बीसवीं सदी के भारत में जवाहरलाल नेहरू ने राजनीति, कला, संस्कृति और विज्ञान समेत जिन क्षेत्रों पर अपना गहरा प्रभाव डाला था, उनमें साहित्य भी एक था. राष्ट्र-निर्माण के साथ-साथ राष्ट्रीय अस्मिता को रचने में साहित्य की अहम भूमिका को नेहरू जी अच्छी तरह से समझते थे. उन्होंने एक बार लिखा था - ‘हम लोग जो राजनीतिक क्षेत्र में काम करते हैं, देश के और ज़रूरी पहलू अक्सर भूल जाते हैं. किसी देश की असल जागृति उसके नए साहित्य से मालूम होती है क्योंकि उसमें जनता के नए-नए विचार और उमंगें निकलती हैं.’ अप्रैल 1939 में लिखे गए ‘साहित्य की बुनियाद’ शीर्षक वाले एक लेख में नेहरू ने साहित्यकारों से आम हिंदुस्तानी पाठकों को ध्यान में रखकर साहित्य लिखने का आह्वान करने के साथ-साथ ऐसा साहित्य रचने का आग्रह भी किया जो नए हिंदुस्तान का आईना बन सके.

जवाहरलाल नेहरू अपने समय के भारतीय लेखकों के संपर्क में लगातार रहा करते थे. इनमें मुल्कराज आनंद, राजा राव, आरके नारायण जैसे अंग्रेजी के और सज्जाद जहीर जैसे उर्दू के लेखकों के अलावा हिंदी के भी कई लेखक शामिल थे. जहां सज्जाद ज़हीर अपनी किताब ‘रौशनाई’ में प्रगतिशील आंदोलन से नेहरू के जुड़ाव का ज़िक्र करते हैं, वहीं राजा राव और आरके नारायण ने भी नेहरू से अपने सम्पर्क-संवाद के बारे में लिखा है. मुल्कराज आनंद ने तो नेहरू के मानवतावाद पर ‘द ह्यूमनिज़्म ऑफ जवाहरलाल नेहरू’ सरीखी पुस्तक लिखने के साथ ही बच्चों के लिए ‘द स्टोरी ऑफ चाचा नेहरू’ जैसी दिलचस्प किताब भी लिखी थी.

प्रसिद्ध शायर फ़िराक़ गोरखपुरी भी नेहरू के आत्मीय रहे. असहयोग आंदोलन में भाग लेकर अठारह महीने जेल की सजा काटने वाले फ़िराक़ गोरखपुरी ने नेहरू के आग्रह पर कई वर्षों तक अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के अंडर-सेक्रेटरी के रूप में काम किया. उस दौरान ख़ुद नेहरू भारतीय कांग्रेस समिति के सेक्रेटरी थे. जवाहरलाल नेहरू हिंदी के साहित्यकारों जैसे प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, निराला, दिनकर, राहुल सांकृत्यायन, मैथिलीशरण गुप्त आदि के भी सम्पर्क में रहे और उन्होंने इनमें से कई को किसी न किसी रूप में प्रभावित भी किया.

नेहरू और प्रेमचंद

प्रेमचंद का समूचा रचनाकर्म ही अपने समय की राजनीतिक-सामाजिक हलचलों की बानगी देता है. ‘सोज़-ए-वतन’ की कहानियों से लेकर, ‘गोदान’ सरीखे उपन्यास और ‘महाजनी सभ्यता’ जैसे लेख इसके साक्षी हैं. वर्ष 1918-20 के दौरान लिखे गए उपन्यास ‘प्रेमाश्रम’ में ठीक उसी समय युक्त प्रांत (यूपी) के प्रतापगढ़, फ़ैज़ाबाद और रायबरेली ज़िलों में चल रहे किसान आंदोलन की छाप स्पष्ट दिखती है. ज़मींदारों और तालुकेदारों के अत्याचारों के विरुद्ध चल रहे किसानों के आंदोलन में जवाहरलाल नेहरू भी शामिल थे. नेहरू ने कहा था कि किसानों का यह आंदोलन लगान वृद्धि, जबरिया वसूली, ज़मीन से बेदखली और किसानों पर हो रहे अत्याचारों के विरुद्ध था. इस अत्याचार में ज़मींदार व उसके कारिंदों के साथ-साथ सूदखोर और पुलिस भी शामिल थी. नेहरू ने दुख जताते हुए कहा था कि किसानों की जीतोड़ मेहनत के बदले उन्हें सिर्फ़ ज़मींदारों के लात-घूंसे, गालियां और भुखमरी ही मिलती है.

