इस संस्मरण का पहला भाग यहां पर पढ़ा जा सकता है.


अंटार्कटिका में कई वर्ष पहले छोड़ दिए गए दक्षिण गंगोत्री यानी डीजी स्टेशन के अंदर जाना खतरों को बुलावा देने जैसा था. लेकिन हम और कर भी क्या सकते थे. हमें अभियान की ब्रीफिंग में बताया गया था कि डीजी स्टेशन को जब छोड़ा गया था तो उसके भीतर जो कुछ भी सामान था उसे वैसा ही छोड़ दिया गया था. इसलिए हमें उम्मीद थी कि हमें वहां खाने का कुछ न कुछ सामान जरूर मिल जाएगा. हमने तय किया कि सबसे पहले हम डक्ट का ढक्कन खोलने का प्रयास करेंगे. फिर कुछ देर उसे खुला रखने के बाद ही भीतर जाने की कोशिश करेंगे ताकि भीतर ताज़ी हवा प्रवेश कर सके. इसके बाद हमने एक लम्बी रोप को अपने पोर्टा केबिन से ऐंकर करके लंबे ऐंटेना की ओर चलना शुरू किया.

तय हुआ कि सबसे पहले मैं डक्ट के भीतर उतरने का प्रयास करूंगा. राजेश ऊपर मुहाने से मुझको रोप का सहारा देते रहेंगे. और बाद में वे भी नीचे आएंगे. जीवा को इस काम से अलग रखा गया. चूंकि डक्ट में करीब आठ मीटर तक कोई सीढ़ी नहीं बनी थी इसलिए इतनी गहराई तक मुझे किसी तरह लटककर उतरना पड़ रहा था. चारों ओर पिघली बर्फ के जम जाने से डक्ट की सतह एकदम कांच की तरह चिकनी हो गयी थी और उस पर पांव टिका पाना संभव नहीं था. इस कारण मैं बार-बार रोप पर चक्करघिन्नी की तरह घूम रहा था. खैर किसी तरह मेरे पैर नीचे उस प्लेटफार्म की सतह से टकराये जहां से लकड़ी की सीढिंयां शुरू होती थीं. जब मैंने उन पर नजर डाली तो वहां भी हर सीढ़ी पर कांच के जैसी इतनी चिकनी बर्फ बिछी हुई थी कि उस पर बिना किसी सहारे के चलना असंभव था. इसके बाद मैंने कालरा को नीचे आने से रोक दिया और खुद ही नीचे जाने का निर्णय किया. करीब बारह मीटर उतरने के बाद मुझे वह दिख गया जिसकी उम्मीद में मैं वहां गया था.

यह डीजी का खाद्य भंडार था. लेकिन वहां इतना अंधेरा था कि मेरी टार्च की तेज रौशनी लगभग बेकार हो गयी थी. कुछ भी ठीक से नहीं दिख पा रहा था. ऐसे में मैंने हाथों से टटोलकर कुछ चीजें उठाने का प्रयास किया. भूख के मारे हमारी हालत इतनी खराब हो गयी थी कि हम कुछ भी खाने को तैयार थे. मैंने कुछ पैकेट अपने जैकेट के अंदर भर लिए और वापस ऊपर डक्ट की ओर चल पड़ा. मुझे नीचे आये हुए करीब एक घंटा हो चुका था और मैं महसूस कर रहा था कि मेरे साथियों को मेरी बहुत चिंता होने लगी होगी. लेकिन ऊपर चढ़ना नीचे उतरने से काफी अधिक मुश्किल था. एक तो मेरे जैकेट में ठुंसा हुआ सामान इसमें परेशानी पैदा कर रहा था दूसरे सीढ़ियों की सतह पर जमी हुए फिसलनदार बर्फ के कारण मुझे पांव जमाने में भी बहुत कठिनाई हो रही थी.

काफी जद्दोजहद के बाद जब मैं प्लेटफार्म पर पहुंच गया तो मैंने राजेश कालरा को बताया कि खजाना मिल गया है. फिर मैंने अपनी जैकेट को रोप से बांधकर कालरा से उसे ऊपर खींचने को कहा. इसके बाद मैंने भी रोप के सहारे से ऊपर चढ़ना शुरू कर दिया. अब तक रोप पर भी नमी के कारण हलकी सी बर्फ जम गयी थी जिससे उसे पकड़ना बहुत मुश्किल हो गया था. ऊपर से बर्फ की वजह से ही पावों को भी सहारा नहीं मिल पा रहा था. मैं जितना ऊपर चढ़ने की कोशिश करता उतना ही नीचे खिसक जाता था. मेरे हाथ दर्द करने लगे थे. तब मैंने कालरा से कहा कि वह रोप को ऊपर खींचकर उसमें दो-दो फीट की दूरी पर गांठ लगा दे. इसके बाद मैं उन गांठों के सहारे आसानी से ऊपर पहुंच गया.

