भारत सहित पूरी दुनिया में कोरोना वायरस से पैदा हुए हालात के चलते बीते फरवरी-मार्च से स्कूल और कॉलेज बंद हैं. बीते कुछ दिनों से ऐसी खबरें आ रही थीं कि केंद्र सरकार ग्रीन और ऑरेंज जोन वाले इलाकों में स्कूल और कॉलेज खोलने वाली है. लेकिन केंद्रीय गृह मंत्रालय ने साफ़ कर दिया है कि सरकार हाल-फिलहाल ऐसा कोई कदम नहीं उठाने जा रही है. भले भारत सरकार स्कूल खोलने पर विचार न कर रही हो, लेकिन दुनिया के कई ऐसे देश हैं, जहां कोविड-19 महामारी के दौरान इन्हें खोल दिया गया है. आइये जानते हैं कि इन देशों में इस समय स्कूल किस तरह से काम कर रहे हैं और यहां की सरकारों ने कोरोना संकट के दौरान भी स्कूल खोलने का खतरा क्यों उठाया है.

डेनमार्क

कोरोना वायरस के इस संकट के दौरान यूरोप में सबसे पहले डेनमार्क ने अपने स्कूल खोलने का निर्णय लिया. यहां की सरकार ने दो चरणों में स्कूल खोले. पहले 15 अप्रैल को पहली से पांचवीं कक्षा के बच्चों के लिए स्कूल खोले गए और फिर बीते हफ्ते छठवीं से नौवीं कक्षा के बच्चों को भी स्कूल जाने की इजाजत दे दी गयी. डेनिश स्वास्थ्य प्राधिकरण ने इसके लिए अलग से दिशानिर्देश जारी किए. डेनमार्क में स्कूलों में सुबह की प्रार्थना सभा पर रोक लगा दी गई है. क्लास रूम में एक डेस्क पर केवल एक ही बच्चे को बैठने की अनुमति दी गई है और दो डेस्कों के बीच में कम से कम दो मीटर की दूरी रखी गयी है.

छात्रों को घर से स्कूल के लिए निकलते समय, स्कूल परिसर में प्रवेश करते समय, खाने से पहले और बाद में एवं खांसी या छींक आने के तुरंत बाद हाथ धोने के निर्देश दिए गए हैं. खेल के मैदान में केवल 10 साल की उम्र तक के बच्चों को 5-7 के ग्रुप में खेलने की ही अनुमति है. दिशानिर्देशों के अनुसार एक ग्रुप के बच्चे हर रोज केवल उसी ग्रुप में खेल सकते हैं और केवल ऐसे खेलों की ही अनुमति दी गई है जिनमें बच्चों के बीच शारीरिक सम्पर्क न हो सके. स्कूल में बच्चों के हाथ मिलाने और साथ बैठकर खाने पर भी रोक लगी हुई है. शौचालयों और सभी ऐसी सतहों को दिन में कई बार सेनिटाइज किया जाता है जिन्हें बच्चे बार-बार छूते हैं.

नॉर्वे

नॉर्वे में जब कोरोना वायरस के मरीजों की संख्या में दो हफ्ते तक गिरावट बनी रही तो वहां की सरकार ने स्कूलों को खोलने का फैसला किया. पहले 20 अप्रैल से किंडरगार्टन एवं नर्सरी और फिर 27 अप्रैल से छह से 10 साल की उम्र के बच्चों के लिए स्कूलों को खोला गया. स्कूलों को सुरक्षित बनाने के लिए नॉर्वे के स्वास्थ्य मंत्रालय ने सख्त दिशानिर्देश जारी किये. दिशानिर्देशों के तहत किंडरगार्टन में एक टीचर को तीन साल की उम्र तक के केवल तीन बच्चों को ही संभालने की जिम्मेदारी दी गई है. नॉर्वे में माता-पिता को स्कूल के लिए निकलते समय बच्चे के शरीर का तापमान मापना जरुरी है. इसके बाद स्कूल में भी एक बार बच्चे की थर्मल स्क्रीनिंग की जाती है. मैदान में बच्चों को अलग-अलग ग्रुप में खिलाया जाता है, ऐसे खिलौने ही इस्तेमाल किये जाते हैं, जो आसानी से धोये जा सकें. स्कूलों को यह निर्देश भी दिया गया है कि सभी टीचर एक-दूसरे से एक मीटर की दूरी बनाये रखें और कम से कम हर एक घंटे के बाद 20 सेकेंड तक हाथ धोएं.