‘ग़बन’ और ‘कर्मभूमि’ लिखते हुए प्रेमचंद ने अनुवाद का काम भी जारी रखा था. इलाहाबाद स्थित हिंदुस्तानी एकेडमी के लिए प्रेमचंद ने गाल्सवर्दी के तीन नाटकों के तो अनुवाद किए ही. साथ ही, आचार्य नरेंद्र देव के कहने पर उन्होंने नेहरू की पुस्तक ‘लेटर्स फ़्राम ए फादर टू हिज़ डॉटर’ का अनुवाद भी किया. ‘पिता के पत्र पुत्री के नाम’ शीर्षक से प्रकाशित इस किताब के हिंदी संस्करण की भूमिका लिखते हुए नेहरू ने जुलाई 1931 में लिखा था कि ‘मुझे आशा थी कि हिंदी में भी यह किताब जल्दी निकले लेकिन और कामों में मैं फंसा रहा और कई कठिनाइयां पेश आ गईं इसलिए देर हो गई. इन अंग्रेज़ी पत्रों का हिंदी में अनुवाद श्री प्रेमचंद जी ने किया है और उनका मैं बहुत मशकूर हूं.’

तीस के दशक में प्रेमचंद और उनकी पत्नी शिवरानी देवी भी राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय हो चुके थे. जवाहरलाल नेहरू की मां स्वरूपरानी के व्यक्तित्व और उनके त्याग से प्रेमचंद और शिवरानी देवी दोनों ही गहरे प्रभावित थे. सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान स्वरूपरानी नेहरू के भाषण से प्रभावित होकर शिवरानी देवी ‘महिला आश्रम’ की सदस्य बनीं. इसके बाद नवंबर 1930 में शिवरानी देवी की गिरफ़्तारी भी हुई और तीन महीने बाद वे रिहा हुईं.

वर्ष 1932 में सविनय अवज्ञा आंदोलन के दूसरे चरण के समय जवाहरलाल नेहरू की मां स्वरूपरानी पर एक प्रदर्शन के दौरान लाठी बरसाई गई, जिससे उनके सर पर गहरी चोट आई. प्रेमचंद की जीवनी लिखने वाले मदन गोपाल लिखते हैं कि इस घटना से व्यथित होकर प्रेमचंद ने अपने मित्र और कानपुर से छपने वाले ‘ज़माना’ के सम्पादक दयानारायण निगम को एक ख़त में लिखा कि ‘सरकार की दमनकारी नीतियां अब असहनीय हो चुकी हैं. जवाहरलाल नेहरू की माता जी के साथ कितना क्रूर और अपमानजनक व्यवहार किया गया! मैं शर्मिंदा हूं कि इतना सब कुछ होने के बाद मैं अब भी जेल से बाहर हूं’

जब 1936 में सज्जाद ज़हीर ने प्रगतिशील लेखक संघ की बैठक की अध्यक्षता करने के लिए प्रेमचंद से निवेदन किया, तब प्रेमचंद ने उन्हें नेहरू और ज़ाकिर हुसैन का नाम सुझाया था. हालांकि बाद में प्रेमचंद ने ही लखनऊ में हुई ऐतिहासिक बैठक की सदारत की थी. इसी दौरान प्रेमचंद महात्मा गांधी की पहल पर बनाई गई ‘भारतीय साहित्य परिषद’ से भी जुड़े, जिसमें जवाहरलाल नेहरू भी शामिल थे. प्रेमचंद द्वारा संपादित पत्रिका ‘हंस’ भारतीय साहित्य परिषद का मुखपत्र भी बनी थी.

महादेवी के जवाहर भाई

कवयित्री और लेखिका महादेवी वर्मा के रेखाचित्र और संस्मरण भारतीय साहित्य की धरोहर हैं. उनका एक ऐसा ही संस्मरण है जवाहरलाल नेहरू के बारे में, शीर्षक है : ‘जवाहर भाई’. नेहरू से अपनी पहली मुलाक़ात के बारे में महादेवी लिखती हैं कि तब वे इलाहाबाद के क्रास्थवेट गर्ल्स कॉलेज में सातवीं कक्षा की छात्रा थीं. एक दिन उन्हें आचार्या कुमारी तुलासकर के साथ आनंद भवन जाने का मौका मिला और वे स्कूली ड्रेस में ही आनंद भवन के लिए चल पड़ीं. अपने मन में नेहरू से पहली मुलाक़ात की गहरी छाप के बारे में महादेवी लिखती हैं कि ‘नेहरू की दृष्टि में एक स्वप्निल विशेषता थी. सामने खड़े व्यक्ति को ऐसा लगता था मानों वे आंखें उसके पार कुछ देख रही हैं.’