मेरे ऊपर पहुंचने तक जीवा मेरे द्वारा लाये गए माल की जांच-परख कर चुके थे. उसमें दो दाल, एक मिल्क पाउडर, एक नमक और तीन चपाती के पैकेट थे. दो पैकेट नॉनवेज के भी थे. इसके अलावा एक कोल्ड ड्रिंक की बड़ी बोतल और दलियानुमा किसी चीज का पैकेट भी था. इतना माल हमारे हौसले बढ़ाने के लिए बहुत था. लेकिन दुर्भाग्य से हमारे साथ फंस गये जीवा शायद इससे संतुष्ट नहीं थे. जब मैंने उन्हें बताया कि वहां थी तो बहुत चीजें लेकिन बहुत अंधेरा होने के कारण मैं इतना ही ला पाया तो जीवा के चेहरे पर मुस्कान आ गई. उन्होंने मुझे मेरी डायरी वापस करते हुए कहा कि तुम्हारा लिखा तो बेकार हो गया. दरअसल डीजी स्टेशन के अंदर जाने से पहले मैंने और कालरा ने अपनी डायरियों में यह लिख दिया था कि हम अपनी स्वेच्छा से दक्षिण गंगोत्री स्टेशन के भीतर जा रहे हैं ताकि वहां कुछ खाने का सामान ढूंढ सकें और यदि इस दौरान हमें कुछ हो जाता है तो इसकी पूरी जिम्मेदारी सिर्फ हमारी होगी. ऐसा करने के पीछे भाव यह था कि यदि हमें कुछ हो जाए तो उसके लिए अभियान दल के अन्य सदस्यों को कोई परेशानी न हो.

वापस अपने केबिन में पहुंचकर हमने सबसे पहले लायी गयी चीजों की डेट आफ मैनुफैक्चरिंग देखी. ज्यादातर चीजें अगस्त से अक्टूबर 1988 की बनी हुई थीं. चपाती का एक पैकेट जनवरी 1988 का था. नमक,मिल्क पाउडर और कोल्ड ड्रिंक के अलावा सभी चीजें डीआरडीओ की डिफेंस फूड लेबोरेट्री मैसूर की बनी हुई थीं. चूंकि अंटार्कटिका में सामान्यतः बैक्टीरिया नहीं पाए जाते और जिस जगह से हम ये चीजें लाये थे वहां का तापमान प्रायः शून्य से कम ही रहता था इसलिए हम इन चीजों को खाने से डर नहीं रहे थे. वैसे भी इन्हें न खाने का विकल्प तो हमारे पास था ही नहीं.

अंटार्कटिका में एक पेंग्विन
अंटार्कटिका में एक पेंग्विन

इस सामान के आ जाने से हमारी निराशा कम हो गयी थी और हमारे मनोबल पर भी इसका सकारात्मक असर हुआ था. हमें अब यह उम्मीद बंध गयी कि अब हम अधिक तैयारी से डीजी सेंटर के अंदर जाकर अपने खाने के लिए कुछ और चीजें तलाश सकते हैं. मगर अभी हम इन चीजों को पूरी तरह से सुरक्षित भी नहीं मान सकते थे और इस बात का खतरा था कि इनको खाने से हमें फ़ूड पॉइजनिंग भी हो सकती है. इसलिए हमने तय किया कि आज हममें से सिर्फ एक इसे खायेगा. मगर वह कौन होगा इसे लेकर समस्या खड़ी हो गयी. हम तीनों में से कोई भी पीछे हटने को तैयार नहीं था. दो दिन के बाद यह मौका आया था कि हम शाम का खाना खा सकते थे. इसलिए कोई भी इसे गंवाना नहीं चाहता था. अंततः यह तय हुआ कि लॉटरी निकाल कर फैसला किया जाए. मगर इस पर भी सहमति नहीं हो सकी और फिर तीनों लोगों ने दाल और चार पतली चपातियों को बराबर बांट कर खा लिया. अब हमें सुबह का इन्तजार था कि इस खाने का हमारी सेहत पर क्या असर होता है.