स्वास्थ्य मंत्रालय के निर्देशों के तहत पहली से पांचवीं तक की कक्षाओं में अधिकतम 15 बच्चे ही बैठाए जा सकते हैं. प्रत्येक डेस्क के बीच में कम से कम तीन फीट की दूरी होनी चाहिए. डेस्क को रोज धोना भी अनिवार्य है. नॉर्वे में एहतियात के तौर पर ज्यादातर स्कूल कमरों के बजाय खुले वातावरण में बच्चों को पढ़ा रहे हैं. नॉर्वे की सरकार की ओर से यह भी कहा गया है कि किंडरगार्टन के बच्चों के लिए रोज स्कूल आना अनिवार्य नहीं है. लेकिन छह से 10 साल की उम्र का कोई बच्चा अगर स्कूल नहीं आ रहा है तो उसके माता-पिता को साबित करना होगा कि वह बच्चा बीमार है.

फ्रांस

फ्रांस ने अपने यहां बीती 11 मई को लॉकडाउन में ढील दी थी. इसी दिन से सरकार ने किंडरगार्टन और पहली से पांचवीं तक के स्कूलों को भी खोल दिया. इसके एक हफ्ते बाद ही 18 मई से माध्यमिक स्कूलों को भी खोलने की अनुमति दे दी गयी. सरकार के दिशानिर्देशों के अनुसार एक क्लास रूम में केवल 10 छात्रों को ही बैठने की इजाजत दी गयी है. और अभिभावकों को थर्मल स्क्रीनिंग के बाद ही बच्चों को स्कूल भेजने को कहा गया है.

फ्रांस में मास्क को लेकर भी स्कूलों के लिए दिशानिर्देश जारी किए गए हैं. किंडरगार्टन और नर्सरी के बच्चों के लिए मास्क लगाना प्रतिबंधित किया गया है, जबकि पहली से पांचवीं कक्षा तक के बच्चों के मामले में मास्क लगाना उनके माता-पिता की इच्छा पर छोड़ दिया गया है. पांचवीं कक्षा से ऊपर के बच्चों और टीचर्स के लिए मास्क लगाना अनिवार्य है. स्कूलों में छात्रों और टीचर्स को कई बार हाथ धोने और एक-दूसरे से कम से कम एक मीटर की दूरी बनाए रखने के लिए कहा गया है. डेनमार्क और नार्वे की तरह ही फ्रांस में भी ऐसे खेलों पर प्रतिबंध लगाया गया है जिनमें बच्चे एक-दूसरे को छूते हैं. सरकारी दिशानिर्देशों के अनुसार फ्रांस में क्लास रूम्स के खिड़की-दरवाजे दिन भर खुले रहने चाहिए और छात्रों के आने से पहले और जाने के बाद उन्हें सेनिटाइज किया जाना चाहिए. कोरोना वायरस महामारी के दौरान फ्रांस के स्कूलों में अभिभावकों का आना प्रतिबंधित कर दिया गया है.

महामारी के दौरान भी स्कूल क्यों खोले गए?