अपनी शिक्षिका के साथ आनंद भवन से जब वे लौटने लगीं तो वे अपना बस्ता भूलकर बाहर आ गईं. नेहरू महादेवी का बस्ता बाहर ले कर आए और उनसे पूछा कि ‘यह किताबें तुम्हारी हैं?’ जब महादेवी ने स्वीकृति में सिर हिलाया तो नेहरू ने डांटते हुए कहा – ‘क्या वाहियात बात है! किताबें फेंकती घूमती हो.पढ़ती क्या खाक होगी?’

महादेवी लिखती हैं कि ‘क्या वाहियात बात है’ वाली डांट उन्हें नेहरू से आगे चलकर भी कई दफ़े सुनने को मिली. मोटर दुर्घटना में महादेवी का पैर टूट गया, नेहरू ने कहा ‘क्या वाहियात बात है, तुमने अपना पैर ही तोड़ लिया.’ जब कई महीनों तक महादेवी अस्वस्थ रहीं, तो नेहरू ने कहा ‘क्या वाहियात बात है, तुम अक्सर बीमार हो जाती हो.’ महादेवी लिखती हैं कि नेहरू को तब से उन्होंने सैकड़ों बार देखा, पर किसी भी स्थिति में उनके मानवीय रूप में कोई अंतर नहीं मिला.

उन्होंने प्रधानमंत्री के रूप में नेहरू से मुलाक़ात का एक दिलचस्प ब्यौरा दिया है. हुआ यूं कि महादेवी को लेखकों के कॉपीराइट से जुड़े मुद्दे के संबंध में मौलाना आज़ाद से बात करने के लिए दिल्ली जाना पड़ा. उन्होंने नेहरू से मिलने की ठानी, लेकिन उन्होंने पहले से इस मुलाक़ात के लिए कोई समय निश्चित नहीं किया था. जब वे नेहरू से मिलने तीन मूर्ति पहुंची, तो उनके निजी सचिव ने कहा कि बिना पूर्व निश्चित समय के उनसे मुलाक़ात संभव नहीं, और यह भी कि यहां तो लोग 10-10 दिन प्रतीक्षा में पड़े रहते हैं.

बात महादेवी को चुभ गई. उन्होंने पलटकर जवाब दिया, ‘वह प्रधानमंत्री की व्यस्तता का प्रमाण हो सकता है, परंतु जो 10-10 दिन पड़े रहते हैं, उनके निठल्लेपन का तो निश्चित प्रमाण है. आप जाकर उन्हें सूचना दें कि प्रयाग से महादेवी आई है और उसे आज ही लौट जाना है. वह उनसे मिलने की प्रतीक्षा में जीवन के 10 दिन खोने की स्थिति में नहीं है.’ फिर क्या था, जवाहरलाल ख़ुद बाहर आए और महादेवी को अपने साथ अंदर ले गए और उनसे कहा कि ‘यहां बैठो, इलाहाबाद के हालचाल बताओ. तुमसे किसने क्या कह दिया?’ महादेवी लिखती हैं कि ‘इसके बाद मुझे न रूठने की याद रही न उपालंभ देने की. कार्यव्यस्त रहने पर भी दूसरों के विश्वास और सुविधा की चिंता करना नेहरू कदाचित ही कभी भूलते थे.’

एक दिलचस्प घटना खाने की दावत को लेकर भी है. एक बार महादेवी और राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त नेहरू से मिलने गए. नेहरू ने दोनों को रात में भोजन का आमंत्रण दिया. जब उन्हें पता चला कि मैथिलीशरण गुप्त की तरह ही महादेवी भी शाकाहारी हैं तो नेहरू ने महादेवी से मज़ाक में कहा क्या तुम अब तक घास-पात खाती हो. मैथिलीशरण जी ने जवाब दिया ‘आप सबने हमारे लिए छोड़ा ही क्या है.’ फिर नेहरू ने शाकाहारी भोजन बनवाने का प्रबंध किया. रात के भोजन में शाकाहारी और मांसाहारी दोनों ही का प्रबंध था. नेहरू ने महादेवी की थाली अपने पास रखवाई और उनसे आत्मीयता से कहा ‘जो तुम नहीं खाती हो, उसे दूसरों को खाते देख नाक-भौं मत चढ़ाना, अच्छा!’