लेकिन सुबह ने हमारी सभी आशंकाओं को निर्मूल साबित कर दिया. हम तीनों ही ठीक-ठाक थे और अब मिल्क पाउडर से चाय बनाने को बेताब भी. इसके बाद हमने फिर डीजी के अंदर जाने की योजना बनायीं. एक दिन पहले के अनुभव से हमें इतना तो समझ में आ गया था कि नीचे कैसे उतरना है. कल मैंने वहां स्टोर के पास एक अल्युमीनियम की सीढ़ी भी देखी थी. हमने सोचा था कि अगर हम उसे ऊपरी प्लेटफार्म तक ला सकें तो उसकी मदद से ऊपर आना बहुत आसान हो जाएगा. नीचे उतरने में तो गांठ बंधी रोप काम आनी ही थी. हमने अपने रकसैक खाली कर लिए और अपनी चारों टार्च, एक कैसेट रिकार्डर ,कैमरा और आइस ऐक्स लेकर इस बार हम तीनों नीचे उतरने के लिए तैयार हो गए.

काफी मुश्किलों के बाद हम स्टेशन के मुख्य भाग में पहुंचने में कामयाब हो गए. वहां अपनी टार्चों के जरिये हमने सबसे पहले अपने खाने के लिए जरुरी चीजें तलाश कीं. वहां अंडे भी थे लेकिन वे हमारे किसी काम के नहीं थे. कई वर्ष तक शून्य से काफी कम तापमान पर रहने के कारण वे एकदम ठोस हो चुके थे, किसी पत्थर की तरह. और भी कई तरह की चीजें वहां थीं. हमने उनमें से सिर्फ दाल, सूजी का हलवा, चपाती, पुलाव, चाय और दूध के कुछ पैकेट अपने बैग में भर लिए. इसके बाद हमने उत्सुकता के साथ स्टेशन के अंदर देखना शुरू किया. वहां एक शानदार किचन थी, जिसके पास ही एक डायनिंग टेबल थी जिस पर आखिरी बार खाने वाले चार लोगों की प्लेटें पड़ी थीं. इन प्लेटों में कुछ बचा हुआ खाना भी था. वहीं पास में एक शानदार आपरेशन थियेटर भी था.

हमने वहां आखिरी बार रहने वाले कुछ लोगों के केबिन भी देखे. प्रायः हर केबिन में लोगों ने कुछ न कुछ यादें छोड़ने की कोशिश की थी. बड़े हाल में एक प्लेबोर्ड पर स्टेशन को छोड़ने की तारीख, कुछ सन्देश और कई लोगों के नाम लिखे हुए थे. इनको पढ़ते हुए हम तीनों ही बेहद भावुक हो गए. वहीं पर बैठकर रिकार्डर पर हमने भी अपने सन्देश रिकार्ड किये. इसका मकसद यह था कि यदि हम इस तूफ़ान के शिकंजे से नहीं बच पाए तो हमारी ये रिकार्डेड बातें हमारे परिजनो तक हमारे आखिरी शब्दों के रूप में पहुंच सके.

इस सन्देश के लिए हमें दस मिनट में अपनी बात पूरी करनी थी. सबसे पहले कालरा ने अपने माता-पिता के लिए एक संदेश रिकॉर्ड किया. फिर जीवा की बारी आयी. जीवा ने अपनी बात अंग्रेजी में शुरू की, फिर वे तेलगू बोले और सन्देश के आखिरी हिस्से तक आते-आते न जाने क्यों वे टूटी-फूटी हिंदी बोलने लगे. शायद वे हमें भी कुछ समझाना चाहते थे. इस दौरान वे इतने भावुक हो गये कि कई बार रोये भी. वैसे थोड़ा कम-ज्यादा हाल हम तीनों का एक जैसा ही था. कभी हम यह सोचते कि मैत्री और शिप में मौजूद हमारे साथी हमारे बारे में क्या सोच रहे होंगे? क्या वे हमें बचाने की किसी योजना पर काम कर रहे होंगे या सिर्फ तूफ़ान के ख़त्म हो जाने की प्रतीक्षा करेंगे. हालांकि हम भी यह जानते थे कि ऐसे मौसम में न तो हमारे हेलीकाप्टर उड़ान भर सकते थे और न ही किसी अन्य तरीके से हमें मदद पहुंचाई जा सकती थी.

