अमेरिका में अश्वेत नागरिक जॉर्ज फ्लॉयड की पुलिस हिरासत में मौत के बाद कई शहरों में भड़की हिंसा रुकने का नाम नहीं ले रही है. न्यूयॉर्क, शिकागो, फिलाडेल्फिया और लॉस एंजेलेस जैसे बड़े शहरों के बाद हिंसा की आग व्हाइट हाउस के दरवाजे तक पहुंच गयी. रविवार को व्हाइट हाउस के बाहर प्रदर्शनकारियों ने जमकर हंगामा और आगजनी की. पुलिस को प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए आंसू गैस का इस्तेमाल करना पड़ा. अमेरिकी मीडिया के मुताबिक हालात इतने खराब हो गए थे कि सुरक्षा अधिकारियों को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को कुछ समय के लिए भूमिगत बंकर तक में ले जाना पड़ा. तनाव बढ़ता देख अमेरिका के 40 शहरों में कर्फ्यू लगा दिया गया है. डोनाल्ड ट्रंप ने प्रदर्शनकारियों से कहा है कि जल्द ही दंगे नहीं रुके तो वे सेना को अमेरिका की सड़कों उतार देंगे.

सिगरेट का पैकेट, 20 डॉलर का नोट और छह मिनट

बीते 25 मई की शाम को मिनेसोटा प्रांत के मिनेपॉलिस शहर में अफ्रीकी मूल के जॉर्ज फ्लॉयड सिगरेट खरीदने जाते हैं. फ्लॉयड 20 डॉलर का नोट देकर सिगरेट का पैकेट लेते हैं. स्टोर के एक कर्मचारी को 20 डॉलर का नोट नकली होने का शक होता है. कर्मचारी इसकी सूचना पुलिस को देता है. पुलिस अधिकारियों के मुताबिक कर्मचारी ने पुलिस से फोन पर यह भी कहा कि फ्लॉयड शराब के नशे में लग रहे हैं और सिगरेट का पैकेट भी वापस नहीं दे रहे हैं.

न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक कुछ मिनटों में वहां दो श्वेत पुलिस अधिकारी पहुंचते हैं. उनमें से एक पुलिस अधिकारी थॉमस लेन फ्लॉयड की कार के पास पहुंचकर अपनी पिस्टल उन पर तान देता है. लेन फ्लॉयड से हाथ ऊपर करके कार से बाहर आने को कहा जाता है. फ्लॉयड के कार से बाहर निकलते ही पुलिस अधिकारी उन्हें हथकड़ी पहना देते हैं और फ्लॉयड को बताते हैं कि उन्हें नकली मुद्रा इस्तेमाल करने के आरोप में गिरफ्तार किया जा रहा है. इसके बाद अधिकारी फ्लॉयड को पुलिस की गाड़ी में डालने की कोशिश करते हैं. इसी दौरान फ्लॉयड जमीन पर गिर जाते हैं. अमेरिकी मीडिया के मुताबिक फ्लॉयड ने पुलिस को बताया कि वह क्लॉस्ट्रोफोबिक हैं. क्लॉस्ट्रोफोबिक यानी एक ऐसा व्यक्ति जिसे तंग जगहों से डर लगता हो. इसके बाद पुलिस अधिकारी उन्हें फुटपाथ पर बैठा देते हैं.

तभी मौके पर शॉविन नाम के एक और पुलिस अधिकारी पहुंचते हैं. वे जॉर्ज फ्लॉयड को जबरन कार में ठूंसने की कोशिश करते हैं. फ्लॉयड फिर जमीन पर गिर जाते हैं, लेकिन इस बार शॉविन अपना बायां घुटना फ्लॉयड की गर्दन पर रख देते हैं. न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक जॉर्ज फ्लॉयड की गर्दन आठ मिनट 46 सेकेंड तक पुलिस वाले के घुटने के नीचे दबी रही. इस दौरान फ्लॉयड ने कई बार कहा, ‘आई कान्ट ब्रीद (मैं सांस नहीं ले पा रहा हूं).’ लेकिन इसके बाद भी शॉविन ने उनकी गर्दन से पैर नहीं हटाया.

प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक गर्दन दबने के करीब छह मिनट बाद फ्लॉयड के शरीर ने हरकत करना बंद कर दिया था लेकिन इसके बाद भी शॉविन ने उसकी गर्दन दबाये रखी. जब पुलिस वालों ने फ्लॉयड की नब्ज टटोली तो वह गायब थी. इसके बाद घबराये पुलिस अधिकारियों ने एम्बुलेंस बुलाकर उन्हें अस्पताल भेजा, जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया. घटना के बाद तीनों पुलिसकर्मियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया. गर्दन दबाने वाले पुलिस अधिकारी शॉविन पर थर्ड डिग्री मर्डर की धारा लगाई गई है.

मौत से लोग इतने क्यों भड़क गए

जॉर्ज फ्लॉयड की मौत के कुछ ही घंटों बाद अमेरिका में हिंसक प्रदर्शन शुरू हो गए. देखते ही देखते इस घटना के विरोध में लगभग सभी बड़े शहर प्रदर्शनकारियों के निशाने पर आ गए. कुछ जानकारों की मानें तो इस घटना ने इसलिए लोगों में ज्यादा गुस्सा भर दिया क्योंकि इसने 2014 में एक अश्वेत युवक एरिक गार्नर की मौत की याद ताजा कर दी. तब भी न्यूयॉर्क शहर के एक पुलिस अधिकारी ने एरिक की गर्दन तब तक अपने घुटने के बीच में दबाए रखी थी, जब तक उसकी मौत नहीं हो गई. एरिक ने 11 बार बोला था ‘आई कान्ट ब्रीद (मैं सांस नहीं ले पा रहा हूं)’ लेकिन इसके बाद भी पुलिस अधिकारी ने उसकी गर्दन नहीं छोड़ी.

