असम्भव ही सम्भावना

जब आप लाचार होकर संभव को भी अवास्तविक मानने को मजबूर हों तब आपको हो सकता है कि असम्भव का ख़याल आये और आप उसकी सम्भावना की कल्पना करने लगें.

एक ख़बर आयी कि तिरुपति देवस्थानम् को तालाबन्दी के दौरान कई करोड़ रुपयों की हानि हुई है जो कि वहां चढ़ावे में आते अगर भक्तगण वहां इस समय सामान्य रूप से आते होते. ऐसी ख़बरें भी आती रही हैं कि कई धार्मिक संस्थानों विशेषतः मंदिरों के पास अपार धन-राशि जमा है. एक ख़बर यह भी आयी कि वैष्णो देवी मंदिर के प्रबन्धन ने वहां कोरोना प्रकोप के सिलसिले में रुके मुसलमान भाइयों के लिए विशेष भोजन की व्यवस्था की है. जहां-तहां गुरुद्वारों, गिरजाघरों, मंदिरों, मसजिदों ने, विशेषतः घर-वापसी पर निकले लाखों ग़रीबों और मज़दूरों में से कइयों के लिए, बिना भेदभाव के, खाने-पीने का इन्तज़ाम किया है. बहुत सारी स्वयंसेवी संस्थाएं, समूह, इस विपत्ति के समय बने समूह आदि इस सिलसिले में सहायता और सहयोग कर रहे हैं. अपने को राष्ट्रीय स्वयंसेवक कहने वाले लोग कहां-क्या कर रहे हैं इसका पता नहीं!

हो सकता है कि उन्होंने या उनमें से कुछ ने ऐसा किया हो और मेरे नोटिस में न आया हो (आजकल झूठी खबरें इतनी अधिक हैं कि उनमें से सच्ची ख़बर को नबेरना-खोजना बहुत कठिन है). जो सचमुच धनाढ्य बड़े धार्मिक मन्दिर, संस्थान आदि हैं क्या वे एक बड़ी राशि साधनहीन, निस्सहाय लोगों के लिए उदारतापूर्वक ख़र्च कर सकते हैं? देश पर इतनी बड़ी विपत्ति स्वतंत्रता के बाद पहली बार पड़ी है. और उसकी मार सबसे अधिक भयावह ढंग से ग़रीब शोषित-वंचित तबकों पर पड़ी है. हर धर्म में ईश्वर को दीनदयालु माना गया है. क्या ईश्वर की इस दीनदयालुता को ठोस रूप से अपने देश के इन असहाय नागरिकों को अहसास कराने का यह समय नहीं है? अगर इसकी अपेक्षा कारोबारियों और सिनेमा से जुड़े लोगों से की जा सकती है तो बड़े धार्मिक स्थलों-संस्थाओं से ऐसी उम्मीद क्यों नहीं की जानी चाहिए?

पूजा-पाठ आदि अनुष्ठान अपनी जगह हैं और यथासंभव विधिवत् चलते रहें. पर इस समय सच्ची पूजा तो दरिद्रनारायण की पूजा में ही हो सकती है. इससे अधिक धार्मिक काम कोई और नहीं हो सकता. क्या इस लगभग असंभव की समय रहते कोई सम्भावना है?

कविता का वर्तमान

इस समय वर्तमान हमें इस क़दर भयावह रूप से आक्रान्त किये है कि हमें कई बार वर्तमान के अलावा, एक अनन्त और असमाप्य वर्तमान के अलावा, कोई और समय सूझता ही नहीं है. चूंकि अन्य समय हैं और वर्तमान ने उन्हें ग़ायब या अतिक्रमित नहीं किया है, इसलिए कविता के सिलसिले में हमें, उसके एक अधिक व्यापक ओर बहुल वर्तमान के बारे में सोचना चाहिये.