कभी हम खुद को इस बात के लिए तैयार करते थे कि जरा सा भी मौसम ठीक होते ही हम यहां से पैदल ही अपने शिप की ओर चल पड़ेंगे और किसी न किसी तरह वहां पहुंचने का प्रयास करेंगे. हालांकि हम यह भी अच्छी तरह जानते थे कि इस जानलेवा कोशिश का सफल होना असंभव था. और कभी हम यह सोचते कि हमें किसी भी तरह खुद को गर्मियां आने तक तक ज़िंदा बचाये रखना है. क्योंकि तब तो निश्चित रूप से किसी न किसी तरह हमारी खोज कर ही ली जानी थी. हमने अब तक खुद को मानसिक तौर पर बुरी से बुरी स्थितियों के लिए भी तैयार कर लिया था और इसलिए हमारे मरने के बाद मिलने वाले इंश्योरेंस की रकम के बारे में करते हुए भी हम काफी सहज महसूस करने लगे थे.

बहरहाल इस समय हमारी चिंता यह थी कि जैसे भी हो जल्द से जल्द जीवा को लेकर हमें ऊपर खुली हवा और उजाले में पहुंचना है. कल जो सीढ़ी देखी थी उसे अपनी जगह से हटाने में काफी मशक्कत करनी पड़ी. उसे ऊपर के आखिरी प्लेटफार्म तक पहुंचाना भी बड़ी टेड़ी खीर थी. भीषण चिकनी सीढ़ियों पर उसे उठाकर चढ़ते हुए फिसल जाने और चोट लगने या हड्डी टूट जाने का बहुत खतरा था. चूंकि अंटार्कटिका में हड्डियां बहुत कमजोर हो जाती हैं इसलिए हमें वहां इस बात के लिए बहुत अधिक सावधानी रखने को कहा गया था. तस्वीरें खींचने और अपने आने के प्रमाण स्वरूप अपने नाम और तारीख बोर्ड पर लिखने के बाद हम किसी तरह धीरे-धीरे वहां से बाहर निकल आये.

ऊपर आने के बाद हमारे लिए यह यकीन कर पाना मुश्किल हो रहा था कि हम अपने 30-35 मीटर नीचे बर्फ में दबे एक ऐसे स्थान से आये हैं जहां कभी भारतीय विज्ञानियों और सैनिकों की तमाम गतिविधियां चला करती थीं और जिंदगी धड़कती थी. वहां रखे खाने के सामान ने प्रतिकूल परिस्थितियों से लड़ने की हमारी जिजीविषा को और मजबूती तो दी थी फिर भी हमें वहां नीचे ऐसा लगा था कि जैसे हम किसी बड़ी सी कब्र के भीतर पहुंच गए हों. हमने कई बार यह भी सोचा था कि आइस शेल्फ के भीतर दफ़न यह डीजी स्टेशन जब कभी आइस शेल्फ के टूटने के बाद समुद्र की अतल गहराइयों में भविष्य के किसी खोजी अभियान के दौरान सामने आएगा तो वह किसी महत्वपूर्ण कालपात्र से कम नहीं होगा. लेकिन इस वक्त तो हम यहां स्वयं के ही कालपात्र बन जाने से बचने की एक जंग लड़ रहे थे. इसलिए हमने जल्दी से पोर्टा केबिन की ओर कदम बढ़ाये और चाय का लालच देकर जीवा को सहज बनाने की कोशिश में जुट गए.

खाने का कामचलाऊ इंतजाम हो जाने के बाद अब हमने समय काटने के उपायों पर गौर करना शुरु कर दिया. फिल्मों की चर्चा अब उबाऊ होने लगी थी. इसलिये हमने अब खाने की बातें शुरू कर दीं. सुबह के नाश्ते, दिन के खाने, शाम की चाय और फिर रात के खाने के लिए अलग-अलग व्यक्ति को काल्पनिक जिम्मेदारी दी जातीं और वही उसका मेन्यू भी तय करता. हम उन सब चीजों की कल्पना करते जो हमने कभी खाई थीं. जैसे कि जिसे नाश्ते की जिम्मेदारी मिलती वह पहले यह बताता कि वह क्या बनाने जा रहा है. फिर अगर वह उसके बारे में कुछ ख़ास बात जानता होता तो वह भी बताता. फिर आती बात जरुरी चीजों की और फिर उसके बाद बनाने का तरीका बताया जाता. इस बीच अगर बाकी दोनों में से किसी को वह डिश नापसंद होती तो फिर नयी डिश तय की जाती.