अमेरिकी मीडिया के मुताबिक इस बार हिंसा भड़कने का एक बड़ा कारण यह भी है कि बीते कुछ सालों से अश्वेत लोगों के खिलाफ पुलिस का अत्याचार काफी ज्यादा बढ़ गया है. पुलिस की निर्दयता के बेहद चर्चित हुए मामलों में 2014 में फर्गसन शहर में 18 साल के निहत्थे युवक माइकल ब्राउन को गोली मारने की घटना भी है. इसके बाद वहां के लोग तब भड़क गए थे, जब गोली मारने वाले अधिकारी के ऊपर से हत्या की धाराएं हटा ली गई थीं.

इसके बाद 2015 में अमेरिका के बाल्टीमोर में 25 साल के अश्वेत युवा फ्रेडी ग्रे की मौत का मामला काफी गरमाया रहा. फ्रेडी ग्रे को गिरफ्तार करते समय पुलिस ने इतनी ताकत लगाई थी कि पुलिस वैन में ही उसकी मौत हो गई थी. फ्रेडी की गिरफ्तारी का वीडियो भी सामने आया था. वीडियो के प्रसारित होने के बाद बाल्टीमोर में भारी हिंसा हुई जिसके बाद इमरजेंसी भी लगानी पड़ी थी.

2016 में मिनेसोटा प्रांत में ही हुई पुलिसिया कार्रवाई की एक घटना को लेकर खासा बवाल हुआ था. खबरों के मुताबिक 32 साल के एक अश्वेत युवक फिलैंडो कैस्टिल ने ट्रैफिक सिग्नल पर जैसे ही एक पुलिस अधिकारी को बताया कि उसके पास पिस्टल है, पुलिस अधिकारी ने तुरंत उसे सात गोलियां मार दीं. इस घटना को लेकर 2017 में तब और ज्यादा प्रदर्शन हुए थे, जब इस पुलिस अधिकारी को अदालत ने सभी आरोपों से मुक्त कर दिया था. 2016 में अमेरिका के लुइसियाना शहर में पुलिस की निर्दयता की एक और घटना से काफी बवाल मचा था. तब पुलिस ने बाजार में सरेआम एक 37 वर्षीय अश्वेत एल्टन स्टर्लिंग को गोली मार दी थी, जो बाजार सीडी बेच रहा था.

ब्रिटिश अखबार द गार्डियन द्वारा किये गए एक अध्ययन के मुताबिक अमेरिका की पुलिस ने 2016 में प्रति दस लाख लोगों में औसतन 10.13 लोगों को गोली मारी. इनमें अश्वेत को गोली लगने की दर 6.6 थी, और श्वेतों की 2.9. 2018 में अमेरिकन जर्नल ऑफ पब्लिक हेल्थ में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार अमेरिका में प्रति एक लाख लोगों में पुलिस के हाथों अश्वेत लोगों के मारे जाने की दर 1.9 से 2.4 के बीच है, जबकि गोरे लोगों के लिए यह 0.6-0.7 ही है.

वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक 2015 से लेकर अब तक अमेरिका में पुलिस की गोलीबारी के करीब 4,400 मामले दर्ज किए गए हैं. अखबार के मुताबिक अमेरिका में 13 फीसदी आबादी ही अश्वेतों की है, लेकिन पुलिस की गोली से कुल मरे लोगों में एक चौथाई हिस्सा अश्वेत नागरिकों का है. अखबार ने यह निष्कर्ष निकाला है कि अमेरिका में किसी निहत्थे गोरे व्यक्ति की तुलना में किसी निहत्थे अश्वेत व्यक्ति के पुलिस द्वारा मारे जाने की संभावना चार गुना अधिक होती है. पुलिस हिंसा से जुड़ी जानकारी देने वाली एक अन्य वेबसाइट के मुताबिक ‘अमेरिका में साल 2019 में 1,099 लोग पुलिस के हाथों मारे गए... देश की कुल आबादी का 13 फीसदी होने के बावजूद मरने वालों में 24 फीसदी अश्वेत लोग थे.’

कुछ अमेरिकी जानकारों के मुताबिक जॉर्ज फ्लॉयड की मौत ने अमेरिका के लोगों को इसलिए ज्यादा आक्रोशित कर दिया है, क्योंकि लोग पुलिस की ज्यादती से परेशान हो चुके हैं और वे पुलिसिया सिस्टम में पूरी तरह बदलाव चाहते हैं. हालांकि, इस बार प्रदर्शनकारियों की हिम्मत बढ़ने की एक वजह और भी है. इस बार देखने में आया है कि हॉलीवुड के दिग्गज, अमेरिका के बड़े-बड़े राजनेता, बड़े कारोबारी और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं, सभी अमेरिकी पुलिस के तौर तरीकों, फेडरल सरकार की भूमिका, वहां के क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम और वहां की क़ानूनी एजेंसियों में फैले नस्लीय भेदभाव पर चर्चा कर रहे हैं. इनमें से लगभग सभी ने अमेरिकी पुलिस सिस्टम से जुड़े कानूनों में बड़े बदलाव की मांग की है जिससे कोई पुलिस अधिकारी किसी को गोली मारने से पहले सौ बार सोचे. जानकारों की मानें तो प्रदर्शनकारियों को लगता है कि इस बार पुलिस और प्रशासन के खिलाफ अमेरिका में जिस तरह का माहौल बना है, उसे देखते हुए वे संघीय सरकार को पुलिस सिस्टम में बदलाव के लिए मजबूर कर सकते हैं. इसी उम्मीद में प्रदर्शनकारी लगातार अमेरिका की सड़कों पर डटे हुए हैं.