया. उनकी उपेक्षा की गयी अगर निन्दा नहीं, पर ज़्यादातर उसमें वे अप्रभावित रहे. अलबत्ता पाठकों का एक बड़ा वर्ग बरगलाया जाकर उनसे दूर जाता रहा.

दुर्भाग्य से आलोचना ने भी इसमें जो भूमिका निभायी है वह वैचारिक प्रश्नाकुलता की नहीं, साहित्य के सत्ता-प्रतिष्ठानों के पिष्टपेसण की रही है. साहित्य-संवाद इस वजह से वैचारिक रूढ़ियों में फंसकर ऊर्जस्वित नहीं, उबाऊ होता रहा है. इसका अपवाद है पर वह हाशिये पर ढकेला जाता रहा है. यह कहना अनुपयुक्त नहीं होगा कि, कम से कम मेरे लेखे, साहित्य की राजनीति अगर न होती तो साहित्य के लिए अधिक हितकर होता. लेकिन ऐसी आदर्श स्थिति सचाई में शायद कभी नहीं आती!

इन दिनों

इन दिनों सोचने का समय तो ज़रूरत से ज़्यादा मिल रहा है पर सोचना इतना नहीं होता जितना कि हालात पर बिसूरना. पढ़ते-पढ़ते आंखें, जो वैसे ही बूढ़ी हो गयी हैं, थक जाती हैं. लिखना भी कम होता जाता है. जो हो रहा है वह इतना दारूण है कि भाषा उसका बखान तक करने में नाकाफ़ी लगती है. किसने सोचा था कि यह प्रकोप इतने क्रूर-हृदयहीन-निष्करुण समय में बदल जायेगा! उससे निपटने-जूझने के लिए, लगता है, हमारे पास अब संवेदना और सहानुभूति के अलावा कुछ नहीं बचा और उन्हें भी व्यक्त करने का अवसर नहीं है. जैसे हम एक शून्य में घिर गये हैं, जो जितना समय ने रचा है उतना अपनी भूल-ग़लती से हमने भी.

घर में जैसे ज़्यादातर वक़्त चुप्पी रहती है वैसे ही निश्शब्दता भी आती जा रही है. घबराहट होती है. अपने किये-धरे की निरर्थकता का अहसास और गहरा होता जाता है. हम एक नीच ट्रैजेडी का शिकार हैं जिसका हमें कोई पूर्वाभास कभी नहीं था. हमें अपनी सजगता का गुमान था पर बहुत कुछ हमारे जाने बिना होता रहा और हम बेख़बरी में लिप्त रहे. कुमार गंधर्व सूर का एक पद गाते थे - ‘ऊधो, करमन की गति न्यारी! मूरख मूरख राजे कीन्हे, पण्डित फिरत भिखारी’. अब तो हमारा विलाप भी अरण्यरोदन है, शब्दशः. अंधेरे में चीख. ऐसा अंधेरा जो तेज़ धूप में, तपती दोपहर में भी आत्मा में, मानो, घर कर गया है.

इन दिनों लगता है कि मोबाइल फ़ोन पर आ रही लाखों मज़दूरों ग़रीबों की घर वापसी की दिल दहलाने वाली तसवीरें ही हमारे समय की सच्ची ख़बर हैं, बाक़ी सब झूठ, मक्कार और फ़रेब. सचाई बिंबाई फटे पांवों से, तरह-तरह के जुगाड़ करती हुई, अपने पांवों में कई बार जूतों-चप्पलों के बजाय ख़ाली पानी की बोतलें चिपकाये हुए, घर-गांव लौट रही है. सत्ता भले यह न माने, लेकिन हम अपने घरबन्द अन्तःकरण से यह पहचान सकते हैं कि खून-पसीने और अभूतपूर्व यन्त्रणा से रची गयी अदम्य जीवट की यह सचाई अब हमारे समय का सबसे विचलित करने वाला केन्द्रीय सच है. यह सचाई सत्ता के द्वारा उसके होने तक को, प्रशासनिक और न्यायिक दोनों ही स्तरों पर अमान्य किये जाने के बावजूद, अब कहीं और से माने-जाने का मुंह नहीं जोहती है. यह अपने अभागेपन में अकाट्य और अदम्य है.

इस सचाई ने उस विद्रूप को, असमानता की बढ़ती विडम्बना को, यकायक हमारे सामने दारुण मानवीय ढंग से प्रत्यक्ष कर दिया है. यह हमें बाध्य करेगा कि हम अपने लोकतंत्र की गति और दिशा पर फिर से विचार करना शुरू करें. अगर यह लोकतंत्र लोक के इतने बड़े हिस्से को इस क़दर बदहाली और मुफ़लिसी पर मजबूर कर रहा है तो ज़ाहिर है कि उसका तंत्र लोकमुखी होने के बजाय उसके प्रति उदासीन और जब-तब क्रूर हो रहा है. इस तंत्र को लोकोन्मुखी बनाने के लिए उसमें कई मौलिक परिवर्तन ज़रूरी हैं. उन्हें करने की हिम्मत कहां?