महादेवी इस अनूठे संस्मरण के आखिर में लिखती हैं : ‘आज नेहरू अपनी स्वप्नदृष्टि के साथ तिरोहित हो चुके हैं, उन्होंने अपने स्वप्नदर्शी होने का मूल्य चुकाया और देश ने एक स्वप्नदर्शी पाने का.’

नेहरू और निराला

हिंदी के प्रसिद्ध कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ने फरवरी 1930 में ‘सुधा’ में प्रकाशित एक संपादकीय में लाहौर कांग्रेस के सभापति जवाहरलाल नेहरू के व्यक्तित्व व कृतित्व के बारे में विस्तार से लिखा था. असहयोग आंदोलन के दौरान चले मुकदमे में नेहरू द्वारा दिए गए साहसिक बयान को सराहते हुए निराला ने लिखा कि ‘अदालत में पं. जवाहरलाल जी ने जैसे बयान दिए, उनसे आपकी तेजस्विता, देशप्रेम तथा कूटनीति के दुरूह जाल को भेद कर जाने की अपार मेधा-शक्ति का अद्भुत परिचय मिला है. यह भारत के इतिहास में चिरकाल के लिए अमर रहेगा.’ निराला ने नेहरू की दृढ़ता, कार्यकुशलता और दूरदर्शिता की प्रशंसा की और लिखा कि ‘वह नम्र और स्फटिक की तरह स्वच्छ हैं, और उनकी सत्यवादिता संदेह के परे है. उनके हाथों से जाति के स्वार्थ की किसी प्रकार हानि नहीं हो सकती.’

उल्लेखनीय है कि जहां निराला ने ‘काले-काले बादल छाए, न आए वीर जवाहरलाल’ और ‘टूटी बांह जवाहर की’ जैसी कविताएं लिखी थीं. वहीं भाषा समेत कुछ मुद्दों पर उन्होंने नेहरू की आलोचना भी की थी. ‘निराला रचनावली’ के संपादक नंदकिशोर नवल लिखते हैं कि ‘निराला का नेहरू-विरोध अंधविरोध नहीं था. वे नेहरू की प्रगतिशील नीतियों का समर्थन करते थे, उन्हीं के कारण उनकी प्रशस्ति करते थे, और उनकी जन-विरोधी नीतियों के कारण उनकी तीखी आलोचना भी करते थे.’ इलाहाबाद से छपने वाले साप्ताहिक ‘देशदूत’ में नवंबर 1943 में छपी कविता में निराला ने लिखा था :

जवाहरलाल!

वह था किशोरकाल./ दैव के चक्र से वक्रगति आ मिले,

मैं था सत्रह का, चौबीस के / जवाहरलाल!

गीता की आवृत्ति करके / सुनाई मैंने,

मैं हूं कवि आज, धन्य / नेता हैं जवाहरलाल.(निराला रचनावली, खंड-6)

इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने भी अपने एक लेख में जवाहरलाल नेहरू द्वारा प्रधानमंत्री रहते हुए निराला को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने के प्रयासों का ज़िक्र किया है. नेहरू ने मार्च 1954 में साहित्य अकादमी के सचिव कृष्ण कृपलानी को निराला के विषय में एक ख़त लिखा था. निराला की तंगहाली और उनकी ख़राब आर्थिक स्थिति के बारे में बताते हुए नेहरू ने ख़त में लिखा था कि निराला का उदाहरण प्रकाशकों द्वारा एक लेखक के शोषण का ज्वलंत उदाहरण है.

अतः नेहरू ने अकादमी से आग्रह किया कि वह कॉपीराइट कानून में कुछ ऐसे बदलाव करे, जिससे भविष्य में भारतीय लेखकों का कोई शोषण न हो. नेहरू ने अकादमी से निराला को सौ रुपए की मासिक वृत्ति देने और निराला के फक्कड़ स्वभाव को ध्यान में रखते हुए यह रकम महादेवी वर्मा के माध्यम से निराला तक पहुंचाने का आग्रह किया था. अकादमी ने निराला को सौ रुपये की मासिक वृत्ति देना स्वीकार भी किया. इस पूरे घटनाक्रम पर टिप्पणी करते हुए रामचंद्र गुहा ने लिखा है कि आज के भारत यह सोचना भी मुश्किल है कि एक कवि की तंगहाली से चिंतित होकर कोई प्रधानमंत्री उसे आर्थिक मदद देने की बात सुझाते हुए ख़त लिखेगा और यह भी बताएगा कि यह मदद किसके हाथों में या किसके जरिए दी जाय.