इस काल्पनिक नाश्ते के चक्कर में एक-डेढ़ घंटा आसानी से बीत जाता. फिर बाहर की बर्फ हटाने आदि से निपटते तो लंच की चर्चा शुरू हो जाती. कल्पना लोक की इस सैर से हमारा समय तो आसानी से कट ही रहा था, हमारी स्वादेन्द्रियों भी एक तरह की तृप्ति का अहसास करने लगती थीं. इस तरक़ीब ने हमें मानसिक रूप से बहुत मजबूती दी क्योंकि तरह तरह की रेसिपीज के बारे में सोचते रहने से दिमाग को खाली रहने और वहां शैतान को घर बनाने का अवसर ही नहीं मिल पाता था.

हमने अब यह सोचना छोड़ दिया था कि कब मौसम साफ़ होगा और कब हमें बचाने के लिए कोई वहां पहुंचेगा. इसके बजाय हम यह सोचने लगे थे कि हम अपना अगला दिन किस तरह से बिताएंगे. हम तीनों अपनी डायरियों में जो कुछ भी लिखते उसे एक-दूसरे को सुनाना जरुरी कर दिया गया, ताकि एक दूसरे की मनोस्थिति के बारे में पता चलता रहे. मुझे और कालरा को यहां आये करीब 236 घंटे हो चुके थे और तूफ़ान को करीब 188 घंटे. मगर हमारे धैर्य, मानसिक दृढ़ता और विपरीत परिस्थितियों से जूझ सकने की सारी शक्तियों की अग्नि परीक्षा ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी.

इस दौरान कई वर्ष पुरानी चीजें खाने के बाद भी हम अब तक अंटार्कटिका में अक्सर होने वाली फ़ूड पॉयजनिंग से बचे हुए थे. कालरा को एक बार इसकी हलकी सी शिकायत हुई जो हमारे पास मौजूद दवाओं से ही ठीक हो गयी थी. इसके अतिरिक्त अन्य किसी तरह का कोई शारीरिक कष्ट हमें नहीं हुआ था और यह बात हमें बहुत हौसला देती थी. इसके अलावा एक-दूसरे पर व्यक्तिगत टिप्पणी न करने का जो नियम हमने बनाया था उसके कारण भी हमारे बीच सहअस्तित्व और एक-दूसरे की परेशानियों को समझने की भावना बहुत मजबूत हो गयी थी.

मेरे पास एक मल्टी परपज किट थी जिसमें दो तागे की एक रील और कुछ सुइयां भी थीं. हमने इसको समय काटने का नया हथियार बनाया. हम अपनी इनर पेंट के पायचों की सिलाइयां उधेड़ते और फिर उन्हें दुबारा हाथ से सिलते. इस काम में लगने वाला समय नोट किया जाता और फिर हर बार कभी सबसे कम समय लेने वाले या कभी सबसे अधिक समय लेने वाले को विजयी घोषित किया जाता. हर बार तीनों लोगों का काम ख़त्म होने के बाद ही पर्ची निकाल कर जीत का लक्ष्य तय होता. इससे सिलाई करते समय हमें यह मालुम नहीं होता था कि हमें ज्यादा तेज सिलने पर जीत मिलेगी या फिर धीमे सिलने पर.

30 जनवरी की शाम तूफ़ान कुछ हल्का होता दिख रहा था लेकिन कुछ घंटे बाद वह फिर तेज हो गया. इसने हमें और परेशान कर दिया. हमें यह आशंका होने लगी कि कहीं अब तूफ़ान और तेज न हो जाए. लेकिन जैसे हर रात के बाद फिर सूरज निकलता है वैसे ही हमारी आफतों का भी सवेरा होना ही था. 31 जनवरी 1992 की सुबह हमें आसमान में कुछ गडगड़ाहटें सुनाई दीं. मैंने जल्दी से बाहर निकलकर देखा तो नेवी के दो पेंग्विन हेलीकाप्टर हमसे विपरीत दिशा में जाते दिखाई दिए. यह हमारे लिए अविस्मरणीय क्षण था. निराशा के बादल एक झटके से हट गए और सकुशल जिन्दा बच कर जाने की उम्मीदें हिलोरे लेने लगीं. हेलीकाप्टरों ने जैसे ही वापस हमारी और मुड़ना शुरू किया वैसे ही मैंने अपनी जैकेट लहराकर उनका ध्यान खींचने की कोशिश की मगर वे एक चक्कर लगाकर फिर से वापस मुड़ गए. मैंने तेजी से ऊपर हैलीपैड जैसी जगह की और बढ़ने की कोशिश की मगर कुछ घंटे पहले तेज हुए तूफ़ान से उड़कर आयी ताजा बर्फ में धंस सा गया. हेलीकाप्टर जैसे-जैसे दूर होते गए मैं भी निराशा में डूबने लगा. मेरे दोनों साथियों के चेहरे भी एकदम उतर से गए. मौसम अब भी बहुत अच्छा नहीं था फिर भी मैंने केबिन का दरवाजे खोल दिया. दिल के किसी कोने में उम्मीद की एक किरण अभी बाकी थी.