बीती सात अप्रैल को जब नॉर्वे की प्रधानमंत्री एर्ना सोलबर्ग ने दो हफ्ते बाद स्कूल खोलने की बात कही थी तो बड़ी संख्या में लोगों ने इसका विरोध किया था. सोशल मीडिया पर सरकार के इस फैसले के खिलाफ बड़ा कैम्पेन भी चलाया गया. लेकिन इसके बावजूद सोलबर्ग की सरकार ने अपने कदम पीछे नहीं खींचे. उधर, फ्रांस में 11 मई से स्कूल खोलने के फैसले का पेरिस क्षेत्र के करीब 300 मेयर्स (महापौरों) ने विरोध किया था. सरकार को लिखे एक खुले पत्र में इनका कहना था कि यह फैसला जल्दबाजी भरा है. मेयर्स के विरोध के बाद भी फ्रांस की सरकार ने देश के करीब 40 हजार प्राइमरी स्कूल खोल दिए. इस फैसले के कुछ रोज बाद ही अलग-अलग स्कूलों में 70 से ज्यादा छात्र और अध्यापक कोरोना पॉजिटिव पाए गए. लेकिन इसके बाद भी वहां की सरकार ने स्कूलों को बंद नहीं किया. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर ऐसी क्या वजह है कि सरकारों को महामारी के दौरान भी स्कूल खोलने पड़ रहे हैं.

बीती चार मई को फ्रांस के शिक्षा मंत्री जीन-मिशेल ब्लेंकर ने महामारी के दौर में भी स्कूल खोले जाने की वजह मीडिया को बताई. उनका कहना था कि अर्थव्यवस्था को फिर शुरू करने और उसे पटरी पर लाने में स्कूलों की भूमिका अहम है. उनके मुताबिक अगर किंडरगार्टन से लेकर 10 साल के बच्चों तक के स्कूल नहीं खोले गए तो लोग ऑफिस नहीं जा सकेंगे क्योंकि उन्हें घरों में अपने बच्चे संभालने होंगे. ऐसे में स्कूलों को खोलना जरूरी है.

हालांकि, फ्रांस, डेनमार्क और नार्वे की सरकारों ने केवल इसी एक वजह के चलते बच्चों को स्कूल भेजने का खतरा नहीं उठाया. जानकारों के मुताबिक कोरोना वायरस को लेकर बच्चों पर हुए कई अध्ययनों के नतीजों को देखकर और विशेषज्ञों की सलाह के बाद ही इन देशों की सरकारों ने स्कूल खोलने का फैसला किया. पिछले दिनों यूरोप और अमेरिका में हुए कई अध्ययनों में सामने आया है कि कम उम्र के बच्चों को कोरोना वायरस होने का खतरा वयस्कों की तुलना में काफी कम है. और अगर ये बच्चे संक्रमित हो भी जाते हैं तो इनके ठीक होने की संभावना काफी ज्यादा बनी रहती है.

हाल में जॉन हॉपकिंस सेंटर फॉर हेल्थ सिक्योरिटी द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक नौ साल तक की उम्र के बच्चों को कोरोना वायरस से संक्रमित होने का खतरा सबसे कम होता है. यह रिपोर्ट अमेरिका में 2,572 कोरोना संक्रमित बच्चों पर किये गए एक शोध पर आधारित है. रिपोर्ट के अनुसार कुल संक्रमितों बच्चों में से 15 फीसदी की उम्र एक साल से कम थी, जबकि 11 फीसदी बच्चे एक से चार साल तक की उम्र के थे. इसके अलावा 15 फीसदी बच्चों की उम्र पांच से नौ साल, 27 फीसदी की 10 से 14 साल है और 32 फीसदी कोरोना संक्रमित बच्चों की उम्र 15 से 17 साल के बीच थी. अध्ययन के मुताबिक कोरोना संक्रमित किसी भी बच्चे में वयस्कों की तरह संक्रमण गंभीर स्थिति में नहीं पहुंचा और सभी बच्चे बिना अस्पताल गए ही ठीक हो गए.

इसके अलावा कुछ अध्ययन यह भी बताते हैं कि घर में ही बंद रहने का असर बड़ों की तरह बच्चों के भी मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा है. यह भी एक कारण है जिसके चलते कई यूरोपीय देशों की सरकारों ने काफी परेशानी और खतरा उठाते हुए भी पूरी सावधानी के साथ अपने बच्चों को स्कूल भेजने का निर्णय लिया है.