नेहरू और मुक्तिबोध

प्रसिद्ध कवि व लेखक गजानन माधव मुक्तिबोध ने हिन्दी के साप्ताहिक ‘सारथी’ में जुलाई 1956 में एक लेख लिखा था, शीर्षक था ‘नेहरूजी की जर्मनी यात्रा का महत्त्व’. यह लेख उसी वक़्त सम्पन्न हुई नेहरू की जर्मनी यात्रा के बारे में था. पश्चिमी जर्मनी की आम जनता द्वारा नेहरू के अभूतपूर्व स्वागत, जर्मन चांसलर कोनराड एडिनॉवर और नेहरू की संयुक्त विज्ञप्ति और भारत-जर्मनी के बीच परस्परिक सहयोग को लेकर हुए समझौतों के संदर्भ में लिखते हुए मुक्तिबोध ने इसे ऐतिहासिक घटना का दर्ज़ा दिया.

जर्मनी में नेहरू द्वारा दिए गए भाषणों और ठीक उसी समय अमेरिका में वीके कृष्णा मेनन द्वारा दिए गए वक्तव्यों का विश्लेषण करते हुए मुक्तिबोध ने लिखा कि ये दोनों भारतीय कूटनीतिज्ञ अपने-अपने स्थान पर अमेरिकी नीतियों के विरुद्ध वातावरण तैयार करते जा रहे हैं. मुक्तिबोध ने ध्यान दिलाया कि जिस पश्चिमी जर्मनी को लगभग समूचा यूरोप ही ‘अमेरिका का एक आर्थिक-औद्योगिक उपनिवेश’ मानता हो वहां नेहरू द्वारा यह घोषित करना कि संयुक्त राष्ट्र अमेरिका दुनिया को दो परस्पर-विरोधी खंडों में बांट देना चाहता है, एक ख़ास मानी रखता है. मुक्तिबोध का मानना था कि नेहरू की स्वतंत्र, सक्रिय और तटस्थ नीति को पश्चिमी जर्मनी समेत यूरोप के तमाम देशों में व्यापक स्वीकृति मिली है. विश्व राजनीति में नेहरू की महत्त्वपूर्ण भूमिका के संदर्भ में इसी लेख में मुक्तिबोध ने लिखा कि ‘भले ही नेहरू यह कहें कि उन्होंने समझौते कराने का पेशा अख़्तियार नहीं किया है. किन्तु उन्हें अन्य देशों की समस्याएं हल करने में सहायक होना ही पड़ेगा. पंडित नेहरू की इस विशेष स्थिति को दुनिया मानती है, भले ही वे न मानें.’

वर्ष 1957 में जवाहरलाल नेहरू ने अपने आधिकारिक कार्यों से एक सप्ताह का विश्राम लेने की घोषणा की थी. मुक्तिबोध ने नेहरू द्वारा विश्राम की इस पहल को ज़रूरी बताते हुए एक लेख लिखा था : ‘दून घाटी में नेहरू’. मुक्तिबोध लिखते हैं कि सुना है पंडित जवाहरलाल नेहरू एक हफ़्ते छुट्टी पर रहेंगे. ‘आराम हराम है’ का नारा देने वाले नेहरू जी को स्वयं आराम की कितनी ज़रूरत है, यह किसी से छिपा नहीं है. मुक्तिबोध का मानना था कि भारत में ज़रूरी विश्राम के महत्त्व को लोगों ने नहीं समझा है. उनके शब्दों में, ‘जबर्दस्ती विश्राम यानी बेकारी और स्वेच्छापूर्वक निरंतर विश्राम यानी आलस्य के इस क्लासिकल देश यानी भारत में आवश्यक विश्राम का महत्त्व शायद समझा ही नहीं गया है.’ इस संदर्भ में नेहरू ने नेपोलियन से जुड़े एक प्रसंग का भी उदाहरण दिया साथ ही, आइजनहावर (तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट डेविड आइजनहावर) और डॉ. सुकर्णो (इंडोनेशिया के पहले राष्ट्रपति) जैसे समकालीन नेताओं का भी ज़िक्र किया. मुक्तिबोध ने लिखा कि जो लोग ज़िम्मेदारी के पद पर हों, उनके लिए आराम भी एक कर्तव्य होना चाहिए.