हिन्दी कविता का वर्तमान सिर्फ़ उन पांच-छः पीढ़ियों के कवियों तक महदूद नहीं करना चाहिये जो इस समय कविता लिख रहे हैं. इस वर्तमान में प्राचीन कविता, मध्ययुग आधुनिकता का दौर आदि में हुए वे सब कवि शामिल हैं जो हमें आज संबोधित करते सुनायी देते हैं. वैदिक ऋचाओं, संस्कृत श्लोकों, प्राकृत-अपभ्रंश की पदावली, कबीर की साखियां, तुलसी-सूर-मीरा के पद, मीर-ग़ालिब-इक़बाल-फ़िराक-फ़ैज की शायरी, निराला-अज्ञेय-शमशेर-मुक्तिबोध, रघुबीर सहाय-श्रीकान्त वर्मा, साही आदि की कविताएं जिन्हें हम आज भी पढ़ते-सुनते हैं हमारा याने कविता का वर्तमान हैं.

यह एक बड़ा परिवार है - समय के आर-पार फैला हुआ है और हमें इसके कवि या रसिक होने के कारण, सदस्य हो सकने का सौभाग्य मिला है. जो कुछ हमसे पहले लिखा गया और अब भी अपनी सार्थकता में बचा हुआ है हमारा पड़ोस है जैसे जो आज लिख रहे हैं वे भी हमारे पड़ोस में हैं. सौभाग्य यह भी है कि भले हम अपने कोरोना-आक्रान्त वर्तमान में अपने भौतिक पड़ोसियों से दूरी बरत रहे हैं, कविता के इस विशाल वर्तमान में कोई दूरी नहीं है - हम सबकुछ को पड़ोस में देख-पढ़-छू सकते हैं.

अगर ध्यान दें तो यह स्पष्ट होगा कि इस समय में दो तरह की आवाजें आज अधिक हैं - दलितों और स्त्रियों की. सदियों तक चुप्पी में विवश किये गये लोग अब कविता में मुखर होकर कविता का लोकतंत्र सशक्त कर रहे हैं. यह विडम्बना अनदेखी नहीं की जा सकती कि भारत में लोकतंत्र तरह-तरह के सत्ता-प्रपंचों से सिकुड़ रहा है, कविता में लोकतंत्र बढ़ रहा है. यह याद रखना चाहिये कि अगर प्रश्नवाचकता और बहुलता को लोकतंत्र की बुनियादी प्रवृत्ति माना जाये तो स्वतंत्रता के बाद से कविता लगातार दी हुई व्यवस्था के विरोध में खड़ी कविता रही है. एक दिलचस्प अन्तर्विरोध यह है कि स्वयं कविता के अपने समाज में किसी न किसी तरह की व्यवस्था स्थापित होती रही है और इसको प्रश्नांकित करने वालों को जगह तो मिली है पर मान्यता नहीं जो कि लोकतांत्रिक नहीं रहा है. फिर भी, कविता में ऐसे अनेक जीवन-प्रसंग, छवियां और आशय आये हैं जो उसमें पहले नहीं थे.

यह प्रश्न बार-बार उठता है कि वर्तमान कविता को समझने और जांचने के आधार क्या होंगे? अलग-अलग रसिकों के अलग-अलग आधार हो सकते हैं, होते रहे हैं. उनमें आपस में संवाद और द्वन्द्व भी होते रहते हैं. अपनी ओर से सामान्यीकरण की सीमाएं जानते हुए कुछ आधार प्रस्तावित कर सकता हूं:

कल्पना (किस कोटि की, कितनी प्रगल्भ, किस प्रकार/क़दर विकल्पशील, कितनी मुक्त!); स्मृति (कैसी परम्परा का उत्तराधिकरण, कितनी- जातीय, कितनी सांस्कृतिक-सामाजिक, कितनी निजी?); अन्तर्ध्वनियाx (पहले की कविता, दूसरे कवियों की कितनी अनुगूंज?); भाषा (भाषा की कितनी शक्तियों का उपयोग, भाषा की अनजानी जगहों पर ले जाने का जोखिम, शब्दों में नये अर्थारोपण, शब्दों की सटीकता?); सचाई से संबंध (अपनी सचाई का सार्थक रूपायन, सचाई से संवाद और द्वन्द्व, सचाई का बखान, प्रश्नांकन, स्वमान्य सचाई का कैसा-क्यों अतिक्रमण?); स्थानीयता (ब्यौरे, बिम्ब, कविता कहां अवस्थित?); शिल्प (कैसा गठन, लय, कौशल?); नवाचार (क्या विचलन, नये मार्ग की खोज की कोशिश, नयी उद्भावना?) और दृष्टि (औसत नैतिकता से कितना विचलन, कौन से सरोकारों की चरितार्थता, संसार-भाषा से कैसा अनुराग या विराग?).