घोर निराशा और असहायता से जूझते हुए करीब पंद्रह मिनट बीते होंगे कि दूर कहीं से गड़गड़ाहट की आवाजें फिर से सुनाई दीं. मैं झटपट बाहर निकला और पोली बर्फ में क्रॉल करता हुआ ऊपर पहुंच गया. वहां मैंने अपनी लाल जैकेट लहराना शुरू किया और तब मुझे ऐसा लगा कि हेलीकाप्टरों ने मुझे देख लिया है. कुछ ही क्षण में दोनों हेलीकाप्टर हमारे पास पहुंच चुके थे चूंकि नीचे बर्फ बहुत पोली थी इसलिए दोनों हेलीकाप्टर सतह से करीब दो फीट ऊपर ही स्थिर हो गए. उससे सबसे पहले एक डाक्टर ने उतरकर हमसे पूछा कि क्या सब कुछ ठीक है. मेरे हां कहने पर उन्होंने अपने दोनों साथियों को अंगूठे से इसका इशारा किया. इसके बाद मैं अपने साथियों के पास गया और उनसे तत्काल बाहर निकलने के लिए कहा. सामान वहीँ पर छोड़कर हम तीनों हेलीकाप्टरों की ओर बढे. जीवा को एक इन्जेक्शन लगाया गया और हम उड़ चले शिप की ओर. वापस अपने साथियों के पास.

रास्ते में हमें बताया गया कि सुबह जैसे ही शिप के आसपास का मौसम थोड़ा ठीक हुआ तो उन लोगों ने जल्दी से हेलीकाप्टर डेक के अंदर से बाहर निकाले और हमारी खोज के लिए निकल पड़े. डीजी केंद्र के आसपास जब उन्हें जिंदगी के कोई निशान या हलचल नहीं दिखाई दी तो उन्हें लगा कि शायद हम मौसम का कहर झेल नहीं पाए. चूंकि मौसम के फिर से बिगड़ने की आशंका थी इसलिए वे जल्दी से थुलेलैंड की और लौट गये. जब उन्हें शिप के आसपास मौसम ठीक दिखा तो डेलिकॉप्टर के पायलट नंदन बल ने पायलट खन्ना से कहा कि सर अभी हमारे पास पर्याप्त फ्यूल है और हम एक चक्कर और लगा सकते हैं. इसके बाद उन्होंने फिर से हमारी तलाश के लिए हेलीकाप्टर वापस मोड़ लिए और उनका यह निर्णय हमें नयी जिंदगी दे गया.

शिप पर जब हम उतरे तो वहां सारी टीम और शिप क्रू हमारे स्वागत के लिए तैयार खड़ा था. हमें मालायें पहनाकर हमारा स्वागत किया गया. शैम्पेन और चाकलेटों से हमारा मुंह मीठा कराया गया और हमारे नाम के जयकारे लगाए गए. फिर हमें नहाने के बाद डॉक्टर के पास पहुंचने को कहा गया. शाम को जब हम शिप के डायनिंग हाल में बैठकर कुछ खा रहे थे और उस स्वाद को याद कर रहे थे जो हमने ढाई सौ घंटों से भी अधिक समय तक हासिल किया था तब एयरफोर्स के एक साथी ने आकर हमें बताया कि यहां तो आप लोगों की तस्वीरें भी तैयार कर ली गयीं थी. और जो मालायें हमारे गले में डाली गई थीं वे दरअसल हमारी तस्वीरों के लिए ही तैयार की गई थीं.