नेहरू और दिनकर

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की प्रसिद्ध पुस्तक ‘संस्कृति के चार अध्याय’ की प्रस्तावना ख़ुद नेहरू ने लिखी थी. कहना न होगा कि भारतीय इतिहास और संस्कृति में नेहरू ख़ुद भी गहरी दिलचस्पी रखते थे और दस वर्ष पूर्व 1946 में ही नेहरू द्वारा जेल में रहते हुए लिखी गई कालजयी पुस्तक ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ प्रकाशित हो चुकी थी. ‘संस्कृति के चार अध्याय’ की प्रस्तावना में, जो सितंबर 1955 में लिखी गई थी, नेहरू लिखते हैं ‘मेरे मित्र और साथी दिनकर ने अपनी पुस्तक के लिए जो विषय चुना है, वह बहुत ही मोहक और दिलचस्प है. यह ऐसा विषय है जिससे, अक्सर, मेरा अपना मन भी ओत-प्रोत रहा है और मैंने जो कुछ लिखा है, उस पर इस विषय की छाप, आप-से-आप पड़ गई है.’

इस लंबी प्रस्तावना में नेहरू ने उन मुद्दों को रेखांकित किया, जो उनके दिलो-दिमाग के बेहद करीब थे. मसलन, हिंदुस्तान की मिली-जुली या सामासिक संस्कृति की बात, राजनीतिक-सांस्कृतिक एकता और सौहार्द की बात. भारतीय इतिहास का सिंहावलोकन करते हुए नेहरू ने सातत्य और परिवर्तन की शक्तियों की भी चर्चा की. नेहरू का कहना था कि भले एकबारगी ये शक्तियां विरोधी प्रतीत हों, पर असल में, वे परस्पर जुड़ी हुई हैं : ‘परिवर्तन एक ऐसी प्रक्रिया है जो परंपरा के आवरण में लगातार चलती रहती है. बाहर से अचल दीखने वाली परंपरा भी, यदि जड़ता और मृत्यु का पूरा शिकार नहीं बन गई है, तो वह भी धीरे-धीरे परिवर्तित हो जाती है.’ भारत की राष्ट्रीय संस्कृति के संदर्भ में नेहरू ने समन्वयन और आत्मसात करने की उन प्रवृत्तियों का उल्लेख किया, जिसने भारतीय संस्कृति को जीवंत और गतिशील बनाए रखा. भारत के इतिहास और संस्कृति के निर्माण में हरेक भारतीय का योगदान है, इस बात पर बल देते हुए नेहरू ने लिखा कि ‘भारत में बसने वाली कोई भी जाति यह दावा नहीं कर सकती कि भारत के समस्त मन और विचारों पर उसी का एकाधिकार है. भारत आज जो कुछ है, उसकी रचना में भारतीय जनता के प्रत्येक भाग का योगदान है. यदि हम इस बुनियादी बात को नहीं समझ पाते तो फिर हम भारत को भी समझने में असमर्थ रहेंगे.’

जवाहरलाल नेहरू ने हरिवंश राय बच्चन की प्रसिद्ध कृति ‘मधुशाला’ के अंग्रेज़ी अनुवाद की भूमिका भी लिखी थी. यह अनुवाद ‘द हाउस ऑफ वाइन’ शीर्षक से 1950 में फॉर्च्यून प्रेस द्वारा प्रकाशित किया गया था. नेहरू ने हरिवंश राय बच्चन की कृति ‘मधुशाला’ की सराहना करते हुए इसमें मार्जरी बोल्टन एवं राम स्वरूप व्यास द्वारा किए गए अंग्रेज़ी अनुवाद की प्रशंसा भी की थी.

जवाहरलाल नेहरू के निधन के वर्ष भर बाद ही दिनकर ने जवाहरलाल नेहरू पर एक पुस्तक लिखी थी, शीर्षक था ‘लोकदेव नेहरू’. इस किताब में दिनकर ने पंडित नेहरू के राजनीतिक और अंतरंग जीवन के अनेक अनछुए पहलुओं के बारे में लिखा था. दिनकर ने ‘लोकदेव’ शब्द विनोबा से लिया था, जिन्होंने इस शब्द का प्रयोग नेहरू को श्रद्धांजलि देते हुए किया था. नेहरू के विषय में दिनकर ने इसी किताब में ठीक ही लिखा है कि ‘पंडित जी, सचमुच ही, भारतीय जनता के देवता थे.’