ये आधार ऐसे हैं जो किसी भी समय की कविता में पाये-जांचे-परखे जा सकते हैं. ज़ाहिर है कि इनमें घटत-बढ़त भी की जा सकती है.

अगर कविता के वर्तमान के एक महत्वपूर्ण हिस्से, युवाओं द्वारा लिखी जा रही कविता पर ध्यान केन्द्रित करें तो यह स्पष्ट होगा कि इस कविता को आधुनिक काल में प्रचार-प्रसार-प्रकाशन के अभूतपूर्व अवसर मिले हैं. याद करें कि शमशेर बहादुर सिंह का पहला कविता-संग्रह तब निकला जब वे 50 वर्ष की आयु के होने वाले थे और मुक्तिबोध तो 47 वर्ष की आयु तक पहुंचने से पहले दिवंगत होने पर भी अपना पहला कविता-संग्रह प्रकाशित नहीं देख पाये थे. 1970-74 के बीच ‘पहचान’ पत्रिका अन्तर्गत तब के पन्द्रह युवा कवियों के पहले कविता संग्रह पुस्तिकाओं के रूप में प्रकाशित हुए थे. अच्छा है कि आज यह स्थिति नहीं है और युवा कविता कई प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित-प्रोत्साहित की जा रही है. अनेक अनजानी जगहों से युवा कवि आ रहे हैं. यह कविता का बहुत रोचक और उत्तेजक विकेन्द्रीकरण है.

लेकिन कुछ ख़तरे भी, विशेषतः तुरन्त संचार की मोबाइल फ़ोन सुविधा, नेट और वेब आदि के कारण, सामने आये हैं. युवाओं में लोकप्रियता और सफलता का मोह सार्थकता की चिन्ता की बलि देकर बहुत फैल गया है. उनमें विफलता की सार्थकता की कोई पहचान नहीं है. तात्कालिकता का प्रलोभन भी गहरा गया है. बहुत सारे युवा तात्कालिक मान्यता की आकांक्षा और कोशिश करते नज़र आते हैं. कई युवा कवि अपनी एक बिरादरी सी बनाकर आत्मतुष्टि के बाड़े में अपने को जाने-अनजाने सीमित कर रहे हैं. बहुतों में, उनकी कविता में अखबारी क़िस्म का इकहरापन है. उन्हें याद ही नहीं है कि उनसे पहले भी कविता, अच्छी, सार्थक और महान कविता लिखी गयी है. उसकी कोई अन्तर्ध्वनि उनमें पकड़ पाना मुश्किल है. कई बार युवाओं की कविता में मौजूदा स्थिति की भयावहता, लोकतंत्र में की जा रही कटौतियों, प्रश्नांकन की सिकुड़ती जगह, धर्मान्धता-साम्प्रदायिकता के बढ़ते भूगोल की कोई चिन्ता, कोई बेचैन बोध दिखायी नहीं देता.

कहीं न कहीं बहुत सारी युवा कविता ने स्थापित व्यवस्था से एक तरह का अबोध समझौता कर लिया है, यह भूलकर कि ऐसा कोई भी समझौता कविता की बुनियादी नैतिकता और आत्मालोचन का क्षरण है. इन विचलनों का प्रत्याख्यान यह करके नहीं किया जा सकता कि पहले के युवा कवियों पर भी ऐसे ही आरोप लगे थे. जिन पर लगे थे उनकी कविता आज याद नहीं की जाती! कविता अपने जीवट भर से नहीं अपने जोखिम से ही आगे बढ़ती आयी है. अपने समय में बेहद नाराज़ कवि श्रीकांत वर्मा ने कहा था - ‘जो बचेगा, कैसे रचेगा?’